लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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सत्ता में विराजने के बजाए कांग्रेस में नई जान फूंकने उतरे राहुल

वे कहते हैं उन्हें युवराज मत कहिए पर लोग तो उन्हें यही मानते हैं। बात कहने से आगे मानने की है। उनके साथ एक ऐसे परिवार का नाम जुड़ा है जो उन्हें आम नहीं रहने देता। राहुल गांधी अपनी तमाम भद्र छवियों के बीच भारत के प्रथम परिवार की छाया से मुक्त नहीं हो सकते। वे सही मायने में एक सच्चे उत्तराधिकारी हैं क्योंकि उन्होंने सत्ता में रहते हुए भी सत्ता के प्रति आसक्ति न दिखाकर यह साबित कर दिया है उनमें श्रम, रचनाशीलता और इंतजार तीनों हैं।

सत्ता पाकर अधीर होनेवाली पीढ़ी से अलग वे कांग्रेस में संगठन की पुर्नवापसी का प्रतीक बन गए हैं। कांग्रेस, जहां सत्ता और संगठन एकमेक से दिखते थे, जैसी पार्टी में उनकी मां श्रीमती सोनिया गांधी के साथ संगठन को दुरूस्त करने में जुटे राहुल एक बदली हुयी हवा के प्रतीक बन गए हैं। कांग्रेस में यह संगठन के जीवित होकर खड़े होने और संभलने का भी वक्त है। 125 साल पुरानी पार्टी का यह नायक यूं ही अपने को महत्वपूर्ण होते नहीं देखना चाहता वह मैदान में उतरकर उसकी हकीकतों की थाह लेना चाहता है। उनके भारत की खोज यात्राओं पर उन्हें उपहास से मत देखिए यह एक ऐसा काम है जिसे बहुत से सत्ता के पिपासुओं को करना चाहिए था, पर कर तो इसे राहुल ही रहे हैं- यह सिर्फ इसलिए कि वे हैं ही खास। वे अपने परिवार की अहमियत को समझते हैं, शायद इसीलिए उन्होंने कहा- ‘मैं राजनीतिक परिवार से न होता तो यहां नहीं होता। आपके पास पैसा नहीं है, परिवार या दोस्त राजनीति में नहीं हैं तो आप राजनीति में नहीं आ सकते, मैं इसे बदलना चाहता हूं।’

जाहिर तौर पर वे कांग्रेस में एक नई पीढ़ी का इंतजार कर रहे हैं। देश भर में युवाओं को तलाशते राहुल अपनी पीढ़ी के सही प्रतिनिधियों की तलाश में हैं। युवा और हाशिए पर खड़े वंचित लोग उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। उनकी राजनीति को जहां युवाओं से संगठनात्मक मजबूती मिलेगी वहीं आखिरी पायदान के आदमी की चिंता करते हुए वे अपने दल का जनाधार बढ़ाना चाहते हैं। नरेगा जैसी योजनाओं पर उनकी सर्तक दृष्ठि और दलितों के यहां ठहरने और भोजन करने के उनके कार्यक्रम इसी रणनीति का हिस्सा हैं। सही मायनों में वे कांग्रेस के वापस आ रहे आत्मविश्वास का भी प्रतीक हैं। अपने गृहराज्य उप्र को उन्होंने अपनी प्रयोगशाला बनाया है। जहां लगभग मृतप्राय हो चुकी कांग्रेस को उन्होंने पिछले चुनावों में अकेले दम पर खड़ा किया और आए परिणामों ने साबित किया कि राहुल सही थे। उनके फैसले ने कांग्रेस को उप्र में आत्मविश्वास तो दिया ही साथ ही देश की राजनीति में राहुल के हस्तक्षेप को भी साबित किया। उनकी प्रयोगशाला में आज उनकी अहमियत स्वीकारी जा चुकी है। केंद्र में कांग्रेस की वापसी ने सही मायने में राहुल ब्रिगेड को आत्मविश्वास को बहुत बढ़ा दिया है। राहुल भी इसे समझते हैं और अवसर का लाभ देखते हुए वे इस हौसले को स्थाई ताकत में बदलना चाहते हैं। कांग्रेस संगठन में जोश और ताकत फूंकने की उनकी कवायद इसी सोची समझी नीति का हिस्सा है। शायद इसीलिए सत्ता के मोह में फंसने के बजाए उन्होंने संधर्ष का पथ चुना। उप्र की मुख्यमंत्री मायावती की राहुल के दौरों पर की गयी टिप्पणियां इस बात की गवाही हैं कि राहुल का जादू कहीं न कहीं चल रहा है जिससे बसपा और सपा दोनों में खासी घबराहट है। राहुल भी इस बात को समझते हैं। वे जानते हैं उप्र का मैदान जीते बिना गांधी परिवार को वह ताकत नहीं मिल सकती जिसका वह अभ्यासी है। उप्र उनका गृहराज्य होने के नाते एक बड़ी चुनौती है। राहुल ने इस चुनौती को स्वीकारा है।

राहुल गांधी की सबसे बड़ी खूबी है कि वे शुचिता की राजनीति के हिमायती हैं। अपराध और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी चिंताएं साफ दिखती हैं। राजनीति में बेहतर चेहरों के प्रवेश के वे हिमायती हैं। जब वे यह कहते हैं कि “मैं तो बस युवा संगठनों के जरिए हजारों ओबामा तैयार करने की कोशिश कर रहा हूं।” तो उनके बड़े ख्याबों का अंदाजा लग जाता है। राहुल सही मायनों में इन्हीं सपनों के साथ जी रहे हैं और उन्हें सच करने की कोशिशें भी कर रहे हैं। कांग्रेस जैसी लगातार सत्ता में रही पार्टी के पास शानदार अतीत के साथ समस्याएं भी कम नहीं हैं। परिवारवाद, भ्रष्टाचार, जातिवाद जैसे तमाम संकट इस दल के साथ भी जुड़े हैं। सत्ता में रहने के नाते गणेश परिक्रमा करने वालों का एक समूह जिसे राहुल के पिता स्व. राजीव गांधी ने सत्ता के दलाल कहकर संबोधित किया था, एक बड़ी चुनौती हैं। इनसे निपटना और रास्ते निकालना साधारण नहीं होता। किंतु आज यह कांग्रेस के लिए एक राहत की बात है शिखर पर बैठे तीनों नेता सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह व राहुल गांधी की सोच लगभग इन मुद्दों पर साफ है।

राहुल गांधी ने जहां नई आर्थिक नीतियों के पैरोकारों को मानवीय चेहरा अपनाने के लिए सुझाव दिया वहीं आम आदमी की चिंता आज सत्ता की चिंता बनी है। सरकार के काम पर निगरानी रखने के लिए भी एक ताकत आज केंद्र में दिखती है तो इसका कारण राहुल का सत्ता में न होना ही है। सरकार के कामकाज पर नजर रखकर जनता के हित साधने के प्रयासों में अगर तेजी आती है तो इसका लाभ राहुल और कांग्रेस दोनों को मिलेगा। आज मंहगाई के मामले पर केंद्र के मंत्रियों पर गहरा दबाव है तो इसके पीछे भी संगठन की ही ताकत है। बदलाव के दौर से गुजर रही कांग्रेस का नायक देश को समझने और बूझने में लगा है। वे अपना पाठ पढ़ रहे हैं। कांग्रेस में भी प्रशिक्षण और राजनीतिक शिक्षण की जरूरत को समझा जा रहा है। नया नायक जानता है कि भावनात्मक नारों से एक- दो चुनाव जीते जा सकते हैं किंतु सत्ता का स्थायित्व सही कदमों से ही संभव है। सत्ता में रहकर भी सत्ता से निरपेक्ष रहना साधारण नहीं होता, राहुल इसे कर पा रहे हैं तो यह साधारण नहीं हैं। लोकतंत्र का पाठ यही है कि सबसे आखिरी आदमी की चिंता होनी ही नहीं, दिखनी भी चाहिए। राहुल ने इस मंत्र को पढ़ लिया है। वे परिवार के तमाम नायकों की तरह चमत्कारी नहीं है। उन्हें पता है वे कि नेहरू, इंदिरा या राजीव नहीं है। सो उन्होंने चमत्कारों के बजाए काम पर अपना फोकस किया है। शायद इसीलिए राहुल कहते हैं-“ मेरे पास चालीस साल की उम्र में प्रधानमंत्री बनने लायक अनुभव नहीं है, मेरे पिता की बात अलग थी। ” राहुल का यह बयान बताता है कि वे सही विश्लेषण की ताकत भी रखते हैं।संगठन से चेला,चमचा और चापलूस तीनों को राहुल ने विदा करने की ठानी है। उनके करीब आप तभी जा सकते हैं जब आपके बात कहने और बताने को कुछ हो। वे कहते हैं- “ जब मैं किसी से मिलता हूं तो बहुत सावधानी से उन्हें सुनता हूं । आप दूसरों से सुनकर बहुत कुछ सीख सकते हैं, सीखना मेरा काम है। ” राहुल की यही विनम्रता उन्हें और औरों से अलग कर रही है। ये खुद को युवराज कहे जाने से दुखी हुए और इसका सार्वजनिक इजहार भी किया। राजनीति के दुर्गम पथ पर देर से आए इस शहजादे ने इसे लिए पहले कंटीले रास्ते चुने हैं, झोपडियां चुनी हैं, दलितों की बस्तियां चुनी हैं क्योंकि उन्हें पता है लोकतंत्र का राजपथ इन्ही रास्तों से होकर गुजरता है। वे शालीनता की राजनीति के राही बने हैं, लोगों से जुड़ने की कोशिशें उन्हें एक नायक में बदल देती हैं जो कुछ बदलना भी चाहता है। उनके भाग्य ने उन्हें गांधी परिवार का वारिस बनाया है किंतु उनकी अग्रगामी सोच से उनकी पार्टी अगर तालमेल बिठा सकी तो राहुल एक नया इतिहास भी रच सकते हैं। भारत के भावी शासक की ओर देखती जनता अभी तो उन्हें सधे कदमों से आगे बढ़ने के लिए शुभकामनाएं ही दे सकती है।

-संजय द्विवेदी

4 Responses to “सड़क पर उतरा शहजादा”

  1. Amba Charan

    राहुल किस वंशवादी व्यवस्था का विरोध करते हैं? लगता हैं उन्हें केवल दूसरे दलों का ही वंशवाद अखरता है। गांधी परिवार ने तो रायबरेली और अमेठी संसदीय क्षेत्रों को अपनी जददी जायदाद बना रखा है। रायबरेली और अमेठी से तो उन्होंने कभी अपने परिवार से अन्य किसी व्यक्ति को चुनाव ही लड़ने नहीं दिया। क्या इन दोनों क्षेत्रों में योग्य युवा व महिला व्यक्तियों का इतना अकाल है कि उन्हें दिल्ली से नेता ‘इम्पोर्ट’ करने पड़ते हैं। श्रीमति सोनिया गांधी और राहुल बाबा हमें यह कह कर मूर्ख बनाना चाहते हैं कि उनके दोनों संसदीय चुनाव क्षेत्रों में प्रतिभा का अकाल है?

    अच्छा होगा कि दोनों मां-बेटा नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने व परिवार व वंशवाद पर अपने ढकोंसलों को बन्द करें।

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  2. विकास आनन्द

    vikash Anand

    प्रवक्‍ता पर पंकजजी का लिखा ‘खिसियायें नहीं सीखें राहुल गांधी से’ लेख पढा। लेखक ने वास्‍तविकता को नजरअंदाज किया है। मीडिया के झांसे में आकर राहुल गांधी की राजनीति से प्रभावित हो जाना दुर्भाग्‍यपूर्ण है। यहां हम लेखक की आंखें खोलने के लिए सिर्फ कुछ ही तथ्‍यों को प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

    गौरतलब है कि राहुल गांधी प्रदेश अध्‍यक्ष एवं युवा कांग्रेस में प्रजातांत्रिक ढंग से चुनाव की हामी तो भरते हैं पर कहीं ऐसा चुनाव करा नहीं पाए। राहुल वंशवाद के विरोधी तो हैं लेकिन वंशवाद की ही रोटी तोड रहे हैं। उनकी माताश्री पिछले 14 सालों से राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बनी बैठी हैं। न उनकी माताश्री और न स्‍वयं राहुल गांधी ने सामान्‍य कांग्रेस पार्टी के रूप में सेवा की। वे तो पैराशूट से राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष एवं राष्‍ट्रीय महामंत्री के पद पर बैठ गए। हैरानी की बात तो यह है कि जिस सोनिया ने कांग्रेस परिवार में अपनी शादी के बाद 20 वर्षों तक कांग्रेस पार्टी को साधारण सदस्‍यता के योग्‍य न समझा और वही मार्च 1996 में साधारण सदस्‍य बनीं और तीन मास के अंदर ही पार्टी की राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बन बैठी। राहुल गांधी ऐसे मुद्दों पर अपनी जुबान अवश्‍य खोलते हैं जिनसे उन्‍हें स्‍वयं को वाहवाही और पार्टी को वोट मिलते हैं। वे तो दलितों के बडे मसीहा बनते हैं पर प्रतिदिन बढती कीमतों के बीच पिस रहे दलितों का ध्‍यान नहीं करते और बढती कीमतों पर अपनी जुबान बंद रखते हैं। कलावती को प्रसिद्धि तो दी पर जो उससे वादा किया उसे पूरा नहीं किया। तो ऐसे व्‍यक्ति को क्‍या भारत का युवक आदर्श मान सकते हैं।
    लेखक शायद यह भी भूल रहे हैं कि राहुल गांधी उस परिवार से ताल्‍लुक रखते हैं जो खाता तो भारत का है, जो सत्ता-भोग तो भारत में करता है और भारतीयता से प्‍यार का ढोंग रचाता है। पर जब विवाह की बात आती है तो उसके पिता राजीव गांधी को कोई भारतीय युवती भा न सकी और यही रिपोर्ट यही राहुल के बारे में भी आ रही है। कहां तक सच है यह तो वही जाने पर इतनी उम्र बीत जाने के बाद भी विवाह की बातें टाली जाती हैं तो लगता है धुंआ यूं ही नहीं उठ रहा।

    एक बार नहीं अनेकों बार उन्‍होंने जब मुंह खोला है तो बचकानी बातें ही की हैं। उनके भारतीय इतिहास ज्ञान पर तरस आता है। असल में वे मुस्लिम वोट को ही बटोरना चाहते हैं। यही कारण है कि उन्‍होंने एक बार यह कह डाला कि यदि उनके पापा और परिवार का कोई सदस्‍य 1992 में सक्रिय राजनीति में होता तो बाबरी मस्जिद नहीं ढहता। पर उन्‍होंने यह नहीं बताया कि उनकी माताजी को तब सक्रिय होने से किसने रोका नहीं था। अब हलवा-मंडा खाने के लिए कांग्रेस के युवराज अवश्‍य आगे आ रहे हैं।

    एक बार तो राहुल गांधी ने तहलका साप्‍ताहिक से वार्ता में यह भी कह दिया था कि मैं चाहता तो पच्‍चीस वर्ष की आयु में ही देश का प्रधानमंत्री बन जाता। यह उन्‍होंने जिस आधार पर कहा उसी वंशवाद के विरोध का ढोल राहुल गांधी पीट रहे हैं। यह अलग बात है कि तब तहलका के संपादक ने उनकी झेंप को मिटाने के लिए कह दिया था कि राहुल ने अनौपचारिक भेंट में कहा था पर सत्‍य तो सत्‍य है। डींग तो राहुलजी ने अवश्‍य मारी थी चाहे वह अनौपचारिक बातचीत में हो या अनौपचारिक बातचीत में।

    आज तक उन्‍होंने गरीबी और भ्रष्‍टाचार पर मुंह नहीं खोला क्‍योंकि उनकी अपनी और पार्टी की पोल खुल जाएगी। लगता है लेखक पंकजजी मीडिया की बयार में बह गए हैं। सच्‍चाई तो यह है कि राहुल गांधी का राजनीतिक गुब्‍बारा मीडिया ने ही फुलाया है जो कभी भी फूट सकता है।

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  3. om prakash shukla

    sanjaiji apka buletin padh ker malum ho gaya ki hindustan me patricaritaka itana kyo gir raha hai,apne to ptrikaria ka kamsekam itana to saman rakha hota ki is tarah ki chaplusi bhara lekh chadm nam se likhate apne to samanya natic imandari bhi dikhane ki koshis nahi ki ye bhi nahi socha koi vidyarthi ise kya prerada lega.mai to ek samanya pathak ho ljo ankh khuli rakh kar sara drama dekh raha hai.apse kuch bate jana chahta hu kripya ek profesor hane kr nate mujh jaise logo ka margdarshan karege isi asha me.1.congress ke yuvraj ko hindustan ke yuvak sirf shahro ke conwent me hi kyo najar ate hai.dehat ke kitane college me nuolawano ke sampark kiya. 2.maharashtra ke chunaw me rajnatiko ke khandan walo ko hi tikete dene ki kya vavshata thi 3.yuvak congress ka president bhi ek purve matri ke bete ko banane ki kya majburi thi. .4.desh ki jwalunt sawalo par unki pratkriya kyo nahi ati.chahe mahagai jaisi jwalant samasya hi kyo na ho.5.jab mahgai par itana bilub se congress cheti aur vichar ke liye rashtriya karyasamiti ki bathak ho rahi thi to garhazir rah kar maharashtra aur bihar me vote bank ki rajnet kyo kar rahe the. 6.mowvadiyo ka itana bada sangharsh chal raha hai uspar ek shabd bhi na balna kaha ki natikata hai. 7.hindustan ka pradhan mantri rajya sabha se ho sakta hai ye suvidhan me hoga lekin dusare karya kal me bhi bagar chanaw lade pradhan mantri ghoshit kar chunaw me utarana kaha ki natikta hai. 8.sanchar mantri raja dwara ghosit rup se 50,000 hazar karod ka ghotala hone par manmohan singh dwara cleen cit dilwana kaha ki natikata hai. 9.kya dalit kewal uttar pradesh me hi shoshit aur garib hai baki desh me kyo unake ghar nahi jate. 10.kya sirf dalit hi garib hai aur jatio me koi garib nahi hai unake ghar kab gaye. 11.kya uttar pradesh ka matalab sirf amethi aur raibareli hai,kya ek pradhan mantri ke pratyashi se kuch adhik ki umid nahi honi chahiye. 12.sirf apni parti ka sanghtan khada karana hi bharat nirvan ke liye kya kiye. 13.jaha congress viodhi dal hai janta ke sangharsh me kaha khade hue. 13.ek pradhanmantri ke hote huye bagar sadasyo ke samarthan ke pratyashi ghoshi ho pradhanmantri ka apman nahi kar rahe hai.inaki nani indira gandhi ke pradhanmantri rahte sambhaw tha. 14.apka ye kahana ki rahul sonia tyag ki murti hai sahi hai kya jai prakash narayan,nanaji deshmukh satta ki rajneet ko thokar mar janta ki seva me nahi rahe.unako bhul ek aparipaqo yuva ko itana chadhadena patrikaritiya natikata hai. wah bhi usake liye jise abhi kuch din pahale hindi ya kisi tarah bhasad dena na ata ho is tarah churadvandna karana natikta hai 15.ek loktantric desh aur loktantric pari me kisi tarah ke virodh ko bardast na kar pan kamse kum natikta to nahi hi hai. 16.pichali karyakal me kul jama 3bar loksabha me janta ki samasyao par bol kar apne ko primeminister in wating ka khitab hasil karana uchit hai. ha ye jarur hai ki apko padh kar lagta hai ki rahul ek kushal prabandhak hai jo bahut hi safai ke sath patrakaro ke utpdan ki facty ko hi manej kar liye hai,jisase dalal darban type ke prakar hi pada ho. na rahega bans na bajegi basiri.wo buisnece schcol ke product hai wq bhi multinational ke prasicchit unhe malum hai ki ap logo ko ki kya kimat hai aur kitane me bikoge.dwivediji maf kiliyega maine kuch kade shabdo ka prayog kiya hai wah bh firf is liye ki ap patrakarita wo makhanlal chaturvedi ke nam se jude viswavidyalay ke,to apse kamse kum patrakarita ke samanya usulo ki umid hoti hai.yakin manie agar ap chadm nam se likhte to to apka likh mai hi nahi hamare jaise tamam log padhte hi nahi,likhne laya to kuch hai hi nahi ha congress ke juta uthau netao ke liye jaurur gita,ramayan se kam mahatvapurd nahi hai apka likh.ek bar fir chamayachana sahit.asha hai mere sahit tamam logo ki jigyasa shant karege.

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  4. सुरेश चिपलूनकर

    सुरेश चिपलूनकर

    वाह, क्या शानदार चित्र खींचा है… लेकिन चुनाव दूर हैं अभी तो…क्या कांग्रेस बीच में भी पैसा रिलीज़ करती है विज्ञापन के लिये?

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