परमात्मा का बनाया यह संसार कभी पुराना नहीं होता

मनमोहन कुमार आर्य,

 हम इस पृथिवी पर रह रहे हैं। हमारी यह पृथिवी हमने या हमारे पूर्वजों ने नहीं बनाई और न यह अपने आप अथवा बिना किसी निमित्त कारण के बनी है। हमारे इस सौर मण्डल के सूर्य आदि ग्रहों व उपग्रहों को भी हमने या हमारे पूवजों ने नहीं बनाया। यह समस्त जगत ब्रह्माण्ड किसने बनाया है, इसका उत्तर है कि ब्रह्माण्ड में एक सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, निराकार, सर्वव्यापक सत्ता है जिसने सप्रयोजन यह संसार वा ब्रह्माण्ड बनाया है। उसी सत्ता ने जड़ जगत सहित प्राणी जगत को भी बनाया है। प्राणी जगत में हम एक नियम देखते हैं कि इसमें एक प्राणी व मनुष्य जन्म लेता है, वृद्धि को प्राप्त होता है, फिर वृद्धि कुछ समय के लिये रूक जाती है और उसके बाद वृद्धावस्था आती है। कुछ समय तक मनुष्य व अन्य प्राणी इस अवस्था में रहकर फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। सभी प्राणियों का जीवन काल वा आयु भिन्न-भिन्न होती है। मनुष्य का जीवनकाल भी एक सौ वर्ष का माना जाता है परन्तु वर्तमान में एक सौ वर्ष पूरे करने वाले लोग बहुत ही कम होते हैं। इसके अनेक कारण हैं। मृत्यु का कारण प्रायः रोग या दुर्घटनायें होती है। यदि हम इन पर नियन्त्रण पा लें, तो मनुष्य आदि प्राणियों की आयु को कुछ अधिक वर्ष बढ़ाया जा सकता है। मनुष्य के यदि शरीर की बात करें तो यह बचपन, किशोरावस्था सहित युवावस्था में पूर्ण निखार पर देखने योग्य होता है। इसके बाद इसके शारीरिक बल शक्ति में कमी आनी आरम्भ हो जाती है और वृद्धावस्था व्यतीत करते हुए मृत्यु हो जाती है। मनुष्य आदि प्राणियों का आवागमन संसार में सृष्टि के आरम्भ से लगा हुआ है। आवागमन अथवा जन्म-मृत्यु-जन्म का चक्र भी ईश्वर का बनाया हुआ एक अद्वितीय नियम है। प्राणियों के जन्म व मरण का चक्र इस नियम का पालन करता है। इसके अनुसार जिस आत्मा का जन्म होता है उसकी मृत्यु भी अवश्य होगी। यही सिद्धान्त सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय पर भी लागू होता है परन्तु सृष्टि का काल इतना अधिक है कि इसे देखकर इसके रचयिता की महत्ता दिव्यता का ज्ञान होता है और अनायास हमारा सिर उसके उपकारों को स्मरण करके सम्मुख झुक जाता है। धर्म, आस्तिकता, ईश्वर की उपासना, धर्म-कर्म, परोपकार, निर्बलों की सहायता व रक्षा, दूसरों के दुःखों को दूर करने में सहायक होना, सभी मानव हित व समाज हित के कार्यों में दिल खोल कर दान देना आदि, यह सब नियम ईश्वर के उपकारों को स्मरण कर व ही उसका अनुकरण करने की दृष्टि से समाज में प्रचलित हुए हैं।

               सृष्टि को देख कर आश्चर्य होता है कि इतनी पुरानी सृष्टि भी पुरानी होकर नवीन है। वसन्त ऋतु में वनस्पति जगत में जो श्रृंगार की सी स्थिति देखने को मिलती है उससे यह सृष्टि रमणीय भोग्य लगती है। संसार में कुछ ऐसे स्थान हैं जो बहुत ही सुन्दर हैं। लोग यहां पर्यटन की दृष्टि से जाते हैं और इन स्थानों की सुन्दरता को अपनी आंखों कैमरे में कैद कर जीवन भर अपनी मधुर स्मृतियों को यदा कदा स्मरण कर आह्लादित प्रसन्न होते रहते हैं। संसार के जितने भी मत-मतान्तर हैं वह सृष्टि को बने हुए अब तक जो समय व्यतीत हो चुका है, इसका सही उत्तर नहीं दे पाते। केवल सत्य सनातम वैदिक धर्म ही इसका उत्तर देता है। वैदिक प्रामाणिक गणना के अनुसार सृष्टि की रचना को 1,96,08,53,119 वर्ष पूरे हो चुके हैं और हिन्दी मास चैत्र शुक्ल पक्ष से नया वर्ष आरम्भ हो गया है। इतने वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद तो यह संसार नष्ट हो जाना चाहिये था परन्तु ईश्वर ने इस सृष्टि को ऐसा बनाया है कि यह तो पुरानी होती है, ही जीर्ण होती है और ही इसका अन्त मृत्यु होती है। सृष्टि का अस्तित्व बने रहने का काल ईश्वर का एक दिन कहलाता है और वह 4.32 अरब वर्ष होता है। इसके बाद प्रलय हो जाती है जो ब्रह्म वा ईश्वर की रात्रि कहलाती है। 4.32 अरब वर्ष तक यह सृष्टि विद्यमान रहती है। प्रलय का अर्थ है कि सृष्टि नष्ट हो जाती है और यह सृष्टि के कारण सत्व, रज व तम गुणों की साम्यावस्था में परिणित हो जाती है। हमारी सृष्टि 1.96 अरब वर्ष पुरानी हो चुकी है। इतने वर्षों से हमारी पृथिवी सूर्य की परिक्रमा कर रही है। चन्द्रमा भी हमारी पृथिवी की परिक्रमा कर रहा है। इतने वर्षों में न तो इसकी गति में कोई कमी आयी है और ही कभी आकर्षण के सिद्धान्त से यह आपस में टकराये हैं। इसका कारण ईश्वर की अपरम्पार महिमा है। वह सर्वशक्तिमान है और उसी ने ही इस ब्रह्माण्ड को धारण व्यवस्था में रखा हुआ है।

               ईश्वर की व्यवस्था पर विचार करते हैं तो हमें यह व्यवस्था सर्वोत्तम लगती है। ईश्वर हमसे कुछ लेता नहीं है। उसने एक पिता, माता आचार्य के समान हमें सुख प्रदान किये हैं। उसकी कृपा व्यवस्था से सभी आत्माओं को उनके कर्मों के अनुसार जन्म, आयु सुख-दुःख मिलते हैं। मनुष्य योनि में हमें श्रेष्ठ कर्म करने का अवसर मिलता है। श्रेष्ठ कर्म का आधार सद्ज्ञान है। यह सद्ज्ञान ईश्वर ने अपने निज ज्ञान वेद के रूप में सृष्टि के आरम्भ में हमारे पूर्वज चार ऋषियों को दिया था। उन्हीं से परम्परा आरम्भ होकर यह वेद ज्ञान अनेक ऋषियों से होता हुआ ऋषि दयानन्द तक पहुंचा और अब हमें प्राप्त है। हम वेद ज्ञान को उसके सत्य व यथार्थ रूप में जानकर और उसके अनुरूप ही कर्म व पुरुषार्थ कर इस जीवन से भी श्रेष्ठ देवतुल्य मनुष्य जीवन, अक्षय सुखों अथवा मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी हो जाते हैं। वर्तमान में मनुष्य की औसत आर्य 60-70 वर्ष है जिसके बीतने पर मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। मृत्यु होने पर मनुष्य ने जीवन भर जैसे कर्म किये होते हैं, उन कर्मों का ईश्वर को सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी होने से सम्यक ज्ञान रहता है। वह हमें हमारे कर्मों के अनुसार ही नया जन्म देता है जिसमें हमें सुख व दुःख भोगने का अवसर मिलता है। कर्म व भोग की उभय योनि इस मनुष्य योनि में मनुष्य अपने वर्तमान व भावी जीवन को सुखदायी करने के लिये अपनी बुद्धि व ज्ञान के अनुसार श्रेष्ठ कर्मों का वरण कर सकता है। कर्म-फल भोग और जन्म-मृत्यु का यह क्रम इसी प्रकार से पूरी सृष्टिकाल तक चलता रहता है। हमें आश्चर्य होता है कि ईश्वर ने केवल हमारी पृथिवी को ही नहीं अपितु ब्रह्माण्ड में ऐसी अनन्त पृथिवियों पर भी इसी प्रकार की वनस्पति एवं प्राणी रचनायें कर जीवों को उनके पूर्वजन्म के कर्मानुसार जन्म दिया है। ईश्वर सभी जीवों के लिए उनके कर्मानुसार नया जन्म, पुनर्जन्म एवं सुख-दुःख की व्यवस्था करता है। वस्तुतः सभी जीवात्मायें वा प्राणी ईश्वर के इस उपकार के लिये उसके अत्यन्त कृतज्ञ हैं जिससे वह कभी उऋण नहीं हो सकते। ईश्वर हमसे अपने लिये कोई अपेक्षा भी नहीं करता है। उसको हमसे किसी वस्तु अथवा हमारी स्तुति-प्रार्थनाओं की भी अपेक्षा नहीं है। यदि हम उसकी स्तुति करते हैं तो इससे हमारा ही कल्याण होता है। ईश्वर अनादि काल में जैसा था, वर्तमान में भी वैसा ही है और भविष्य में भी उसी प्रकार के गुण, कर्म व स्वभाव वाला रहेगा। हम ईश्वर के उपकारों के लिये अपने सच्चे मन से केवल उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना ही कर सकते हैं एवं इसके साथ निर्बल दूसरे मनुष्यों के सुख के लिये भी पुरुषार्थ कर सकते हैं जिसका फल हमें ईश्वर की व्यवस्था से मिलता है।

               वेद में एक मन्त्र आता है जिसका भाव है कि मनुष्य को ईश्वर की सृष्टि को देखना चाहिये। ईश्वर ने यह सृष्टि ऐसी बनाई है कि जो न पुरानी होती है न नष्ट होती है। हमारी यह सृष्टि वा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नाश व प्रलय को तभी प्राप्त होगा कि जब ईश्वर इसकी प्रलय करेंगे। सृष्टि से पदार्थों को लेकर मनुष्य भवन, कागज, भोजन, कार, स्कूटर, कमप्यूटर, वस्त्र आदि जो कुछ भी बनाता है है वह कुछ दिनों व वर्षों के व्यतीत हो जाने पर पुराना होकर नष्ट हो जाता है परन्तु यह नियम जड़-जंगम सृष्टि पर घटता हुआ दीखता नहीं है। इसका कारण केवल ईश्वर द्वारा इसे नवीन रखना ही हो सकता है। न केवल हमारी यह सृष्टि अपितु सृष्टि के अन्य ग्रह व उपग्रह भी अब तक अपना यथोचित कार्य कर रहे हैं जिसके लिये यह ईश्वर के द्वारा बनाये गये थे। ब्रह्माण्ड की विशालता का भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसके लिये तो इस ब्रह्माण्ड को अनन्त कहना ही समीचीन प्रतीत होता है। किसी कवि ने ईश्वर की महिमा को विचार कर एक भजन लिखा है जिसकी आरम्भिक पंक्तियां हैं तेरा पार किसी ने भी पाया नहीं, दृष्टि किसी की तू आया नहीं। तेरा पार किसी ने भी पाया नहीं।।’ वेदों ने भी नेति-नेति कह कर उस ईश्वर का गुणगान किया है। हम चाहे कितने भी ज्ञानी हो जायें व ईश्वर के बारे में बड़े-बड़े सही अनुमान भी लगा लें, परन्तु ईश्वर की महिमा उससे भी कहीं अधिक होगी। इसका अर्थ यह है कि हम ईश्वर की महिमा की कल्पना नहीं कर सकते। हम जीवन में छोटी-छोटी वस्तुओं को प्राप्त करने के लिये लालायित रहते हैं जिनका एक या दो बार ही उपयोग होता है। ईश्वर अनादि काल से हम पर अनेक प्रकार के उपकार करता आ रहा हैं जिन्हें हम जानते नहीं या भूल चुके हंै। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम अधिक से अधिक ईश्वर विषयक साहित्य का अध्ययन करें और अधिक से अधिक सद्कर्मों को करते हुए उन सभी को उसको समर्पित कर दें। अपने सद्कर्मों के प्रति हमारा किसी प्रकार से स्वार्थ का भाव नहीं होना चाहिये। ऐसा करके ही हम अपनी आत्मा को शुद्ध व पवित्र तथा ईश्वर से मिलने व उसके साक्षात्कार के योग्य बना सकते हैं। इस स्थिति को प्राप्त होकर ईश्वर-साक्षात्कार में हम क्या पायंेगे और हमारे आनन्द की क्या सीमा होगी, इसका हम अनुमान भी नहीं कर सकते।

               ईश्वर ने हमारे हमारे समान असंख्य वा अनन्त जीवों के लिये कभी पुरानी होने वाली इस सृष्टि को बनाया है। इस सृष्टि को बनाने वाला वह परमात्मा इस इस पूरे ब्रह्माण्ड का रचयिता अधिष्ठाता है। उसकी महिमा को हम पूर्णरूपेण कभी नहीं जान सकते। यदि हम उसके ओ३म् नाम का स्मरण जप करते हुए तथा उसका चिन्तन-मनन करते हुए अपने जीवन को व्यतीत करें तो यही हमारा कर्तव्य है। ऐसा करते हुए हमें अपने किसी अन्य कर्तव्य की भी उपेक्षा नहीं करनी है। इसी के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं। ओम् शम्।

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