पर्यावरण संतुलन बिगाड़ने में इंटरनेट की भूमिका!

लिमटी खरे

ट्वंटी ट्वंटी यानी सन 2020 आरंभ हो गया है। विजन 2020 को लेकर न जाने कितने सपने दिखाए गए थे इक्कीसवीं सदी के आरंभ में, पर जैसे जैसे ट्वंटी ट्वंटी करीब आया वैसे ही सारे के सारे वायदों की हवा निकलती ही दिखी। आज के समय में इंटरनेट के बिना जीवन की कल्पना मात्र ही सिहरन पैदा कर देती है। सूचना, संचार और प्रौद्योगिकी यानी आईसीटी उद्योग के अंतर्गत इंटरनेट, वीडियो और इसी तरह की अनेक क्लाऊड सेवाओं से साल भर में 83 करोड़ टन से ज्यादा कार्बन डाई आक्साईड का उत्सर्जन होता है। एक शोध पत्रिका एनवॉरमेंटल साईंस एण्ड टेक्नॉलाजी के अनुसार एनजी, इफिसिंट टेली कम्यूनिकेशन्स और बेला लेब्स के विद्यार्थियों के द्वारा किए गए शोध के अनुसार आईसीटी का उत्सर्जन 2020 में दो गुना हो सकता है। कल तक रिफरेंस के लिए किताबों आदि को सहेजकर रखना होता था पर आज सब कुछ एक क्लिक पर ही है।

महानगरों को छोड़िए, छोटे से गांव में भी अगर बिजली गोल हो जाए और इंटरनेट के टावर काम करना बंद कर दें तो अफरा तफरी मच जाती है। मोबाईल के साथ ही साथ अब मोबाईल पर इंटरनेट लोगों का प्यारा शगल बनकर रह गया है। सत्तर के दशक तक बड़े शहरों में कलर्ड फोटोग्राफ खिंचाने की सुविधा थी तो छोटे और मझौले शहरों में श्वेत श्याम (ब्लेक एण्ड व्हाईट) चित्र ही सब कुछ हुआ करते थे। जैसे जैसे तकनीक उन्नत हुई वैसे वैसे कैमरे उन्नत हुए। फिर आया वीडियो कैमरों का दौर! किसी ने शायद ही कभी सोचा होगा कि हाथ में लेकर चलने वाले छोटे से मोबाईल से बेहतरीन फोटो और वीडियो भी बनाए जा सकते हैं। इन्हें सेकन्ड्स में एक दूसरे के पास भेजा भी जा सकता है।

इंटरनेट के जरिए कार्बन उत्सर्जन की बात लोगों को मजाक लगे पर हावर्ड विश्वविद्यालय के भौतिक शास्त्र के जानकार डॉ. एलेक्स विजनर ग्रास के द्वारा कुछ साल पहले किए गए अध्ययन में इस बात को उजागर किया था कि गूगल पर दो बार सर्च करने में उतनी कार्बन का उत्सर्जन होता है जितना कि एक बार चाय बनाने में! कहा जाता है कि एक कप चाय बनाने में 15 ग्राम कार्बन डाई आक्साईड का उत्सर्जन होता है। यह मामला इस कदर उठा कि गूगल को सफाई देना पड़ा और गूगल के द्वारा दी गई सफाई में इस बात से इंकार नहीं किया गया कि डाटा का उपयोग करने से कार्बन का उत्सर्जन होता है!

कहा जाता है कि एविएशन इंडस्ट्री के द्वारा ओजोन की परत को उतना प्रभावित नहीं किया है जितना कि इंटरनेट का उपयोग करने वालों के द्वारा किया जा रहा है। हम तो एक बटन दबाकर जानकारी हासिल कर रहे हैं, पर यह जानकारी किस स्त्रोत में रखी हुई है! और वहां तक पहुंचने के लिए कितनी उर्जा खर्च करना पड़ रहा है यह बात भी शोध का ही विषय है।

इंटरनेट लोगों की सहूलियत के साथ ही साथ उनकी परेशानी का सबब भी बनता जा रहा है। आज मोबाईल और इंटरनेट का एडिक्शन सबसे खतरनाक ही साबित हो रहा है। इंटरनेट पर किसी भी साईट को खोलने पर पचास तरह के विज्ञापन आपका ध्यान भटकाते हैं। इसके अलावा पार्श्व में अनेक टूल्स के जरिए आपकी जासूसी के खतरे से इंकार नहीं किया जा सकता है। इंटरनेट के कारण ग्लोबल वार्मिंग को खतरा बना हुआ है। दुनिया का चौधरी अमरीका सबसे ज्यादा कार्बन का उत्सर्जन करता है। इसके बाद चीन का नंबर आता है और भारत तीसरी पायदान पर खड़ा हुआ है। वैज्ञानिकों की मानें तो भारत के बाद कार्बन उत्सर्जन के लिए चौथी पायदान पर इंटरनेट का रखा गया है।

इंटरनेट के जरिए कार्बन उत्सर्जन को कम कैसे किया जाए इस पर विचार करने के बजाए देश मे थ्री जी के बाद अब 04जी और 05जी की तैयारियां की जा रही हैं। जिस तरह से कार्बन उत्सर्जन के मामले में इंटरनेट को जवाबदेह ठहराया जा रहा है उसके लिहाज से 2024 में इससे होने वाला कार्बन उत्सर्जन 24 फीसदी तक बढ़ जाएगा। उस समय इंटरनेट ही कार्बन उत्सजर्न का सबसे बड़ा स्त्रोत बनकर सामने आएगा। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि जब भी पर्यवरण की बात आती है तो इंटरनेट की ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं जाता!

वैसे भी इस समय पर्यावरण को लेकर स्थितियां बहुत ज्यादा चिंताजनक ही मानी जा सकती हैं। पेड़ों को लगाए जाने के मामले में भी अभी बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है। दरअसल, भ्रष्टाचार का दानव ही इन सारी योजनाओं को निगल जाता है। देश में पौधारोपण के अनेक कार्यक्रम चलते हैं पर साल भर बाद किसी को यह देखने की फुर्सत नहीं रह जाती है कि लगाए गए पौधों में से कितने जीवित रह गए हैं। देश, प्रदेश में वन विभाग के अमलों की जवाबदेही तय तो है पर इसका निर्वहन हो रहा है अथवा नहीं यह देखने की फुर्सत शायद ही किसी को मिल पाती हो।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में महज 16 साल की ग्रेटा थनबर्ग के आरोपों को बेबुनियाद नहीं माना जा सकता है, जिन्होंने हुक्मरानों पर ग्रीन हाऊस गैसेज के उत्सर्जन से निपटने में अक्षम रहने की बात कही थी। उनका कहना साफ था कि इस तरह नेताओं के द्वारा युवा पीढ़ी के साथ न केवल विश्वासघात किया है वरन उनका बचपन भी छीन लिया है। आज महानगरों में सर्दियों में स्माग जैसी समस्या की मूल वजह क्या है! अनेक वन्य जीवों की प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर है।

मौसम के चक्र के संबंध में अगर बारीकि से अध्ययन किया जाए तो सर्दी, गर्मी और बरसात का मौसम धीरे धीरे आगे खिसकता जा रहा है। पहले अक्टूबर से सर्दी आरंभ होती थी और मकर संक्रांति (14 जनवरी) के आसपास बिदाई ले लेती थी। कुछ सालों से फरवरी में भी कड़ाके की सर्दी पड़ रही है।

इसी तरह गर्मी का मौसम मार्च के अंत से जून के मध्य तक रहता था, पर कुछ सालों से गर्मी अप्रैल से आरंभ होती है और जून के अंत तक रहती है। यही आलम बरसात का है। बरसात का मौसम जून के दूसरे सप्ताह से सितंबर के मध्य तक माना जाता है। इस साल अक्टूबर माह तक बारिश होती रही।

निश्चित तौर पर यह चिंताजनक हालात माने जा सकते हैं। 2018 के अंत में जलवायू विशेषज्ञों के द्वारा भी दुनिया भर के देशों को चेताते हुए कहा गया था कि जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए अब ज्यादा समय नहीं रह गया है। इसके लिए 2030 तक का ही समय रह गया है, इसलिए जो भी प्रयास किए जाने हैं वे जल्द से जल्द किए जाएं। इस चेतावनी के एक साल बाद भी पर्यावरण संतुलन के मामले में दुनिया भर के देश जस के तस ही खड़े दिख रहे हैं। अब महज एक दशक ही हमारे सामने रह गया है। इस एक दशक में अगर पर्यावरण संतुलन के लिए प्रयासों में संजीदगी नहीं लाई गई तो आने वाली पीढ़ी को इसके दुष्परिणाम भोगने से कोई नहीं रोक सकता।अभी भी समय है। जब जागो तब सवेरा की तर्ज पर पृथ्वी की जीवनदायनी क्षमताओं को चिन्हित कर उनकी रक्षा के लिए प्रयास करना जरूरी है। आज इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि ग्रीन हाऊस गैसेस के उत्सर्जन में कमी कैसे लाई जाए। इसके लिए वैश्विक स्तर पर योजना बनाई जाए। अगर भारत को इसके लिए पहल करनी पड़े, या इसका नेतृत्व करना पड़े तो देश के हुक्मरानों को पीछे नहीं हटना चाहिए।

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