‘पं. युधिष्ठिर मीमांसक और उनके आर्यसमाज विषयक कुछ विचार’

-मनमोहन कुमार आर्य,

आर्यजगत् के उच्च कोटि के कीर्तिशेष विद्वान पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी ने एक महत्वपूर्ण पुस्तक ‘मेरी दृष्टि में स्वामी दयाननद सरस्वती और उनका कार्य’ लिखी है। इसका दूसरा संस्करण सन् 1994 में प्रकाशित हुआ था। इस पुस्तक के प्रथम संस्करण के आमुख में पंडित युधिष्ठिर मीमांसक जी ने ‘गुरुवर्य की इच्छापूर्ति में प्रवृत्त होना’ शीर्षक से अपने कुछ विचार प्रस्तुत किये हैं। हम इस शीर्षक के अन्तर्गत उनके कुछ आरम्भिक विचारों को प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं ‘अध्ययन काल की समाप्ति के समकाल ही 25 दिसम्बर 1935 को पिताजी का अचानक स्वर्गवास हो गया। मैं न माता की सेवा कर सका न पिताजी की। अतः मैंने निश्चय किया कि अब मेरे लिये एकमात्र गुरुजी ही ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी आज्ञा का पालन करना मेरा एकमात्र कर्तव्य है। इस दृष्टि से उनके निधन पर्यन्त उनके निर्देश में काम करता रहा (मध्य में कुछ वर्ष छोड़कर) और उनके निधन के पश्चात् उनके आरम्भ किये कार्य को पूरा करने में लग गया।

2 मई 1936 को मेरा श्रीमती यशोदा देवी (नर्मदा देवी) के साथ विवाह हुआ। यह देवी भी मेरे व्रत को निभाने में परम सहायिका हुई। इस जन्म में जो कुछ भी मैंने सफलता प्राप्त की, उसमें माता पिता और आचार्य के पश्चात् इस देवी का योगदान सबसे अधिक रहा। यदि इस सहधर्मचारिणी का पूरा सहयोग प्राप्त न होता तो मैं भी अन्य साधारण साक्षर व्यक्तियों जैसा ही रहता। अस्तु।

माता पिता की वेदपाठी ब्राह्मण बनाने की इच्छा थी। मैं उनकी इच्छानुरूप तो नहीं बन सका, हां प्रयत्न अवश्य किया है। ब्राह्मणत्व का अधिकारी बनने के लिये स्वाध्याय प्रवचन का संकल्प और अप्रतिग्रही होना आवश्यक है। इन तीनों की ओर अपना यथासम्भव ध्यान दिया है। इससे बहुधा संकटों का भी सामना करना पड़ा, परन्तु देवी के सहयोग और धैर्य के कारण परीक्षाकाल निवृत्त हुआ।

मेरा जन्म भाद्र शुक्ला 8 सम्वत् 1966 तदनुसार 22 सितम्बर सन् 1909 में हुआ। इस प्रकार मेरे वयः के 80 वर्ष पूर्ण हुए। (यह पंक्तियां पण्डित जी ने वर्ष 1989 के अन्त में लिखी होंगी) इस काल में मैंने शिक्षा से लेकर मीमांसा पर्यन्त अंगोपांगों का स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रदर्शित पाठविधि के अध्ययन किया है। संस्कृत वांगमय के वैदिक और अवैदिक उभयविध मह्ती ग्रन्थराशि का अध्ययन मनन और पारायण किया, संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास (3 भाग), वैदिक स्वर मीमींसा, वैदिक छन्दो मीमांसा सदृश मौलिक ग्रन्थ लिखे, अनेक दुर्लभ प्राचीन वैदिक ग्रन्थों तथा स्वामी दयानन्द सरस्वती की महती ग्रन्थराशि का शोधोपयोगी सम्पादन और प्रकाशन किया। आर्यसमाज और परोपकारिणी सभा के साथ सम्पर्क रहा। इस सबका समुदित प्रभाव मेरे मन पर यह पड़ा कि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने विद्याबल और तपोबल से वेदोद्धार और वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार का जो कार्य किया, उसका शतांश भी उनके द्वारा स्थापित इन सभाओं ने नहीं किया। जो कुछ कार्य हुआ, वह अधिकतर व्यक्तिगत प्रयासों का फल है। इतना ही नहीं, अब तो आर्यसमाज के द्वारा जो कार्य हो रहा है, उसका 75 प्रतिशत स्वामी दयानन्द सरस्वती के मन्तव्यों के विपरीत हो रहा है। सम्प्रति तो सामान्य व्यक्तियों और आर्यसमाजियों में कोई अन्तर ही नहीं है। यह सब गिरावट आर्यसमाज के नियमों की विशेषकर 3-4-5 की उपेक्षा के कारण हुआ है।

विद्वान लेखक ने उपुर्यक्त कुछ पंक्तियां ऐसी लिखी हैं जो समाजों व सभाओं को दर्पण दिखाने के समान हैं। इन पर आर्यसमाज और सभाओं सहित ऋषि भक्त विद्वानों को विचार करना चाहिये और जहां आवश्यकता हो वहां अपनी कार्य व प्रचार शैली बदलनी चाहिये।

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