गरीबों के खेत, अमीरों के पेट

-देवाशीष मिश्रा

पिछले कुछ समय से दो खबरों से जुड़ी बातें लगातार अखबारों और इलेक्ट्रानिक चैनलों में जोर-शोर से आ रहीं हैं। एक बढ़ती मँहगाई जिससे आम जन त्राहि-त्राहि कर रहा है। दूसरा सरकारी व्यवस्था में सड़ता अनाज। भारत में रोज ना जाने कितने पेट खाली ही सो जाते हैं, इस उम्मीद में कि शायद कल पेट भर जाये। आखिर इस व्यवस्था का दोषी कौन है? वो नेता जो स्वतत्रं भारत में सबकी खुशहाली देने का वादा करते हैं या फिर वो कानूनी, प्रशासनिक व्यवस्था जिसे हमें अग्रेजों की विरासत के रूप में ढो रहे हैं। ताज़्जुब होता है कि सरकारी कानून व्यवस्था से पीड़ित होकर हमारे वीर स्वतंत्रता सेनानियों ने अग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूँका था। आज हमारी सरकार उसी संशोधित अथवा यथावत 100 सालों या उससे अधिक सालों पूर्व बने कानून से देश को चला रही है।

26 अगस्त 10 को लगभग पचास हजार किसानों ने संसद का घेराव उस कानून के खिलाफ किया जिसके आधार पर सरकारें अनाज पैदा करने वाले किसानों की जमीन बहुत कम कीमत में खरीद लेती हैं। किसी किसान की उसकी पैतृक कृषि-भूमि से क्या संबंध होता है, यह केवल वह किसान ही समझ सकता है जिसकी ज़िन्दगी का ज्यादातर हिस्सा उस खेत पर ही गुजरता है। जून की चिलचिलाती धूप हो या दिसम्बर-जनवरी की हांड़ कँपाने वाली ठंड हम सभी इनसे बचने के कई प्रकार के प्रयास करते रहते हैं, लेकिन किसान तो उसी मौसम में दिन हो या रात अपने खेत पर पहुँच जाता है, रोजी-रोटी की आस में। वर्तमान में हमारे देश के किसान पूर्व की समस्याओं के अलावा तीन अन्य समस्याओं से जूझ रहें हैं। पहला, खेती के व्यवसाय में कई बार बेची गई अनाज की कीमत लागत से कम होती हैं। एक ओर जहाँ सरकारी मशीनरियाँ लागत मूल्य कम करने में असफल होती हैं वहीं दूसरी ओर बाज़ार में अनाज बेचने के लिए सही मूल्य निर्धारित करने में भी असफल होतीं हैं। दूसरा सबसे बड़ा कारण, उदासीन सरकारी नीतियों की वजह से किसानों को क्या पैदा करना है, इसमें असमंजस। पिछले कई वर्षों से यह बात देखने में आ रही है कि जिस साल किसी खास अनाज की कमी होती है या उसको उगाने वाले किसानों को लाभ होता है तो सभी किसान उसी खाद्य फसल को उगाने लगते हैं जिससे अगले वर्ष फसल की तो अच्छी पैदावार हो जाती है लेकिन अच्छी पैदावार होने के कारण उस फसल की कीमत गिर जाती है। जिससे किसानों को नुकसान हो जाता है। इसके साथ ही दूसरी तरफ अन्य फसलों की पैदावार में कमी आ जाती है। इसमें दलाल जमाखोरी कर समस्या को और बढ़ा देते हैं। कम पैदा हुई फसल की कीमत बढ़ जाती है, जो मँहगाई बढ़ने का कारण होती है। इन सब बातों का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह होता है कि ना तो ज्यादा पैदावार वाली फसल के किसानों को फायदा होता है और ना ही कम फसल पैदा करने वाले किसान को। अब तीसरी बड़ी समस्या पर आते हैं देश में तेजी से बढ़ते औद्योगिक विकास के लिए, परिवहन व्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए तथा विकास सम्बन्धी अन्य कार्यों को बढ़ाने के लिए सरकारें आम किसानों की भूमि का अधिग्रहण करती जा रही हैं। उपरोक्त कारणों से भूमि का अधिग्रहण करना बिल्कुल भी गलत नही परन्तु उसकी वजह से किसानों को होने वाली समस्याओं का निपटारा बहुत ही गंभीरता व बेहतर तरीके से करना चाहिए। हमें इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि खेती की भूमि न सिर्फ किसानों की अजिविका का साधन हैं बल्कि उससे उनकी गहरी संवेदनाऐं भी जुड़ी होती हैं। इसके साथ ही हमें उन कानूनों व नियमों को पुन: अवलोकन करना होगा, जिससे हमारे किसानों की समस्याऐं बढ़ती जा रही हैं।

कृषि विकास दर को बढ़ाने के लिए हमें खेती के व्यवसाय को एक लाभप्रद रोज़गार के रूप में विकसित करना होगा। इसके लिए बहुत जरुरी है कि हमारी सरकारों के पास खेती के व्यवसाय से जुड़ा एक स्पष्ट दृष्टिकोंण हो तथा उस लक्ष्य को पाने में आने वाली अड़चनों के लिए पहले से तैयारी हो। यह सत्य है कि हम आज भी पूरी तरह मानसून पर निर्भर है हमें मानसून पर इस निर्भरता को कम करना चाहिए। इसके लिए देश के की नदियों को जोड़ने का प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाना होगा। नदियों के आपस में जुड़ जाने के बाद हम बाढ़ और कम बारिश वाले क्षेत्रों में एक संतुलन पैदा करने में काफी हद तक सक्षम हो जायेंगे। इसका सीधा फायदा हमारे किसानों को होगा।

देश की आर्थिक व्यवस्था को अगर हमें मजबूत बनाना है तो हमें इन तीनों समस्याओं को जड़ से समाप्त करना होगा।

इस आशा के साथ ही हम उस बात पर फिर आते हैं, जहाँ ये बात शुरू हुई थी। हमारे केन्द्रीय कृषि मंत्री ने गरीबों को अनाज मुफ्त में बाँटने से इंकार कर दिया है। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? कहीं सरकार की नजर उस भारी टैक्स पर तो नहीं, जिसे सरकार इन अनाज को शराब बनाने वाली कम्पनियों को बेचकर कमाना चाहती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने शराब पर 2 प्रतिशत टैक्स की और बढ़ोत्तरी की जिससे उसे 200 करोड़ रु का राजस्व प्रतिवर्ष प्राप्त होगा। इस राशि का इस्तेमाल वह नगर पालिका और नगर निगम की जर्जर होती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए करेगी।

हमें विकास से परहेज नही है, लेकिन गरीब आम व्यक्ति से निवाला छीन कर बनाई गई शराब पर करके नहीं। सरकार की यह नीति कितनी दोषपूर्ण दिखाई देती है। इन्ही नीतियों की वजह से आज शुध्द पानी मिलना मुश्किल है लेकिन शराब सहज ही हर जगह मिल जाती है। शराब की वजह से कितनी बुराईयाँ फैलती हैं यह यहाँ कहने की जरूरत नही। हम सभी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं। हालाँकि अन्तोदय योजना चल रही है तथा यूपीए सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने की तैयारी में है। लेकिन फिर गरीबों के पूर्ण हित की बात तथा खाद्य सुरक्षा मिलना अभी दूर का विषय लग रहा है। मुझे तो उस दिन का इन्तजार है जब सभी भारतीयों के लिए पर्याप्त पौष्टिक भोजन होगा और सभी किसानों का हित सुरक्षित होगा।

(देवाशीष मिश्रा, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालयख्, भोपाल)

2 thoughts on “गरीबों के खेत, अमीरों के पेट

  1. आपकी जागरूकता को नमन .जो देश बनाते हैं ,देश में संसाधन जुटाते हैं अधपेट कुपोषण के शिकार करोड़ों खेतिहर असंगठित मजदूरों -किसानो की वीभत्स एवं दयनीय स्थिति देखकर भी भृष्ट पापी अधिकारीयों तथा सत्तासीन नेतृत्व की ह्रदय हीनता के कारण ही लोग लगातार सड़कों पर आ आ कर आन्दोलन कर रहे हैं .कुछ तो गलत राह पर चलकर नाक्साल्वादी हो गए और कुछ उनसे ज्यादा पतित होकर चोरी -ठगी -सुपारी -हफ्ता वसूली से जीवन यापन कर रहे हैं .इस पतनशील व्यवस्था में कुछ तत्व धरम के नाम धंधा चला रहे हैं .ये नापाक तत्व आगामी कुछ दिनों में फिर कौम को बजय गरीवी -भ्ख्मारी से लड़ने के आपस में लड़ाने बाले हैं .इसकी सुपारी इन्हें मरघट के शैतानो ने दी है .आप जैसे मुट्ठी भर सदाशयी विद्द्वान हैं जो देश की बदहाली पर चिंतित हैं .आपको प्रस्तुत आलेख के लिए .धन्यवाद्

  2. जब तक इस देश में प्रधानमंत्री से लेकर ग्राम प्रधान के पद पर बैठा व्यक्ति सिर्फ अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए सरकारी साधन और संसाधन का प्रयोग करते रहेंगे तबतक इस देश में कोई भी सार्थक बदलाव नहीं आ सकता | जरूरत ऐसे पदों पर बैठे लोगों के कार्यों की निगरानी की है …

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