लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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सरकारी दावा २१ मौतें परन्तु अपनों को तलाशते घाट पर मौजूद लापता लोगों के परिजनों को देख कर कहा जा सकता है कि मृतकों की संख्या इससे हो सकती है बहुत ज्यादा l नीतीश सरकार के आपदा प्रबंधन की एक बार फिर खुली पोल , NDRF के बाद पहुँचा जिला – प्रशासन, प्रकाश-पर्व उत्सव के इंतजामातों की कुछ ज्यादा ही हो गई थी ‘ब्रैंडिंग’ … सरकार व् प्रशासन की खुमारी नहीं हुई थी दूर ? सरकार ने जाँच के आदेश की औपचारिकता पूरी कर दी है लेकिन क्या महज जाँच से चली गयीं जानें वापस आ जाएंगी ? ऐसी जाँचों का हश्र क्या होता है किसी से छुपा है क्या ?

 

बिहार का  आपदा – प्रबंधन तंत्र अपने आप में आपदा है l कल के हादसे के पश्चात्  बिहार के आपदा-प्रबंधन की व्यवस्था पर फिर से एक नई बहस छिड़ गई है , इससे जुड़े अनेकों अनुत्तरित – प्रश्न हैं जिन पर एक गंभीर सोच के साथ सरकार की ओर से सार्थक पहल वक्त की मांग है l बाढ़ की विभीषिकाओं , छठ व् रावण – वध हादसे के बाद  आपदा – प्रबंधन के सन्दर्भ  में बिहार में   बातें तो काफी की गयीं लेकिन अभी तक कोई भी प्रभावी – व्यवस्था मूर्त रूप नहीं ले पायी है l  प्रदेश  में आपदा – प्रबंधन मंत्रालय का गठन तो हुआ लेकिन अभी भी आपदा के समय में एकमात्र सहारा एनडीआरएफ  ही है l हालिया वर्षों में अनेकों प्राकृतिक-आपदाओं का कहर सूबे  पर बरपा और सबों के पश्चात आपदा -प्रबंधन को दुरुस्त करने की बातें भी खूब हुईं , सरकार की समीक्षा बैठकों , प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर लंबी परिचर्चाओं का दौर चला लेकिन ऐन मौकों पर सारी व्यवस्थाएँ धवस्त हो गयीं l बिहार के  आपदा – प्रबंधन तंत्र की सबसे बड़ी आपदा यह है कि लोगों को किसी कुदरती  कहर या दुर्घटना से बचाने की जिम्मेदारी अनेक की है किसी एक की नहीं। आपदा – प्रबंधन किसका दायित्व है? मुख्यमंत्री  सचिवालय ? जो खुद को हरेक मर्ज की दवा मानता है या गृह मंत्रालय ? जिसके पास दर्जनों दर्द हैं या आपदा प्रबंधन मंत्रालय / विभाग  ? जो हरेक हादसे  के पश्चात अपनी नाकामी को मुआवजे की रकम अदायगी की आड़ में छिपाता दिखता है l अपने शुरुआती दौर से लेकर अब तक  बिहार के  आपदा – प्रबंधन मंत्रालय – विभाग ने सतही तौर पर  सिर्फ ज्ञान और विज्ञापन देने का काम ही किया है।

 

लापरवाह प्रशासनिक अमले और अधिकारियों को जाँच से किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुँच कर अगर कोई कड़ा सन्देश देना चाहती है  सरकार  तो निम्नलिखित प्रश्नों पर जाँच के दायरे को सीमित कर प्रशासनिक जिम्मेवारी तय कर अधिकारियों को दण्डित करे l

  • गंगा दियारे में जुटी बडी़ भीड़ ((लगभग १ लाख )) के बावजूद क्यूँ नहीं थीं प्रशासन की तरफ से किसी संभावित हादसे से निबटने की तैयारियां ?
  • एक भी एम्बुलेन्स क्यूँ नहीं था तैनात ?
  • पहले से क्यूँ नहीं थी तैनात SDRF या NDRF की टुकड़ी ?
  • दियारे से लोगों को वापस लाने के लिए क्यूँ नहीं की गयी थी नावों – स्टीमरों की समुचित व् पर्याप्त व्यवस्था ?
  • क्यूँ नहीं लगाई गयी थी वरीय पुलिस व् प्रशासनिक अधिकारी की निगरानी / नेतृत्व में पर्याप्त पुलिस – बल की ड्यूटी ?
  • किन कारणों से हादसे के दो घंटे से भी ज्यादा वक्त के बाद घटना- स्थल पर पहुँचे पटना के वरीय आरक्षी – अधीक्षक व् जिलाधिकारी ?
  • पूर्व के हादसों से क्यूँ नहीं सबक ले रहा है बिहार का आपदा- प्रबंधन विभाग एवं पटना का पुलिस – प्रशासन ?

 

 

ये कुछ ऐसे यक्ष-प्रश्न हैं जो सूबे में आपदा – पबंधन के तमाम दावों का माखौल उड़ाते नजर आते हैं l अगर ऐसी दुर्घटनाओं  की जिम्मेदारी नहीं  ठहराई जाएगी और इसके लिए  जिम्मेवार लोगों को दंडित नहीं किया जाएगा तो ऐसी  दुर्घटनाएं  भविष्य में भी घटित होती रहेंगी  और लोग मरते रहेंगे l  जब कोई पुल गिरता है तो इसके निर्माण कार्य में लगी टीम के इंजीनियरों को जवाबदेह ठहराते हुए उनके विरुद्ध कार्रवाई की जाती है ,  मरीज के इलाज में कोताही करने या गलत इलाज करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल भेज दिया जाता है. लेकिन जब आम जनता  स्पष्टतया प्रशासनिक  लापरवाही  के कारण मौत के मुँह में समां जाते हैं  तो इसकी कर्ता-धर्ता  सरकार और उसके नुमाइंदों के ऊपर उंगली क्यों नहीं उठाई जा रही , दण्डित क्यूँ नहीं किया जा रहा  ??

 

जब तक ऐसा नहीं होगा सरकारें और सरकारी महकमा / विभाग अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते रहेंगे  , जो मेरी राय में  एक घृणित अपराध है l आरोप-प्रत्यारोप , जाँच के नाम पर लीपा – पोती   से स्थिति नहीं  बदलने वाली  है l  जिस क्षण से  किसी दुर्घटना-हादसे   के लिए मंत्री – अधिकारी  को जिम्मेदार ठहराने की शुरुआत हो जाएगी यकीन मानिए  सरकार और विभाग दोनों को लोगों के जान की अहमियत व् कीमत समझ में आने लगेगी  और   तब ही व्यवस्था जागेगी और जिम्मेवारी से   भागने के सारे रास्ते स्वतः ही बंद होंगे l

 

शुरुआत तो करनी होगी, यह जितनी जल्दी हो उतना ही बेहतर होगा  अन्यथा, हम यूँहीं  बहसें करते रहेंगे, आलेख पर आलेख लिखते रहेंगे और  प्रशासनिक चूक जनित दुर्घटनाओं व् मौतों  का तांडव जारी  रहेगा l

 

 

 

 

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आलोक कुमार

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