पंथनिरपेक्षता और छत्रपति शिवाजी महाराज

भारत में प्राचीन काल से ही पंथनिरपेक्ष शासन व्यवस्था की कल्पना हमारे ऋषि – महर्षियों ने की है । राजा की न्यायप्रियता इसी बात में मानी और देखी गई है कि वह जब न्याय करे तो न्याय की आशा करके आने वाले पक्ष की जाति , सम्प्रदाय , लिंग या भाषा आदि कुछ भी ना देखे । उससे अपेक्षा की गई है कि जैसे ईश्वर प्रत्येक प्राणी को उसके कर्म का फल वैसे – वैसे ही देता है , जैसे जैसे उसका कर्म है , वैसे – वैसे ही राजा को भी अपनी जनता में न्याय करते समय प्रत्येक व्यक्ति के अपराध का उसे यथोचित और समुचित दंड अवश्य देना चाहिए । राजा की ऐसी समदर्शी न्यायप्रिय भावना से समाज में वास्तविक पंथनिरपेक्ष शासन की स्थापना हो जाती है। 
शिवाजी जिस काल में जन्मे उस काल में शासन पूर्णतया सांप्रदायिक लोगों के हाथों में था । फलस्वरुप न्याय भी सांप्रदायिक लोगों के हाथों से ही दिया जा रहा था । इस से जनता त्रस्त थी । कई बार ऐसा भी देखा जाता था कि मुस्लिम जनता भी अपने काजियों या अपने नवाब , सुलतान या बादशाहो से सही न्याय नहीं ले पाती थी । इस प्रकार वास्तविक पंथनिरपेक्ष शासन की स्थापना करना उस समय आवश्यक था। लोगों की इच्छा थी कि कोई ऐसा शासक हमारे लिए आए जो हमें वास्तविक न्याय प्रदान कर सके । परिस्थितियों ने शिवाजी का निर्माण किया और जब शिवाजी गद्दी पर बैठे तो उन्होंने वास्तव में न्यायपूर्ण प्रशासन देने का हर संभव प्रयास अपने लोगों के लिए किया । ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब शिवाजी के न्याय से मुस्लिम पक्ष भी प्रसन्न हुआ ।
शिवाजी भारत की जिस मिट्टी से बने थे उसकी सोंधी सोंधी सुगंध उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से सर्वत्र ही आती हुई अनुभव होती है । सर्वांशत: शिवाजी भारतीय संस्कारों की प्रतिमूर्ति थे । कुछ लोगों ने उनको मुस्लिम विरोधी सिद्ध करने का प्रयास किया है । इतिहास में यह वही लोग हैं जो भारत में राष्ट्रवाद ,राष्ट्रीयता और राष्ट्र की बात करने वाले लोगों को कोसते चले आए हैं । इन लोगों ने इतिहास का विकृतिकरण किया है और हमारे इतिहासनायकों को बहुत ही घृणास्पद ढंग से प्रस्तुत करने का कार्य किया है। 
भारत के राष्ट्रवाद में वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिनः की जो पवित्र धारा प्रवाहित होती है ,उससे भारतीय संस्कृति का और भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूल संस्कार निर्मित होता है । यही आज के शब्दों में हिंदुत्व है और यही प्राचीन अर्थों में आर्य राज्यव्यवस्था का एक अनिवार्य अंग था । शिवाजी अपने समय में चाहे भारत की इस महान परंपरा को जो भी शब्द दे रहे हों , परंतु उनका भाव एक ही था कि वह इस भारतीय संस्कृति के मूल संस्कार के अनुसार ही समाज का निर्माण करना चाहते थे। 
उस समय की मुगलिया सत्ता हिंदुओं पर जिस प्रकार अत्याचार कर रही थी , उससे देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज अपने आप को बहुत ही उत्पीड़ित अनुभव कर रहा था । शिवाजी ने मुगल सत्ता की इस नीति का विरोध किया और उन्होंने अपने राज्य में हिंदुओं सहित सभी वर्गों के लोगों की रक्षा करने का संकल्प लेकर आगे बढ़ने लगे । इसके लिए उन्होंने अनेकों हिंदू मंदिरों का जीर्णोद्धार भी कराया , गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाया। नेताजी पालकर जैसे लोगों को जो बलात मुस्लिम बना लिए गए थे , उनकी शुद्धि कराकर के पुनः हिंदू बनाया । शिवाजी के ये ऐसे कार्य हैं जो छद्म इतिहासकारों को कभी भी पसंद नहीं आते हैं । शिवाजी के इन कार्यों में इन इतिहासकारों को सांप्रदायिकता दिखती है । उन्हें भारत का राष्ट्रवाद इस बात में दिखाई देता है कि यहां का बहुसंख्यक हिंदू समाज किसी के भी अत्याचारों को मौन रहकर सहन कर ले । उसका प्रतिकार ना करे , प्रतिशोध ना करे ,प्रतिरोध ना करे , और उन पर किसी प्रकार से भी क्रोध ना करे ।यदि हिन्दू समाज कहीं प्रतिगामी साहस दिखाते हुए खड़ा हो जाता है तो इन इतिहासकारों के माथे पर बल पड़ जाते हैं ,और यह तुरंत उसे सांप्रदायिक कहकर अपमानित करने का प्रयास करते हैं । शिवाजी को जब यह सांप्रदायिक ठहराते हैं तो इन्हें इस बात का भी उत्तर देना चाहिए कि तत्कालीन मुगलिया शासन जो सांप्रदायिक आधार पर बहुसंख्यक हिंदू समाज के ऊपर अत्याचार कर रहा था , तो क्या वह ऐसा कार्य पंथनिरपेक्ष शासन की भावना के वशीभूत होकर कर रहा था या केवल और केवल अपने सांप्रदायिक मनोरथ को पूर्ण करने के लिए ऐसा कर रहा था ? 
औरंगजेब के पूर्वज अकबर ने चाहे दिखाने के लिए ही सही फिर भी अपनी राजपूत नीति में कहीं ना कहीं लचीलापन दिखाया । यद्यपि हम अकबर की राजपूत नीति की भी आलोचना करते हैं और हम उसकी इस नीति को वास्तविक रूप में हिंदू को छल बल से ठगने की नीति के रूप में देखते हैं , परंतु यहां प्रसंगवश कुछ देर के लिए हम मान लेते हैं कि अकबर ने अपनी राजपूत नीति में लचीलापन दिखाकर हिंदुओं के प्रति उदारता का व्यवहार किया था । जबकि औरंगजेब ने तो ऐसा भी कुछ नहीं किया । उसने अकबर की नीति के सर्वथा विपरीत जाते हुए केवल और केवल हिंदुओं के प्रति दमन और दलन की नीति को अपनाने में ही मुगलिया सत्ता का लाभ और भला देखा ।
हमें मिस्टर पारसनिस द्वारा लिखित और मुहम्मद आदिलशाह द्वारा जारी किये गए शाही आदेश से भली – भांति उस काल की परिस्थितियों के विषय में मालूम चलता हैं। 
वह लिखते हैं कि —-“सभी उच्च दर्जे के पद केवल मुसलमानों के लिए आरक्षित हों , इनमें से कोई भी पद किसी हिन्दू को नहीं मिलना चाहिए, कुछ छोटे पदों पर हिंदुओं को जरुर नौकरियां दी जा सकती हैं। सबसे अमीर हिन्दू का दर्जा भी एक गरीब मुसलमान से ऊपर नहीं होना चाहिए। एक हिन्दू और एक मुस्लिम के विवाद में भी काज़ी को किसी भी हालत में मुस्लिम को दण्डित नहीं करना चाहिये । चाहे मुस्लिम ने हिन्दू पर ( कितना ही ) जुल्म किया हो। सभी हिन्दुओं के लिए जजिया देना अनिवार्य हो। जो मुस्लिम क्लर्क जजिया ले रहा हो , वह अपने स्थान पर सदा बैठा रहे । चाहे अमीर से अमीर हिन्दू भी उसके सामने क्यूँ न खड़ा हो ? ” (सन्दर्भ- Parasnis I,S.,VOL.II,p.26)
इस शाही आदेश से स्पष्ट होता है कि मुस्लिम शासकों की नीतियां हिंदुओं के प्रति कितनी पक्षपातपूर्ण और अन्यायपरक थीं ? शिवाजी इस प्रकार की सोच को राजनीति से दूर रखना चाहते थे । भारत की आदर्श राजनीतिक परंपरा का यह बहुत ही पवित्र पक्ष है कि राजा न्यायशील और पक्षपातशून्य होकर अपने सिंहासन पर विराजमान होता है । शिवाजी इसी परंपरा को आगे बढ़ाना चाहते थे । यही कारण रहा कि उन्होंने अपने राज्य में मुस्लिमों के साथ भी पक्षपात न करने का व्रत लिया। 
मुस्लिम शासकों की सम्बन्ध में ऐसे भी अनेकों प्रमाण हमें मिलते हैं ,जब किसी बादशाह या नवाब ने अपने शासकीय दायित्वों का निर्वाह करते हुए ऐसे आदेश भी दिए कि हिंदू मंदिरों का विध्वंस कर दिया जाए ।अपनी शासकीय नीतियों के अंतर्गत वह नहीं चाहते थे कि हिंदू लोग अपने मंदिरों में जा कर पूजा पाठ कर सकें । इस प्रकार हिन्दुओं धार्मिक स्वतंत्रता को मुस्लिम शासकों ने पूर्णतया प्रतिबंधित कर दिया। 
आदिलशाह ने ही अपने दो आदेशों में क़ाज़ी को स्पष्ट रूप से कहा था कि उसे मराठा राज्य में हिन्दू मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ना हैं। (सन्दर्भ – Wad and Parasnis-Sanadapatren,pp.77,81) ”
आदिलशाह के इन आदेशों से स्पष्ट होता है कि वह अपने राज्य की हिंदू जनता के प्रति पूर्णतया असहिष्णु , निर्मम और कठोर हृदयी शासक था।
शिवाजी ने जब इस प्रकार के अत्याचारों को देखा तो उनकी आत्मा चीत्कार कर उठी । तब उन्होंने अपने समकालीन मुस्लिम बादशाह औरंगजेब के लिए एक पत्र भी लिखा था । इस पत्र का एक अनुवाद जदुनाथ सरकार की अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ‘शिवाजी’ में पृष्ठ 311 पर तथा दूसरा अनुवाद ताराबाई पेपर पर्शियन लेटर्स कोल्हापुर की शिवाजी यूनिवर्सिटी के प्रकाशन की भूमिका में पृष्ठ16 पर अंकित है। यह पत्र शिवाजी ने 30 नवंबर 1679 को औरंगजेब के लिए लिखा था । जिस के कुछ अंश हम यहां पर दे रहे हैं :———-” शहंशाह आलमगीर को उनका खैरख्वाह शिवाजी ईश्वर की कृपा और आपकी सूर्य प्रकाश जैसी स्पष्ट मेहरबानी के लिए गहरी कृतज्ञता ज्ञापित करता है और आपको ससम्मान सूचित करता है कि मैं आपकी इजाजत लिए बिना चला आया । यह मेरी बदनसीबी थी। पर अब मैं जैसे आप चाहें आप की सेवा करने के लिए सहमत हूं । आपकी दयालुता का सबको पता लगे। मैं तो आपके हितैषी के नाते कुछ बातें आपके सामने रखता हूं । हाल में मेरे कानों में यह बात आई है कि मुझसे युद्ध करने के कारण अब आपका खजाना खाली हो गया है । आप उसे पूरा करने के लिए हिंदुओं पर जजिया कर लगाने वाले हैं ।
जहांपनाह ! आपकी मुगलिया सल्तनत की नींव रखने वाले अकबर ने 50 वर्ष राज्य किया। उन्होंने वही उत्कृष्ट नीति अपनाई थी , जिससे उन्होंने ईसाई , यहूदी , हिंदू ,दादूपंथी ,मलकी, अनीश्वरवादी , ब्राह्मण जैन सभी जमातों को अमन और समानता हमसे देखा था । उनका उद्देश्य था सब का कल्याण और सब की सुरक्षा । इसलिए वे जगतगुरु कहलाए । इस जगह से वे जिस दिशा में गए उधर सफलता और प्रतिष्ठा उनके मार्ग में थी ।
उनके पश्चात नूरुद्दीन जहांगीर 22 वर्ष तक राज्य करते रहे ।उन्होंने अच्छे काम करने में पूरी जिंदगी बिताई और अमर हुए । शाहजहां ने 32 वर्ष तक राज किया। उन्होंने अच्छे काम करके जीवन सफल किया ।उनके राज्य शासन में कई सूबे तथा किले उनके अधिकार में आए । वह आज नहीं है ,पर उनका नाम और कीर्ति शेष है । उनकी महानता अवर्णनीय है।
——– उनकी हुकूमत में जनता शांति और अमन से थी। लेकिन आप की हुकूमत में कई सूबे और किले आपके हाथ से निकले जा रहे हैं । बचे हुए सूबे और किले भी आपके हाथ से निकल जाएंगे या आप खो देंगे। आपकी रियाया की माली हालत अच्छी नहीं है। आपके परगने और महालों की आमदनी रोज-रोज घटती जा रही है। जहां से पहले एक लाख मिलता था , वहां से अब 1000 भी वसूल कर पाना कठिन हो गया है । राजे और राजपुत्रों को गरीबी ने मार दिया है। इस वक्त आपके सिपाही आपसे असंतुष्ट हैं । मुस्लिम कष्ट में है और हिंदू झुलस गए हैं । लोग रोटी के लिए तरस रहे हैं । उनके चेहरे लाल इसलिए हैं कि वह अपने ही हाथों से अपना मुंह पूछ ले रहे हैं और जब प्रजा इतनी बुरी स्थिति में है तब फिर भी आपने उन पर ऊपर से जजिया लगाया है । आप ऐसा कैसे कर सके ? – यह बुरी ख़बर पूरब से पश्चिम तक चलेगी । लोग कहेंगे कि हिंदुस्तान का शहंशाह भी कटोरा लेकर निकल पड़ा है, और ब्राह्मण , जैन ,साधु , जोगी, सन्यासी ,बैरागी ,गरीब और भूखी जनता से जजिया वसूल रहा है ,और इस पर उसे गर्व है। तैमूर के घराने का नाम उसने मिट्टी में मिला दिया है । जनता की भावना गहरी होगी । 
जहांपनाह ! कुरान में खुदा को रब्बुल -आलमीन कहा गया है । उसे रब्ब – उल मुसलमीन नहीं कहा गया है । असल में इस्लाम और हिंदू धर्म एक ही दिव्य परमात्मा के दो सुंदर रूप हैं । मस्जिद में अजान दी जाती है, मंदिर में घंटी बजाई जाती है । जो कोई मजहबी कट्टर पन और धर्म द्वेष फैलाता है , वह ईश्वर के आदेश के विरुद्ध काम करता है । इन तस्वीरों पर लकीरें खींचना उस कलाकार की कलाकारी को दोष देना है। 
अगर आप सृष्टि में दोष निकालते हैं तो आप सृष्टा को दोष देते हैं । ऐसा आप न करें । इस समय की बात यह है कि जजिया किसी भी हालत में ठीक नहीं कहा जा सकता है । यह हिंदुस्तान में एक नई चीज है । यह नाइंसाफी है । अगर आप समझते हैं कि मजहब और इंसाफ के नाम पर कर लगाना आवश्यक है तो पहले आप राजा जयसिंह से वसूल कीजिए । वह हिंदुओं का नेता है ।वह देगा तो आपके इस हितैषी से भी वसूल करना कठिन नहीं होगा। “
छत्रपति शिवाजी महाराज के इस पत्र से स्पष्ट हो जाता है कि वह किसी मत , पंथ या संप्रदाय के विरोधी नहीं थे। अपितु वह उस निर्मम , क्रूर और हृदयहीन सत्ता के विरोधी थे ,जो भारतवर्ष में आकर जनविरोध के नए-नए प्रयोग करती जा रही थी और जिस के नए-नए प्रयोगों के कारण जनता त्राहिमाम त्राहिमाम कर उठी थी।
यद्यपि अहंकार और धार्मिक असहिष्णुता के शिकार बादशाह औरंगजेब ने शिवाजी महाराज के इस पत्र का कोई प्रतिउत्तर नहीं दिया ,परंतु शिवाजी महाराज के इस पत्र का उस समय की जागरूक जनता पर अच्छा प्रभाव पड़ा । उनके उदार व्यक्तित्व का मुसलमान और हिंदू दोनों ने ही लोहा माना । दोनों समुदायों के लोगों को ही ऐसा लगा कि शिवाजी वास्तव में एक जनप्रिय शासक हैं ।
शिवाजी के मानवतावादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के कारण जनता में उनके प्रति सहानुभूति और सम्मान का भाव था । जबकि औरंगजेब के प्रति मुस्लिम वर्ग में भी असंतोष का होना यह स्पष्ट करता है कि उसकी नीतियों से कई मुस्लिम भी सहमत नहीं थे । इसके विपरीत औरंगजेब के भीतर हिंदुओं के प्रति धार्मिक कट्टरपन और धार्मिक असहिष्णुता कूट-कूट कर भरी हुई थी। जी के राज्य में प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी जबकि औरंगजेब के यहां ऐसा नहीं था। 

इस्लाम और शिवाजी की नीति

शिवाजी का व्यक्तित्व सचमुच अद्भुत और लौकिक था । उन्होंने अफजल खान के वध करने में ही अपने साहस का ही परिचय नहीं दिया था, अपितु युद्ध क्षेत्र में शत्रु से कितना सावधान होकर हमें रहना चाहिए ? – इसका पाठ भी उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को पढ़ाने का प्रयास किया । यदि शिवाजी उस समय थोड़ी सी भी असावधानी और प्रमाद का प्रदर्शन करते तो अफजल खान उनका वध करने में सफल हो गया होता । अफजल खान को मारने के पश्चात उसके पूना, इन्दापुर, सुपा, बारामती आदि क्षेत्रों पर शिवाजी का शासन स्थापित हो गया। अफजल खान स्वयं भी अपनी धार्मिक कट्टरता के लिए विख्यात था और यही कारण था कि उसने धर्मान्धता में तुलजापुर और पंडरपुर के मंदिरों का विध्वंस किया था। दूसरी ओर शिवाजी ने अपने राज्य के अधिकारियों को सभी मंदिरों के साथ – साथ मस्जिदों को भी पहले की ही भांति दान देने की आज्ञा जारी की थी। इससे उनकी धार्मिक सहिष्णुता का बोध होता है। 
२. शिवाजी की धार्मिक सहिष्णुता का लोहा उनका विरोधी बादशाह औरंगजेब भी मानता था । वह स्वयं भी इस बात के लिए शिवाजी की प्रशंसा करता था कि शिवाजी स्वयं में धार्मिक रूप से सहिष्णु शासक हैं। औरंगजेब ने स्वयं शिवाजी को चार बार अपने पत्रों में इस्लाम का संरक्षक बताया था। ये पत्र १४ जुलाई १६५९, २६ अगस्त एवं २८ अगस्त १६६६ एवं ५ मार्च १६६८ को लिखे गए थे। (सन्दर्भ Raj Vlll, 14,15,16 Documents )
३. कई विदेशी विद्वान और लेखक भी शिवाजी महाराज की धार्मिक सहिष्णुता की प्रशंसा करते हुए पाए जाते हैं । डॉ फ्रायर ने कल्याण जाकर शिवाजी की धर्म निरपेक्ष नीति की अपने लेखों में प्रशंसा की हैं। Fryer,Vol I, p. 41n
4 . विदेशी विद्वानों का यह भी मानना है कि शिवाजी महाराज ने दरगाह, मस्जिद ,पीर ,मजारों आदि का कभी अपमान नहीं किया और उनके लिए आर्थिक व्यवस्था करने में भी अपनी उदारता का परिचय दिया ।ग्रांट डफ़ लिखते हैं की शिवाजी ने अपने जीवन में कभी भी मुस्लिम सुल्तान द्वारा दरगाहों ,मस्जिदों , पीर मज़ारों आदि को दिए जाने वाले दान को नहीं लूटा। सन्दर्भ History of the Mahrattas, p 104
5 – भारत का मानवतावाद आज के संसार के लिए भी कौतूहल और जिज्ञासा का विषय है । जिस समय शिवाजी इस भूमि पर भी विचरते थे , वह धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता का काल था ,और उस समय भारत वर्ष अपने प्राचीन राजनीतिक आदर्शों की स्थापना के लिए संघर्ष के काल से गुजर रहा था । शिवाजी उस संघर्ष के एक जीवंत उदाहरण बन चुके थे । वह अपने संघर्ष को धार्मिक सहिष्णुता और भारत के मानवतावाद को व्यक्ति का धर्म बनाने के लिए लड़ रहे थे । डॉ दिल्लों लिखते हैं की वीर शिवाजी को उस काल के सभी राजनीतिज्ञों में सबसे उदार समझा जाता था।सन्दर्भ Eng.Records II,348. 
6 – किसी भी व्यक्ति की महानता इस बात में छुपी होती है कि उसके आलोचक या उससे शत्रुभाव रखने वाले लोग उसके प्रति कैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं ? यदि आलोचक और शत्रुभाव रखने वाले लोग भी व्यक्ति के प्रति उसकी किन्हीं विशिष्ट नीतियों को लेकर शांत हो जाएं या विनम्र शब्दों का प्रयोग करने लगें तो समझिए कि व्यक्ति सचमुच महान था । 
शिवाजी के सबसे बड़े आलोचकों में से एक खफी खाँ था । वह शिवाजी से बहुत घृणा करता था । यही कारण है कि जब शिवाजी की मृत्यु हुई तो उसने यह लिखा था कि अच्छा हुआ एक काफ़िर का भार धरती से कम हुआ , उसने भी शिवाजी की तारीफ़ करते हुए अपनी पुस्तक के दूसरे भाग के पृष्ठ 110 पर कहा है कि ,- ” शिवाजी का यह सामान्य नियम था कि कोई मनुष्य मस्जिद को हानि न पहुँचायेगा , लड़की को न छेड़े , मुसलमानों के धर्म की हँसी न करे तथा उसको जब कभी कहीं कुरान हाथ आता तो वह उसको किसी न किसी मुस्लमान को दे देता था। औरतों का अत्यंत आदर करता था और उनको उनके रिश्तेदारों के पास पहुँचा देता था। अगर कोई लड़की हाथ आती तो उसके बाप के पास पहुँचा देता। लूट खसोट में गरीबों और काश्तकारों की रक्षा करता था। ब्राह्मणों और गौ के लिए तो वह एक देवता था। यद्यपि बहुत से मनुष्य उसको लालची बताते हैं , परन्तु उसके जीवन के कामों को देखने से विदित हो जाता है कि वह जुल्म और अन्याय से धन इकठ्ठा करना अत्यंत नीच समझता था।
सन्दर्भ लाला लाजपत राय कृत ‘छत्रपति शिवाजी ‘ पृष्ठ 132 ,संस्करण चतुर्थ, संवत 1983।
7 – यह शिवाजी ही थे जो अपने समकालीन मुस्लिम संतो फकीरों का भी सम्मान करते थे और जैसे वह अपने हिंदू गुरुओं के पास जाते रहते थे , वैसे ही वह समय आने पर मुस्लिम संतो व फकीरों का आशीर्वाद लेने के लिए भी उनके पास जाते रहते थे। शिवाजी जंजिरा पर विजय प्राप्त करने के लिए केलशी के मुस्लिम बाबा याकूत से आशीर्वाद तक मांगने गए थे।
(सन्दर्भ – Vakaskar,91 Q , bakshi p.130)
8 – छत्रपति जी महाराज पंथनिरपेक्ष राजनीति की जिंदा मिसाल थे । वह उन मुस्लिम नवाबों , बादशाहों , या सुल्तानों की नीतियों को मानवता के विरुद्ध मानते थे जो अपने यहां पर सरकारी नौकरियां देने में भी पक्षपात करते थे । यही कारण था कि शिवाजी ने उनकी नीतियों का अनुकरण न करते हुए अपनी सेना में अनेक मुस्लिमों को रोजगार दिया था। 
१६५० के पश्चात बीजापुर, गोलकोंडा, मुग़लों की रियासत से भागे अनेक मुस्लिम , पठान व फारसी सैनिकों को विभिन्न सम्मानजनक पदों पर शिवाजी द्वारा रखा गया था , जिससे कि उनके भीतर किसी प्रकार की हीनभावना उत्पन्न न हो । शिवाजी ने इन मुस्लिमों की धर्म सम्बन्धी आस्थाओं का पूरा सम्मान करने का भरसक प्रयास किया था और अपने राज्य कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दे दिए थे की इन मुस्लिम राज्य कर्मियों की भावनाओं का पूरा सम्मान किया जाए । यही कारण था कि ये मुस्लिम राज्यकर्मचारी शिवाजी महाराज के प्रति सत्यनिष्ठा से कार्य करते रहे और कई तो अपनी मृत्यु तक शिवाजी की सेना में ही कार्यरत रहे। राज्यसत्ता के विरुद्ध विद्रोह का एक कारण यह भी होता है कि जब लोग अपने आप को उपेक्षित समझने लगते हैं तो वह राज्यसत्ता के विरोध में उतर आते हैं। हिंदू समाज ने मुस्लिम सत्ताधीशों का इसीलिए विरोध किया था कि मुस्लिम सत्ताधीशों ने कभी भी भारतीयों के धर्म और उनकी धार्मिक आस्थाओं का सम्मान नहीं किया था। जबकि शिवाजी महाराज ने अपने राज्य में अपने राष्ट्र धर्म का सम्यक निर्वाह किया। 
कभी शिवाजी के विरोधी रहे सिद्दी संबल ने शिवाजी की अधीनता स्वीकार कर ली थी और उसके पुत्र सिद्दी मिसरी ने शिवाजी के पुत्र शम्भा जी की सेना में काम किया था। इसका अभिप्राय है कि शिवाजी ने अपनी मुस्लिम प्रजा के अधिकारों का भी सम्मान किया था ।
शिवाजी की दो टुकड़ियों के सरदारों का नाम इब्राहीम खान और दौलत खान था जो मुग़लों के विरुद्ध शिवाजी के साथ युद्ध में भाग लेते थे।क़ाज़ी हैदर के नाम से शिवाजी के पास एक ऐसा मुस्लिम अधिकारी था जो कि ऊँचे पद पर आसीन था। 
शिवाजी महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण पद पर किसी मुस्लिम अधिकारी को नियुक्त करने में कोई संकोच नहीं करते थे ,क्योंकि शिवाजी ने मुस्लिम लोगों के हृदय को जीत लिया था और उन्हें उनसे सेवाएं लेने में किसी प्रकार का भय नहीं सताता था । यही कारण था कि फोंडा के किले पर अधिकार करने के बाद शिवाजी ने उसकी रक्षा का दायित्व एक मुस्लिम फौजदार को दे दिया था।
बखर्स के अनुसार जब आगरा में शिवाजी को कैद कर लिया गया था तब उनकी सेवा में एक मुस्लिम लड़का भी नियुक्त रहता था , जब शिवाजी आगरा के किले से निकल कर भागे थे तो उस घटना का पूरा विवरण उस लड़के को ज्ञात था । शिवाजी के प्रति उसके इस प्रकार के भक्तिभाव को देखकर औरंगजेब अत्यंत क्रुद्ध हुआ था और उसने उस लड़के को मरवा दिया था। इसके उपरांत भी उस लड़के ने अंतिम क्षणों तक शिवाजी महाराज के बारे में कोई ऐसी सूचना नहीं दी थी जो उनके लिए किसी प्रकार भी कष्टप्रद हो सकती थी । शिवाजी की सेना में कार्यरत हर कोई मुस्लिम सिपाही शिवाजी की न्यायप्रियता का गुणगान करते हुए उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहा और स्वामी भक्ति के भाव से भी भरा रहा। ये लोग वास्तव में शिवाजी की वास्तविक पंथनिरपेक्ष राजनीति और राष्ट्रधर्म के दीवाने हो चुके थे।
सन्दर्भ shivaji the great -dr bal kishan vol 1 page 177
शिवाजी सर्वदा इस्लामिक विद्वानों और पीरों को यथोचित सम्मान प्रदान करते थे , उनके अच्छे विचारों को सुनते थे और यदि वह जनोपयोगी होते थे तो उन्हें क्रियान्वित करने का भी प्रयास करते थे। शिवाजी ऐसे मुस्लिम विद्वानों की लकीरों को धन,उपहार आदि देकर समय समय पर सम्मानित भी करते थे।
शिवाजी वेद आदि सत्य – शास्त्रों के राजधर्म के जीते जागते प्रमाण थे । उसके अनुसार वह अपनी हिंदू या मुस्लिम प्रजा में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करते थे। जहाँ हिंदुओं को मंदिरों में पूजा करने में कोई रोक टोक नहीं थी , और वे अपने धार्मिक पूजा-पाठ को बिना किसी बाधा के कर सकते थे वहीं मुसलमानों को भी मस्जिद में नमाज़ अदा करने से कोई नहीं रोक सकता था।
किसी दरगाह, मस्जिद आदि को यदि मरम्मत की आवश्यकता होती थी तो उसके लिए राजकोष से धन आदि का सहयोग भी शिवाजी द्वारा दिया जाता था। इसीलिए शिवाजी के काल में न केवल हिन्दू अपितु अनेक मुस्लिम राज्यों से आकर मुस्लिम भी शिवाजी के राज्य में बस गए थे।
भारतीय राज्यव्यवस्था में राजा का जो कर्तव्य होता है उसके अनुसार उसका प्रजावत्सल होना बहुत आवश्यक माना गया है । यह गुण शिवाजी के अंदर कूट-कूट कर भरा था। जिससे प्रभावित और प्रेरित होकर उनकी मुस्लिम जनता भी उनके प्रति निष्ठावान हो गई थी ।

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