लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 की चर्चा आम तौर पर होती ही रहती है । लेकिन आजकल कुछ ज़्यादा ही हो रही है क्योंकि एक और अनुच्छेद 35 A उसके पिछवाड़े में पकड़ा गया है , जिसके बारे में अब विधि विशारद कह रहे हैं कि वह भी अनुच्छेद 370 के कारण ही अवतरित हो सका  है । लेकिन एक बात समझ से परे है है कि भारत का संविधान अधिकृत रुप से छापने वाले विधि मंत्रालय ने उसे इतने लम्बे अरसे तक यत्नपूर्वक पिछवाड़े में छिपा कर क्यों रखा ? परन्तु इससे एक लाभ भी  हुआ है । इस पुनः उभरे विवाद के कारण एक बार फिर अनुच्छेद 370 की जामा तलाशी शुरु हो गई है । इस जामा तलाशी में इस अनुच्छेद के अन्दर काफ़ी मात्रा में बेकार हो चुका सामान मिला है , जिसको लेकर स्वच्छता अभियान के लोग उत्साह में आए हैं लेकिन जम्मू कश्मीर के बकरा दल ने भी अपने सींग तीखे करने शुरु कर दिए हैं । उसका कहना है कि अनुच्छेद 370 के अन्दर से यह कूड़ा निकाला गया तो जम्मू कश्मीर की स्वायत्तता और उसका विशेष दर्जा ख़तरे में पड़ जाएगा । लेकिन तीखे हो रहे सींगों के बीच भी अनुच्छेद 370  के खोल में छिपे बेकार सामान की शिनाख्त करना लाज़िमी हो गया है ताकि यह निरीक्षण ही हो सके कि इस सामान का कश्मीर के दर्जा-ए-ख़ास से ताल्लुक़ है भी या कुछ लोगों ने अपनी राजनैतिक कांगडी गर्माए रखने के लिए शोर मचाना शुरु किया है ।

संस्कृत में कहावत है प्रथम ग्रासे मक्षिका अर्थात पहले कौर में ही मक्खी आ गई । यही स्थिति अनुच्छेद 370 की है । इस अनुच्छेद के पहले वाक्य (370(1)( a) के अनुसार जम्मू कश्मीर पर संघीय संविधान का अनुच्छेद 238 लागू नहीं होगा । लेकिन इस वक़्त संघीय संविधान में अनुच्छेद 238 के नाम से कोई अनुच्छेद मौजूद ही नहीं है । बहुत साल पहले यह अनुच्छेद भारत के संविधान में विद्यमान होता था  लेकिन बाद में संविधान संशोधन की प्रक्रिया के तमाम विधि विधान को अपना कर उस अनुच्छेद को संविधान में से हटा दिया गया । संघीय संविधान में से अनुच्छेद 238 के विलुप्त हो जाने के बाद अनुच्छेद 370 (1)( a) अपने आप ही अप्रासांगिक हो जाता है । जब संविधान में कोई अनुच्छेद है ही नहीं तो उसके जम्मू कश्मीर में लागू होने या न होने का प्रश्न ही कहाँ बचता है ? अनुच्छेद 238 के मृत हो जाने या संविधान में से उसकी छुट्टी कर दिए जाने के बाद अनुच्छेद 370 की इस घोषणा का कोई अर्थ नहीं रह जाता कि अनुच्छेद 238 जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं होगा । क़ायदे से अनुच्छेद 370 के इस भाग को भी हटाना चाहिए था  क्योंकि सजीव अनुच्छेद 370 का अब यह निर्जीव अंश मात्र बन गया है । लेकिन यह निर्जीव अंश अभी तक भी सजीव  भाग से मज़बूती से चिपका हुआ है और यदि कोई संशोधन करके इस मृत अंग को बाहर निकालने की बात करता है तो श्रीनगर के लाल चौक में पटाखे छूटने लगते हैं कि इससे जम्मू कश्मीर का तथाकथित विशेष दर्जा ख़तरे में पड़ जाएगा ।

इसी प्रकार  अनुच्छेद 370 के दूसरे भाग  (1)( b) की जाँच पड़ताल से भी हैरानकुन तथ्य सामने आते हैं । इस अंश की भाषा कालबाह््य हो गई है ।  अनुच्छेद 370 (1)( b)(i) के अनुसार जम्मू कश्मीर राज्य के लिए क़ानून बनाने की संसद की शक्ति सीमित कर दी गई है । इसके अनुसार संसद जम्मू कश्मीर के लिए संविधान की संघ सूची और समवर्ती सूची के केवल उन विषयों पर क़ानून बना सकती है , जिनके बारे में राष्ट्रपति ने यह घोषणा कर दी हो कि ये विषय उन विषयों के अनुसार ही हैं जिन पर , रियासत ने भारत डोमीनियन में विलय होते समय , डोमीनियन विधानमंडल को विलय पत्र में क़ानून बनाने का अधिकार दिया गया था । इस अनुच्छेद की भाषा से ही स्पष्ट है कि स्थिति 26 जनवरी 1950 से पहले की थी । 26 जनवरी 1950 के बाद भारत डोमीनियन समाप्त हो गया और उसके स्थान पर वैधानिक दृष्टि से भारत गणतंत्र प्रकट हो गया । जम्मू कश्मीर अब भारत डोमीनियन का हिस्सा नहीं बल्कि भारत गणतंत्र का अंग है । इसलिए अनुच्छेद 370 के इस खंड की भाषा पूरी तरह बदलने की जरुरत है । इसमें सीधे सीधे उन विषयों का उल्लेख किया जा सकता है , जिन पर संघीय संसद को क़ानून बनाने का अधिकार है । चाहे ये विषय विलय पत्र से अक्षरक्ष: ही क्यों न उठा लिए जाएँ । अब न तो भारत डोमीनियन विद्यमान है और न ही डोमीनियन विधानमंडल , लेकिन अनुच्छेद 370 अभी भी डोमीनियन की ज़मीन पर ही पैर अंगद की तरह पैर जमाए हुए है । सारा देश 26 जनवरी 1950 को भारत डोमीनियन की विदेशी खाल उतार कर भारत गणतंत्र के अपने प्राचीन मूल रुप में प्रकट हो गया था । जम्मू कश्मीर ने भी ऐसा ही किया था । उसके राजप्रमुख ने भी अन्य राजप्रमुखों की तरह राज्य द्वारा संघीय संविधान को अपनाने की अधिसूचना जारी की थी ।  उसके बाबजूद अनुच्छेद 370 का यह अंश 2017 में भी अपने उसी पुराने लिवास में जम्हाई ले रहा है । लेकिन इस भाषा को बदलने की बात तो दूर, यदि इसके आसपास भी कोई देख लिया जाता है तो सोनिया कांग्रेस से लेकर शेख़ अब्दुल्ला का पूरा कुनबा चिल्लाने लगता है कि इससे राज्य का दर्जा-ए-ख़ास खतरे में पड़ जाएगा । जबकि जम्मू कश्मीर का अवाम भी पूछने लगा है कि क्या राज्य के ये राजनैतिक दल कबाड़ संभाले रहने को ही दर्जा ख़ास मान रहे हैं ?
लेकिन अभी अनुच्छेद 370 की आत्मा तक पहुँचना तो बाक़ी है । इस अनुच्छेद में जम्मू कश्मीर सरकार पर बहुत भारी ज़िम्मेदारियाँ आयद की गई हैं । इसलिए बाक़ायदा स्पष्टीकरण दिया गया है कि आखिर जम्मू कश्मीर सरकार से क्या अभिप्राय है , इसकी व्याख्या  भी की गई है । यह व्याख्या निम्नानुसार है , For the purpose of this article, the Government of the State means the person for the time being recognized by the President on the recommendation of the Legislative Assembly of the State as the Sadr-i-Riyasat of Jammu and Kashmir, acting on the advice of the Council of Ministers of the State for the time being in office. इसका अर्थ हुआ कि राज्य की विधान सभा द्वारा अनुमोदित जिस व्यक्ति को राष्ट्रपति उस समय जम्मू कश्मीर  का सदर-ए-रियासत स्वीकार करेंगे , राज्य की मंत्रि परिषद की सलाह पर कार्य करता हुआ  वह व्यक्ति उस समय ,”राज्य की सरकार” माना जाएगा ।
जम्मू कश्मीर सरकार की यह व्याख्या 1950 में समझ आ सकती थी । उस समय प्रावधान यह था कि जम्मू कश्मीर की विधान सभा सदरे रियासत के पद पर नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को नाम प्रस्तावित करती थी । यदि राष्ट्रपति उस नाम को स्वीकृति दे देते तो वह व्यक्ति सूबे का सदरे रियासत नियुक्त कर दिया जाता था । उस व्यक्ति के लिए लाज़िमी था कि वह अपनी मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करेगा । लेकिन बाद में यह सारी व्यवस्था समाप्त हो गई । जम्मू कश्मीर के अपने संविधान अधिनियम 1957 में ही राज्य की विधान सभा में अनेक संशोधन कर नई व्यवस्थाएँ लागू कर दीं । अब राज्य में सदर-ए-रियासत का कोई पद नहीं है । इसलिए राज्य की विधान सभा द्वारा न तो इस पद के लिए किसी को अनुमोदित करने का प्रश्न शेष बचता है और न ही राष्ट्रपति द्वारा उसको स्वीकृति देने का । अब राज्य में राज्यपाल का पद है और राज्यपाल की नियुक्ति उसी प्रकार होती है जिस प्रकार किसी भी अन्य राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति होती है । इसलिए अनुच्छेद 370 में दी गई राज्य सरकार की पूरी परिभाषा ही अप्रासांगिक हो जाती है । परन्तु फिर भी यह परिभाषा अनुच्छेद से उसी प्रकार चिपकी हुई है जिस प्रकार बंदरिया का मरा हुआ बच्चा भी उसके साथ चिपका रहता है । पंजाबी में एक कहावत है , जिधर गईंयां बेड़ियाँ उधर गए मल्लाह । अर्थात जिधर किश्तियां चली गईं उसी तरफ़ मल्लाह चले गए । अब न राजा रहे न महाराजा , न सदरे रियासत रहे न रियासतें । लेकिन भारतीय संविधान का यह अनुच्छेद अभी भी वहाँ खड़ा पुराना राग अलाप रहा है ।
भीमराव आम्बेडकर भारतीय संविधान को जीवन्त दस्तावेज़ कहते थे । संविधान कोई अजायबघर नहीं है जिसमें टूटी फूटी चीज़ों को संभाल कर रखा जाता है । न ही यह चंडीगढ़ में बनाया गया टेक चन्द का राक गार्डन है जिसे केवल टूटी फूटी चीज़ों से ही बनाया और सजाया गया हो । फिर अनुच्छेद 370 के अन्दर कालक्रम से प्राणहीन हो चुके शब्द और अर्थ क्यों नहीं हटाए जा सकते ? आम्बेडकर तो यह भी मानते थे कि भविष्य की पीढ़ियों पर हम अपने आप को थोप नहीं सकते । वे अपने लिए अपनी जरुरतों के मुताबिक़ उपबन्धों की व्यवस्था कर सकते हैं और उन्हें यह करने का पूरा अधिकार है । इसीलिए उन्होंने संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद डालने से इन्कार कर दिया था ।उनका तर्क था मैं देश की आमें वाली सन्तानें पर एक ख़ास विचारधारा कैसे लाद सकता हूँ ? लेकिन अनुच्छेद 370 का मामला इसके बिल्कुल विपरीत है । अनुच्छेद में परिवर्तन करने या उसे हटाने की बात तो दूर , इस अनुच्छेद के खोल के भीतर के नकारा हो चुके अंगों को बाहर निकाल कर सफ़ाई करने की अनुमति भी नहीं दी जा रही । ऐसा कहा जा रहा है कि अनुच्छेद 370 का दरवाज़ा तभी खुल सकता है जब उस पर लगे ताले की कुंजी जम्मू कश्मीर सरकार राष्ट्रपति को सौंप दें या फिर राष्ट्रपति स्वयं जम्मू कश्मीर सरकार से उस कुंजी की माँग कर लें । राष्ट्रपति तो इस मामले में पहल नहीं कर सकते क्योंकि ख़तरा है कि राज्य सरकार कुंजी देने से इन्कार कर सकती है । जम्मू कश्मीर सरकार ख़ुद कुंजी केन्द्र के हवाले कर देगी -ऐसी संभावना नहीं के बराबर है ।
इस लिए विधायिका को स्वयं इस बात पर विचार करना चाहिए कि अनुच्छेद 370 के भावार्थ को बदले बिना उसकी भाषाई साफ़ सफ़ाई की व्यवस्था की जाए । वैसे भी भारत सरकार ने स्वच्छता अभियान चला रखा है । लगे हाथ अनुच्छेद 370 में भी साफ़ सफ़ाई कर ली जाए तो भाव और अर्थ दोनों  की रक्षा हो जाएगी । यह अलग बात है कि जम्मू कश्मीर में जिनका आर्थिक और राजनैतिक स्वार्थ अनुच्छेद 370 से ही चलता है , वे जरुर रुदाली रुदन करेंगे और उनके साथ बकरे भी मींगन करेंगे कि बिना भाव को छेड़े , केवल सफाई से भी रियासत का दर्जा-ए-ख़ास नष्ट हो जाता है । ऐसे लोगों के लिए इतना ही कि अल्लाह इन्हें स्वच्छता में रहने की तौफीक दे ।

 

One Response to “अनुच्छेद 370 के मृतक अंगों को बाहर निकालना –”

  1. Suresh Vyas

    The constitution is made by the citizens, and therefore the citizens can and should amend the constitution whenever it is found it does not help the national interests.

    O Hindus! Never ever feel you are slaves to the construction; because you are the masters in your own country Hindustan.
    jaya sri Krishna!

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