प्राण की आहुति कोई देता !

प्राण की आहुति कोई देता,
समझ बलिदान कहाँ कोई पाता;
ताक में कोई है रहा होता,
बचा कोई कहाँ उसे पाता !

रही जोखिम में ज़िन्दगी रहती,
सुरक्षा राह हर कहाँ होती;
तभी तो ड्यूटी है लगी होती,
परीक्षा हर घड़ी वहाँ होती !

चौकसी करनी सभी को होती,
चूक थोड़ी भी नहीं है चलती;
व्यवस्थित तंत्र नहीं हो जब तक,
सुरक्षित कहाँ कोई है हद पर !

शांति जब तक न हम हैं रख पाते,
मिटा उद्वेग उर नहीं पाते;
ख़ुशी कब मन में कोई पा पाते,
मार कर मर के सिर्फ मन रोते !

स्वतंत्र आत्म ही सुलझ पाती,
सुलझे दो देश ही सुलह करते;
कलह से चैन कहाँ ‘मधु’ पाता,
विधाता को वृथा व्यथा देता !

रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु

Leave a Reply

%d bloggers like this: