लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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-विपिन किशोर सिन्हा-
poem

पुरखों का युद्ध था गोरों से, मोदी का युद्ध है चोरों से।
हे भारत मां के अनुपम सुत।
जन-जन की आंखों के तारे।
नर इंद्र तुम्हीं दामोदर हो।
हे कोटि जनों के तुम प्यारे।
गांधी ने अलख जगाई थी।
सरदार ने राह दिखाई थी।
उस मिट्टी में तुम पले बढ़े।
है काम तेरे न्यारे-न्यारे।
हे कोटि जनों के तुम प्यारे।
जन-जन की आंखों के तारे |

हे महामना के मानस पुत्र।
सन्देश तुम्हीं विवेका के।
बाबा की धरती पर स्वागत।
करते काशीवासी सारे।
हे कोटि जनों के तुम प्यारे।
जन-जन की आंखों के तारे।
पुरखों का युद्ध था गोरों से।
खंडित आज़ादी पाई थी।
संघर्ष तुम्हारा चोरों से।
हे सुराज्य के रखवारे।
हे कोटि जनों के तुम प्यारे।
जन-जन की आंखों के तारे।
सूरज के आते ही नभ में।
धरती आलोकित होती है।
आशा विश्वास करोड़ों के।
हर लो तुम सारे अंधियारे।
हे कोटि जनों के तुम प्यारे।
जन-जन की आंखों के तारे।

11 Responses to “मोदी का युद्ध है चोरों से”

  1. arish sahani

    Hindus after 1000 yrs still slave to their enemy. They have no nation.
    Our enemy is so smart, They have now converted millions of hindus to islam,christian, communists and these converts now hate own culture and bow to enemy and all are brain dead, ready to die for enemy and destroy own nation.
    Can hindu beat this war game of Three enemies. Get ready to perish.
    No Hindu ever thinks like this.

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  2. Bipin Kishore Sinha

    मेरे आदरणीय आर सिंह जी. लग गई न मिर्ची. मोदी के नाम से जिन्हें मिर्ची लगाती है, वे हैं नवाज़ शरीफ, फारुख अब्दुल्ला, मौलाना बुखारी, AK-49, मल्लिका-ए-हिंदुस्तान, शहजादा और शहजादी. आपकी औकात ऐसी नहीं की मैं उपरोक्त लोगों में आपका नाम शुमार करूँ. पर मिर्ची आपको सबसे ज्यादा लगी है. किसी ने आपको रोका है- गद्य के बदले पद्य का सहारा आप भी ले सकते हैं. पर इतनी अकल न तो आपको है और न आपके आका को. मछियाते रहिये. जलन कम न हो तो डा. हर्षवर्धन को दिखा लीजियेगा.

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    • आर. सिंह

      आर. सिंह

      सिन्हा जी,अभी भी आपने मेरे लिए आदरणीय शब्द का प्रयोग किया.इस पर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ.इसका मतलब नमो की भक्ति में पूर्ण आपके पूर्ण रूप से डूबने में अभी थोड़ी देर है.जब उसमे पूर्ण शराबोर हो जाइयेगा,तो यह थोड़ी शालीनताजो बची हुई है,वह भी खत्म हो जाएगी,,तब आप भी मुझे वही कहने लेगंगे,जो दूसरे मोदी भक्त कह रहे है.इस बौखलाहट को मैं समझ सकता हूँ,क्योंकि मैंने जो प्रश्न अपनी टिप्पणी में किये हैं,उनका उत्तर आपके पास नहीं है,क्योंकि आपलोग भूल गए हैं कि भारत का एक लोकतान्त्रिक सेट आप, है.यह देश किसी की बपौती नहीं है.जो भी यहां का नागरिक है,उसको अपने विचार धारा को प्रकट करने का अधिकार कम से कम संविधान की और से तो मिला ही है.अगर सब लोग चारण बन जाए तो लोकतंत्र अपने आप समाप्त हो जाएगा. हो सकता है कि भविष्य में ऐसा भी हो जाए ,क्योंकि लक्षण अच्छे नहीं दिख रहे हैं.जब वाराणसी में आआप के प्रचारकों पर हर तरह के आक्रमण किये जा रहे हैं,तो इसका क्या मतलब है? खैर इसको अभी यहीं छोड़ते हैं.मैं फिर अपनी बात पर आता हूँ..सिन्हा जी ,एक बुद्धिजीवी की तरहमेरी टिप्पणी में उठाये गए प्रश्नो का जबाब दीजिये,यह मिर्ची वगैरह वाली बात न मुझ पर कोई प्रभाव डालेगी,न प्रवक्ता के निष्पक्ष पर्यवेक्षकों पर.

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      • Bipin kishore sinha

        मेरे लिए तो आप आदरणीय हैं ही। ऑटो चालक लाली की तरह जब आपके सपने चूर-चूर हो जायेंगे, तो आप भी AK-49 के गाल पर एक झन्नाटेदार तमाचा मारकर घर वापसी करेंगे लेकिन तब शर शैया पर लेते हुए भीष्म पितामह की तरह पश्चाताप करने के अलावे कोई विकल्प नहीं होगा। इस समय आप मक्कारों गद्दारों और मैडम के प्यादों की मृग मरीचिका में भटक रहे हैं, इसलिए आपके अप्रासंगिक प्रश्नों का उत्तर देना ठीक वैसा ही कृत्य होगा जैसे भैंस के आगे बीन बजाये भैस बैठ गई पगुराय। धन्यवाद।

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        • आर. सिंह

          आर. सिंह

          सिन्हा जी,ऑटो चालक से मेरी तुलना करके आपने मुझे सचमुच में आम आदमी बना दिया,इसके लिए. शुक्रिया. इसके बाद मेरे बारे में टिप्पणी करते समय और किसी से मेरी तुलना करते समय दो बातें याद रखियेगा. एक तो यह कि अफ़सोस तब होता है,जब किसी से अपने लिए कुछ अपेक्षा होती है,या आपने किसी के लिए कुछ किया है ,बदले में कुछ पाने की सम्भावना होती है,पर मेरे लिए ऐसा कुछ भी नहीं है,अतः मुझे अफ़सोस करने का कोई कारण नहीं दीखता. दूसरी बात यह है कि मैं व्यक्ति नहीं विचार का समर्थन करता हूँ.उसके लिए भी मेरा अपना मापदंड है. यह बात मैंने श्री अरविन्द केजरीवाल को ही , नहीं बल्कि श्री राजमोहन गांधी को भी कही थी.सिन्हा जी,ऐसे भी चारणो को मैं विचारक नहीं मानता. यह कहने के लिए मुझे इसलिए बाध्य होना पड़ा है,क्योंकि यहां मैंने नमो की चाटुकारिता में मग्न उनके भक्तों के सम्मुख बहुत से प्रश्न उठाये हैं.उनके समुचित उत्तर की मुझे अब भी तलाश है. अपने किसी कृत्य के लिए मुझे अफ़सोस या पछतावा हो जिंदगी में ऐसे अवसर नहीं के बराबर आये हैं.ऐसा लगता तो नहीं कि अब भी ऐसे अवसर आएंगे. हो सकता है कि नमो के प्रधान मंत्री बनने के बाद जो लोग उनका खुल कर विरोध कर रहें हैं उनसे बदला लिया जाए पर उसमे भी मुझे घबराने की आवश्यकता नहीं है,क्योंकि एक ऐसे लोगों की संख्या इतनी बड़ी है कि मेरे जैसों की बारी आते आते बहुत समय लग जाएगा. अगर आ भी गया तो जिसे मौत से डर नहीं लगता,उसका कोई क्या बिगाड़ लेगा?
          ऐसे महाभारत के सन्दर्भ में बात की जाए,तो कौरवों की जीत होते भले ही दिखाई पड़े ,पर अंत में जीत पांडवों की ही होगी,क्यों कि सत्य या भगवान उनके पक्ष में है.
          अगर राम चरित्र मानस या रामायण के सन्दर्भ में बात की जाए,तो रावण के पास पुष्पक विमान था.संचार के अनेक साधन थे,कहा गया है कि रावण रथी,वीरथ रघुवीरा. फिर भी जीत रघुवीर की हुई.
          सिन्हा जी,सत्य कभी हारता नहीं.बकवास भले ही किया जाए या गलत सलत दलीलें भले ही दिया जाए,पर मेरे विचार से सत्य अभी भी आम आदमी पार्टी के साथ है. नमो से तो किसी की तुलना इसलिए नहीं की जा सकती,क्योंकि किसी अन्य ने अल्पवयस्क काल से आजतक निरंतर झूठ का सहारा कभी नहीं लिया होगा.

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        • आर. सिंह

          आर. सिंह

          सिन्हा जी,ऑटो चालक से मेरी तुलना करके आपने मुझे सचमुच में आम आदमी बना दिया,इसके लिए. शुक्रिया. इसके बाद मेरे बारे में टिप्पणी करते समय और किसी से मेरी तुलना करते समय दो बातें याद रखियेगा. एक तो यह कि अफ़सोस तब होता है,जब किसी से अपने लिए कुछ अपेक्षा होती है,या आपने किसी के लिए कुछ किया है ,बदले में कुछ पाने की सम्भावना होती है,पर मेरे लिए ऐसा कुछ भी नहीं है,अतः मुझे अफ़सोस करने का कोई कारण नहीं दीखता. दूसरी बात यह है कि मैं व्यक्ति नहीं विचार का समर्थन करता हूँ.उसके लिए भी मेरा अपना मापदंड है. यह बात मैंने श्री अरविन्द केजरीवाल को ही , नहीं बल्कि श्री राजमोहन गांधी को भी कही थी.सिन्हा जी,ऐसे भी चारणो को मैं विचारक नहीं मानता. यह कहने के लिए मुझे इसलिए बाध्य होना पड़ा है,क्योंकि यहां मैंने नमो की चाटुकारिता में मग्न उनके भक्तों के सम्मुख बहुत से प्रश्न उठाये हैं.उनके समुचित उत्तर की मुझे अब भी तलाश है. अपने किसी कृत्य के लिए मुझे अफ़सोस या पछतावा हो जिंदगी में ऐसे अवसर नहीं के बराबर आये हैं.ऐसा लगता तो नहीं कि अब भी ऐसे अवसर आएंगे. हो सकता है कि नमो के प्रधान मंत्री बनने के बाद जो लोग उनका खुल कर विरोध कर रहें हैं उनसे बदला लिया जाए पर उसमे भी मुझे घबराने की आवश्यकता नहीं है,क्योंकि एक ऐसे लोगों की संख्या इतनी बड़ी है कि मेरे जैसों की बारी आते आते बहुत समय लग जाएगा. अगर आ भी गया तो जिसे मौत से डर नहीं लगता,उसका कोई क्या बिगाड़ लेगा?
          ऐसे महाभारत के सन्दर्भ में बात की जाए,तो कौरवों की जीत होते भले ही दिखाई पड़े ,पर अंत में जीत पांडवों की ही होगी,क्यों कि सत्य या भगवान उनके पक्ष में है.
          अगर राम चरित्र मानस या रामायण के सन्दर्भ में बात की जाए,तो रावण के पास पुष्पक विमान था.संचार के अनेक साधन थे,कहा गया है कि रावण रथी,वीरथ रघुवीरा. फिर भी जीत रघुवीर की हुई.
          सिन्हा जी,सत्य कभी हारता नहीं.बकवास भले ही किया जाए या गलत सलत दलीलें भले ही दिया जाए,पर मेरे विचार से सत्य अभी भी आम आदमी पार्टी के साथ है. नमो से तो किसी की तुलना इसलिए नहीं की जा सकती,क्योंकि किसी अन्य ने अल्पवयस्क काल से आजतक निरंतर झूठ का सहारा कभी नहीं लिया होगा.

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  3. आर. सिंह

    आर. सिंह

    मैंने अपनी पहली टिप्पणी में लिखा है कि यह चारण परम्परा बहुत लोग निभा रहे हैं.मुबारकबाद ,पर इससे आगे बढ़ कर मैं यह पूछना चाहता हूँ कि क्या यह एक अच्छी परम्परा है? क्या सांसदीय लोकतंत्र प्रणाली में इस तरह की व्यक्ति पूजा उचित हैं? क्या ऐसा नहीं लगता कि जो इस तरह की चाटुकारिता पर उत्तर आएं हैं,वे बुद्धिजीवियों को बदनाम कर रहे हैं ,क्योंकि उनकी गिनती उसी वर्ग में होती है. प्रेसिडेंशियल फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट में तो शायद यह क्षम्य भी हो सकता था,पर हमारे संसदीय प्रणाली में इसका स्थान कहाँ है? ऐसे तो शायद अमेरिका में भी किसी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार की प्रशंसा में ऐसे कसीदे नहीं गढ़े जाते होंगे. कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम अभी भी उसी राजा महाराजाओं के जमाने वाले मानसिकता में जी रहे हैं. अभी तो मोदी चुनावी मैदान में हैं. हो सकता है कि उनकी जीत हो जाए,पर परिणाम आने के पहले ऐसा कैसे कहा जा सकता है? भाइयों जरा इंतज़ार तो कर लो.
    शायद यह टिप्पणी मोदी भक्तों को नागवार गुजरे,पर मैं फिर भी यही कहूँगा कि इस तरह की चाटुकारिता लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण नहीं है.

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    • Bipin Kishore Sinha

      मोदी के नाम से मिर्ची क्यों लगती है आपको ? आपके अलावा जिसे सबसे ज्यादा मिर्ची लगती है, वे हैं- नवाज़ शरीफ फारुख अब्दुल्ला सोनिया राहुल और AK-49.

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  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    प्रिय विपिन जी, आपने हमारे मन की बाते भी कविता के माध्यम से प्रभावी रूप में कह दी।
    मुझे पूरा विश्वास है, नरेंद्र शासक नहीं; माँ का-भारत माँ का सेवक है।
    और शठं प्रति शाठ्यम्‌ भी जानता है।
    आपके शब्द खाली नहीं जाएंगे।
    कविता के लिए बधाई-धन्यवाद।
    स्वस्थ रहें, लिखते रहें।

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  5. आर. सिंह

    आर. सिंह

    सिन्हा जी,आपकी कविता का मुखड़ा तो आमआदमी पार्टी के इस स्लोगन से बहुत मिलता जुलता है,’पहले लड़े थे गोरों से अब लड़ेंगे. चोरों से”. मुश्किल यह है कि आआप के स्लोगन के चोरों में नमो की कंपनी भी शामिल है. कंपनी से मेरा मतलब नमो के किसी उद्योग इत्यादि से नहीं है,बल्कि उनके मंत्री मंडल के सदस्यों और उनके मैन फ्राइडे से है. उनके अतिरिक्त अब तो अन्य बहुत से चोर और डाकू नमो की छत्र छाया प्राप्त कर चुके हैं.वे क्या लड़ेंगे चोरों से? ऐसे विरुदावलि सुन्दर है. आजकल ऐसी चारण परम्परा बहुत लोग निभा रहें हैं,उसमे आपका भी नाम जुड़ गया. मुबारक बाद.

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  6. dr.ashokkumartiwari@gmail.com

    सब लुट जाएगा – मोदी को रोकना ही होगा —– मैं एक राष्ट्रभक्त हूँ ! हिंदी-हिंदुस्तान को बचाने के लिए मोदी का विरोध कर रहा हूँ – पिछले 14 सालों से गुजरात में मोदी का ड्रामा देख रहा हूँ !! मोदी हिंदी विरोधी तथा अम्बानियों के एजेंट हैं आधुनिक कंस और गरीब उत्तर भारतीय बच्चों पर बिना किसी कारण लाठियाँ बरसवाने वाले राज ठाकरे के परम मित्र है मोदी ———————————————- अरे ये गाँधीजी के ह्त्यारों की पीढ़ी है — हम गुजरात में तो इसके अभ्यस्त हो गए हैं थोड़ा बनारसी भी झेलें –

    गुजराती लीला भंसाली की फिल्म ” रामलीला ” में हीरो हनुमान गली में रंगरलियाँ मनाता है पीछे सीना फाड़ने पर सीता-राम-लक्ष्मण भी दिखाई पड़ रहे हैं कभी देखो फिर मोदी पर विचार करो ——–
    सब मिले हुए हैं, पाँच सालों तक एक भी अविश्वास प्रस्ताव कांग्रेस के खिलाफ बी.जे.पी. वाले नहीं ला सके और पूरे पाँच सालों तक बी.जे.पी. सरकार थी तब भी सिखों के दंगों पर एस.आई.टी. जाँच का आदेश नहीं करवाए क्या दोस्ती दोनों निभा रहे हैं बस केवल केजरीवाल के खिलाफ दोनों एक हैं — —- —– अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव कन्नौज से निर्विरोध चुनी गई थीं ! कांग्रेस – बी.जे.पी. और अम्बानी उसी रिस्ते को निभाने के लिए पुलिस को पंगु बना दिए हैं !! नहीं तो पूरे दिल्ली में बस दौड़ा-दौड़ाकर निर्भया की दुर्दशा की गई कहाँ थी दिल्ली पुलिस की पेट्रोलिंग गाड़ियाँ !!! किसी भी पेट्रोलिंग द्स्ते पर कार्यवाही क्यों नहीं हुई क्योंकि जो कार्यवाही कर सकते हैं उन्हीं का हुक्म बजाने में वे लगे रहते हैं !!! जैसे गुजरात में मोदी के कहने से एक लड़की की जासूसी और अब जशोदाबेन को छुपाना — सबसे बड़ा ताज्जुब है कि खिड़्की एक्सटेंशन के मामले पर आम आदमी पार्टी के कानून मंत्री के खिलाफ नाजायज आवाज उठाने वाली महिला समिति वाली नेत्रियाँ मोदी के मामले पर चुप क्यों हैं – ‌ ? ? ?

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