लेखक परिचय

मिलन सिन्हा

मिलन सिन्हा

स्वतंत्र लेखन अब तक धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, कहानीकार, समग्रता, जीवन साहित्य, अवकाश, हिंदी एक्सप्रेस, राष्ट्रधर्म, सरिता, मुक्त, स्वतंत्र भारत सुमन, अक्षर पर्व, योजना, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, जागरण, आज, प्रदीप, राष्ट्रदूत, नंदन सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएँ प्रकाशित ।

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-मिलन सिन्हा-
poem

हर मौसम में,
देखता हूँ उन्हें,
मौसम बारिश का हो,
या चुनाव का,
रेल पटरियों से सटे,
उनके टाट -फूस के,
घर भी हैं सटे-सटे,
चुनाव से पूर्व उन्हें,
एक सपना दिखाई देता है,
बारिश से पहले,
अपने एक पक्के घर का,
लेकिन चुनाव के बाद,
बारिश शुरू होते ही,
एक दुःस्वप्न दिखाई देता है उन्हें,
बारिश के पानी टपकने का,
अपने-अपने घर के ढहने का,
आंगन में ठेहुना भर पानी जमने का,
जमा किये हुए सूखे लकड़ियों का,
आग में तब्दील न होने का,
फिर भी,
एक आग तब भी देखी है,
उन सबके सीने में जलते हुए,
यह आग भविष्य को जलाकर,
राख करनेवाली नहीं है,
बल्कि, हर विपरीत मौसम में भी,
आपसी संबंधों को गर्माहट देनेवाली,
जीवन को संघर्षरत रखनेवाली है।

No Responses to “सीने में जलती आग”

  1. mahendra gupta

    और वे ये सपने लिए हुए ही इस दुनिया से कूच कर जाते हैं , सपने दिखाने वाले उसी तरह अन्य लोगों को सपने बेचने दिखने के लिए बरकरार रहते है

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