लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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18जून फादर्स डे पर विशेषः-

मृत्युंजय दीक्षित
वर्तमान आधुनिक समय में जब पूरे विश्व में आर्थिक उदारीकरण और ग्लोबलाइजेशन का दौर चल रहा है उस समय कुछ नयी संस्कृति के पर्वों और डे का उदय हो रहा है। आज का युग मीडिया का युग है। आधी से अधिक वैष्विक संस्कृति मीडिया के प्रचार- प्रसार से अधिक प्रभावित हो रही है। प्रतिदिन कोई न कोई डे सामने आ रहा है। अब विदेषी सभ्यता की देखादेखी और विदेषी कंपनियों के उत्पादों को किसी भी हाल में बेचने के लिए एक नया डे ऐजाद कर लिया गया है और वह है फादर्स डे।
यदि फादर्स डे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर ध्यान दिया जाये तो पता चलता है कि इस डे को मनाने को लेकर विदेशों में ही एकमतता नहीं थी और अभी भी नहीं है। लेकिन भारत में फादर्स डे को मनाने के लिए विदेषी कंपनियां खासकर सोषल मीडिया, टी वी और मोबाइल कंपनियां विशेष तैयारी करती हैं। समाचार पत्रों मेें विशेष कालम तैयार किये जाते है। अधकचरे ज्ञान से विभूषित व अपने आप में आधुनिकता का चादर ओढ़ने वाले आज के समाज को यही नहीं पता है कि भारतीय संस्कृति व सभ्यता में पिता को कितना महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। भारतीय समाज में पिता को आकाश के समक्ष तथा माता को धरती के समकक्ष माना गया है।
भारतीय समाज में माता अपने बच्चे का पालन पोषण करती है तथा वह अपनी संतान के हरसुख व दुख में भागीदार बनती है जबकि कहा जाता है कि पिता परिवार का आर्थिक रूप से पालन करने के लिए परिवार से दूर चला जाता है। संतान अधिकांशतः माता के सानिध्य में रहती है। जबकि वास्तव मेें ऐसा नहीं है। भारतीय संस्कृति में पिता का उतना ही महत्व है जितना की माता का। एक प्रकार से पिता अपनी संतानों का मार्गदर्शक होता है। वह अपने हर बालक व बालिका को घर से दूर रहकर भी हर प्रकार से मजबूत बनाता है। पिता एक मजबूत संबल होता है। भारतीय संस्कृति में मान्यता है कि यदि पिता का आशीर्वाद बालक व बालिका को मिल जाता है तो समझों उसका जीवन पूरी तरह से धन्य हो जाता है। पिता सदा अपनी संतान का भला ही चाहता है। पिता के जीवन से ही संताने अपना आगे का मार्ग चुनती हैं। पिता सर्वोपरि है। हिंदू धर्म में भगवान सूर्य को पिता माना गया है। ष्षनि देव को सूर्य पुत्र माना गया है। महाभारत की लड़ाई में कर्ण सूर्य पुत्र था। पितृभक्त ध्रुव अपने पिता के आषीर्वाद से आकाष की ऊंचाइयों को छू गया।
भारतीय इतिहास में पितृभक्ति की कई कइानियां हैं। इसलिए भारत में फादर्स डे मनाने का कोई महत्व नहीं हैं लंेकिन आधुनिक मीडिया व कल्चर ने अब सब कुछ संभव कर दिया है। भक्त धुव अपने पिता के ही आशीर्वाद से आकाश में एक तारे के समान चमक रहा है।
अब आइये जरा देखते हैं कि आधुनिक फाइर्स डे की क्या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है तथा इसका वास्तविक इतिहास क्या है। फादर्स डे की शुरूआत 20 वीं सदी से मानी जाती है।मान्यता है कि पिताधर्म तथा पुरूषों द्वारा परवरिश का सम्मान करने के लिए मातृ दिवस के पूरक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह हमारे पूर्वजों और उनके सम्मान की स्मृति में भी मनाया जाता है। फादर्स डे विश्व के सभी देशों में अलग- अलग तारीखों तथा अलग- अलग रूपों से मनाया जाता है। जिसमंे उपहार देना, पिता के लिए विशेष भोज का आयोजन एवं पारिवारिक गतिविधियां शामिल हैं के रूप में मनाया जाता है । विदेशी संस्कृति आमतौर पर बिलकुल अलग किस्म की है। वहां पर वृद्ध माता- पिता को परिवार से अलग कर दिया जाता है उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। वहां पर बच्चों के पास इतना समय नहीं होता कि वे अपने पिता व माता के लिये प्यार व सांत्वना के दो क्षण निकाल सकें। इसी दृष्टिकोण से एक दिन पिता को समर्पित किया गया है। यह विदेशी कल्चर है। जबकि इसके विपरीत अपने यहां पितरों को याद करने के लिए पितृपक्ष मनाया जाता है। पितरांे का तर्पण किया जाता है। हम लोग प्रतिदिन पिता का आशीर्वाद लेते हैे। उनका वास्तविक प्रेम प्राप्त करके जीवन में आगे बढ़ते हैं। पिता जिंदगी को जीने का ढंग सीखाते हैं। वह अपने बालक और बालिका को इतना मजबूत देखना चाहते हैं कि वह स्वयं अपने पैरों पर खड़ा होकर दूसरों के लिए समस्या न बनकर समाज की समस्या हल करने वाला बनकर समाज मंे उभरे। पिता कभी भी अपने बालक व बालिका को निराशा की मुद्रा में नहीं देखना चाहता अपितु वह उसे मानसिक रूप से इतना मजबूत बनाना चाहता है कि वह किसी भी कठिन से कठिन परिस्थितियों में प्रसन्न रहते हुए जीवन का आनंद उठा सके।
कहा जाता है कि 6 दिसम्बर 1907 को पश्चिम वर्जीनिया के एक खान में मारे गये 210 पिताओं के सम्मान में इस विशेष दिवस का आयोजन किया गया। इस डे के विवादों मंें रहने के कारण पष्चिमी देषों में आधिकारिक छुटटी बनाने में कई दिन लग गये। विदेशों में जहां मदर्स डे को उत्साह के साथ मनाया जाता था वहीं फादर्स डे का मजाक। समाचार पत्र- पत्रिकाओं में कार्टून और व्यंग आदि प्रकाषित होते थे। धीरे- धीरे अवकाष को प्रोत्साहन मिला लेकिन गलत कारणों के लिए।
अमेरिका में कांग्रेस के भारी विरोध के बाद 1966 मेें राष्ट्रपति लिंडन जानसन ने प्रथम घोषणा जारीकर जून महीने के तीसरे रविवार को पिता के सम्मान मंें फादर्स डे के रूप में तय किया। 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने फादर्स डे पर अवकाष घोषित किया।
विश्व भर के देशों में यह अलग तारीखों कारणों के बीच मनाया जाता है। अधिकांश देशों में फादर्स डे पर आज भी राष्ट्रीय अवकाश नहीं घोषित है। जर्मनी में यह पर्व बिलकुल अलग मंे मनाया जाता रहा है।जर्मनी में 19 वीं शती में रूश्ैंटिलमैन पार्टियां मनायी जाती थीं जिसमें महिलाओं को नहीं शामिल किया जाता था और देर रात तक शराब का वितरण और सेवन किया जाता था। जापान,सेषेल्स, न्यूजीलैंड फिलीपींस में सहित कई देशों में सार्वजनिक अवकाश नहीं होता।एक प्रकार से देखा जाये तो फादर्स डे केवल ओर केवल पश्चिमी सभ्यता का संवाहक और भारतीय संस्कृति के विपरीत है। जिसे आज का मीडिया गलत प्रचार के माध्यम से भारतीय संस्कृति को भी दूषित करने मंें लग गया है।

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