More
    Homeप्रवक्ता न्यूज़पैंडोरा-पेपर्सः काले पन्नों के सफेद दागी

    पैंडोरा-पेपर्सः काले पन्नों के सफेद दागी

    प्रमोद भार्गव
    टैक्स हैवन यानी कर के स्वर्ग माने जाने वाले देशों में गुप्त संपंत्ति बनाने की पड़ताल से जुड़े दस्तावेजों में 300 प्रतिष्ठित भारतीयों के नाम हैं। इनमें प्रसिद्ध व्यवसायी अनिल अंबानी, विनोद अडाणी, समीर थापर, अजीत केरकर, सतीश शर्मा, किरण मजूमदार शॉ, पीएनबी बैंक घोटाले के आरोपी नीरव मोदी की बहन पूर्वी मोदी, फिल्म अभिनेता जैकी श्रॉफ के अलावा क्रिकेट खिलाड़ी सचिल तेंदुलकर, लॉबिस्ट नीरा राडिया और पॉप गयिका शकीरा के नाम भी शामिल हैं। विदेशी हस्तियों में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी बिलेयर और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान मंत्रीमंडल के कुछ मंत्रियों के नाम भी शामिल हैं। भारत समेत 91 देशों के 35 मौजूदा व पूर्व राष्ट्राध्यक्षों तथा 330 से ज्यादा राजनेताओं और अधिकारियों के नाम इस सूची में दर्ज हैं। इन लोगों में धार्मिक नेताओं और नशीले पदार्थों के कारोबारी भी शामिल हैं। इन काले दस्तावेजों का खुलासा ‘इंटरनेशनल कंसोर्टियम आॅफ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स’ ने किया है। काले कारनामों के ये दस्तावेज 20 लाख दस्तावेजों की जांच का प्रतिफल हैं। इस खोजी अभियान में 117 देशों के 150 मीडिया संस्थानों से जुड़े 600 पत्रकारों ने अहम् भूमिका निभाई। इसमें भारतीय समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार भी शामिल थे। भारत सरकार ने इस खुलासे के तत्काल बाद सीबीडीटी के चेयरमेन की अध्यक्षता में सच्चाई जानने के लिए एक समिति का तत्काल गठन भी कर दिया। इसमें प्रवर्तन निदेशालय, रिर्जव बैंक और एफआईयू के प्रतिनिधि शामिल हैं।
    विदेशों में कालाधन सफेद करने को लेकर यह नया खुलासा है। इसके पहले पनामा पेपर्स के जरिए दुनियाभर के सफेद कुबेरों में 426 भारतीयों के नाम सामने आए थे। इसी तरह पैराडाइज पैपर्स का भी खुलासा हुआ था, जिसमें 714 भारतीयों के नाम थे। हालांकि ये खोजें भी आईसीआईजे ने ही की थीं। इन खुलासों से पता चला कि बरमूडा की सवा सौ साल पुरानी वित्तीय एवं कानूनी सलाहकार कंपनी ऐपलबे ने कालेधन का निवेश बड़ी मात्रा में कराया था। सबसे ज्यादा कालाधन जमा करने वाले लोगों में 31000 अमेरिका के 14000 ब्रिटेन और 12000 नागरिक बरमूडा के हैं। भारत के 714 लोगों के नाम पैराडाइज अभिलेखों में हैं।
    हालांकि इस सूची में नाम होने से यह जाहिर नहीं होता कि ये लोग वास्तव में कर वंचना के दोषी हैं। दरअसल विदेशी बैंकों में धन जमा करना कोई अपराध उस स्थिति में नहीं है। जब कायदे-कानूनों का पालन करके धन जमा किया गया हो। इसलिए यह जांच के बाद ही साफ होगा कि भारतीय नागरिकों ने कर चोरी करते हुए धन जमा किया है अथवा नहीं। दरअसल पनामा पेपर्स उजागार होने पर 426 भरतीयों के नाम सामने आए थे। इनकी जांच करने पर पता चला कि इनमें से 147 लोग और कंपनिया ही कार्यवाही के लायक हैं। लेकिन कर चोरी में लिप्त होने के बावजूद इनके विरुद्ध अब तक कोई कड़ी कार्यवाही नहीं की गई है। इस लिहाज से यह आशंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि सरकार कर चोरी करने वालों के विरुद्ध कोई कार्यवाही करना चाहती भी है या नहीं ? जबकि इन्हीं पनामा पेपर्स में नाम आने पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को न केवल सत्ता से वंचित होना पड़ा था, बल्कि अदालत ने उन्हें सजा भी सुनाई थी। भ्रष्टाचार का यह मामला लंदन के एवनफील्ड संपत्ति खरीद का था, जिसमें शरीफ को 10 साल की सजा के साथ 73 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया था। इसी मामले में शरीफ की बेटी मरियम को 7 साल और जांच में सहयोग नहीं करने के ऐवज में 1 साल की अतिरिक्त सजा सुनाई गई थी। पाक के राष्ट्रीय उत्तरदायित्व ब्यूरो का आरोप था कि शरीफ और उनके परिवार ने 1993 में भ्रष्टाचार से अर्जित धन से लंदन में 4 फ्लैट खरीदे थे। इस मामले में अदालत ने शरीफ और उनकी बेटी को आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का दोषी पाया और सजा सुनाई।
    बरमूडा की ऐपलबे कंपनी अपनी दुनियाभर में फैंली 118 सहयोगी कंपनियों के जरिए दुनिया के भ्रष्ट नौकरशाहों, राजनेताओं, उद्योपतियों और अन्य व्यवसायों से जुड़े लोगों का कालाधन विदेशी बैंकों में जमा कराने के दस्तावेज तैयार करती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के श्ोयर खरीदने-बेचने और उनमें भागीदारी के फर्जी दस्तावेज भी यह कंपनी तैयार कराती है। कर चोरी का ये लोग दुनिया के उन देशों में अपने धन को सुरक्षित रखते हैं, जिन्हें कालेधन का स्वर्ग कहा जाता है। एक जमाने में स्विट्जरलैंड इसके लिए बदनाम था। लेकिन अब मॉरिशस, बरमूडा, साइप्रस, पनामा बहामास, लग्जमबर्ग और कैमन आईलैंड देश भी कालेधन को सुरक्षित रखने की सुविधा धन-कुबेरों को दे रहे हैं। इन देशों ने ऐसे कानून बनाए हुए हैं, जिससे लोगों को कालाधन जमा करने की वैधानिक सुविधा प्राप्त होती है। दरअसल इसी धन से इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं गतिशील हैं। बरमूडा एक छोटा देश है और वहां प्राकृतिक एवं खनिज संपदाओं की कमी है। इसलिए यह देश अपनी अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखने के लिए तस्कर व अपराधियों का धन भी सफेद बनाने का काम बड़े पैमाने पर करता है। यही वजह है कि स्विस बैंकों की तरह बरमूडा भी काले कारोबारियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन गया है। हालांकि कालेधन के भारतीय अपराधी विजय माल्या और नीरव मोदी को ब्रिटेन ने शरण दी हुई है।
    हालांकि इसके पहले भी भारतीय लोगों के नाम इस तरह के खुलासों में आते रहे हैं। अप्रैल 2013 में आॅफशोर लीक्स के नाम से पहला खुलासा हुआ था। इसमें 612 भारतीयों के नाम शामिल थे। फिर स्विस लीक्स नामक खुलासा हुआ। इसमें 1195 भारतीयों के नाम थे। इनके खाते एचएसबीसी बैंक की जिनेवा शाखा में बताए गए थे। इसके बाद 2016 में पनामा लीक्स के जरिए 426 भारतीयों के नाम सामने आए थे। इन सभी खुलासों के बावजूद कर चोरी करने वालों पर अब तक कोई ठोस कार्यवाही सामने नहीं आ पाई है। नरेंद्र मोदी सरकार ने कालेधन पर नियंत्रण के लिए नोटबंदी की थी और श्ोल कंपनियों पर कड़ी कानूनी कार्यवाही भी की थी। तीन ऐसे कानून भी बनाएं, जिससे कालाधन देश से बाहर नहीं जाने पाए। लेकिन नतीजे ढाक के तीन पात रहे। नतीजतन इन सब कोशिशों के बावजूद कालेधन के उत्सर्जन पर कितना असर पड़ा, यह पारदर्शिता के साथ अबतक स्पष्ट नहीं हो पाया है ? दरअसल हमारा प्रशानिक ढांचा कुछ ऐसा है कि वह गलत काम करने वालों को कानूनी सरंक्षण देता है। इसलिए अवसर मिलते ही नए-नए गोरखधंधे शुरू हो जाते हैं।
    दरअसल दुनिया में 77.6 प्रतिशत काली कमाई ‘ट्रांसफर प्राइसिंग’ मसलन संबद्ध पक्षों के बीच सौदों में मूल्य अंतरण के मार्फत पैदा हो रही है। इसमें एक कंपनी विदेशों में स्थित अपनी सहायक कंपनी के साथ हुए सौदों में 100 रुपए की वस्तु की कीमत 1000 रुपए या 10 रुपए दिखाकर करों की चोरी और धन की हेराफेरी करती हैं। ऐपलबे कंपनी इन्हीं गोरखधंधों के अभिलेख तैयार करने में माहिर है। भारत समेत दुनिया में जायज-नजायज ढंग से अकूत संपत्ति कमाने वाले लोग ऐसी ही कंपनियों की मदद से एक तो कालेधन को सफेद में बदलने का काम करते हैं,दूसरे विदेश में इस पूंजी को निवेश करके पूंजी से पूंजी बनाने का काम करते हैं। यूरोप के कई देशों ने अपनी अर्थव्यस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए दोहरे कराधान कानूनों को वैधानिक दर्जा दिया हुआ है। इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरंक्षण प्राप्त है। बरमूडा, पनामा और स्विट्रलैंड जैसे देशों के बैंकों को गोपनीय खाते खोलने, धन के स्रोत छिपाने और कागजी कंपनियों के जरिए लेनदेन के कानूनी अधिकार हासिल हैं। बहरहाल, ऐसे ही कानून झोल के चलते कालेधन का उत्सर्जन और उसका विदेशी बैंकों में जमा होने का सिलसिला निरंतर बना हुआ है।

    प्रमोद भार्गव

    प्रमोद भार्गव
    प्रमोद भार्गवhttps://www.pravakta.com/author/pramodsvp997rediffmail-com
    लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    Must Read