परपीड़क पुरुष समाज और नारीवादी विमर्श

अमेज़न का यह प्रोडक्ट गहरे दार्शनिक प्रश्नों को छेड़ता है- क्या नारी की मुक्ति जेंडर इक्वलिटी में निहित है? क्या नर और नारी एक समान का नारा सही है? क्या यूनिसेक्स वस्त्र पहनकर, न्यूडिस्ट क्लब ज्वाइन कर अनेक पुरुषों को अपनी मर्जी के अनुसार सेक्स करने के हेतु बाध्य कर नारी अपनी मुक्ति पा सकती है? क्या यह पुरुषवादी पितृसत्तात्मक समाज द्वारा फैलाया गया भ्रम है कि नारी शारीरिक रूप से पुरुष से कमजोर होती है,

विश्व के सबसे बड़े ऑनलाइन रिटेलर तथा क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर अमेज़न ने जब ट्राई पोलर क्रिएटिव टेबल टॉप ऐश ट्रे की बिक्री (मात्र!!!!) 5196 रुपए(यह कीमत 30 प्रतिशत छूट के बाद थी) में प्रारम्भ की तब विज्ञापनों में नारी देह के असम्बद्ध और अश्लील,अमर्यादित प्रदर्शन के आदी पुरुष और स्त्रियाँ दोनों चौंक उठे। कारण था इसका डिजाईन -जिसमें बाथटब में एक नग्न स्त्री अधलेटी है जिसके गुप्तांग में आप सिगरेट बुझा सकते हैं। यूरोप और अमेरिका में विकृत यौन अभिरुचियों वाले स्त्री पुरुषों के क्लबों में इस तरह के उत्पाद उपलब्ध होते हैं जो उनकी फेटिश अथवा सैडिस्टिक (परपीड़क)या मैसोकिस्टिक(आत्मपीड़क) प्रवृत्तियों को संतुष्ट करते हैं। किन्तु भारत में इस तरह के उत्पाद की खुले आम बिक्री चौंकाने वाली थी। संभवतः इस विशाल कंपनी की मार्केटिंग टीम ने भारत में बलात्कार के बाद हो रही वीभत्स हत्याओं को देखकर(जिनमें नारी शरीर और उसके प्राइवेट पार्ट्स के साथ विशेष बर्बरता की जाती है) यह निष्कर्ष निकाला होगा कि भारतीय पुरुष बर्बरता पसंद हैं और यह उत्पाद उन्हें रोमांचित करेगा। यह निर्लज्ज बाजार द्वारा हमारे निर्मम समाज की नग्न व्याख्या थी। इसका विरोध हो रहा है और अमेज़न के मार्केट एनालिस्ट यदि यह समझेंगे कि भारत की महिलाएं इससे आहत हो अमेज़न के प्रोडक्ट्स का बहिष्कार कर देंगी तो इस प्रोडक्ट को बाजार से हटा लिया जाएगा।
यह घटना बाजार के बढ़ते साहस को तो दर्शाती ही है, यह भी इंगित करती है कि नारी देह को बेचने की बाजार की रणनीति कारगर हो रही है। इस विषय पर नारी की गरिमा का बखान करते हुए एक भावुक आलेख लिखना अधिक सुविधाजनक है क्योंकि यह आसानी से छपेगा,पढ़ा जाएगा और प्रशंसित भी होगा। किन्तु इससे सत्य के अनेक संभावित पहलू अनुद्घाटित रह जाएंगे और उस तक पहुंच पाना संभव नहीं हो पाएगा।
द हिस्ट्री ऑफ़ सेक्सुअलिटी के लेखक फ्रेंच दार्शनिक मिशेल फूको (1926-1984) ने लॉजिक ऑफ़ डोमिनेशन के आधार पर यह बताया है कि यह परस्पर विरोधी द्विध्रुवीय युग्म में सोचने की एक प्रणाली को प्रोत्साहित करता है जैसे पुरुष-स्त्री, तर्क-भावना, पौरुष-नारीत्व, स्वातंत्र्य-आवश्यकता, सक्रिय-अक्रिय, मन-देह, सभ्य-आदिम, शुद्ध-दूषित,। इन परस्पर विरोधी शब्द युग्मों में प्रथम शब्द आपस में सम्बंधित हैं, इसी प्रकार द्वितीय शब्द भी आपस में एक समानता दर्शाते हैं। फेमिनिस्ट आलोचकों के अनुसार ये द्विध्रुवीय शब्द युग्म हमें पुरुष के साथ एक विशिष्ट श्रेष्ठ गुण समूह को जोड़ने के लिए कंडीशन करते हैं और नारी के साथ स्वाभाविक रूप से अपेक्षाकृत हीन गुणों का चयन करना इन परस्पर विपरीत द्विध्रुवीय शब्द युग्मों में छिपे अंतर्निहित संकेतों का परिणाम होता है। जब हम ऐसे डुअलिस्टिक पैटर्न को अपनाते हैं तो ऐसा लगता है कि हम बड़ी स्पष्टता से सोच रहे हैं और किसी निर्णय की ओर बढ़ रहे हैं। किन्तु निर्णय तक पहुंच जाना ज्ञान प्राप्ति नहीं है,द्वैतवादी सोच अनंत संभावनाओं और सहनशीलता को समाप्त कर हमें निर्मम तार्किकता के भरोसे छोड़ देती है।यह डुअलिस्टिक पैटर्न न केवल प्रभुत्वशाली पुरुष के मन में यह मिथ्या धारणा उत्पन्न कर देता है कि वह उन गुणों से युक्त है जो उसमें हैं ही नहीं बल्कि अधीनस्थ नारी में भी यह भाव पैदा कर देता है कि वह उन श्रेष्ठ गुणों से रहित और हीन है जो पुरुष में हैं।फूको बताते हैं कि किस प्रकार से 18 वीं शताब्दी में जेंडर स्टडीज को बढ़ावा देकर स्त्री-पुरुष के भेद को साइंस और डिससिप्लिन का रूप दिया गया और हम पुरुष की श्रेष्ठता के अभ्यस्त हो गए।
फेमिनिस्ट धारा भी सेक्सुअलिटी के बारे में दो वर्गों में विभक्त है। एंटी पोर्नोग्राफिक फेमिनिस्ट्स का मानना है कि पोर्नोग्राफी नारी के शोषण और दमन का प्रतीक है। जिन परिस्थितियों में यह की जाती है वे नारी के लिए असम्मानजनक और घातक होती हैं तथा यद्यपि इनमें नारी को आनंद का अनुभव लेते दिखाया जाता है लेकिन वह यौन हिंसा का शिकार और अपने यौन साथी की प्राकृतिक-अप्राकृतिक संतुष्टि का खिलौना बनकर रह जाती है। जबकि प्रो पोर्नोग्राफिक फेमिनिस्ट्स का मानना है कि पोर्नोग्राफी का विरोध करने वाली महिलाएं विक्टोरियन काल के उस पुरुषवादी विचार से गुमराह हो जाती हैं कि पुरुष सेक्स पसंद करते हैं और महिलाएं इसे सहन करती हैं। इनके अनुसार पोर्नोग्राफी में अब महिलाओं को पुरुषों को बंधक अथवा गुलाम बनाते, उन पर शारीरिक अत्याचार करते और अपनी संतुष्टि के लिए उनका मनचाहा इस्तेमाल करते बताया जाता है जो परंपरागत पुरुष के डोमिनेशन का रोल रिवर्सल है।
यही स्थिति प्रॉस्टिट्यूशन के विषय में है जो नारीवादी प्रॉस्टिट्यूशन के समर्थन में हैं उनका यह मानना है कि पोर्नोग्राफी की भांति इसका भी विरोध पितृसत्तामक धार्मिक विचारों और मूल्यमीमांसा से जुड़ा हुआ है जिसके कारण इसके विरोधी नारीवादी इसे नारी पर हिंसा समझते हैं। वेश्यवृत्ति के समर्थकों का विश्वास है कि यदि प्रॉस्टिट्यूशन स्वेच्छा और स्वविवेक से किया जाता है तो यह नारी के लिए उसी प्रकार जायज है जिस प्रकार पुरुष के लिए। जबकि वेश्यावृत्ति का विरोध करने वाले नारीवादी यह मानते हैं कि वेश्यावृत्ति गरीबी, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, अवसरों के नितांत अभाव, बाल्य काल में यौन उत्पीड़न,ड्रग एडिक्शन तथा नारी को पुरुष की दासी मानने की मानसिकता से उपजी कुप्रथा है। पूरे विश्व में वेश्याओं पर किए अध्ययन दर्शाते हैं कि उनकी स्थिति बहुत ज्यादा ख़राब होती है और इनमें से अधिकांश इस पेशे को त्यागना चाहती हैं। वेश्यवृत्ति के विरोधी नारीवादियों का दृढ विश्वास है कि वेश्यावृत्ति में सहमति और सुविचारितता के तत्व कभी निहित नहीं हो सकते हैं।
यहाँ कुछ पुस्तकों का उल्लेख आवश्यक हो जाता है,प्रथम तो नैंसी फ्राइडे की माय सीक्रेट गार्डन और वीमेन ऑन टॉप जिनमें महिलाओं की यौन फंतासियों का लेखिका के दावे के अनुसार डाक्यूमेंट्री रिप्रजेंटेशन है। दूसरी पुस्तक बाँडेज,डिससिप्लिन, सैडिस्म और मैसोकिस्म(BDSM) पर आधारित ई एल जेम्स रचित फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे है। ये पुस्तकें बेस्ट सेलर्स रहीं। भले ही इनका अकादमिक या साहित्यिक महत्व न हो लेकिन इनकी लोकप्रियता के पीछे अवचेतन में छिपी आकांक्षाओं को जानने की शिष्ट समाज की जिज्ञासा को कारण माना जा सकता है।
फीमेल ऑब्जेक्टिफिकेशन के बारे में भी नारीवादी विभाजित हैं। कुछ का मानना है कि आज की नारी अपनी देह को हथियार की तरह इस्तेमाल करना सीख गई है, वह इसके माध्यम से न केवल आर्थिक आजादी प्राप्त करने बल्कि पुरुषों पर प्रभुत्व स्थापित करने में भी सफल रही है। पूरी एडवरटाइजिंग और फैशन इंडस्ट्री, हॉलीवुड तथा बॉलीवुड एवं ब्यूटी कॉन्टेस्ट्स आदि का आधार अनेक प्रकार से नारी देह ही है। प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण की हॉलीवुड की ओर जाने की आकांक्षा भारतीय नारी के उस बढ़ते हुए आत्मविश्वास का प्रतीक मानी जा रही है जिसमें वह अपनी देह के सहारे दुनिया जीतने निकली है। सनी लियोन भी एक आदर्श केस स्टडी हो सकती हैं जो विदेशी पोर्न इंडस्ट्री में सफलतम पोर्न स्टार बनने के बाद भारत जैसे पारंपरिक समझे जाने वाले देश की फिल्म इंडस्ट्री में केवल इसलिए सफल मानी जाती हैं कि उनकी फिल्में पैसा कमाती हैं हालाँकि इन फिल्मों का आधार उनकी पोर्न स्टार की छवि और देह प्रदर्शन को नए आयाम तक ले जाने का उनका साहस है। पुरुष उनके जिस्म के कायल हैं और औरतें जिस्म को इस्तेमाल करने की उनकी हिम्मत और काबिलियत की।
अमेज़न का यह प्रोडक्ट गहरे दार्शनिक प्रश्नों को छेड़ता है- क्या नारी की मुक्ति जेंडर इक्वलिटी में निहित है? क्या नर और नारी एक समान का नारा सही है? क्या यूनिसेक्स वस्त्र पहनकर, न्यूडिस्ट क्लब ज्वाइन कर अनेक पुरुषों को अपनी मर्जी के अनुसार सेक्स करने के हेतु बाध्य कर नारी अपनी मुक्ति पा सकती है? क्या यह पुरुषवादी पितृसत्तात्मक समाज द्वारा फैलाया गया भ्रम है कि नारी शारीरिक रूप से पुरुष से कमजोर होती है, यौन क्रिया- जिसे हम सेक्सुअल एनकाउंटर के नाम से भी जानते हैं- में पुरुष, एग्रेसर होता है और नारी रेसीपीएन्ट? यदि यह सत्य है तो फिर परंपरावादियों के इस कथन को भी क्या सत्य मान लेना चाहिए कि चूँकि पुरुष नारी से अधिक शक्तिशाली है और यौन क्रिया पुरुष के पक्ष में अधिक है इसलिए नारी को अपनी देह को ढककर रखना चाहिए ताकि पुरुष की वासना भड़क न उठे और कामुकता के आवेग में वह उसे क्षति न पहुँचा दे? क्या नारी के पास केवल देह ही है जो पुरुष को कामवासना का दास बनाकर परास्त कर सकती है? बलात भोग्या बनने के बजाए स्वेच्छा से भोग्या बनने का नाटक करना -जिसमें देह का ऐसा प्रयोग हो कि भोगने वाला समझे कि मैं नारी को इस्तेमाल कर रहा हूँ किन्तु वह खुद इस्तेमाल हो रहा हो- ही नारी को विजयी बना सकता है? क्या नारी जाने अनजाने उपभोक्तावादी और भोग प्रधान पुरुषवादी दृष्टिकोण के अनुसार अपनी योग्यता-अयोग्यता एवं सफलता असफलता का आकलन कर रही है? क्या व्यक्तित्व के अन्य सारे गुण बुद्धिमत्ता, धैर्य,निर्णय क्षमता, नेतृत्व क्षमता आदि गौण हैं? क्या नारी एक राजनेता, संत या प्रशासनिक अधिकारी, उद्यमी, व्यवसायी और खिलाडी बनकर समाज में अपनी सर्वश्रेष्ठता स्थापित नहीं कर सकती? क्या पारंपरिक पोशाक भी पितृसत्तात्मक समाज की ईजाद है इसलिए इसका त्याग कर ही आधुनिक बना जा सकता है? क्या पुरुष के अहम, घमंड,स्वेच्छाचारिता और उसके दुर्गुणों – नशा करना, जुआ खेलना आदि का अनुकरण करना यह सिद्ध करना है कि इन आत्महंता प्रवृत्तियों पर पुरुष का एकाधिकार नहीं है? क्या अवचेतन में छिपे यौन व्यवहारों को आचरण में लाना उनसे मुक्ति दिला सकता है, विशेषकर तब जबकि हमें यह ज्ञात है कि मनोवैज्ञानिकों के निर्देशन में किए गए ऐसे प्रयोग भी घातक सिद्ध हुए हैं? क्या प्रकृति द्वारा दी गई मातृत्व की क्षमता भी नारी को बंधन में डालती है? यदि ऐसा है तो क्या प्रकृति का स्वरुप पितृसत्तामक है? क्या नारी को परिवार की बुनियाद कहना पुरुषवादी सोच है? इन प्रश्नों के उत्तर जिस दिन समाज ढूंढ लेगा अनेक शाश्वत से लगने वाले प्रश्न हल हो जाएंगे।
एक कथा जाने क्यों बार बार याद आ रही है। जब मीरा बाई प्रख्यात कृष्ण भक्त जीव गोस्वामी से मिलने पहुंचीं तो उन्हें बताया गया कि वे किसी स्त्री का मुख नहीं देखते। इस पर मीरा ने कहा कि मैं तो समझती थी कि वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण ही एक पुरुष हैं यह दूसरा पुरुष कहाँ से आ गया। यह सुनकर जीव गोस्वामी अभिभूत हो गए और उनका भ्रम टूटा कि स्त्री-पुरुष में भेद है। क्या हम कभी देह के पार देख पाएंगे?
डॉ राजू पाण्डेय

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