लेखक परिचय

वीरेन्द्र परमार

वीरेन्द्र परमार

एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन I प्रकाशित पुस्तकें :- 1. अरुणाचल का लोकजीवन(2003) 2.अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य(2009) 3.हिंदी सेवी संस्था कोश(2009) 4.राजभाषा विमर्श(2009) 5.कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय (2010) 6.डॉ मुचकुंद शर्मा:शेषकथा (संपादन-2010) 7.हिंदी:राजभाषा,जनभाषा, विश्वभाषा (संपादन- 2013) प्रकाशनाधीन पुस्तकें • पूर्वोत्तर के आदिवासी, लोकसाहित्य और संस्कृति • मैं जब भ्रष्ट हुआ (व्यंग्य संग्रह) • हिंदी कार्यशाला: स्वरूप और मानक पाठ • अरुणाचल प्रदेश : अतीत से वर्तमान तक (संपादन ) सम्प्रति:- उपनिदेशक(राजभाषा),केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड, जल संसाधन,नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय(भारत सरकार),भूजल भवन, फरीदाबाद- 121001, संपर्क न.: 9868200085

Posted On by &filed under विविधा.


वीरेन्द्र परमार

भारत का पूर्वोत्तकर क्षेत्र बांग्लादेश, भूटान, चीन, म्यांोमार और तिब्बीत- पांच देशों की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर अवस्थित है । असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम- इन आठ राज्योंद का समूह पूर्वोत्त्र भौगोलिक, पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंतत महत्व्पूर्ण है । देश के कुल भौगलिक क्षेत्र का 7.9 प्रतिशत भाग पूर्वोत्तृर क्षेत्र के आठ राज्यों में समाविष्टै है । कुल क्षेत्रफल का 52 प्रतिशत भूभाग वनाच्छाूदित है । इस क्षेत्र में 400 समुदायों के लोग रहते हैं। इस क्षेत्र में लगभग 220 भाषाएं बोली जाती हैं । संस्कृ।ति, भाषा, परंपरा, रहन-सहन, पर्व-त्योभहार आदि की दृष्टिं से यह क्षेत्र इतना वैविध्य पूर्ण है कि इस क्षेत्र को भारत की सांस्कृंतिक प्रयोगशाला कहना अतिशयोक्तिनपूर्ण नहीं होगा । इस क्षेत्र में आदिवासियों का घनत्वक देश में सर्वाधिक है । सैकड़ों आदिवासी समूह और उनकी उपजातियां, असंख्य् भाषाएं व बोलियां, भिन्न –भिन्नो प्रकार के रहन-सहन, खान-पान और परिधान, अपने-अपने ईश्व रीय प्रतीक, आध्या त्मिनकता की अलग-अलग संकल्पूनाएं इत्याीदि के कारण यह क्षेत्र अपनी विशिष्टअ पहचान रखता है । अनेक उच्छृंकखल नदियों, जल- प्रपातों, झरनों और अन्य जल स्रोतों से अभिसिंचित पूर्वोत्तरर की भूमि लोक साहित्यह की दृष्टिा से भी अत्यंरत उर्वर है ।
असम पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा प्रदेश है I महाभारत में असम का उल्लेख प्रागज्योतिषपुर के रूप में मिलता है। कालिकापुराण में भी कामरूप – प्रागज्योतिषपुर का वर्णन है। इसकी राजधानी दिसपुर, गुवाहाटी है I गुवाहाटी पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा शहर है I गुवाहाटी को पूर्वोतर का प्रवेशद्वार कहा जाता है I असमिया असम की प्रमुख भाषा है । यहां बांग्ला और हिंदी भी बोली जाती है । इनके अतिरिक्त राज्य की अन्य भाषाएं हैं-बोड़ो, कार्बी, मिसिंग, राभा, मीरी आदि । कार्बी (मिकिर), बोड़ो कछारी, दिमासा कछारी, सोनोवाल कछारी, बर्मन कछारी, देवरी, मीरी (मिशिंग), तिवा इत्यादि असम की प्रमुख जनजातियाँ हैं I अरुणाचल प्रदेश अपने नैसर्गिक सौंदर्य,सदाबहार घाटियों, वनाच्छाादित पर्वतों, बहुरंगी संस्कृाति, समृद्ध विरासत, बहुजातीय समाज, भाषायी वैविध्या एवं नयनाभिराम वन्यव-प्राणियों के कारण देश में विशिष्ट स्थाान रखता है । अनेक नदियों एवं झरनों से अभिसिंचित अरुणाचल की सुरम्य् भूमि में भगवान भाष्कार सर्वप्रथम अपनी रश्मिर विकीर्ण करते हैं, इसलिए इसे उगते हुए सूर्य की भूमि का अभिधान दिया गया है । इसके पश्चिम में भूटान और तिब्बत, उत्तर तथा उत्तर – पूर्व में चीन, पूर्व एवं दक्षिण – पूर्व में म्यांमार और दक्षिण में असम की ब्रह्मपुत्र घाटी स्थित है I पहले यह उत्तर – पूर्व सीमांत एजेंसी अर्थात नेफा के नाम से जाना जाता था I 21 जनवरी 1972 को इसे केन्द्रशासित प्रदेश बनाया गया I इसके बाद 20 फ़रवरी 1987 को इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया I प्रदेश में निम्नलिखित जनजातियाँ निवास करती हैं – आदी, न्यिशी, आपातानी, हिल मीरी, तागिन, सुलुंग, मोम्पा, खाम्ती, शेरदुक्पेन, सिंहफ़ो, मेम्बा, खम्बा, नोक्ते, वांचो, तांगसा, मिश्मी, बुगुन (खोवा ), आका, मिजी I अरुणाचल की 25 प्रमुख जनजातियों की अलग-अलग भाषाएं हैं लेकिन सभी लोग संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग करते है, यहॉं तक कि विद्यालयों-महाविद्यालयों में भी माध्यकम भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग किया जाता है । ईटानगर, नाहरलागुन, बमडीला, तवांग, पासीघाट, जीरो इत्यादि अरुणाचल के प्रमुख शहर हैं I ईटानगर इस राज्य की राजधानी है I
मिजोरम एक छोटा पर्वतीय प्रदेश है । मिजो का शाब्दि क अर्थ पर्वतवासी है । यह शब्द मि और जो के संयोग से बना है । मि का अर्थ है लोग तथा जो का अर्थ है पर्वत । मिजोरम उत्तर – पूर्वी भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है I इसके पश्चिम में बंगलादेश और त्रिपुरा तथा पूरब एवं दक्षिण में म्यांमार है I इसके उत्तर में मणिपुर और असम की सीमा है I सामरिक दृष्टि से यह प्रदेश विशिष्ट महत्व रखता है क्योकि लगभग 650 मील की सीमा म्यांमार एवं बंगलादेश को स्पर्श करती है I इस क्षेत्र को पहले लुशाई हिल्स के नाम से जानते थे I बाद में लुशाई हिल्स का नाम परिवर्तित कर इसे मिज़ो हिल्स नाम दिया गया I 21 जनवरी 1972 को इसे केन्द्रशासित प्रदेश घोषित किया गया I 20 फ़रवरी 1987 को मिजोरम को भारत का 24 वां राज्य बनाया गया I मिजोरम की राजधानी आइजोल है I अन्य प्रमुख शहर हैं चम्फई, लुंगलेई, सरछिप आदि I मिजोरम में मुख्यमत: निम्नइलिखित समुदायों के लोग निवास करते है – राल्तें, पाइते, दुलियन, पोई, सुक्तेक, पंखुप, जहाव, फलाई, मोलबेम, ताउते, लखेर, दलाड; खुड.लई, इत्या दि । मिजो इस प्रदेश की मुख्य् भाषा है । यहाँ की अन्य भाषाएँ हैं – जाहू,लखेर, हमार, पाइते, लाई, राल्ते इत्यादि I
तिब्बखत, नेपाल, भूटान की अंतर्राष्ट्रीद सीमा पर अवस्थित सिक्किम एक लघु पर्वतीय प्रदेश है । यह सम्राटों, वीर योद्धाओं और कथा-कहानियों की भूमि के रूप में विख्यात है । पर्वतों से आच्छादित इस प्रदेश में वनस्पतियों तथा पुष्पों की असंख्या प्रजातियां विद्यमान हैं । सिक्किम की राजधानी गंगटोक है I राज्ये में मुख्ययत: लेपचा, भूटिया, नेपाली तथा लिंबू समुदाय के लोग रहते हैं । सिक्किम सरकार ने प्रदेश की 11 भाषाओँ को राजभाषा घोषित किया है – नेपाली, सिक्किमी, हिंदी, लेपचा, तमांग, लिंबू, नेवारी, राई, गुरुंग, मागर और सुनवार I नेपाली इस प्रदेश की संपर्क भाषा है I नेपाली को भारतीय संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल किया गया है I विद्वानों, समाजशास्त्रियों एवं नृविज्ञानियों ने “नागा” शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में भिन्न- भिन्न मत व्यक्त किए हैं I कुछ विद्वानों का मत है कि “नोक”(NOK) शब्द से “नागा” शब्द की उत्पत्ति हुई है जिसका अर्थ “लोग” है I कुछ विद्वानों का मानना है कि नागा शब्द कछारी भाषा के शब्द “नांगरा ” से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ “योद्धा” हैI कुछ विद्वान मानते हैं कि संस्कृत में “नाग” का अर्थ “पर्वत” होता है और नागा का अर्थ पर्वत पर निवास करनेवाले मानव हैI कुछ लोगों की मान्यता है कि नागा शब्द बर्मा भाषा के “नाका” से आया है जिसका अर्थ होता है “कान की बाली I नागालैंड के लोग कानों में बाली धारण करते हैं I इसलिए इन्हें नागा कहा गया I नागालैंड पूर्वोत्तर का एक प्रमुख राज्य है I यहाँ की लगभग सम्पूर्ण आबादी जनजातीय है I यहाँ का समाज अनेक आदिवासी समूहों एवं उपजातियों में विभक्त है। नागालैंड की प्रमुख जनजातियाँ हैं- चाकेसांग, अंगामी, जेलियांग, आओ, संगतम , चिमंगचुर, चांग, सेमा, लोथा, खेमुन, रेंगमा, कोन्यक इत्यादि। राज्य के प्रमुख शहर कोहिमा, दीमापुर, वोखा, किफिरे, मोकोकचंग एवं प्रमुख भाषाएँ चाकेसांग, अंगामी, जेलियांग, आओ, संगतम , चिमंगचुर,चांग, सेमा, खेमुन, रेंगमा, कोन्यक, नागामीज, हिंदी इत्यादि है I प्रदेश की राजधानी कोहिमा है I
मेघालय एक छोटा पर्वतीय प्रदेश है । यहां की अधिकांश भूमि पर्वत-घाटियों और वनों से आच्छाहदित है । यहां खासी, जयंतिया, गारो तीन प्रमुख आदिवासी समूह रहते हैं । खासी, जयंतिया और गारो प्रदेश की प्रमुख भाषाएं हैं । अंग्रेजी राज्यि की राजभाषा है । यहाँ हिंदी भी बोली जाती है I राज्य की साक्षरता 73.18 प्रतिशत है I मेघालय के प्रमुख शहर शिलांग, जोवाई, विलियमनगर, मवलाई, नोंगपो, चेरापूंजी, तुरा इत्यादि हैं I मेघालय की राजधानी शिलांग है I मणिपुर अपने शाब्दिंक अर्थ के अनुरूप वास्तव में मणि की भूमि है । इसे देवताओं की रंगशाला कहा जाता है । सदाबहार वन, पर्वत, झील, जलप्रपात आदि इसके नैसर्गिक सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं । अत: इस प्रदेश को भारत का मणिमुकुट कहना अतिशयोक्तिौपूर्ण नहीं है । यहां की लगभग दो-तिहाई भूमि वनाच्छाादित है । प्रदेश के पास गौरवशाली अतीत, समृद्ध विरासत और स्वभर्णिम संस्कृिति है । यहाँ तीन जातीय समूह के लोग रहते हैं – मैतेई, नागा और कुकी चीन I मणिपुर की प्रमुख भाषा मैतेई है जिसे मणिपुरी भी कहा जाता है । मणिपुरी भाषा की अपनी लिपि है-मीतेई-मएक । इसके अतिरिक्तष राज्य में 29 बोलियां हैं जिनमें प्रमुख हैं- तंगखुल, भार, पाइते, लुसाई, थडोऊ (कुकी), माओ आदि । मणिपुर में निम्नलिखित आदिवासी समुदाय रहते हैं – ऐमोल, अनल, अंगामी,चिरु, चोथे, गंगते, हमार,लुशोई, काबुई, कचानगा, खरम, कोईराव, कोईरंग, कोम, लम्कांग,माओ, मरम, मरिंग, मोनसंग, मायोन, पाईते, पौमई,पुनरूम, राल्ते,सहते, सेमा, तांगखुल, थडाऊ, तराव इत्यादि I मणिपुर के प्रमुख शहर इम्फाल, बिसनपुर, उखरुल, थौबल, चंदेल, सेनापति, चूराचांदपुर इत्यादि हैं I
त्रिपुरा पूर्वोत्तर का छोटा पर सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है I त्रिपुरा नाम के संबंध में विद्वानों में मत भिन्नछता है । इसकी उत्प्त्तिू के संबंध में अनेक मिथक और आख्याेन प्रचलित हैं । कहा जाता है कि राधाकिशोरपुर की देवी त्रिपुर सुंदरी के नाम पर त्रिपुरा का नामकरण हुआ । एक अन्यह मत है कि तीन नगरों की भूमि होने के कारण त्रिपुरा नाम ख्याात हुआ । विद्वानों के एक वर्ग की मान्यतता है कि मिथकीय सम्राट त्रिपुर का राज्य होने के कारण इसे त्रिपुरा अभिधान दिया गया । कुछ विद्वानों का अभिमत है कि दो जनजातीय शब्दर तुई और प्रा के संयोग से यह नाम प्रकाश में आया जिसका शाब्दिक अर्थ है भूमि और जल का मिलन स्थल । लगभग 18 आदिवासी समूह त्रिपुरा के समाज को वैविध्यदपूर्ण बनाते हैं जिनमें प्रमुख हैं- त्रिपुरी, रियड; नोआतिया, जमातिया, चकमा, हालाम, मग, कुकी, गारो, लुशाई इत्याखदि । इस प्रदेश के पास उन्नत सांस्कृपतिक विरासत, समृद्ध परंपरा, लोक उत्सहव और लोकरंगों का अद्धितीय भंडार है । बंगला और काकबराक इस प्रदेश की प्रमुख भाषाएं है । हिंदी भी व्यापक रूप से यहाँ बोली जाती है I राज्य के प्रमुख शहर अगरतला,अमरपुर, अम्बासा, धर्मनगर,आनंदनगर,बेलोनिया, उदयपुर, विशालगढ इत्यादि है I अगरतला प्रदेश की राजधानी है I
पूर्वोत्तर के लोकसाहित्य की विशेषताएं
पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी पर्वतशिखरों एवं सुदूर जंगलों में प्राकृतिक जीवन व्यतीत करते हैं जहाँ गीत गाते झरनों, बलखाती नदियों, वन्य – जीवों और नयनाभिराम पक्षियों का उन्मुक्त संसार है I यहाँ का जीवन सरल और स्वच्छंद है I यहाँ जीवन की आपाधापी नहीं, समय की व्यस्तता नहीं,कोई कोलाहल नहीं – तनावरहित जीवन, न्यूनतम आवश्यकताएं, कोई महत्वाकांक्षा नहीं, भविष्य की कोई चिंता नहीं I इन परिस्थितियों में इनके उर्वर मस्तिष्क में कल्पना की ऊंची उड़ान उठती है I फलतः लोकगीतों, लोककथाओं, मिथकों, कहावतों, पहेलियों का सृजन होता है I लोकसाहित्य की दृष्टि से पूर्वोतर भारत अत्यंत समृद्ध है I पूर्वोतर की पुरानी पीढ़ी को लोकसाहित्य का जीवंत भंडार गृह कहा जा सकता है I लोकसाहित्य वाचिक परंपरा में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है I
• पूर्वोत्तर भारत की आर्थिकी कृषि पर निर्भर है I अतः अधिकांश पर्व – त्योहार कृषि से संबंधित है I बीज बोने, फसल कटने के उपरांत अनेक पर्व – त्योहार मनाए जाते हैं I नृत्य – गीत इन त्योहारों के अभिन्न अंग है I त्योहारों के अवसर पर इष्ट देवों को प्रसन्न करने के लिए सामूहिक स्तर पर नृत्य – गीत प्रस्तुत किए जाते हैं I इसलिए पूर्वोतर के लोकसाहित्य में त्योहारों से संबंधित गीतों, नृत्यों और आख्यानों की संख्या सबसे अधिक है I
• प्राचीनकाल में पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी समूहों के बीच परस्पर लड़ाई – झगडे होते रहते थे I कभी – कभी ये झगडे युद्ध का रूप धारण कर लेते थे I इस युद्ध में अनेक लोग मारे जाते थे I इसलिए इस क्षेत्र के प्रायः सभी आदिवासी समुदायों में युद्ध नृत्य और युद्ध गीत की परंपरा विद्यमान है I युद्ध नृत्य और युद्ध गीत वीर रसात्मक होते हैं एवं लोगों में शौर्य व पराक्रम का संचार करते हैं I गीतों में अतीत में घटित युद्धों के उल्लेख के साथ – साथ समुदायों के पूर्वज योद्धाओं के वीरतापूर्ण आख्यान वर्णित होते हैं I
• पूर्वोत्तर का समाज उत्सवधर्मी है I इस क्षेत्र के अनेक आदिवासी समुदायों में मृत्यु को भी उत्सव के रूप में समारोहपूर्वक मनाया जाता है I मदिरा पीकर ग्रामवासी पूरी रात नृत्य करते हैं और गीत गाकर मृतक की आत्मा की शांति के लिए कामना करते हैं I इसलिए इस अंचल में मृत्यु गीतों व मृत्यु नृत्यों की उन्नत परंपरा है I
• पूर्वोतर के लोकसाहित्य में पशु – पक्षियों, पेड़ – पौधों, जीव – जंतुओं आदि का मानवीकरण किया गया है I यहाँ जड़ वस्तुएं भी मनुष्य की तरह बातें करती हैं, प्रणय निवेदन करती हैं तथा एक – दूसरे के सुख – दुःख में सहभागी बनती हैं I पशु –पक्षी भी परस्पर विचार – विनिमय करते हैं तथा सुख – दुःख में एक दूसरे की सहायता करते हैं I पर्वत – वृक्ष भी मानव के हर्ष – विषद में हर्षित – रोमांचित – उद्वेलित होते हैं I
• इस अंचल के लोकसाहित्य में वन, पहाड़, देवी – देवता, भूत – प्रेत, जादू – टोना, तंत्र – मन्त्र, नदी, तालाब, पेड़ – पौधे इत्यादि से संबंधित आख्यानों, गीतों, कथाओं और पहेलियों का बाहुल्य है I इस अंचल के लोकसाहित्य में दैवीय गुणों से युक्त वनस्पतियों, संवेदनशील भूत – प्रेतों और चमत्कारी नदियों – झरनों – तालाबों का उल्लेख बार – बार मिलता है I
• पूर्वोतर के प्रणय गीतों में प्रेम की पराकाष्ठा दृष्टिगोचर होती है I इन गीतों में आत्मसमर्पण, आत्मोत्सर्ग और प्रेम की उदात्तता का भाव है I प्रेमी – प्रेमिका एक – दूसरे के लिए जीने – मरने को तत्पर रहते हैं I प्रेमी – प्रेमिका के प्रणय निवेदन में भावनाओं के आरोह – अवरोह के साथ – साथ शब्द चातुर्य भी मिलता है I
• इस क्षेत्र की अधिकांश जनजातियों में मुखौटा नृत्य की परंपरा विद्यमान है I नर्तकगण विभिन्न पशु – पक्षियों का मुखौटा धारण कर पारंपरिक नृत्य करते हैं I बरसिंगा नृत्य, कंकाल नृत्य, दम्पू नृत्य आदि पूर्वोतर में अत्यंत लोकप्रिय हैं I इन नृत्यों
के द्वारा समाज को नैतिकता का सन्देश जाता है I विशेषकर बौद्ध धर्मावलम्बी जनजातियों में मुखौटा नृत्य की उन्नत शैली मौजूद है जिसके माध्यम से बौद्ध धर्म से संबंधित सन्देश संप्रेषित किए जाते हैं I
• पूर्वोत्तर के कुछ जनजातीय समाज में पशु – पक्षियों के हाव – भाव के आधार पर नृत्य किए जाते हैं I नर्तकगण भालू, मुर्गा आदि पशु – पक्षियों की तरह अंग – संचालन करते हैं तथा वैसी ही आकृति बनाकर संदेशों को अभिव्यक्त करते हैं I नागालैंड में मुर्गा नृत्यथ, झिंगुर नृत्यक, भालू नृत्य आदि खूब लोकप्रिय है। हेतातेउली अथवा भालू नृत्य द्वारा योद्धाओं में उत्साह व पराक्रम का संचार करता है।
• पूर्वोत्तर में नृत्य सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग है I इसके द्वारा लोग अपने हर्ष – विषाद, विजय – पराजय, उल्लास – उमंग आदि प्रकट करते हैं I पूर्वोत्तर के कुछ समाज में नृत्य भी एक प्रकार की उपासना और ईश्वर प्राप्ति का एक साधन है I यहाँ नृत्य एक पवित्र कर्म माना जाता है I इसे प्रस्तुत करने के लिए कुछ सुनिश्चित नियम होते हैं I जहाँ नृत्य की प्रस्तुति हो वह स्थान पवित्र होना चाहिए I यहाँ के समाज में धर्म के साथ नृत्य का गहरा जुड़ाव है I जीवन के सभी अवसरों, यथा – जन्म, विवाह, श्राद्ध आदि पर नृत्य की परंपरा विद्यमान है I
• पूर्वोत्तर के समाज में लोककथाओं और मिथकों की समृद्ध परंपरा है I सभी समुदायों में अपने देशंतरगमन, पूर्व पुरुषों तथा ईश्वरीय प्रतीकों के सम्बन्ध में भिन्न- भिन्न मिथक प्रचलित हैं I यहाँ वन्य एवं वन्य- प्राणियों से सम्बंधित लोककथाओं और मिथकों का बाहुल्य है I पूर्वोत्तर के आदिवासी समुदाय मिथकों में सृष्टि, पेड़, पर्वत, जल, मानव, पशु- पक्षी, जीव- जंतु आदि की उत्पत्ति की कथा वर्णित है I यहाँ प्रेम- कथाएं भी पर्याप्त संख्या में मिलती हैं I शिकार सम्बन्धी लोककथाएं भी खूब लोकप्रिय हैं I इन लोककथाओं में मानवीय मूल्यों को प्रतिस्थापित करने की भावना निहित होती है I
• पूर्वोत्तर के लोकगीतों में वीरगाथात्मक आख्यान, देशांतरगमन संबंधी घटनाएँ, पूर्वजों की उपलब्धियां तथा आखेट से जुडी अनुभव वर्णित होते हैं I अधिकांश लोकगीत व लोककथाएँ मिथकों पर आधारित हैं I यहाँ की कहावतें एवं दंतकथाएँ पूर्वजों द्वारा अर्जित अनुभव और अतीत की घटनाओं पर आधारित हैं I
• सामूहिकता बोध पूर्वोत्तर की विशेषता है I किसी व्यक्ति का जीवन समुदाय से अलग नहीं होता है I यहाँ व्यष्टि नहीं, समष्टि महत्वपूर्ण है I इसलिए पूर्वोत्तर में नृत्य – गीत की प्रस्तुति सामुदायिक स्तर पर होती है I इससे परस्पर भाईचारे की भावना सुदृढ़ होती है I
• धर्म पूर्वोत्तर भारत के लोगों का प्राण तत्व है I धार्मिक मान्यताएं कदम – कदम पर इनका पथ आलोकित करती हैं I अतः इष्ट देवताओं, ईश्वरीय प्रतीकों, भूत- प्रेतों आदि से संबंधित उपासना गीतों, संस्कार गीतों और संस्कार नृत्यों का आधिक्य है I इन नृत्य – गीतों में उत्साह, उत्तेजना, ऊर्जा और सम्पूर्ण समर्पण होता है I
• पूर्वोत्तर भारत में विद्यमान युवागृह लोकसाहित्य को पल्लवित – पुष्पित करने में महती भूमिका का निर्वाह करते हैं I यहाँ पर युवा पीढ़ी नृत्य – गीत का प्रशिक्षण प्राप्त कर वाचिक परंपरा को आगे बढ़ाती है I
सैकड़ों आदिवासी समूहों का क्षेत्र पूर्वोत्तर अपनी विविधतापूर्ण संस्कृति के विख्यात है I सरल जीवन और न्यूनतम आवश्यकता के कारण आदिवासी समाज के पास चिंतन, मनन, आत्मावलोकन, कल्पना, नृत्य – गीत, गपशप के लिए भरपूर समय होता है I खाली समय में इनकी कल्पनाएँ ऊंची उड़ान भरती हैं तथा उनके उर्वर मन – मस्तिष्क से कहानियों, कविताओं, गीतों, कहावतों की अविरल धारा फूट पड़ती है I हजारों की संख्या में कहानियां, गीत, मिथक, आदि वाचिक परंपरा में मौजूद हैं जिन्हें अभी तक लिपिबद्ध नहीं किया गया है I दो – चार को छोड़कर पूर्वोत्तर की अधिकाँश भाषाओँ के पास अपनी लिपि नहीं है I लिपिहीनता इस क्षेत्र के लोकसाहित्य के संरक्षण – संकलन – प्रकाशन में सबसे बड़ी बाधा है I अतः आवश्यक है कि देवनागरी लिपि में पूर्वोत्तर भारत के लोकसाहित्य का संकलन – प्रकाशन के लिए भागीरथ प्रयास किए जाएँ अन्यथा काल – प्रवाह में साहित्य के इस विशाल भंडार का क्षरण हो जाएगा तथा हमारा समाज इस समृद्ध विरासत से वंचित हो जाएगा I

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *