मृत संवेदनाओं के बीच शांत सुशांत

बात दिल्ली के रिक्से, ऑटो, बस चालक से शुरू करें तो,इनका भी अपना एक संगठन है, नही, नही, सबका घाल मेंल नहीं, वह विशेषज्ञता की बात समझते हैं । इसलिये रिक्से वालों का अलग यूनियन, आटो वालों का अलग और बस ड्राइवर का अलग, यहाँ तक कि ओला/ऊबर जैसे ऐप द्वारा दरवाजे तक सेवा हेतु उपस्थित सुविधा देने वाला चालक तक सभी का अपना-अपना यूनियन है । किसी को छू कर तो देखिये ! वह जरूरत पड़ने पर कैसे आस पास के सभी कार्य आधारित बिरादरी को बुला लेते हैं और आप को तब समझ में आता है  कि हल्के में ले कर गलती कर दी है।
             फिर हत्या हो जाये, और यह खामोश रह जाएँ ? न, यह मुश्किल है वह भी तब जबकि राष्ट्रीय मीडिया इस मुद्दे को जबर्दस्त तरीके से उठा रही हो, तो फिर और अधिक मुश्किल । पर, जैसा कि एक उभरते युवा कलाकार “सुशान्त सिंह राजपूत” के साथ सहकर्मियों की मृत संवेदना हैरान करने वाली है । किसी भी क्षेत्र अथवा व्यवसाय से जुडे व्यक्ति के साथ ऐसी कोई भी घटना घटित हो जाय तो एक आंदोलन सा वातावरण तानांव औऱ आक्रोश के बवंडर में सब कुछ धूल-धूसित हो जाती है । आप तीस हजारी कोर्ट में पुलिस बनाम अधिवक्ता की पराकाष्ठा देख चुके हैं, सही अथवा गलत सिद्ध करने  पर मेंरा अधिकार नहीं किन्तु संगठन में शक्ति है और अपार शक्ति है, हम सभी इसके गवाह हैं, प्रमाणित करने की आवश्यकता ही नहीं “प्रत्यक्षम किम प्रमाणम ।।”

“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”

दुष्यंत कुमार की एक कविता का यह अंश बताता है कि हमारा उद्देश्य हंगामा खड़ा करने का नहीं, बल्कि हमारी रुचि सम्भावना तलाशने में है । 
किसी को भी संवेदना नहीं खोना चाहिए अन्यथा ऐसा मनुष्य और नोट छापने की मशीन में कोई फर्क नहीं रह जाता । संवेदना लेखन और साहित्य दोनों में बनी रहे इसलिये संवेदना को जीवित रख कर हम सम्भावना को तलाशते हैं ।

मैं अपना छोटा सा अनुभव आप से साझा करता हूँ ।अगर आप दिल्ली में हैं,तो एक प्रयोग करिये, किसी रिक्से पर बैठ जाइये और बता दीजिये कहाँ जाना है। अधिकांश रिक्से वाले बिहार के मिलेंगे,रास्ते का सफर इनकी आय-व्यय और अपनी मौलिकता को बताते हुए,उस व्यक्ति के शहर में आने के कारण को समझते हुए सफर करते रहिये और रिक्से से उतरिये तब पूछिये कि बताओ भैया आप की ईमान का या मेहनत का कितना हुआ ? वह आप से यही कहेगा कि आप को जो उचित लगे दे दीजिये । आप पुनः बोलिये नहीं मुझे तय करना होता तो बैठने से पहले तय कर के बैठता, आपका रिक्सा, आप की मेहनत, फिर मैं मूल्य कैसे निर्धारित करूँ ? आप की ईमानदारी का जितना होता है,आप जो बोलेंगे,दे दूँगा । थोड़ा रिस्क लीजिये क्योंकि अपवाद हर सिद्धान्त में होता है ।वह आप से ज्यादे बोल कर कितना ले जायेगा 50 का 100 लेगा ! यही न ? वह 2000 का बिल नहीं पकड़ायेगा, जितना आप किसी रेस्टोरेंट में किसी मित्र या करीबी के साथ शान से खर्च करके और बाद में 50 रुपये टिप दे कर चले आते हैं । अगर आप रिक्से वाले को मूल्य तय करने की स्वतंत्रता देते हैं तो पारिश्रमिक तय करने पर उसका पूरा अधिकार है,किन्तु वह 50 का 40 बता कर आप को हैरान जरूर कर सकता है । क्योंकि शायद उसके रिक्से पर एक अरसे बाद कोई ऐसा व्यक्ति बैठा है जो उसके अधिकार और स्वतंत्रता की बात कर रहा है बहुत दिनों के बाद कोई ऐसा व्यक्ति बैठा है जो उसे मूल्य निर्धारण की छूट दे रहा । बेईमानी करके वह पूरी बिरादरी को बदनाम नहीं करेगा । वह चाहता है, कि कोई उसका भी दुख सुने,समझे और ऐसा व्यक्ति कभी न ठगा जाय वह यही सोचेगा। आप कर के देखिये । पर आप उसे,वह जितना मांगे उतना देने के बाद 20 या 25 रूपये अतरिक्त, अलग से दीजिये और यह कह कर की आप से बात कर के बहुत अच्छा लगा, आप मेहनती भी हैं और ईमानदार भी,इस अतरिक्त पैसे का आप चाय ही पी लीजियेगा, साथ में यह भी जोड़ दीजिये कि नहीं लोगे तो मैं साथ में चाय पिलाने खुद ले चलूंगा और तब शायद मुझे और खर्च करना पड़ जाय । वह टपाक से पैसे ले लेगा कि आप अपना समय न नस्ट करें वह इसका भी ख्याल रखेगा ।

यह मेंरा व्यक्तिगत अनुभव है यथार्थ है । आप को लगेगा कि यह तो अपव्यय हो गया, मूर्खता ! 
तो जैसे अविरल बहती गंगा में आप ने कभी 5 या 10 का सिक्का फेंक कर सन्तुष्टि का भाव ग्रहण किया था यहाँ भी वही भाव ग्रहण कीजिये क्योंकि माँ गंगा आप को हर जगह नहीं मिलेगी पर ऐसे लोग हर जगह मिल जायेंगे जो आप की संवेदना, आस्था, प्रेम और विश्वास को हमेशा जीवित रखेंगे ।

एक परीक्षा के लिये मैं मेट्रो से निकला और सीधा रिक्से पर पहुँचा भाई मुझे फला कॉलेज ले चलें परीक्षा का समय होने वाला है,आप को इस कॉलेज का लोकेशन पता हो तो ले चलें ! उसने कहा हाँ, देख रहा, स्कूल जानता हूँ, पास में ही है चलिये, हाँ चलो । पर असल में रिक्से वाला मुझे उसी नाम के गर्ल्स कॉलेज ले गया लेकिन प्रवेश पत्र पर गर्ल्स कॉलेज का जिक्र नहीं था, पर संतुष्टि के लिए मैंने वहाँ मौजूद अभ्यर्थियों से पूछा, तो पता चला कि यह वह कालेज नहीं है । मैं भागते हुए फिर से रिक्से पर बैठा और बोला कि फला ब्लॉक में है यह नहीं है, जल्दी करो, अब उसके पाँव में पंख लग गये और परीक्षा केंद्र पर पहुँचा तो उसने गमझे से पसीना पोछते हुए कहा कि अभी लड़के बाहर ही हैं देर नहीं हुई है । मैंने कहा हाँ पर अगर एक बार और भटकते तो देर हो जाना तय था । वह इस बात से शर्मिंदा हुआ और बोला आप जो चाहें दे दीजिये ! मैंने कहा आप फिर देर करवायेंगे, मुझे सब जोड़ कर बताईये कितना दूँ वह बोला 30 रूपया यह स्कूल मेट्रो स्टेशन से नजदीक है,अगर सीधा आता तो यही मेरे ईमान का था पर मैंने भटकने वाली दूरी को इसमें नही जोड़ा है आप 30 रुपया दे दीजिये । मैंने 30 दिया उसने जेब में रखा और इससे पहले कि वह वहाँ से जाता मैंने उसे 30 और रुपये दिये,यह कहते हुए कि आप ईमानदार हैं और मेहनती भी रख लीजिये, मैं खुशी से दे रहा हूँ, आपने जाने अंजाने में इतना श्रम तो किया ही है इसमें अतरिक्त कुछ नहीं। वह कुछ और कहे इससे पहले मैं प्रोफेशनल हो गया कि अब बहस का नहीं है मेंरे पास । उसने पैसे रख लिये,उसकी थकी हुई मुस्कान में गूढ़ भाव था और मेंरे चेहरे पर सन्तुष्टि और प्रेम की सुखद अनुभूति, जिसे ले कर मैं परीक्षा भवन में गया । दो घण्टे बाद जब बाहर निकला तो, वही रिक्से वाला मेंरे सामने रिक्सा लिये खड़ा था और कहा चलिये, मैं स्तब्ध था ।उसने दो घण्टे वही गुज़ारे या ठीक समय पर पहुँच गया ? पर उसे क्या मालूम था कि परीक्षा 2 घण्टे ही चलेगी और वह ठीक समय पर पहुँच गया ? मैं निरुत्तर था, अब मेंरे पास उसे देने के लिये कुछ भी नही था, थी तो बस खामोशी !!

अब आप इस रिक्से वाले से वालीवुड की एक बार फिर से तुलना कीजिये । मुझे नहीं लगता भावना और निष्ठुरता की तुलना करना उचित होगा, क्योंकि वालीवुड की बड़ी-बड़ी हस्तियों के निम्नतर कार्यों के साथ इस रिक्से वाले के कार्य की कोई तुलना है भी अथवा नहीं ?अपने चुलबुल पाण्डे,अनाड़ी से लेकर खिलाड़ी और सहनशाह की उपाधि तक, अगर कुछ दिखता है तो वह है खामोशी !! यह खामोशी निःशब्दता की नहीं बल्कि निष्ठुरता की है,नाम बड़े दर्शन छोटे । यह बात देश के लोगो को कील की तरह चुभ रही है पूरे समाज में आक्रोश है पर इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ? 
राम जन्म भूमि के शिलान्याश पर तो राम शब्द जुबान पर आया नही तो इस मातम में ही राम नाम जप लेते तो भी इन्हें इस पाप से मुक्ति मिल जाती । 
पर्दे पर 50 की उम्र में क्रीम,पाउडर पोत कर 21वर्ष की नायिका के साथ अभिनय, इतना विभत्स स्वरूप है जिसे बयान करना भी कठिन है । ई रॉन्ग नम्बर है बोलने वाला नमूना कहाँ है ? भारत में डर-डर कर जीवन बिता दिया बेचारे ने पर अब देखो ISIS के गढ़ रहे टर्की में यह कैसे निर्भय और शेर की तरह घूम रहा। देश की असहिष्णुता ने इनका हवा-बयार बन्द कर रखा था अब कितने खुशनुमा माहौल में जीवन का कैसा आनंद ले रहा, जरा गौर करिये । जबकि CBI सुशांत सिंह राजपूत की तथाकथित हत्या/आत्महत्या की गुत्थी सुलझा रही तो दूसरी ओर टर्की के खंडहर में क्या गुफ्तगूँ चल रही । वाह !!
पर यह स्क्रीन शॉट बहुत कुछ बया कर रहा है ।
“हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।”  ~ दुष्यंत कुमार

लेखक – मृदुल चन्द्र श्रीवास्तव

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