‘श्री गणेश’ की आवश्यकता

डॉ कविता कपूर

गणेश उत्सव आयोजन के इतिहास पर यदि नजर डालें तो हम पाते हैं कि महाराष्ट्र में इसकी शुरुआत आजादी से पूर्व बाल गंगाधर तिलक ने की थी। इस उत्सव का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन को गति देना तथा अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंक कर गणेश पूजा के बहाने सभी स्वतंत्रता सेनानी और देशवासियों को एकत्रित करना था । वे आन्लदोलनों की योजनाएं बनाया करते थे । यह वह दौर था जब दो या दो से अधिक लोगों का एक जगह पर खड़े होना वर्जित था, अंग्रेज सरकार ने कड़े कानून असहाय भारतीयों पर लाद दिए थे। अतः गणेश उत्सव की आड़ में स्वतंत्रता आंदोलन की योजनाएं बनाई जाती थी । वर्तमान समय में यह श्रद्धा कम तथा भेड़ चाल अधिक हो गया है। फिल्मों से प्रभावित होकर घर- घर में गणेश की मूर्ति की स्थापना एक दिखावा मात्र बनकर रह गई है । लोग इस उत्सव के दौरान मिट्टी के प्रदूषण, जल प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण का कारण बनते हैं । सारा सारा दिन लाउडस्पीकर चलाना, उच्च रक्तचाप तथा अन्य मानसिक विकारों को जन्म दे रहा है। गणेश जी की प्रतिमाओं में इस्तेमाल हुए रासायनिक पदार्थों से बने रंग देखने में तो आकर्षक लगते हैं किंतु वे जल तथा मिट्टी को प्रदूषित करते हैं। यह भी देखने में आ रहा है के गणेशोत्सव के नाम पर बेरोजगार, दिग्भ्रमित युवा वर्ग लोगों से चंदा इकट्ठा करता है तथा इन पैसों का गलत कामों में प्रयोग किया जाता है। मदिरापान लड़ाई झगड़े और देर रात तक ध्वनि प्रदूषण आदि कृत्य किए जाते हैं। समाज के प्रबुद्ध वर्ग को तथा जनसंचार माध्यमों को इस विषय में पहल कर सामने आना चाहिए तथा लोगों में जन जागृति लानी चाहिए कि आस्था के नाम पर दिखावा करना तथा प्रदूषण फैलाना सर्वथा अनुचित है। पर्यावरण दोहन के नतीजे समय-समय पर उत्तराखंड त्रासदी, केरल बाढ़ त्रासदी आदि के रूप में सामने आ रहे हैं । इसके बाद भी प्रकृति की चेतावनी सुनकर मनुष्य न जागा तो वह अपने ही सर्वनाश का कारण बनेगा। समय की मांग है कि अब इको फ्रेंडली त्योहार मनाए जाए त्योहारों के नाम पर पर्यावरण को क्षति पहुंचाने की बजाय हमें पर्यावरण को बढ़ावा देने का ‘श्री गणेश’ करना होगा। पर्यावरण संरक्षण का ‘श्री गणेश’।

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