कविता:जोगन-विजय कुमार

मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

तेरे बिन कोई नहीं मेरा रे ; हे श्याम मेरे !!

मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

 

तेरी बंसुरिया की तान बुलाये मोहे

सब द्वारे छोड़कर चाहूं सिर्फ तोहे

तू ही तो है सब कुछ रे , हे श्याम मेरे !

मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

 

मेरे नैनो में बस तेरी ही तो एक मूरत है

सावंरा रंग लिए तेरी ही मोहनी सूरत है

तू ही तो एक युगपुरुष रे ,हे श्याम मेरे !

मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

 

बावरी बन फिरू , मैं जग भर रे कृष्णा

गिरधर नागर कहकर पुकारूँ तुझे कृष्णा

कैसा जादू है तुने डाला रे , हे श्याम मेरे !

मैं तो तेरी जोगन रे ;हे घनश्याम मेरे !

 

प्रेम पथ ,ऐसा कठिन बनाया ; मेरे सजना

पग पग जीवन दुखो से भरा ; मेरे सजना

कैसे मैं तुझसे मिल पाऊं रे , हे श्याम मेरे !

मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे !

 

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