वेद ही मनुष्य मात्र के परम आदरणीय व माननीय धर्म ग्रन्थ क्यों?

वेदों की उत्पत्ति और उनके विषय में कुछ तथ्यों पर भी दृष्टिपात कर लेते हैं। सृष्टि के आरम्भ काल में ईश्वर ने मनुष्य आदि प्राणियों को अमैथुनी सृष्टि अर्थात् बिना माता-पिता के संसर्ग हुए उत्पन्न किया था। यह सभी स्त्री व पुरुष युवावस्था में उत्पन्न किये गये थे। यदि ईश्वर इन्हें शैशवास्था में उत्पन्न करता तो इनके पालन करने के लिए माता-पिता की आवश्यकता होती और यदि इन्हें वृद्ध बनाता तो इनसे मैथुनी सृष्टि न चल पाती और वहीं समाप्त हो जाती। अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न इन युवा स्त्री पुरुषों को बोलने के लिए भाषा और पदार्थों के नाम व क्रिया पद आदि का ज्ञान चाहिये था।

मनमोहन कुमार आर्य

एक शब्द ‘धर्म’ है जिसका विपरीत व विरोधी अथवा विलोम शब्द अधर्म है। यह धर्म शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है। यह शब्द हिन्दी भाषा में संस्कृत से ही आया है। अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, अरबी व संसार की अन्य भाषाओं में इसका प्रयोग नहीं हुआ है। वेद निर्विवाद रूप से संसार की सबसे पुरानी पुस्तक है। वेद से प्राचीन पुस्तक या मत-पन्थ-धर्म का अन्य कोई ग्रन्थ संसार में नहीं है। यदि वेद को समग्रता में जान लिया जाये तो सच्चे हृदय के विवेकशील व बुद्धिजीवी लोग यह स्वीकार करेंगे कि वेद मानव आचार संहिता वा धर्म शास्त्र है। धर्म मनुष्य जीवन में श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव को धारण करने को कहते हैं। मनुष्य को क्या धारण करना चाहिये? मनुष्य के लिए सबसे अच्छी व आवश्यक यदि कोई वस्तु संसार में है तो वह ‘सच्चे व अच्छे गुण, कर्म व स्वभाव’ ही हैं। यह अच्छे गुण, कर्म व स्वभाव का धारण ही धर्म पालन कहलाता है। वेद के ऋषियों ने सृष्टि के आदि काल में मनुष्यों को ‘सत्यं वद धर्म चर’ का उपदेश किया था। इसका अर्थ है सत्य बोलो और धर्म पर चलो। इससे यह संकेत मिलता है कि सत्य बोलना व सत्य का ही आचरण करना धर्म कहलाता है। आजकल सभी पौराणिक मतों व अन्य मतों के आचार्यों द्वारा चलाये जा रहे मत, बौद्ध, जैन, ईसाई व इस्लाम, सब अपने मत को धर्म कहते हैं। अब प्रश्न यह है कि यदि इन सबकी सभी मान्यतायें व शिक्षायें सत्य बोलने व सत्य का पालन सहित उनका आचरण करने की बातें करती हैं, तभी यह धर्म हो सकती हैं अन्यथा यह धर्म नहीं हो सकतीं। यहां यह भी बता दें कि वेद मत को छोड़कर अन्य कोई भी मत, पन्थ एवं सम्प्रदाय शत-प्रतिशत सत्य विचारों व मान्यताओं पर आधारित नहीं है। जो मत व पन्थ सर्वांश में सत्य न हो, वह मत वा धर्म अधूरा व आंशिक धर्म ही हो सकता है समग्र धर्म नहीं, जैसा कि वेद पर आधारित वैदिक धर्म पूर्णता में सत्य धर्म है। वेद से इतर जितने भी मत संसार में हैं उनमें किसी में कम तो किसी में अधिक अवैदिक व असत्य मान्यताओं व परम्पराओं की भरमार है। उन मान्यताओं के रहते वह पूर्ण व सत्य मत नहीं कहला सकते और इसी आधार पर वह पूर्ण धर्म भी नहीं हैं। कपड़े में दाग लग जाये तो लोग उसे साफ करते हैं। इसी प्रकार से धर्म वा मत में असत्य मान्यतायें व कर्म भी कपड़े पर दाग के सामान हैं। यदि उन्हंे अच्छे साबुन से रगड़ रगड़ कर धोकर साफ नहीं किया जायेगा तब तक वह पूर्ण व सच्चे धर्म की संज्ञा नहीं पा सकते। कहने के लिए कोई अपने मत की प्रशंसा किन्हीं भी शब्दो में क्यों न करे, परन्तु विवेकशील लोगों को सच्चाई व वास्तविक स्थिति का ज्ञान है। दुःख इसी बात का है कि कोई भी मताचार्य अपने मत की अशुद्धियों, बुराइयों व असत्य मान्यताओं की पहचान कर उसे हटाने का प्रयत्न नही करता क्योंकि उन्हें यह तथ्य भलीभांति ज्ञात है कि ऐसा करने पर उनके मत का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। इसका अपवाद केवल व केवल वेद द्वारा प्रचलित व पालित सबसे प्राचीन, सृष्टि के आरम्भ से प्रचलित वैदिक धर्म है जो समस्त ज्ञात व अज्ञात सत्य मान्यताओं से सुभूषित धर्म है। इसी सत्य वैदिक धर्म का आर्यसमाज विगत 142 वर्षों से आन्दोलन के रूप में प्रचार करता चला आ रहा है।

अब सत्य व असत्य के स्वरूप पर विचार करते हैं। सत्य किसी पदार्थ के यथार्थ वा वास्तविक स्वरूप को कहते हैं। एक पदार्थ काले रंग का है तो उसे काला जानना व दूसरों को बताना ही सत्य होगा। इसके विपरीत यदि जानकारी के अभाव व अन्य किसी भी कारण से हम उसका सहीं रंग नहीं जानते व बताते हैं तो वह असत्य होता है। इसी प्रकार से ईश्वर, जीव व प्रकृति व अन्य सभी विषयों से संबंधित उनके सत्य व असत्य स्वरूप, पक्ष व गुण, कर्म, स्वभाव व चरित्र आदि हुआ करते हैं। ईश्वर का स्वरूप सच्चिदानन्दस्वरूप है। इसका अर्थ है कि ईश्वर सत्य, चित्त व आनन्द स्वरूप वाला है। सत्य का अर्थ है कि उसकी सत्ता यथार्थ है, वह काल्पनिक सत्ता वाला नहीं है। चेतन का अर्थ है कि वह जड़ के विपरीत ज्ञान व कर्म करने वाली तथा संवेदना, दया, करूणा, जीवों के कल्याण व हित को चाहने वाली सत्ता है। इसके साथ ईश्वर दिखाई न देने से निराकार, इस ब्रह्माण्ड की विशालता के कारण सर्वव्यापक, ज्ञानपूर्वक लोक लोकान्तर एवं मनुष्य आदि प्राणियों की सृष्टि करने वाला होने से ईश्वर सर्वज्ञ व सृष्टिकर्ता, हमारे कर्मों का नियामक होने से सर्वान्तर्यामी, सदा से विद्यमान रहने से अनादि, नित्य, अनुत्पन्न, अजन्मा, अजर, अमर, अविनाशी व  अनन्त सिद्ध है। दुखियों के दुख करने के कारण व वृद्धावस्था के दुःखों से छुड़ा कर व सुखदायक मृत्यु देकर व उसके बाद कर्मानुसार पुनर्जन्म देकर वह करूणामय व दयालु सिद्ध होता है। वह हमारे सभी कर्मों का साक्षी होकर हमें हमारे शुभाशुभ कर्मों का फल जन्म वा पुनर्जन्म के रूप में देकर एवं कर्मों का सुख-दुःख रूपी भोग कराने वाला होने से वह न्यायकारी, न्यायाधीश एवं हमारा राजा भी है। ईश्वर सर्वशक्तिमान है अतः वह अपने काम स्वयं करता है, किसी की किंचित सहायता की उसको अपेक्षा नहीं है। उसका कभी जन्म व अवतार भी नहीं होता। सर्वव्यापक का अवतार लेना ऐसा है कि जैसे किसी सार्वभौमिक राजा को कोई व्यक्ति अपने समान व न्यून एक साधारण मनुष्य माने। यह जो वर्णन किया है वह ईश्वर का सत्यस्वरूप हैं। जिन ग्रन्थों में ईश्वर का ऐसा स्वरूप पाया जाता है, उनकी ऐसी बातें सत्य मानी जा सकती हैं और यदि किसी ग्रन्थ में ईश्वर को इसके विपरीत एकदेशी, ससीम, अवतार लेने वाला, रास-रंग करने वाला, मनमानी करने वाला व अपने मत के लोगों को सुख व स्वर्ग व दूसरें मतों के लोगों को दुःख,  दोजख व नरक की आग में जलाने वाला बताने वाले मत व उनके ग्रन्थ में ईश्वर का ऐसा स्वरूप सत्य व तर्कसंगत मान्य नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार से जीवात्मा, जो कि सभी प्राणियों के शरीरों में विद्यमान है, वह सत्य, चित्त, एकदेशी, ससीम, अल्पज्ञ, अनादि, नित्य, अनुत्पन्न, अजर, अमर, ज्ञान प्राप्ति व कर्म करने की सामथ्र्य वाला, कर्मानुसार पूर्वजन्मों, इस जन्म व परजन्मों में आने जाने वाला होता है। प्रकृति एक जड़ पदार्थ है जो अपने मूल रूप में सत्व, रज व तम गुणों वाली कहलाती है। ईश्वर इसी से पूर्व कल्पों के अनुसार सृष्टि की रचना करता है जिसमें सभी सूर्य, चन्द्र, पुथिव्यां, अन्य लोक-लोकान्तर, ग्रह, उपग्रह, आकाश गंगायें, निहारिकायें एवं जीवात्मा के प्राणादियुक्त सूक्ष्म शरीर आदि आते हैं। यह सब ज्ञान वेदों में उपलब्ध है। सृष्टि से वेदों के ज्ञान का मिलान करने पर यह सत्य सिद्ध होता है। अन्य किसी मत में सृष्टि विषयक इन तथ्यों का पूर्ण सत्य उद्घाटन नहीं हुआ है जिससे यह सिद्ध होता हो कि वेदेतर सभी मत व मतान्तर अल्पज्ञ मनुष्यों के द्वारा उद्घाटित व प्रचलित हैं जबकि वेद सृष्टिकर्ता ईश्वर की ज्ञान व विज्ञान से युक्त कृति है। सत्यार्थ प्रकाश का ग्यारहवां, बारहवां, तेरहवां तथा चौदहवां समुल्लास पढ़कर भी इन सभी तथ्यों को प्रत्यक्ष किया जा सकता है।

वेदों की उत्पत्ति और उनके विषय में कुछ तथ्यों पर भी दृष्टिपात कर लेते हैं। सृष्टि के आरम्भ काल में ईश्वर ने मनुष्य आदि प्राणियों को अमैथुनी सृष्टि अर्थात् बिना माता-पिता के संसर्ग हुए उत्पन्न किया था। यह सभी स्त्री व पुरुष युवावस्था में उत्पन्न किये गये थे। यदि ईश्वर इन्हें शैशवास्था में उत्पन्न करता तो इनके पालन करने के लिए माता-पिता की आवश्यकता होती और यदि इन्हें वृद्ध बनाता तो इनसे मैथुनी सृष्टि न चल पाती और वहीं समाप्त हो जाती। अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न इन युवा स्त्री पुरुषों को बोलने के लिए भाषा और पदार्थों के नाम व क्रिया पद आदि का ज्ञान चाहिये था। किसने किससे कैसा व्यवहार करना होता है, यह ज्ञान भी इन्हें बताना आवश्यक था। भूख लगने पर फल, गोदुग्ध व वनस्पितियों का सेवन करना है और प्यास लगने पर वहां निकट के स्वच्छ जलाशय व नदी का जल पीना है, यह ज्ञान भी सभी मनुष्यों को बताना था। इन सबकी पूर्ति ईश्वर ने इन ऋषियों को चार वेदों का ज्ञान देकर पूरी की। जिसे ऋग्वेद का ज्ञान दिया वह अग्नि ऋषि कहलाये, जिसे यजुर्वेद का ज्ञान दिया वह वायु ऋषि, जिसे सामवेद का ज्ञान दिया वह आदित्य ऋषि और जिसे अथर्ववेद का ज्ञान दिया वह अंगिरा ऋषि जाने जाते हैं। यह वर्णन वैदिक वांग्मय के अन्तर्गत ‘ब्राह्मण ग्रन्थों’ में वर्णित हैं। इन चार ऋषियों को ईश्वर ने इनकी आत्मा में अपने जीवस्थ वा अन्तर्यामीस्वरूप से प्रेरणा द्वारा ज्ञान दिया था। चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के विषय क्रमशः ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान है। सभी वेदों में ईश्वर व उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना का ज्ञान भी दिया गया है जिससे मनुष्य सृष्टिकर्ता के ज्ञान व उसकी उपासना में भ्रमित न हो। इन चार ऋषियों ने ईश्वर की प्रेरणा से चार वेदों का ज्ञान एक एक करके ब्रह्मा जी को दिया। इन पांच ऋषियों के एक स्थान पर उपस्थित होने के कारण चार वेदों का ज्ञान पांचों ऋषियों को हो गया। इसके बाद इन ऋषियों ने अन्य युवा स्त्री व पुरुषों को उपदेश व बोलकर ज्ञान कराया। यह उपदेश पद्धति से ज्ञान देने की परम्परा का आरम्भ था जो अद्यावधि प्रचलित है। ऋषि दयानन्द ने भी गुरु विरजानन्द जी से वेद-व्याकरण का ज्ञान प्राप्त कर उस ज्ञान से वेदों की संहितायें प्राप्त करने के अनन्तर चार वेदों का व्याकरण व अन्य शास्त्रों की सहायता से आलोचन किया और बाद में वेदभाष्य का कार्य आरम्भ किया जिससे साधारण मनुष्य भी लाभान्वित हो सकंे। हमें लगता है कि लोकभाषा हिन्दी सहित संस्कृत में वेदों के ज्ञान-विज्ञान युक्त प्रमाणिक भाष्य का कार्य सृष्टि के इतिहास में ऋषि दयानन्द जी ने ही पहली बार किया। इसका सुपरिणाम है कि आज एक साक्षर व्यक्ति भी वेदों के गम्भीर रहस्यों को जानता है। वेदभाष्य का अंग्रेजी अनुवाद भी आज उपलब्ध है। आज हम व देश-विदेश के लाखों लोग ऋषि दयानन्द व उनके अनुयायी विद्वानों के वेदभाष्यों से लाभान्वित हो रहे हैं। यह ऋषि दयानन्द का मानव जाति पर बहुत बड़ा उपकार है। यदि ऐसा न होता तो हमारा व लाखों करोड़ों मनुष्यों का जीवन उन्नत न होता और न ही परजन्म सुधरता। ऋषि दयानन्द जी के सम्पूर्ण मानव जाति पर अन्य अनेक उपकार हैं जो लेख के विषय से भिन्न होने के कारण यहां उन्हें उल्लेखित नहीं किया जा रहा है। तथापित संक्षेप में इतना तो बता देते हैं कि ऋषि दयानन्द ने वेदानुसार ईश्वरीय उपासना की परिणामोत्पाक सत्य विधि सिखाई। अवतारवाद, मूर्तिपूजा, व्यक्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, जन्मना जाति व्यवस्था आदि का खण्डन किया। देशवासियों को देश को आजाद करने की प्रेरणा की। उन्होंने जन्म से सभी को शूद्र बताया। स्वामी दयानन्द जी ने विद्या आदि संस्कारों तथा आचरण के आधार पर कर्मणा ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य वर्णों को मान्यता दी। अनेक अनुसार अच्छे कर्मों को करके शूद्र ब्राह्मण बन सकता है और ब्राह्मण नीच कर्म करके शूद्र हो जाता है। बाल विवाह व बेमेल विवाह को उन्होंने अनुचित ठहराया, गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार विवाह का समर्थन एवं छोटी आयु की विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार दिया। उन्होंने स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार भी दिया। ऐसे अनेकानेक उपकार ऋषि दयानन्द के मानव जाति पर हैं।

वेद ही संसार के सभी मनुष्यों के आदरणीय एवं माननीय ग्रन्थ हैं। मतमतान्तरों के ग्रन्थों में वैसा निर्भ्रांत ज्ञान नहीं है जैसा कि वेदों में है। मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में मिथ्या मान्यताओं व विश्वासों की भरमार है जबकि वेद इन अज्ञानमूलक मान्यताओं से मुक्त है। इन मत-मतान्तरों के कारण ही संसार में अन्धकार फैला और लोग ईश्वर के अस्तित्व को न मानने वाले नास्तिक बने हैं। मत-मतान्तरों की ईश्वर विषयक मान्यतायें बुद्धिमान व विवेकशील मनुष्यों में भ्रम उत्पन्न करती हैं तथा सभी मत-मतान्तर ईश्वर के यथार्थ स्वरूप को न जानने व बताने के कारण वैज्ञानिक बुद्धिवाले मनुष्यों को सन्तुष्ट नहीं कर पाते। इसलिए संसार का एक बहुत बड़ा बौद्धिक वर्ग नास्तिक बन गया है। यूरोप व अन्य देशों में उत्पन्न हुए कुछ प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने वहां प्रचलित नाना मत-मतान्तरों की ईश्वर विषयक मान्यताओं से सन्तुष्ट न होने के कारण संसार में ईश्वर के विद्यमान न होने की घोषणा की। इसका दोष अविद्यायुक्त सभी मत-मतान्तरों पर ही है। यह मत-मतान्तरों की अक्षमता है। वैदिक धर्म में ईश्वर का बुद्धिसंगत एवं सृष्टि में विद्यमान ईश्वर के गुणों के अनुरूप स्वरूप का वर्णन हुआ है। वैदिक विचारधारा से जुड़े सभी विद्वान व वैज्ञानिक ईश्वर को मानते व इसका युक्ति एवं तर्क आदि प्रमाणों से समर्थन एवं प्रचार करते हैं। हमारा विचार है कि यदि यूरोप आदि सभी देशों के वैज्ञानिक वेद वा ऋषि दयानन्द द्वारा उद्घाटित ईश्वर के अस्तित्व के प्रमाणों पर एक बार दृष्टिपात कर लें तो वह अवश्य ईश्वर के अस्तित्व को न केवल स्वीकार ही कर लेंगे अपितु ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करना भी आरम्भ कर देंगे। यदि आज ऋषि दयानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी और स्वामी श्रद्धानन्द जी आदि लोग जीवित होते तो यह कार्य पूर्ण हो गया होता। इसके लिए हमारे विद्वानों को ईश्वर के समर्थन में प्रामाणिक लेखन कर उसे वैज्ञानिकों तक पहुंचाना चाहिये। वेद आज के भी और भविष्य के भी सभी मनुष्यो के प्रमाणिक एकमात्र धर्म ग्रन्थ हैं। ऋषि दयानन्द के शब्दों में ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।’ विवेक पूर्वक वेदों के प्रचार द्वारा जितनी वेदों की प्रतिष्ठा बढ़ेगी उतना ही संसार से अज्ञान मिटेगा और देश व विश्व में शान्ति में वृद्धि होगी। ओ३म् शम्।

 

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