अमर अजेय है लोकतंत्र

Posted On by & filed under राजनीति

समय और समाज के साथ चलना बहुत बार हमारी मजबूरी हो जाती है। हम चाहे जिस क्षेत्र में हो, स्थायित्व के साथ-साथ उन्नति की अपेक्षा तो रहती ही है। समाज में नैतिकता की आवश्यकता के पक्षधर होते हुए भी परिस्थितिवश हमें जाने अनजाने में कुछ अनैतिक काम भी करने पड़ जाते हैं। ऐसे में देश… Read more »

एक साथ चुनाव से लोकतंत्र मजबूत होगा

Posted On by & filed under राजनीति

सही मायनों में हमारा लोकतंत्र ऐसी कितनी ही कंटीली झाड़ियों में फँसा पड़ा है। प्रतिदिन आभास होता है कि अगर इन कांटों के बीच कोई पगडण्डी नहीं निकली तो लोकतंत्र का चलना दूभर हो जाएगा। लोकतंत्र में जनता की आवाज की ठेकेदारी राजनैतिक दलों ने ले रखी है, पर ईमानदारी से यह दायित्व कोई भी दल सही रूप में नहीं निभा रहा है। ”सारे ही दल एक जैसे हैं“ यह सुगबुगाहट जनता के बीच बिना कान लगाए भी स्पष्ट सुनाई देती है। राजनीतिज्ञ पारे की तरह हैं, अगर हम उस पर अँगुली रखने की कोशिश करेंगे तो उसके नीचे कुछ नहीं मिलेगा। कुछ चीजों का नष्ट होना जरूरी है, अनेक चीजों को नष्ट होने से बचाने के लिए। जो नष्ट हो चुका वह कुछ कम नहीं, मगर जो नष्ट होने से बच सकता है वह उस बहुत से बहुत है। लोकतंत्र को जीवन्त करने के लिए हमें संघर्ष की फिर नई शुरूआत करनी पडे़गी।

असाधारण जनादेश के नैतिक दायित्व

Posted On by & filed under राजनीति

प्रश्न उठता है कि ऐसा क्या है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में। उत्तर है देश को लंबे समय बाद ऐसा नेतृत्व मिला है जिसकी प्रामाणिकता, परिश्रम एवं निष्ठा पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं है। उत्तर है कि प्रधानमंत्री मोदी उस पार्टी के कार्यकर्ता हैं जिसका अधिष्ठान राष्ट सर्वोपरि है। उत्तर है, भाजपा के पीछे उन हजारों, लाखों, करोड़ों कार्यकर्ताओं एवं जन सामान्य का विश्वास है जो भाजपा के सदस्य नहीं हैं पर यह मानते हैं कि देश के लिए आज भाजपा आवश्यक है। उत्तर है, कि आज भाजपा को उनका भी समर्थन प्राप्त है जो परंपरागत रूप से भाजपा के साथ नहीं रहे हैं।

फ़िक्सिंग का शिकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ?

Posted On by & filed under मीडिया, राजनीति

-तनवीर जाफ़री- भारतीय संविधान में हालांकि मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में कहीं कोई मान्यता नहीं दी गई है। उसके बावजूद मीडिया ने स्वयं को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में प्रचारित कर रखा है। और यह ‘भ्रांति’ समाज में धीरे-धीरे एक स्वीकार्य रूप भी धारण कर चुकी है। आज पूरा… Read more »

मीडिया की सर्वव्यापी उपस्थिति से जीवंत हो रहा है लोकतंत्र

Posted On by & filed under पर्यावरण

-संजय द्विवेदी- चुनाव जो मीडिया में ज्यादा और मैदान में कम लड़ा जा रहा बेहतर चुनाव कराने की चुनाव आयोग की लंबी कवायद, राजनीतिक दलों का अभूतपूर्व उत्साह,मीडिया सहभागिता और सोशल मीडिया की धमाकेदार उपस्थिति ने इस लोकसभा चुनाव को वास्तव में एक अभूतपूर्व चुनाव में बदल दिया है। चुनाव आयोग के कड़ाई भरे रवैये… Read more »

लोकतंत्र, अधिकार और “आप” की सरकार

Posted On by & filed under राजनीति

 – सिद्धार्थ मिश्र – इतिहास सदैव अपने आपको दोहराता है। इस दोहराव की पृष्‍ठभूमि तैयार करते हैं जनआंदोलन। ये आंदोलन ही कहीं न कहीं नये चेहरों की ताजपोशी की सियासी पृष्‍ठभूमि भी तैयार करते हैं। दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी की अप्रत्‍याशित सफलता आज इस बात का सबसे जीवंत प्रमाण है। तमाम उहापोह के बीच… Read more »

इस चुनाव से टूटे कई मिथक

Posted On by & filed under चुनाव

– सुनील अमर – देश की लोकतांत्रिक राजनीति में व्यक्ति से लेकर जाति और धर्म तक के कई मिथक पहले चुनाव से ही गढ़ लिये गये थे और वे थोड़े बहुत रद्दो-बदल के साथ हर चुनाव में अपना असर दिखाते रहे लेकिन संतोष की बात है कि उत्तर प्रदेश में सम्पन्न हुआ विधानसभा का यह… Read more »

मतदाता किस कटोरे का विषपान करे?

Posted On by & filed under चुनाव

अब्दुल रशीद लोकतंत्र में मतदान करना हर नागरिक का उत्तरदायित्व होता है और अधिकार भी। यही लोकतंत्र की विशेषता है कि एक आम आदमी अपने मत से अपने लिए सरकार के नुमाइन्दे चुन सकता है। जनता के द्वारा जनता की सरकार के लिए मतदान के जरिए अपना प्रतिनिधि चुनना अपने आप में महत्वपुर्ण है और… Read more »

राइट टू रिकाल

Posted On by & filed under लेख, समाज

अब्दुल रशीद लोकतंत्र में कहा जाता है सत्ता जनता से जनता के लिए जनता के द्वारा चलता है। लेकिन क्या ऐसा होता है? आज जनता के वोट द्वारा सत्ता भले ही चुनी जाती है लेकिन न तो सत्ता जनता के हित में काम करती है और न ही जनता के भागीदारी को समझती है कारण… Read more »

न लोक ही बचा न तंत्र

Posted On by & filed under राजनीति

डॉ. शशि तिवारी लोक का स्थान स्वयं ने ले लिया और तंत्र का स्थान परिवादवाद ने, बची-कुची कसर जातिवाद के तंत्र ने कर दी। बढ़ते लम्पट तंत्र एवं गिरते राजनीतिक तंत्र से कहीं न कहीं नुकसान गणतंत्र को अवश्य ही हुआ है। गुलाम भारत को स्वतंत्र कराने में जिन नेताओं ने अपनी जवानी न्यौछावर कर… Read more »