ऋषि दयानन्द अविद्या निवारणार्थ विद्या-अविद्या का प्रकाश किया

मनमोहन कुमार आर्य

ऋषि दयानन्द ने ईश्वर व मृत्यु विषयक अपनी शंकाओं के समाधान प्राप्त करने के लिये अपने
माता-पिता व उनके घर को पूर्ण युवावस्था, आयु लगभग 21 वर्ष के बाद, छोड़ा था। वह देश भर में
धार्मिक विद्वानों से मिले थे और उनसे अपनी शंकाओं का समाधान करने सहित ईश्वर प्राप्ति के
उपाय आदि की भी चर्चा की थी। वह अनेक योगियों के सम्पर्क में भी आये और योग विद्या प्राप्त
करने में सफल हुए। वह योग से प्राप्त होने वाली ईश्वर साक्षात्कार की स्थिति समाधि अवस्था को
प्राप्त करने में भी सफल हुए थे। समाधि में योगी को आत्मा और ईश्वर का साक्षात्कार होता है।
ऋषि दयानन्द ने इस स्थिति को भी प्राप्त किया था। यह स्थिति वर्तमान में कुछ नाम मात्र लोगों
को ही प्राप्त होती है। इसके बाद लोग अपने जीवन को सफल समझ कर समाधि अवस्था का ही
अभ्यास जारी रखते हैं जिससे वह ईश्वर का अधिकाधिक आनन्द ले सकें और मृत्यु होने पर मोक्ष
को प्राप्त कर सकें। ऋषि दयानन्द अपनी इस अवस्था से सन्तुष्ट नहीं हुए थे। उन्होंने इसके बाद

भी विद्या प्राप्ति के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये प्रयत्नों को जारी रखा।
विद्या प्राप्ति के उर्द्देश्य की पूर्ति ऋषि दयानन्द जी ने मथुरा के प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती की पाठशाला
में लगभग तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्राप्त की थी। अध्ययन समाप्त करने के समय उनकी आयु 38 वर्ष की थी। गुरु
विरजानन्द जी की प्रेरणा व इच्छा से उन्होंने संसार से अविद्या को दूर करने का अपना लक्ष्य बनाया। इसके लिये उन्होंने वेद
ज्ञान के प्रचार की योजना बनाई। उन्होंने पाया कि सभी मतों में अविद्या विद्यमान है। लोग विद्या के मार्ग पर न चलकर
अविद्या के मार्ग पर चल रहे हैं। अविद्या से मनुष्य का लौकिक एवं पारलौकिक जीवन दुःखमय एवं विद्या से मनुष्य का
जीवन सुखमय एवं परम आनन्द मोक्ष की प्राप्ति कराता है। अविद्या से मनुष्य अपने सद्गुणों को भुलाकर सच्चे प्रचारकों के
प्रति अनुदार व हिंसक तक बन जाता है। संसार के अधिकांश महापुरुषों को अविद्यावान् लोगों के द्वारा दुःख सहित मृत्यु तक
को प्राप्त होना पड़ा है। ऋषि दयानन्द के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह अविद्या दूर करने में आने वाली बाधाओं और लोगों द्वारा
दिये जाने वाले दुःखों से परिचित थे तथापि उन्होंने अपने इस सत्कर्तव्य को चुना और विद्या का प्रकाश करने सहित अविद्या
दूर करने के लिये अवैदिक, अज्ञानपूर्ण, सत्य के विपरीत मत-मतान्तरों की मान्यताओं व सिद्धान्तों की समीक्षा वा खण्डन
का सहारा लिया। अविद्या दूर करने के लिये शंका समाधान, विवेचना, समीक्षा, सत्य का मण्डन व असत्य का खण्डन करना
आवश्यक होता है। विद्यालयों में अध्यापक भी इसी प्रकार से विद्या प्राप्त कराते हैं। ऋषि दयानन्द ने भी संसार से मनुष्यों के
सभी दुःखों को दूर करने के लिए विद्या का प्रचार तथा अविद्या का नाश करने को आवश्यक जानकर मत-मतान्तरों की
समीक्षा व असत्य मान्यताओं का खण्डन किया जिसका परिणाम है कि सुबुद्ध व निष्पक्ष लोगों ने वैदिक मत को अपनाया
और वह अविद्या से मुक्त होकर सत्य मार्ग पर चलते हुए ईश्वर भक्ति, अग्निहोत्र यज्ञ तथा देश व समाज के उपकारक कार्यों
से जुड़े। स्वामी श्रद्धानन्द, पं0 लेखराम, पं0 गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती जी आदि ऐसे ही
महापुरुष थे। इन्होंने अपनी अविद्या को दूर किया और विद्या व विद्या के सिद्धान्तों को अपनाया और इसके साथ ही देश व
संसार से अविद्या दूर करने के महनीय व प्रशंसनीय कार्य भी किये।
विद्या का प्रचार तथा अविद्या को दूर करने का ऋषि दयानन्द के अनेक कार्यों में सबसे महत्वूपर्ण कार्य
सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का लेखन व प्रकाशन था जिसका न केवल तात्कालिक प्रभाव हुआ अपितु यह अविद्या दूर करने का
स्थाई साधन बन गया है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में विद्या व अविद्या का यथार्थस्वरूप प्रकाशित किया है। इसके 14

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समुल्लासों में आरम्भ के 10 समुल्लास वैदिक सत्य मान्यताओं का प्रकाश करते हैं जो विद्या के प्रकाशक हैं। ऋषि दयानन्द
व सत्यार्थप्रकाश के प्रकाशन से पूर्व यह सत्य ज्ञान लोगों को अपनी समस्त पूंजी व्यय करके भी कहीं से भी प्राप्त नहीं होता
था। ऋषि दयानन्द ने अपने प्रचार व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के द्वारा संसार में सत्य ज्ञान का प्रकाश फैलाया। हम यह भी
कह सकते हैं कि वेद के होते हुए भी व उससे अनभिज्ञ लोगों को उन्होंने ज्ञान का सूर्य सत्यार्थप्रकाश देकर कृतार्थ किया।
सत्यार्थप्रकाश के प्रथम 10 समुल्लासों को पढ़कर मनुष्य सद्ज्ञानी, सदाचारी, देशभक्त, समाज सुधारक, माता-पिता का
आज्ञा पालक व उनका सेवक, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री का भाव रखने वाला, सच्चा धार्मिक व ईश्वर भक्त, सभी सद्गुणों से
सम्पन्न, पुरुषार्थी, समाज का हितकारक, अविद्या को दूर करने वाला आदि अनेकानेक गुणों से युक्त होता है।
महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश के उत्तरार्ध के चार समुल्लासों में मत-मतान्तरों की अविद्या को प्रकाशित कर
उनकी समीक्षा की है। अज्ञान व अविद्या ही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। यह मनुष्यों को नाना प्रकार के दुःख देते रहते हैं और
उसके वर्तमान तथा भविष्य सहित परजन्म को भी बिगाड़ते हैं। सामान्य मनुष्य मत-मतान्तरों में रहकर, उनके ग्रन्थों को
पढ़कर व उनके कर्मकाण्डों का पालन कर सत्य ज्ञान व सत्य विद्याओं को प्राप्त नहीं होता। उन मतों के आचार्य भी उन ग्रन्थों
को पढ़कर भी सत्य ज्ञान व सदाचरण को प्राप्त नहीं होते। अतः उच्च कोटि के निष्पक्ष विद्वानों व आप्त पुरुषों द्वारा असत्य
धार्मिक मान्यताओं की समीक्षा आवश्यक होती है जिससे दूध में से पानी को अलग किया जा सके। यही कार्य ऋषि दयानन्द
जी ने सत्यार्थप्रकाश के अन्त के चार समुल्लासों में बहुत ही योग्यतापूर्वक किया है। इससे सभी मत-मतान्तरों के व्यक्ति
लाभान्वित हुए हैं। उन्हें न केवल अपने मत की कुछ अविद्यायुक्त बातों का ही ज्ञान हुआ है अपितु अन्य प्रायः सभी मतों की
भी असत्य व अविद्यायुक्त बातों का ज्ञान हुआ व अध्ययन करने से होता है। असत्य का विपरीत शब्द सत्य होता है। असत्य
ज्ञान के साथ ही सत्य का ज्ञान भी हो जाता है। यह कार्य सत्यार्थप्रकाश के पूर्वार्ध व उत्तरार्ध के समुल्लासों से बखूबी होता है।
ऋषि दयानन्द ने प्रथम दस समुल्लासों सहित अन्त के चार समुल्लासों की पृथक-पृथक भूमिकायें भी लिखी हैं। इन
भूमिकाओं में उन्होंने अपने उद्देश्य व आशय को स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया है कि उनका आशय किसी का दिल दुःखना
नहीं है अपितु लोगों के दीर्घकालिक लाभ के लिये उन्हें सत्य व असत्य के स्वरूप से परिचित कराना है। उन्होंने यह भी लिखा है
कि सत्यार्थप्रकाश पढ़कर मत-मतान्तरों के लोग अपने हित व अहित को ध्यान में रखकर सत्य का ग्रहण व असत्य का त्याग
चाहें, तो कर सकते हैं। उन्होंने किसी से सत्य को ग्रहण कराने के लिये किसी पर किसी प्रकार का दबाव व भय उत्पन्न नहीं
किया और न ही किसी को कोई प्रलोभन की बात ही की है। वह स्वेच्छा से जो चाहें कर सकते हैं, इसकी छूट उन्होंने लोगों को दी
है। ऋषि दयानन्द ने जो कहा व किया, वही धार्मिक विद्वानों का मुख्य कर्तव्य होता है। इसी कार्य को करने की ईश्वर की
आज्ञा ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ वेदों में पायी जाती है। यजुर्वेद में ‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविशेच्छतं समाः। एवं त्वयि
नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।’ में भी उन सत्य कर्मों को ही करने की आज्ञा है जिससे मनुष्य एक सौ वर्ष तक स्वस्थ एवं
सुखपूर्वक जीवित रह सके। अतः ऋषि दयानन्द ने एक विद्वान महात्मा एवं ईश्वर के सच्चे सन्देशवाहक का परिचय देने
सहित अपने कर्तव्य को ही पूरा किया है। उन पर किसी भी प्रकार के पक्षपात का आरोप नहीं लगता। यदि वह ऐसा न करते तो
उसके बाद मत-मतान्तरों के लोगों ने अपनी कुछ मान्यताओं को युक्ति व तर्कसंगत बनाने का जो प्रयास किया है, वह भी न
होता।
ऋषि दयानन्द जी ने धार्मिक व मत-मतान्तरों की अविद्या दूर करने का इतिहास में अभूतपूर्व प्रयास किया। आज
संसार के लोग सत्यासत्य को समझने लगे हैं। कोई ऋषि के सत्य मन्तव्यों को माने या न माने, परन्तु सत्यार्थप्रकाश असत्य
मार्ग को मानने व उस पर चलने वालों का पथ प्रदर्शन तो करता ही है। हमारा सौभाग्य है कि हमें अपनी किशोरावस्था में
आर्यसमाज को जानने व समझने का अवसर मिला और हमारी आत्मा ने स्वतः इसे स्वीकार किया। आज हम सभी प्रकार की
अविद्याओं से मुक्त हैं। हमें ईश्वर, जीवात्मा व इस संसार के महत्व व उपयोग का ज्ञान है। ईश्वर को प्राप्त करने की साधना

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करना व उसे प्राप्त करना हमारे पुरुषार्थ पर निर्भर करता है। आर्यसमाज के शीर्ष विद्वान व योगाचार्य स्वामी सत्यपति जी
मुस्लिम सम्प्रदाय के सपेरा सम्प्रदाय में उत्पन्न हुए थे। उन्होंने परिस्थितियोंवश वेद के सिद्धान्तों को जाना और श्रेष्ठता के
आधार पर उन्हें स्वीकार किया। आज वह आर्यसमाज के विद्वानों व अनुयायियों के प्रमुख आचार्य हैं। उन्होंने अपने जीवन का
कल्याण करने किया है और दूसरों को भी सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा करते हैं। हमने भी उनके उपदेशों का श्रवण व उनके वृहद
साहित्य का अध्ययन किया है। उनके विचार व सिद्धान्त वेद व ऋषि दयानन्द सम्मत हैं। हमें व समाज के अन्य बन्धुओं को
उनके उदाहरण से लाभ उठाना चाहिये।
ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश व इसके उत्तरार्ध के चार समुल्लास मनुष्य जाति की उन्नति के लिये ही लिखे हैं।
आधुनिक समाज आज भी अविद्या से ग्रस्त हैं। उन्होंने सत्यार्थप्रकाश से लाभ नहीं उठाया है। हम समझते हैं कि ऐसा करके
उन्होंने अपनी ही हानि की है। यदि वह इससे लाभ उठाते तो उन्हें जन्म-जन्मान्तरों में ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था को जानने
व तदनुकूल आचरण करने का लाभ प्राप्त होता। हम इतना ही निवेदन करेंगे कि सत्यार्थप्रकाश को ज्ञान व विज्ञान की उन्नति
तथा सत्य सिद्धान्तों के ज्ञान के लिये सभी मनुष्यों को पढ़कर लाभान्वित होना चाहिये। इसे अपनाकर संसार में सुख व
शान्ति का विस्तार किया जा सकता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
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