प्रज्ञा विरोधी अराजक तत्व

अंग्रेजों ने जाते जाते अपने पिट्ठू नेहरू को भारत की सत्ता सौंप दी।  क्रांतिकारियों के बलिदानों  पर पानी फेरते हुए नेहरू, गांधी जी को आजादी का पूरा श्रेय देने का छल देश के साथ किया गया। नेहरू और जिन्ना ने अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए देश के बटवारे में पूरा सहयोग किया। लाखों हिंदुओं के हत्याएं और बलात्कार होने पर भी गांधीजी पूरी तरह मौन रहे और मुस्लिम तुष्टीकरण करते रहे। फिर शुरू हुआ निपटाने का काम। पहले तो सुभाष चंद्र बोस को निपटा दिया गया क्योंकि यदि वे सामने आजाते तो नेहरु कभी प्रधानमंत्री नहीं बनता। सरदार पटेल भी रास्ते का कांटा थे। नेहरू की किस्मत अच्छी थी जो वे भी सिधार गये। अपने परिवार की परंपरा को कायम रखते हुए लाल बहादुर शास्त्री को भी निपटा दिया गया। उन जैसे कर्मठ और इमानदार व्यक्ति के रहते इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री बनना असम्भव था। कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण करते हुए धर्म की ऐसी राजनीति खेली कि उसे समझने में देश को 70 साल लग गए। मुस्लिम केवल वोट बैंक बना रहा। उन्हें राष्ट्रधारा में लाने तथा उनके जीवन में परिवर्तन लाने के लिए ईमानदार प्रयास किया ही नहीं गया। उन्हें  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू संगठनों का डर दिखाकर वोट बैंक बनाकर रखा गया। कश्मीरी पंडितों को असहनीय पीड़ा, अत्याचार, बलात्कार, अनाचार, प्रताड़नाएं सहन करनी पड़ीं, अपना घर बार छोड़ना पड़ा। तब कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण की पट्टी आंखों पर बांध कर मौन बैठी रही। जब देश में अलग-अलग तरह के आंदोलन कांग्रेस सरकार के खिलाफ होने लगे तो इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र में एक काला अध्याय जोड़ते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी और अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटने का क्रूर उदाहरण देश के समक्ष प्रस्तुत किया।इसी पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए “राजीव गांधी” ने हजारों सिखों के नरसंहार को अंजाम दिया और बोफोर्स घोटाले से बड़े-बड़े घोटालों की आधारशिला रखी। देश को लूटने व मूर्ख बने का काम चलता रहा। मनमोहन सिंह की सरकार में घोटालों का ऐसा दौर चला की देश की अर्थव्यवस्था रसातल मे चली गई। जब लोग जागने लगेतब कोई नया शिगूफा छोड़ना जरूरी हो गया था जो लोगों का ध्यान भटका सके और इनके मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पर भी कोई आंच ना आए। तब एक झूठा केस तैयार किया गया। सुशील शिंदे की अगवाई में साध्वी प्रज्ञा को षडयंत्र करके इसमें फसाया गया। यह था  “हिंदू आतंकवाद” का शिगूफा। 8 साल तक चली लंबी कार्यवाही में एक भी साक्ष्य यह साबित नहीं कर पाया की साध्वी प्रज्ञा आतंकवादी है। फिर भी आतंकवादियों के मौलिक अधिकारों की बात करने वालों में से एक भी व्यक्ति इस महिला के मौलिक अधिकारों की बात करने के लिए आगे नहीं आया। वहीं भारत के टुकड़े टुकड़े करने की बात करने वाले और भारत से आजादी की मांग करने वाले लोगों के समर्थन करने के लिए कांग्रेस के अध्यक्ष,  पूरी कांग्रेस खड़ी है।  मसूद अजहर जी बोलने वाला, राम मंदिर के खिलाफ केस लड़ने वाला कपिल सिब्बल कांग्रेसी है। कांग्रेस का यह दोगला चरित्र जनता को समझ आ गया है। साध्वी प्रज्ञा राष्ट्रभक्ति, सहनशक्ति, समर्पण और नारी शक्ति का अद्भुत प्रतीक हैं। न्यायालय द्वारा उन्हें निरपराधी घोषित करने के बाद भी उनपर आरोप लगाने वाले लोग भारत के संविधान और न्याय व्यवस्था के भी शत्रु हैं। इन्हे भारत के संविधान और न्याय व्यवस्था में आस्था नहीं है। अत: जो प्रज्ञा विरोधी अराजक तत्व हैं  उन्हें पहचाना जाना चाहिए और उनके खिलाफ देश को खड़ा होना चाहिए। भारत माता के चरणों में समर्पित

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