योजनाएं बेहतर तो है, प्रबंधन की कमी है भाजपा में

अनिल अनूप 
एनसीपी के एक नेता ने नरेंद्र मोदी की व्याख्या उनके जन्मदिन पर धोबी के कुत्ते के रूप में की। विपक्ष के इस नेता को भद्दे व्यवहार के लिए जिम्मेवार माना जाना चाहिए। मैं सोचता हूं कि ऐसे विशेषण और गालियां, जो विपक्ष द्वारा दी जाती हैं, विश्व को यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि ये वे लोग हैं जो कि दावा करते हैं कि भारत में लोकतंत्र व मानव अधिकार नहीं हैं। इसने अघोषित आपातकाल का तमगा हासिल कर लिया है। क्या ऐसे लोग आपातकाल में फल-फूल सकते हैं। राजनीति में जो लोग हैं वे केवल आजादी के असीमित अधिकारों का ही दुरुपयोग नहीं करते, बल्कि यह भी दावा करते हैं कि उनके पास कोई आजादी नहीं है। ऐसी निंदात्मक टिप्पणियों को अनसुना कर मोदी ने लोकतांत्रिक भावना का परिचय दिया है। लेकिन राष्ट्र को इस तरह की कार्रवाइयों को माफ नहीं करना चाहिए। मैंने मोदी के जन्म दिन पर कामना की कि मेरा मौला उनको दुगनी शक्ति दे ताकि वे राष्ट्र की सेवा करते रहें क्योंकि कई वर्षों से उन जैसा नेता कोई नहीं है। भाजपा के अब तक के चार वर्षों के शासनकाल में कई ऐसी अच्छी परियोजनाएं शुरू हुई हैं जो कि सच में ही राष्ट्र निर्माण अभियान की प्रतीक हैं। यह सच है कि कुछ निराश करने वाली विफलताएं सरकार की रही हैं जो उसकी उपलब्धियों पर एक धब्बे की तरह हैं। मैं सोचता हूं कि सरकार इन मसलों पर पर्याप्त विचार कर रही है। सरकार की सफलताएं अगर गिननी हों, तो वन रैंक वन पेंशन, यूपीए कार्यकाल के 17 किलोमीटर के मुकाबले 40 किलोमीटर प्रतिदिन सड़क निर्माण, सभी गांवों का विद्युतीकरण तथा आधार को लागू करना इस सरकार की बड़ी सफलताएं हैं। सबसे बड़ी कल्याणकारी योजना, जिसकी गरीबों के लिए सख्त जरूरत है, वह है स्वास्थ्य संबंधी योजना जो जल्द ही लागू कर दी जाएगी।
मोदी सरकार की सफलता की टोपी में दीवालियापन कानून के रूप में एक और पंख लगा है क्योंकि यह सरकार बैंकों के एनपीए को नीचे लाने के लिए कटिबद्ध लगती है। इसके बावजूद मुझे इस बात की चिंता है कि कुछ ऐसे मेगा प्रोजेक्ट हैं जिन पर सरकार अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई है। मेक इन इंडिया तथा न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन ऐसी ही योजनाएं हैं जहां सरकार का प्रदर्शन उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता। तीन बड़े प्रोजेक्ट, जिन पर काफी वाद-विवाद हो रहा है, वे हैं विमुद्रीकरण, जीएसटी तथा हवाई शक्ति को बढ़ाने के लिए राफेल विमानों की खरीद का सौदा। सभी मूल्यवान प्रोजेक्ट हैं तथा निकट भविष्य में इनसे राष्ट्र को काफी फायदा भी होगा, परंतु इन पर कार्यान्वयन सुस्त गति से चल रहा है। देश में अगर कोई अन्य प्रधानमंत्री हुआ होता तो उसे अपदस्थ कर दिया गया होता। लोगों ने काफी कुछ झेला है, किंतु इसके बावजूद उनका मोदी में विश्वास बना हुआ है। उनमें गहन विश्वास ने उन्हें तकलीफें झेलने को तैयार किया तथा उनकी कार्य प्रणाली आज भी लुभा रही है। विमुद्रीकरण से वो हासिल नहीं हुआ जो सोचा गया था। इसका मुख्य उद्देश्य काले धन को पकड़ना था, लेकिन प्रायः सारा पैसा वापस बैंकों में आ गया। इसके बावजूद इसने लोगों को काले धन से व्यापार करने से रोका तथा उन्होंने डिजीटल आर्थिकी को अपनाया जिससे व्यापार में पारदर्शिता आएगी। अब व्यापार ईमानदारी से होने लगा है तथा लोग करों की अदायगी भी कर रहे हैं। जो लोग गैर कानूनी गतिविधियों में शामिल थे, इसके कारण उनमें भय उत्पन्न हुआ है। राजस्व एकत्रीकरण में इससे लाभ हुआ है तथा बैंकिंग नेटवर्क में और खाते आए हैं, साथ ही आयकर प्रणाली में भी सुधार हुआ है। अमर्त्य सेन व मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्रियों ने इसके कारण विनाश की भविष्यवाणी की थी, जो सही साबित नहीं हुई।
जीएसटी को हालांकि दबंगई के साथ घोषित किया गया, किंतु इसका प्रबंधन शिथिल रहा, हालांकि अन्य सरकारें इसे लागू करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थीं। सरकार एक साधारण व कुशल प्रणाली बनाने में विफल रही जिससे ट्रांसपोर्टरों व उद्योगपतियों को कई तरह की पेचीदगियों का सामना करना पड़ रहा है। कई लोगों ने सोचा था कि अब चुंगी नाके नहीं रहेंगे, परंतु ये अब भी वैसे ही हैं तथा इससे ऐसे लोगों को निराशा हुई है। यात्रा अभी भी सुगम नहीं हो पाई है। रिकवरी तथा रिइंबर्समेंट सिस्टम को लेकर उद्योगपतियों को कई शिकायतें हैं। तीसरी परियोजना, जो रक्षा क्षेत्र से संबंधित है, वह है वायु सेना के लिए फ्रांस से राफेल विमानों की खरीद कर उसकी शक्ति को बढ़ाना। यह मामला यूपीए सरकार के समय से लेकर लटका हुआ था। उसने इसके लिए समझौता वार्ता भी की थी, किंतु वह इस परियोजना पर अमल नहीं कर पाई।
विमानों की खरीद के रेट को लेकर अब विपक्ष को लगता है कि इसमें भ्रष्टाचार हुआ है। वह इस मामले को जोर-शोर से उठा रहा है। किंतु लगता यह है कि चूंकि इस सौदे में कोई तीसरा पक्ष नहीं है, कोई मध्यस्थ नहीं है, इसलिए भ्रष्टाचार होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसा नहीं लगता है कि किसी तीसरी पार्टी को कोई भुगतान हुआ हो। यह सौदा सरकार की ओर से सीधा सरकार से हुआ है। सरकार ने जो नए मापदंड तय किए हैं, उससे दीर्घकाल में देश को लाभ ही होगा। इस तरह के कदम उठाने से अब तक की सरकारें हिचकिचाती रही हैं, क्योंकि इससे चुनावी हित प्रभावित होने तथा लोकप्रियता को बट्टा लगने का खतरा था।
लेकिन मोदी सरकार ने इन सब को अनदेखा करते हुए जोखिम उठाने का साहस दिखाया है, यह विपक्ष के लिए भी एक चुनौती है। मोदी सरकार से मेरी सबसे बड़ी निराशा न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन को लेकर है। इस मामले में खास कुछ नहीं हुआ है। हालांकि व्यापार करना अब कुछ सुगम हुआ है, किंतु प्रणाली में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है तथा लालफीताशाही की मिसालें अब भी मिल जाती हैं। सरकार इन सभी परियोजनाओं में विकलांग नजर आई तथा अब भी यहां उल्लिखित सभी तीन क्षेत्रों में संचार की स्थिति स्पष्ट नहीं है। वास्तव में सरकार की राफेल सौदे को लेकर सुस्त संचार पर बड़ी विफलता रही है। सर्जिकल स्ट्राइक में भी सरकार की संचार गतिविधि बढ़ी धूमिल किस्म की रही जिसमें पहले कुछ वीडियो दिखाए गए, जबकि बाद में अपने लोगों को बोलते हुए दिखाया गया। शासन के इस काफी कमजोर क्षेत्र में विपक्ष बड़े हमले करता रहा है। विविध मंत्रालयों का बड़े स्तर पर फिर से संगठन होना चाहिए था, इनमें विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए था तथा सरकार को और कुशल बनाने के लिए नए कामों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए था। सरकार की पूरी कार्य प्रणाली तथा न्यायपालिका में बड़े स्तर पर आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत है ताकि उपनिवेशवादी खामियों से छुटकारा पाया जा सके। मोदी इस मामले में विफल रहे हैं अथवा उनके पास समय नहीं है, किंतु उनकी कार्यप्रणाली में इसका बड़ा महत्त्व है क्योंकि यह वह बेयरिंग है जिस पर शासन का पहिया घूमता है।

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