पुलिस की हफ्ता वसूली और लोकतंत्र

राकेश कुमार आर्य

भारत में पुलिस अंग्रेजों के शासनकाल में भारत के देशभक्त लोगों को पकड़ने , उन्हें पीटने और झूठे आरोपों में जेल भेजने का काम किया करती थी । एक प्रकार से यह तंत्र भारतवासियों का ‘ माइंड वाश ‘ कर उसमें ब्रिटिश राजतंत्र के प्रति राजभक्ति भरने का काम किया करता था । ब्रिटिश तंत्र का शुभचिंतक व्यक्ति हमारे पुलिसतंत्र को अपना भी शुभचिंतक दिखाई दिया करता था । इस प्रकार की राजभक्ति ही उन दिनों राष्ट्रभक्ति मानी जाती थी और जिस राष्ट्रभक्ति को हमारे देशभक्त क्रांतिकारी अपना रहे थे , वह उन दिनों एक दंडनीय अपराध थी । पुलिस प्रशासन की दृष्टि में भारत वासी निरीह प्राणी थे । जिन्हें जितना लूटा जाए और पीटा जाए – उनकी दृष्टि में उतना ही उचित था । इस कार्य से प्रसन्न होकर पुलिस को उसका स्वामी ब्रिटिश तंत्र पुरस्कार देता था । लूट के माल को इकट्ठा करने वाला अर्थात कलेक्टर नाम का प्राणी ऐसे पुलिस प्रशासन के सहयोग से देश के रक्त को चूसता था। इसीलिए अंग्रेजों ने आईपीएस वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भी अपने कलेक्टर के अधीन रखा था , क्योंकि कलेक्टर का सीधा संबंध जनता से होता था । जिससे वह राजस्व एकत्र अर्थात कलेक्ट करता था। जनता कहीं कलेक्टर के विरुद्ध विद्रोही न हो जाए , इसलिए संभावित विद्रोह को दबाने के लिए कलेक्टर को गैरकानूनी ढंग से अपने साथ एक सेना रखने का अधिकार था । यही गैरकानूनी सेना उन दिनों पुलिस कहलाती थी । यह पूर्णतया निर्लज्ज होती थी और भारतीयों के प्रति बहुत ही निर्मम भी होती थी ।
स्वतंत्रता के पश्चात भी इस निर्मम पुलिस तंत्र की कार्यशैली में कोई परिवर्तन नहीं आया । इसका कार्य आज भी वही है जो अंग्रेजों के समय था ,आज भी यह सरकार की एक गैरकानूनी सेना है ,जिसके दामन पर ऐसे अनेकों दाग हैं , जो यह बताते हैं कि इस की कार्यशैली आज भी निरपराध लोगों को लूटना , पीटना और जेल में डालने वाला ही है । पुलिस प्रशासन की स्थापना 1860 की भारतीय दंड संहिता को पूरी निर्ममता से लागू कराने के उद्देश्य से की गई थी । जबसे इसने बागडोर संभाली तभी से भारत को मिटाने के काम में पूर्ण सत्यनिष्ठा से लग गई । आज भी यह कुल सांसदों और देश के कुल विधायकों की संख्या के लगभग एक तिहाई उस भाग का संरक्षण करती है या कहिए कि उनके संरक्षण में काम करती है जिन पर आपराधिक मुकदमे लंबित हैं । 
शेरमन के अनुसार सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के इस प्रकार पनपने का कारण संगठनात्मक संस्कृति है ,जो कि विभिन्न प्रकार के विश्वास और मूल्य पद्धति का होना है। वास्तव में संगठन शब्द बहुत ही सुंदर शब्द है जो कि मानवीय संस्कृति की उत्कृष्टता का बोधक है । संगठन शब्द सम और गठन से मिलकर बना है ,अर्थात जिसका सम्यक रूप से गठन किया गया हो , वह संगठन होता है। प्रचलित अर्थ में संगठन को लोगों ने इतना गिरा दिया है कि यह दूसरों के अधिकारों को छीनने व अतिक्रमण करने वालों का गिरोह बना हुआ सा लगता है ।अधिकतर संगठन समाज में यही कार्य कर रहे हैं ।वह अपने संख्याबल और संगठन शक्ति के आधार पर दूसरों के अधिकारों की सुरक्षा न करके उनका अतिक्रमण करते से दिखाई देते हैं ।
पुलिस को भी एक संगठन कहा जाता है , परंतु इसने अपनी परिभाषा को दूसरे अर्थ में ही प्रयोग किया है। अर्थात यह लोगों के अधिकारों की सुरक्षा न करके उनके अधिकारों का अतिक्रमण कर गिरोह की गुंडागर्दी करती सी जान पड़ती है । पुलिस आज भी हमारे लोगों के साथ – साथ देश के जनसाधारण के साथ उनकी सहयोगी बनकर खड़ा होने को तैयार नहीं है । वह आज भी अपनी विषयुक्त सोच से ग्रसित है और यह मानकर चलती है कि जनसाधारण तो शोषित और शासित है और मैं शासक व शोषक हूँ । बस ,यह सोच ही वह मूल कारण है जो भारत की पुलिस को लोकतांत्रिक नहीं होने देता है । 
घोष (1978 ) जो कि पुलिस महानिरीक्षक के पद पर कार्यरत रहे थे , ने अपनी सेवानिवृत्ति के पश्चात कहा था कि पुलिस दुकानदार और ठेलेवालों , व्यापारियों और उसके कार्यक्षेत्र में कार्यरत अपराधियों से साप्ताहिक हफ्ता वसूली भुगतान के कार्य में ही लगी रहती है । इसका अभिप्राय है कि पुलिस आज भी हफ्ता वसूली के कार्य को ही अपना मुख्य कार्य मानती है । इसी बात का प्रमाण है कि पुलिस संगठनात्मक संस्कृति में विश्वास रखती है। आज भी यह देखा जा सकता है कि पुलिस कांस्टेबल भी ठेलेवालों और बस या ट्रक के ड्राइवर से भीख मांगने के लिए सड़क पर खड़ा रहता है । वह हफ्ता वसूली के लिए थाने से पूरे अधिकार के साथ निकलता है और अपना काम करके आता है । इस बात का पता थाने के थानाध्यक्ष को भी होता है कि कौन सा पुलिसकर्मी हफ्ता वसूली के लिए कहां गया हुआ है ? पुलिस के लोग अपने इसी कार्य में लगे रहते हैं , और 24 -24 घंटे काम करके भी अपने थानों में और अधिक स्टाफ भेजने की संस्तुति शासन से नहीं करते हैं , क्योंकि यदि और स्टाफ आ गया तो उनकी वसूली का काम प्रभावित होगा और उसमें हिस्सेदार बढ़ जाएंगे। यह हिस्सेदारी रंगदारी के काम में लगे लोगों से भी आती है और दूसरे अपराधी प्रवृत्ति के लोगों से भी आती है । जिसका जितना गंभीर अपराध होगा ,उतनी ही भारी वसूली अथवा चौथ उसे आएगी , जो लोग किसी अपराधी का या अपराधी तंत्र का विरोध करेंगे ,वे आज भी पुलिस के लिए वैसे ही शत्रु हैं जैसे कभी ब्रिटिश काल में हुआ करते थे ।
पुलिस के भीतर जो उच्च अधिकारी बैठे हैं वह स्थानान्तरण को एक उद्योग के रूप में अपनाते हैं । पुलिसकर्मियों को रिश्वत लेकर उनके मनमाने स्थान या थाने में स्थानांतरित करना और फिर उनसे भी चौथ लेना आदि पुलिस अधिकारियों की कार्यशैली में सम्मिलित हो चुका है । इसी को ” स्थानांतरण उद्योग ” कहा जाता है । 
इंडियन एक्सप्रेस ( 1999 ) ने लिखा है कि पुलिस गणवेश के आपूर्तिकर्ताओं से कमीशन अन्य कार्यालय उपकरणों , हथियारों एवम वाहनों की आपूर्ति में और यहां तक कि व्यापारिक दलालों से जबरन वसूली करना पुलिस की कार्यशैली में सम्मिलित है । जहाँ जितना बड़ा बाजार होता है अर्थात कमाई की जितनी अधिक संभावनाएं होती हैं , वहां उतना ही बड़ा सौदा पुलिस अधिकारी की नियुक्ति के लिए होता है । इसमें कभी – कभी राजनीतिक हस्तक्षेप भी होता है । बड़े बाजार में नियुक्त अधिकारी लूट के माल में से कुछ कमीशन सेवा पानी के रूप में राजनीतिक लोगों के लिए भी निकालता है , जिसे वह राजनीतिज्ञ अपना अधिकार मानता है । अब जो भी अधिकारी उसे अधिक से अधिक कमीशन देगा , उसे ही वह अपने क्षेत्र में नियुक्त करना चाहता है । कहने को तो यह गैरकानूनी पुलिस तंत्र व्यापारियों की सुरक्षा के लिए आता है और यह भी दिखाता है कि वह ऐसी परिस्थितियां बनाने के लिए सक्रिय और सजग है , जिसमें व्यापारी वर्ग अपना कार्य सहजता और सरलता से कर सके , पर वास्तव में यह तंत्र कानून व्यवस्था को इतना बिगाड़े भी रखना चाहता है कि जिसके सहारे उसका अपना धंधा चलता रहे ।
यह धंधा शब्द आजकल बहुत प्रचलित है । वास्तव में धंधे की कार्यशैली ने ही धंधों को प्रभावित किया है । जब लूट भी एक धंधा बन जाएगी और उस धंधे को भी हमारी रक्षक बनी पुलिस अपने लिए अपना लेगी तो फिर धंधे तो प्रभावित होने ही हैं। जितने ही बड़े प्रतिष्ठान , हवाई अड्डे ,कोयला खदान या सीमा चेकपोस्ट आदि होते हैं , वहां उतने ही बड़े स्तर पर पुलिस की मिलीभगत से बड़े-बड़े आर्थिक अपराध होते हैं । हमें देखने के लिए तो वहां सुरक्षा की चाक चौबंद व्यवस्था नजर आती है , पर वास्तव में थोड़ा गहराई से यदि चिंतन किया जाए तो पता चलता है कि यह सारी चाक चौबंद व्यवस्था अपराधी की सुरक्षा के लिए है , ना कि जनसाधारण के लिए। जनसाधारण को तो वहां से भगाया जाता है , कि तू यहां क्यों आ गया ? – चल हट पीछे । हमें अपना काम करने दे । जनसाधारण नाम की चिड़िया ना फटके , इसी का नाम सुरक्षा व्यवस्था है। वैसे भी जहां कदम- कदम पर बाज लगे हों, वहां चिड़ियों का अस्तित्व तो वैसे भी नहीं रहता । 
बड़े पुलिस अधिकारियों के यहां दर्जनों ऐसे लोग मिल जाते हैं जो बिना वेतन के ही उनके यहां अपनी सेवाएं दे रहे होते हैं। इनकी जीविकोपार्जन कहां से होती है ? बताने की आवश्यकता नहीं है ।यह सुबह से शाम तक चिड़ियों का शिकार करने वाले बाज होते हैं । संभवत: यहीं से बाज शब्द जैसे सौदेबाजी , गिरोहबाजी , पतंगबाजी आदि शब्दों में प्रयुक्त होना आरंभ हुआ है। यह पुलिस प्रशासन जहाँ भी दिखाई देता है , वहाँ ही इसकी कार्यशैली ऐसी ही होती है । मंत्रियों की कोठियों पर भी ऐसी ही होती है और कोठेवालियों के यहां भी ऐसी ही होती है । इस आलेख में लोकतंत्र के इस प्रकाश स्तंभ का सारा कच्चा चिट्ठा स्पष्ट नहीं किया जा सकता । 
अब बात यह है कि इस विभाग की कार्यशैली में सुधार कैसे आए ? – इसके लिए अपराधी को पकड़ना और अपराधी के साथ क्रूरता प्रदर्शित करने का परंपरागत प्रशिक्षण पुलिस को ना देकर इसे नैतिकता और निर्दयता के बीच अंतर करना सिखाया जाए ,और यह बताया जाए कि नैतिकता का प्रचार – प्रसार करना इसका मुख्य उद्देश्य है और यही इसका राज धर्म है । जबकि अनैतिकता का विनाश इसका सर्वोपरि कर्तव्य धर्म है । एक प्रकार से पुलिस को हम आचार्य की भूमिका में लाएं । उसका कार्य सदाचार की वृध्दि और अनाचार का विनाश करना हो , यही तो आचार्य का कार्य है । पुलिस को प्रशिक्षण काल में ही अपराध और केवल अपराध तक ही सीमित रखना तो उसकी प्रकृति को भी अपराधी बना देना है । हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी तंत्र का विस्तार और विकास उसके सदाचरण से ही होता है ,और विनाश दुराचरण से होता है ।अंग्रेज पुलिस को निर्दयता और दुराचरण का पाठ पढ़ाते थे और उसे भारतीयता से घृणा करना सिखाते थे तो उनका यह कार्य समझ में आ सकता था कि वह ऐसा क्यों करते थे ? पर आज तो देश स्वतंत्र है आज की पुलिस को भी सदाचार और सदाचरण से दूर रखा जा रहा है तो यह बात समझ में नहीं आती कि ऐसा क्यों हो रहा है ? 

3 thoughts on “पुलिस की हफ्ता वसूली और लोकतंत्र

  1. एक माह से ऊपर हो गया और सोचता हूँ श्री मणि राम शर्मा और श्री राकेश कुमार आर्य में अवश्य कोई वार्तालाप हुआ होगा जिससे विषय पर सहमत दोनों किसी संगठन अथवा संस्था का ढांचा तैयार कर पाएंगे।

  2. आज निराशाजनक भारतीय सामाजिक परिप्रेक्ष्य में एक पाठक स्वरूप मुझे प्रस्तुत लेख की विषय वस्तु में बिना अभिस्वीकृत एडवोकेट श्री मणि राम शर्मा जी द्वारा लिखे अंश प्रयोग में लाए जाने पर उनकी उलाहना एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है| संगठन!!!

  3. The material has been taken from one of my posts भारतीय पुलिस संस्कृति में भ्रष्टाचार की जड़ें without any acknowledgement

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