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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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मेरी ख़ामोशी का ये अर्थ नहीं कि तुम सताओगी

तुम्हारी जुस्तजू या फिर तुम ही तुम याद आओगी

वो तो मैं था कि जब तुम थी खड़ी मेरे ही आंगन में

मैं पहचाना नहीं कि तुम ही जो आती हो सपनों में

खता मेरी बस इतनी थी कि रोका था नहीं तुमको

समझ मेरी न इतनी थी पकड़ लूं हाथ, भुला जग को

पड़ेगा आना ही तुमको कि तुम ही हो मेरी किस्मत

भला कैसे रहोगी दूर कि तुम ही हो मेरी हिम्मत

कि जब आयेगी हिचकी तुम समझ लेना मैं आया हूँ

तुम्हारे सामने दर पे एक दरख्वास्त लाया हूँ

कि संग चलकर तुम मेरी ज़िंदगी को खूब संवारोगी

मेरे जीवन की कड़वाहट को तुम अमृत बनाओगी

पनाहों में जो आया हूँ रहम मुझ पर ज़रा करना

अब आओ भी खडा हूँ राह पर निश्चित है संग चलना

– अनामिका घटक

One Response to “कविता/याचना”

  1. लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार

    LAXMI NARAYAN LAHARE KOSIR

    अनामिका जी सप्रेम आदर जोग
    आपकी रचना कुछ कहती है””””’ प्रेम की भाषा का परिचय कराकर साथ साथ चलने की उम्मीद पर
    अपना जुबा खोलती है ”आपको हार्दिक बधाई ””””””””””””””””””””””””””””””””””””

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