सूना हो गया नदी का घर

एक वर्ष से केंद्रीय पर्यावरण मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे अनिल माधव दवे का जन्म 6 जुलाई, 1956 को उज्जैन के भदनगर में हुआ था। उनके पिता का नाम माधव दवे और माता का नाम पुष्पा देवी था। उन्होंने इंदौर स्थित गुजराती महाविद्यालय से एमकॉम की डिग्री हासिल की। उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही अपने राजनीतिक और सामाजिक सफर की शुरुआत कर दी थी। अपने महाविद्यालय के छात्र अध्यक्ष चुने गए।

माँ नर्मदा के सेवक और उसके सुयोग्य बेटे अनिल माधव दवे के देवलोक चले जाने की खबर ऐसी है कि सहसा उस पर भरोसा करना कठिन होता है। उनका नाम आते ही सदैव मुस्कुराता हुआ चेहरा, शांत चित्त और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर व्यक्तित्व हमारे सामने उपस्थित होता है। उनके जिक्र के साथ नकारात्मक भाव, उदासी और खालीपन मेल नहीं खाता। इसलिए ही हृदयघात के कारण उनकी मृत्यु की खबर अविश्वसनीय प्रतीत होती है। लेकिन, सत्य यही है। अनेक संभावनाओं से भरा एक संत राजनेता भारतीय राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में रचनात्मकता की एक बड़ी लकीर खींचकर चला गया है। स्व. अनिल माधव दवे की पहचान आम राजनेता की नहीं थी। वह धवल राजनीति के पैरोकार थे। लिखने-पढ़ने वाले और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की गहरी समझ रखने वाले राजनेता के तौर पर उनको याद किया जाएगा। वह जब किसी गंभीर विषय पर बोल रहे होते थे, तब सभा/संगोष्ठी में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति ध्यानपूर्वक उनको सुनता था। उनकी वाणी में गजब का माधुर्य था। कर्म एवं वचन में समानता होने और गहरा अध्ययन होने के कारण, उनकी कही बातों का गहरा असर होता था। उनके प्रति एक बौद्धिक आकर्षण था। राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में एक ऊंचाई प्राप्त करने के बाद भी किसी फलदार वृक्ष की भांति उनका स्वभाव सदैव विनम्र ही रहता था। यही कारण था कि उनका सम्मान भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं, अपितु विरोधी राजनीतिक दल में भी था। सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय सभी विचारधारा के लोग और संगठन भी उनसे विचार-विमर्श करते थे।

पर्यावरण के प्रति उनकी संवेदनाएं और पर्यावरण संरक्षण में सक्रियता के कारण वह बाकी नेताओं से अलग नजर आते थे। उनके जैसे राजनेताओं के कारण ही भारतीय लोकतंत्र समृद्ध है। पर्यावरण के प्रति वो सदैव सजग और चिंतित रहे हैं। मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा के दर्द को उन्होंने आत्मसात कर लिया था। सदानीरा माँ नर्मदा के संरक्षण को उन्होंने अपने जीवन का ध्येय बना लिया था। नर्मदा नदी की सेवा के लिए उन्होंने संस्था ‘नर्मदा समग्र’ की स्थापना की। नर्मदा समग्र के माध्यम से उन्होंने नर्मदा की दुर्दशा के प्रति सबका ध्यान नहीं खींचा, अपितु नर्मदा संरक्षण की पहल भी प्रारम्भ भी। नर्मदा को अपने मन में गहरे तक उतारने के लिए उन्होंने 19 दिन में 1312 किमी यात्रा तय की थी। नर्मदा के साथ उनका रिश्ता इतना प्रगाढ़ हो गया कि वह ‘नर्मदा के घर’ में ही रहने लगे। भोपाल में उन्होंने अपने आवास को ‘नदी का घर’ नाम दिया। नर्मदा समग्र का कार्यालय भी यहीं है। यह पहली बार होगा जब किसी ने नदी संरक्षण के लिए अपनी प्रतिबद्धता को इस तरह भी प्रकट किया। एक आवास के सामने की दीवार पर लिखा ‘नदी का घर’ और उसके साथ ही अंकित ‘नदी का चित्र’ लोगों को प्रतिदिन नदी संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जागरूक करता है। आज उनकी अनुपस्थिति के कारण नदी का घर उदास है, सूना है। बहरहाल, पर्यावरण मुद्दों पर जागरूकता अभियान चलाने के लिए उन्होंने ‘नदी उत्सव’ जैसा अंतरराष्ट्रीय आयोजन किया, जो अपने आप में अनूठा था। इस उत्सव के दौरान नदी संरक्षण से लेकर जलवायु परिवर्तन के मुद्दे उठाये गये। एक गम्भीर चिंतक और लेखक के तौर पर भी उनका एक स्थान है। पर्यावरण को बचाने के लिए उन्होंने कई किताबें भी लिखीं। सृजन से विसर्जन तक, चंद्र शेखर आजाद, संभल के रहना घर में छुपे हुए गद्दारों से, शताब्दी के पांच काले पन्ने, नर्मदा समग्र, शिवाजी और सुराज, रोटी और कमल की कहानी, अमरकंटक से अमरकंटक तक एवं शिवाजी और सुराज जैसी किताब शामिल हैं। शिवाजी की शासन-प्रशासन व्यवस्था पर उनका गहरा अध्ययन था।

एक वर्ष से केंद्रीय पर्यावरण मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे अनिल माधव दवे का जन्म 6 जुलाई, 1956 को उज्जैन के भदनगर में हुआ था। उनके पिता का नाम माधव दवे और माता का नाम पुष्पा देवी था। उन्होंने इंदौर स्थित गुजराती महाविद्यालय से एमकॉम की डिग्री हासिल की। उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही अपने राजनीतिक और सामाजिक सफर की शुरुआत कर दी थी। अपने महाविद्यालय के छात्र अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने अपने साथियों के साथ भारतीय राजनीति की तस्वीर बदलने वाले जेपी आंदोलन में हिस्सा लिया। देश सेवा का प्रण उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समीप ले आया। अनिल जी वर्षों तक संघ के जीवनवृत्ति प्रचारक बने। अपने प्रबंधकीय कौशल के लिए भी उन्हें याद किया जाएगा। चुनाव हों या फिर अन्य सामाजिक महत्व के आयोजन, उनके प्रबंधन में अनिल माधव दवे सिद्ध थे। उनके रणनीतिक कौशल और प्रबंधन अद्भुत था। मध्यप्रदेश में पिछले चुनाव के समय जब भाजपा को सत्ता की डगर कठिन महसूस हो रही थी, तब सुनिश्चित विजय की योजना की जिम्मेदारी दवे जी को ही सौंपी गई। इससे पहले के चुनाव में भी भाजपा के जीत का रोडमैप बनाने में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई थी। मध्यप्रदेश में जब ‘विश्व हिंदी सम्मेलन’ के आयोजन का जिम्मा आया तो उसके आयोजन के लिए अनिल जी ही आगे आये। सिंहस्थ महाकुम्भ के दौरान भारत की प्राचीन विचार-विमर्श की परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए ‘अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुम्भ’ का सफलता के साथ आयोजन भी अनिल जी की प्रबंधन क्षमता के कारण संभव हो सका। बहरहाल, हम कह सकते हैं कि अनिल माधव दवे एक व्यक्ति ही नहीं, अपितु समाज को समर्पित एक संस्था भी थे। भले ही भौतिक रूप से वो नदी के घर से चले गए हों, लेकिन उनका व्यक्तित्व, उनकी लेखनी और उनकी खींची लकीरें रचनात्मक कार्य करने वाले लोगों को आकर्षित और प्रेरित करती रहेंगी। हालांकि, जब नए भारत की इबारत लिखी जा रही है, तब उनके चले जाने से राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में लंबे समय तक एक शून्य उपस्थित रहेगा।

1 thought on “सूना हो गया नदी का घर

  1. पढते पढते ही नतमस्तक अनुभव कर रहा हूँ।
    उनकी चरण रज मेरे माथे!

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