लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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zarushthraडा. राधेश्याम द्विवेदी
पारसी या फारसी धर्म के प्र्रवर्तक या पैगम्बर का नाम जरथुस्त्र या जोरास्टर था। यह धर्म फारस या प्राचीन ईरान में आर्यों के वैदिक धर्म से अनुप्राणित होकर निकला है। परम्परागत रुप में इसका समय 6000 ई.पू. कहा जाता है। इतिहास में सिकन्दर की विजय ( 330 ई.पू.) से 258 साल पहले 588 ई.पू. इस धर्म का उत्कर्ष काल रहा। इसलिए पश्चिमी विद्वान इस पैगम्बर का समय 628-557 ई.पू. के मध्य मानते है।
पहलवी परम्परा के अनुसार इनका पारिवारिक नाम स्पितमा (अत्यधिक श्वेत) था। वे पोरोष्स्पी एवं दुगदोवा के पुत्र थे। उन्होंने 20 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर 10 वर्षों तक उषी – दारेन पर्वत पर चिन्तन मनन करते हुए ज्ञान प्राप्त किया और अपने गांव लौट आये। उन्होंने सारे जीवन और जगत को पुण्य और पाप के बीच चलने वाले भीषण द्वन्द्व के रुप में देखा और इसी केन्द्रीय विचार पर अपना मतवाद खड़ा किया। उनका नया धर्म कोई स्वीकार नहीं कर रहा था तो वह बैक्ट्रिया (आधुनिक अफगानिस्तान) आकर वहां के शासक कुमार कावा विश्ताश्पा , उनके दरबारी एवं जनता को अपने धर्म की दीक्षा दिए। उन्होंने बैक्ट्रियाई दरबार के एक मंत्री की पुत्री से शादी कर अगले 30 वर्षों तक चीन तिब्बत आदि देशों में अपने धर्म का प्रचार किया। 77 वर्ष की उम्र मे वह बल्ख ( आधुनिक काबुल ) के एक अग्नि मंदिर मे प्रार्थना कर रहे थे जहां इराक के एक हत्यारे ने छुरा भोंककर उनकी हत्या कर दी।
प्राचीन विद्वानों के अनुसार इस धर्म की उत्पत्ति प्राचीन फारस ( वर्तमान ईरान ) में हुई थी। फारस संस्कृत के पारस शब्द से बना है। फारस में रहने के कारण इस धर्मावलम्बियों को फारसी कहा जाने लगा। जब पारसी लोग भारत पहुचे, गुजरात के राजा यादव राणा ने उनका प्रेम से स्वागत किया। तब से ये बीर , धर्मप्राण लोग भी सच्चाई से भारत वासियों के साथ रहे हैं। ये बड़े शान्तिप्रिय लोग थे। फारस में मुस्लिम आक्रमण के पश्चात् शरणार्थी के रुप में भारत के पश्चिम तट पर 936 ई. में ये आये थे जो कृषि, व्यापार एवं वाणिज्य में संलग्न हो गये। ये मुम्बई एवं सूरत के आसपास बस गये। भारत के औद्योगिक विकास में ये अपना अच्छा योगदान दे रहे हैं। दादा भाई नौरोजी ( हुतात्मा ) तथा जमशेदजी नौशेरवानजी टाटा के नाम से कोई भी भारतीय अपरचित नहीं होगा। भारत में पारसी जन किसी भी प्रकार के जोर जबरदस्ती जैसी हरकत नहीं किये। इनकी जनसंख्या एक लाख से ऊपर थी जो निरन्तर कम होती जा रही है। मुम्बई में यह बड़ी संख्या में निवास कर रहे थे। इनके उपनाम प्रायः टोपीवाला, सुतलीवाला , बाटलीवाला तथा पालकीवाला जैसे पाये जाते हैं। आगरा में 1950 में लगभग एक हजार परिवार पारसियों का था जो अब कुछ गिने चुने ही बचे हुए हैं। जिस दिन ये भारत में आये उस दिन को वे नवरोज पर्व के रुप में मनाते हैं। इस दिन वे अपने घरों व प्रतिष्ठानों को दीपावली जैसे रोशनी से सजाते हैं।
प्राचीन फारसी लोग और भारतीय आर्यों के पूर्वज एक ही वंश के थे। पारसियों के ईरानी तथा वैदिक धर्म के देवों तथा उनके पूजा अनुष्ठानों में बहुत समानताएं थीं। इससे पता चलता है कि भारतीय आर्य ईरान से आये थे तथा दोनों एक ही पूर्वजों के वंशज थे। आर्य भारत में लगभग तीन चार हजार वर्ष पूर्व आ गये थे और पारसी 936 ई. में आये थे। आर्य जब भारत आ रहे थे, उनकी एक शाखा ईरान में रह गई थी जो भारतीय आर्यों के समान प्रकृति के दिव्य तत्वों ( सूर्य, अग्नि, चन्द्रमा, वायु, जल आदि ) की पूजा करते थे। इनमें अग्नि को विशेष महत्व दिया जाता था। इन सभी दृष्य तत्वों से परे एक सूक्ष्म, सर्वोच्च एवं अदृष्य तत्व ( इश्वर) का अस्तित्व भी माना जाने लगा था। इसे अहुर ( असुर) कहते थे।
इस धर्म की शिक्षा तथा फारसी धर्म की मान्यताओं का संकलन जेन्द अवेस्ता नामक ग्रंथ में प्राप्त होता है , जो भारत के ऋग्वेद के समान ही धर्मग्रंथ है। ऋग्वेद में जिन उच्च गुणों का नाम ऋत कहा गया है , उन गुणों के लिए अवेस्ता में अशा शब्द का प्रयोग किया गया है। ऋतसंम्पन्न व्यक्ति भारत में ऋषि तो अशा सम्पन्न अवेस्ता में रतु कहा जाता है। दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची हैं । इस जाति में भी भारत जैसे चार वर्णो का विधान था। भारतीय द्विजों के उपनयन संस्कार की भांति पारसियों में नवजोत (नवजन्य ) संस्कार पुराने समय से चला आ रहा है। कालान्तर में दोनों शाखाओं में भेद पड़ने लगा। अहुर ( असुर ) पारसियों में इश्वरवाचक हो गया और भारत में दानव के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। इसके बदले में पारसियों ने देव शब्द का अर्थ अपनी भाषा में दानव कर लिया। पारसी लोग इन्द्र, नासत्य, विधातृ आदि देवताओं को जानते थे। उनके यहां ये नाम देवों के नहीं, दानवों के हो गये । तब भी दोनों शाखाओं में माओघा ( चन्द्रमास), मिथ््रा(मित्र ),यिम ( यम) आदि एक ही अर्थ में पूजे जाते रहे हैं।
बाद में ईरानी शाखा के आर्यों में कुरीतियां आ गईं और धर्म का रुप कलुशित हो गया। पृथ्वी ने गौ का रुप धारण कर ( आर्यों की पौराणिक कथा जैसा ) अहुर से बचने के लिए प्रार्थना की और अहुर मज्द ने मानवों के उद्वार के लिए पृथ्वी पर जरथ्रुस्त्र ( कनकाभ) को भेजा। जरथ्रुस्त्र की वाणी ही गाथा कहलाती है, जो षुद्व संस्कृत नाम है। गाथायें पांच होती हैं जिन पर जरथ्रुस्त्र धर्म आधारित है। डा. तारपोरवाला का कथन है कि भाषा और भाव दोनों ही दृश्टियों से गाथा और ऋग्वेद के प्रारम्भिक मंत्र समान हैं। दोनों में एक ही छन्द का प्रयोग हुआ है। गाथा के मंत्र ऋग्वेद के मंत्रों की भाषा में आसानी से बदले जा सकते हैं। दोनों के पारिभाशिक षब्दों में समानता है। ऋग्वेद का सोम गाथा में होम हो गया है। वेद का सर्वतत् ( संम्पूर्णता ) गाथा का हौर्वतत् हो गया। षक्ति के अर्थ में क्षात्र शब्द का प्रयोग गाथा और वैदिक संस्कृत दोनों में एक जैसा है। ईसाइयत और इस्लाम में भगवान और शैतान की जो कल्पना उदित हुई , वह जरथ्रुस्त्र धर्म की ही देन है। जरथ्रुस्त्र के अहुर मज़्द ही भगवान और अहिर्मन ही शैतान है।
जरथ्रुस्त्र.धर्म में दीक्षित ईरानियों ने ही ईरान में वह उन्नतिषील साम्राज्य स्थापित किया जो रोमन साम्राज्य का जवाब था। ई.पू. 321 में सिकन्दर ने ईरानी राज्य पर चढ़ाई की थी और 651 ई. में अरब के नये मुसलमानों ने चढ़ाई की थी। ईरानी साम्राज्य विलास में डूबा हुआ था , अतएव वे आगे टिक ना सके। ईरानी हार गये और लगभग दो तीन सौ वर्ष में सब के सब मुसलमान हो गये। फिर ईरानी संस्कृति ने अरबों पर ऐसा धावा किया कि पारसी , ईरानी या फारसी भाषा ही इस्लाम की भाषा हो गई और इस्लाम को लोग ईरानी संस्कृति का पर्याय मानने लगे।
इसी मुसलमानी आक्रमण से घबड़ाकर अपने धर्म की रक्षा करने के लिए कुछ पवित्र फारसी सन 936 ई. में ईरान से भाग कर भारत में आ बसे और आनन्दपूर्वक रहने लगे। आर्यों की भांति पारसी भी अग्नि पूजक थे। भगवान जरथ्रुस्त्र को परमात्मा ने ही अग्नि प्रदान किया था जो तब से लेकर अब तक ईरान में जल रही है। इसी कारण इनके धर्म का नाम अग्यिारी भी कहा जाता है। यह अग्नि पारसी लोग भारत लाये और उसे मुम्बई से 80 मील उत्तर उदवाद नामक स्थान में मन्दिर बना कर स्थापित कर दिया। यह अग्नि आज भी जल रही है । इतिहास में बहुत उलट फेर हुआ है । इस्लाम के आने के बाद बहुत सी ऐसी बातें एवं नाम भारत पहुंचे जिन्हें लोग भ्रम के कारण ही इस्लाम से संबद्व मानते हैं। वास्तव में वे उन ईरानियों के नाम हैं जो मुसलमान नहीं जरथ्रुस्त्रवादी थे। शाहपुर और न्यायी नौशेरवाॅं ईरान के बादशाह थे , किन्तु वे मुसलमान नहीं थे। शीरी और फरहाद जरथ्रुस्त्री प्रेमी युगल थे। षीरी ईरान के बादशाह खुषरू परवेज की पत्नी थी और फरहाद उसी देश का मूर्तिकार था।
भारत और ईरान का संबंध बहुत पुराना था। जब आर्य इस देश में नये नये आये थे उस समय भारत और ईरान की सीमायें मिली हुई थी। दोनों देशों के लोगों के रीति रिवाज एवं धर्म एक थे। धर्म ये अन्तर तब से दिखाई देने लगा जब जरथुस्त्र ने अपना नया धर्म चला दिया था। मौर्यों से पूर्व , गांधार औेर भारत के कुछ पष्चिमोत्तर भाग ईरानी साम्राज्य के अंग थे। मौर्यों के समय ईरानी राज्य के कुछ ही भाग भारत में मिला लिए गये थे। मौर्यों के बाद, शकों के शासन में ईरान और भारत के कुछ भूभाग एक राज्य के अन्तर्गत थे। भविष्यत पुराण में कहा गया है कि श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को जब कुष्ट हो गया था तब उन्होंने चन्द्रभागा नदी के किनारे एक सूर्य मन्दिर का निर्माण कराया था। इसके लिए जब उन्हें कोई्र स्थानीय पुरोहित नही मिला तो शक द्वीप के मग जाति के ब्राह्मण बुलवाये गये थे जो जरशब्द या जरशस्त के अनुयायी थे। सर चाल्र्स इलिएट का अनुमान है कि ये ब्राह्मण ईरान के मागी रहे होंगे और जरशब्द या जरशस्त नाम जरथ्रुस्त्र का है।
प्रमुख शिक्षाएंः
1. इश्वर एक है , वह सत्यात्मा , न्यायी , सर्वज्ञ और सर्वगुण सम्पन्न है। वह शुभ एवं प्रकाशमान है।
2. अहिर्मन अशुभ एवं अंधकार का प्रतीक है। वह इश्वरी तत्वों को सदा चुनौती देता रहता है।
3. मनुष्य का जीवन नाना प्रकार के द्वन्द्वों से युक्त है। मनुष्य स्वविवेक से सत्, असत्, शुभ अशुभ आदि का अन्तर पहचानकर जीवन में व्यवहार करे।
4. नैतिक द्वन्द्वों में अन्तिम विजय शुभत्व की होती है, सत्य और न्याय की होती है।
5. मनुष्य का दायित्व है कि वह सत्य, मंगलमय और त्याग का मार्ग अपनाये।
6. मनुष्य इश्वर में आस्था रखे और स्व कर्म को निष्ठांपूर्वक करता रहे। अन्तिम विजय शुभत्व की होती है।

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