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– डॉ. ज्योति किरण

पिछले दिनों राहुल गाँधी की बंगाल यात्रा के दौरान एक न्यूज़ चैनल ने समाचार के साथ ही एक ‘विजुअल क्लिप’ दिखाया। यह क्लिप कई अर्थों में महत्वपूर्ण था, क्योंकि वह एक हज़ार से भी अधिक शब्द बोल रहा था। बहुत नपी-तुली पर प्रेरक भाषा में राहुल कहते हैं पहले एक भारत था अब मैं देखता हूँ कि दो भारत हैं। एक आम गरीब आदमी का भारत और दूसरा साधन संपन्न भारत। पता नहीं वे इतिहास के किस काल खंड में इस एक भारत की बात कर रहे थे। गाँधी जी ने भारत समझने के लिए जब ट्रेन की खिड़की से भारत ढूँढने का यत्न किया था तो उन्हें कई भारत दिखे थे – असमान, विवर्ण, शोषित भारत।

बहरहाल, राहुल अपने भाषण को आगे बढ़ाते हुए बड़ी तैयारी से रचा अपना कूटनीतिक वाक्य फेंकते हैं – यहाँ भी दो बंगाल हैं; एक आम गरीब का बंगाल और दूसरा सी. पी. एम. का बंगाल। इस द्वैधता के वर्णन को वे फिर किस चतुराई से आगे बढ़ाते रहे, यह सारे भारत ने सुना-देखा पर इसके बाद के विजुअल क्लिप का उल्लेख अधिक महत्वपूर्ण है। राहुल अपने उत्प्रेरक भाषण को समाप्त करके मंच पर बैठे प्रणव मुखर्जी की ओर बढ़ते है। प्रणव कुर्सी से उठकर राहुल को गले लगाने जैसा कुछ करते हैं। दोनों के हाथ गहरी गर्मजोशी से बंध जाते हैं और विजेता जैसा भाव चेहरे पर लिए राहुल मानो प्रणव से कह रहे हों, देखा प्रदर्शन शानदार रहा ना! प्रणव विगलित, पितृतुल्य, सम्मोहित से, रूँधे गले से तारीफ में निमग्न है, फिर और थोड़ी कानाफूसी और तारीफ और फिर राहुल आश्वस्त बैठ जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे किसी रीयेलिटी प्रतियोगिता में कोई प्रतियोगी अपने ‘कोच’ या ‘मेंटर’ के पास लौटा हो। पर यहाँ ‘मेंटर’ किसी माता से भी अधिक भावुक दिखा और प्रतियोगी अपनी कूटनीतिक तैयारी से बहुत संतुष्ट, आत्मविश्वासी व प्रसन्न।

राहुल भारतीय राजनीति के ‘रीयलेटी शो’ के मंझे खिलाड़ी बन गए हैं। उन्हें पता है जनता किस भंगिमा, किस वाक्य से कहाँ प्रभावित होगी। कौन-सा बयान कहाँ देकर कांग्रेस के भीतर ही एक ‘विसिबल’ साफदिल, सक्रिय ‘नयी आभासी कांग्रेस’ का मायाजाल रचा जा सकता है। पर वे यह भूल रहे हैं कि यह आभासी सच्चाई विसंगतियों से भरी है। उदाहरणार्थ नियामगिरी में माओवादी नेता के साथ जब वे साझे मंच पर अपने को दिल्ली में तैनात ‘आदिवासियों का सिपाही’ कहकर वहाँ से वेदाँत को बाहर करने का विजयोत्सव मनाते हैं, तो तथ्य एक बिल्कुल अलग कहानी कह रहे होते हैं। दुर्भाग्य से तथ्य राहुल के साथ नहीं है। वेदाँत को पर्यावरण क्लीयरेंस काँग्रेस सरकार ने ही दिया। काँग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी वेदाँत के वकील तौर पर विभिन्न केस लड़ते रहे, यहाँ तक कि वन व पर्यावरण मंत्राालय जब एन. ई. ए. ए. के समक्ष डोंगरियाँ कोंध आदिवासियों का लगातार विरोध करता रहा, तो राहुल व उनकी ‘अवतार सेना’ ने एक शब्द भी नहीं कहा। इस प्रकार का अस्तित्व या विचारों का सिज़ोफ्रेनिया कांग्रेस के लिए यद्यपि नया नहीं है। एक ही समय में एक कांग्रेस में दो कांग्रेस दीख पड़ने की युक्ति कांग्रेस की संकट के समय की पुरानी नीति है। ताकि एक कांग्रेस वह जो गलतियाँ करती चले और उसी के भीतर एक आभासी विरोध में खड़ी कांग्रेस जहाँ कुछ लोग एक तयशुदा नीति के तहत वर्तमान नीतियों-गलतियों के विरुध्द खड़े रहने का स्वाँग करते रहे, ताकि गलतियाँ पच भी जाएँ, धूमिल भी होती रहें और साथ ही इन लड़ाके सिपाहियों का ग्लैमर भी बढ़ता चले।

राहुल की भाषा, व्यंजन, स्वर सभी विषयों में घोर राजनैतिक हैं। हुआ करें, इसमें आपत्ति भी किसे है? आखिर वे इंदिरा के आधिकारिक उत्तराधिकारी हैं – पर संवेदनक्षमता, सहानुभूति के आवरण में राजनीति करना और इसे संवेदनाओं के तौर पर प्रचारित करना धूर्तता है। उनके दो भारतों की अवधारणा आर्थिक, सामाजिक तौर पर होती तो समझा जा सकता था, पर उनके दो भारतों की विवेचना विशुध्द राजनीतिक स्वार्थ है। यह वर्गीकरण मात्र एक ही आधार पर है – एक भारत वह जो कांग्रेस शासित है और एक वह जहाँ गैर-कांग्रेसी सरकार है। जैसे ही राहुल विपक्ष शासित राज्यों में पैर रखते हैं उनके भीतर का चतुर रणनीतिकार उनके जन समर्पित, वाम प्रभावित युवा मन में विकास अवश्वमेघ की अलख जगा देता है और वे बोलने लगते हैं – शोषण के विरुध्द, विकास के लिए। मीडिया बेशक इस अश्वमेघ में उनका पीछा करता है। ताकि एक आम भारतीय यह ठीक से जान सके कि कैसे कांग्रेस का वैरागी राजपुत्र सत्य, अहिंसा विकास और शोषण मुक्त समाज की परिकल्पना और आधारभूत सोच लेकर देश के समक्ष कांग्रेस का नया चेहरा रख रहा है। पर इस नयी सोच को सिर्फ उड़ीसा में बेचा जाता है, उत्तरप्रदेश में या फिर बंगाल में जहाँ विपक्ष की सरकारें हैं। यह सोच राजस्थान सरीखे राज्यों के लिए मुखर नहीं होती, जहाँ चिकित्सा, शिक्षा, आर्थिक योजना, विकास के सभी मानक लगातार गिर रहे हैं और 22 जिले खाद्य असुरक्षित हैं। या फिर उत्तर-पूर्व के राज्यों में जहाँ विकास की भूख ने युवा को एक बार फिर सड़क पर ला खड़ा किया है। और तो और बेहद गंभीर राष्ट्रीय विषयों पर तो राहुल अब तक कूटनीतिक मौन के अस्त्र से ही लड़ते रहे हैं।

बानगी दो अंकों की मुद्रास्फीति व महंगाई से पीड़ित व त्रस्त जनता केवल जीवन के लिए एकदम आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था कैसे करें? इस विषय पर उनका सार्वजनिक मत क्या है? अर्जुन सेन गुप्ता कमीशन के दिल दहला देने वाले आंकड़ों पर राहुल संवेदित क्यों नहीं हैं, जिनके अनुसार 70 प्रतिशत से अधिक जनता गरीबी से जूझ रही है। भारत की राष्ट्रीय आय में 60 प्रतिशत योगदान देने वाला वर्ग असंगठित क्षेत्र से है जिनमें 85 प्रतिशत लोग 20 रूपए रोज से भी कम पर जी या मर रहे हैं। इन लोगों का बढ़ती जी. डी. पी. के आंकड़ों, विकास दर वगैरह से कुछ भी लेना-देना नहीं है। अपनी पार्टी की जनविरोधी नीतियों के इन भयंकर परिणामों पर राहुल कभी नहीं बोलते। लाखों टन सड़ते अनाज पर जब सुप्रीम कोर्ट मनमोहन सरकार को गरीबों को अनाज बाँटने पर निर्देशित करती है और अर्थवेत्ता प्रधानमंत्री केवल इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट को ऑंखें दिखाते हैं कि 37 प्रतिशत से अधिक गरीबों को अनाज मफ्ुत नहीं दिया जा सकता, तब भी राहुल मौन का सहारा लेते हैं।

राहुल चूँकि विकास अर्थशास्त्र के भी विद्यार्थी रहे हैं, अतः जरूर जानते होगें कि अन्न सड़ने की ‘वास्तविक पर्यावरण कीमत’ (रीयल कॉस्ट) कई गुना अधिक है, पर इनमें से कोई भी बात उनकी संवेदनाओं को नहीं जगाती न ही उन्हें मुखर करती है, क्योंकि वे जानते हैं इन विषयों पर बोलना राजनीतिक रूप से सही नहीं होगा। जबकि ये वे सब ऐसे विषय थे, जिन पर उन्हें राजनैतिक इच्छा शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए था। राज ठाकरे ने पिछले 113 बयानों में एक ही बयान सटीक व अर्थपूर्ण दिया है। दो चार बार हवाई दौरे कर लेने से महाराष्ट्र (एक प्रदेश) को राहुल नहीं समझ सकते। राहुल को समझना होगा भारत केवल कलावती के झोपड़ों के झरोखों से नहीं समझा जा सकता है न ही बंगाल के शाति निकेतन के चंद युवा उत्साही चेहरों में ढूढ़ा जा सकता है – ऐसा भी नहीं है कि भारत वहाँ नहीं है पर भारत उससे बहुत अधिक विस्मयकारी रूप से जटिल व बहुत से आयामों, स्तरों में बंटा है। यहाँ संस्कृति, सोच, जीवनशैली एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा की बहुविध सच्चाइयों से बनी है जो हवाओं से तराशी पहाड़ी गोलाइयों-वृत्तों जैसी है, जहाँ कोई आकार न तो सुनिश्चित है और न एक दूसरी की सही प्रतिकृति ही। यही भारत की जटिलता भी है और यही वैशिष्ट्य भी। इस पर भी भारत का मानस सरल है। अतः यहाँ कुछ समय तक करिश्मा व स्वाँग हो, सब चल जाते हैं। पर लंबे समय तक भारत न कुटिलता सहता है न स्वाँग। ‘भारत एक खोज’ से राहुल ने इतना तो जरूर सीखा होना चाहिए और इस भ्रम निरास के सुबूत भी अब उभरने लगे हैं। युवा तुर्कों के गढ़ दिल्ली में राहुल की अपूर्व लोकप्रियता के बावजूद विश्वविद्यालय में युवा वोट एन. एस. यू. आई को नहीं जाता। राजस्थान विश्वविद्यालय में भी ए.बी.वी.पी. जीतती है।

राजनैतिक अपरिपक्वता का ताजातरीन सबूत राहुल के कश्मीर पर बयान में देखने को मिलता है जहाँ वे कहते हैं कि कश्मीर पार्ट टाइम प्रॉब्लम नहीं है, अतः उमर अब्दुल्ला को हमें समय और समर्थन देना चाहिए। कोई उनसे पूछे कि किसने उमर अब्दुल्ला को सलाह दी थी कि वे अप्रवासी मुख्यमंत्री बनकर कश्मीर को ‘पार्ट-टाइम’ समस्या से फुल टाइम समस्या बना दे? शांति के समय जनेच्छा से तंत्र को संस्थागत करने की सलाह तब राहुल ने अपने साथी सिपाही को क्यों नहीं दी? और ऐसा समय व समर्थन देने का नारा राहुल ने तब क्यों नहीं लगाया, जब नक्सली समस्या के समय चिदंबरम अपने ही साथियों से घिरे थे?

मौटे तौर पर पिछले कुछ वर्षों में भारत आंतरिक सुरक्षा व समेकित, न्यायपूर्ण विकास दोनों ही मोर्चों पर बुरी तरह से असफल रहा है। कांग्रेस की जननिरपेक्ष अपरिपक्व नीतियों ने जनापेक्षाओं को कभी आत्मसात् किया ही नहीं। ऑंतरिक-बाह्य सुरक्षा पर राहुल कदाचित ही बोल पाते हैं, क्योंकि उसके लिए पूरा अध्ययन परिपक्व सोच व पारदर्शिता आवश्यक है। सार्वजनिक जीवन में उनके द्वारा इनमें से एक भी गुण अभी दिखाया नहीं गया है। हाँ विकास पर वे खूब बोलते हैं अधिक अच्छा हो कि वे विकास पर सचमुच सोचें। भी और उनकी सोच राजनैतिक खाँचों की मजबूरी और द्वैधता से भरी नहीं हो, किंतु जैसे उन्हें आकर्षक रंग-रूप विरासत में मिला है वैसे ही व्यापक जनहित में न सोचकर संकीर्ण दलीय राजनीति के कोणों से देश को नापने-ऑंकने और निर्णय लेने की वृत्ति भी विरासत में मिली लगती है। उनका अभी तक का हिचकिचाहट भरा राजनीतिक वर्तन तो कम से कम यही कहता है, कि वे नेहरू की अदूरदर्शिता, इंदिरा की दलीय संकीर्ण सोच व राजीव की अपरिपक्वता का एक अति विशिष्ट संगम है, पर कौन जाने शायद भारत की वर्तमान राजनीति को यही करिश्माई गुण ही चाहिए हों।

* लेखिका उच्च शिक्षित साध्वी है।

4 Responses to “राहुल गाँधी और उनके दो राजनैतिक भारत”

  1. amit anari

    मै aapaki बात से पूरी तरह सहमत हूँ आपने बहुत अच्छा लिखा है परन्तु इस दिशा मै कुछ और भी करने की आवश्यकता है जिससे एक आम आदमी भी इनकी सच्चाई को समझ सके क्योंकि लोकतंत्र मै निर्णय वही करता है शुभम

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  2. पंकज झा

    पंकज झा.

    अद्भुत आलेख. भाषा का शानदार प्रवाह. लेकिन अब एक निवेदन….. एक राक्षस की कहानी जरूर आपने सूनी होगी जिसे आप जितनी भर्त्सना करो वो उतना ताकतवर होते जाता है. तो अगर हम जी भर-भर कर ऐसे तत्वों को कोसते रहे तो इससे इनका मंसूबा ही सफल होगा. यही तो चाहते हैं इनके रणनीतिकार कि हर वो उपाय किया जाय जिससे युवराज की चर्चा पूरे देश में हो. तो अपना यह भी निवेदन कि देशभक्त तत्वों को ऐसे बच्चों की थोड़ी उपेक्षा करना भी सीखना होगा.

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    • आर. सिंह

      R.Singh

      पंकज जी विचार तो आपका अच्छा है.पर क्या यह संभव है?राहुल आपके देश के प्रधान मंत्री बनने की तैयारी में लगे हैं और वे जो भी कर रहे हैं वह उस दिशा में कदम बढाने जैसा है.आम आदमी ग्लैमर पसंद करता है और वह राहुल में काफी मात्रा में है.अगर आप जैसे या यों कहिये की हमारे जैसे लोग चाहते हैं की राहुल के कदम आगे न बढ़ पाए तो एक ऐसा जन प्रतिनिधि सामने लाना होगा जिसमे राहुल से अधिक करिश्मा हो.ऐसा जन प्रतिनिधि मिलेगा कहाँ से?जवाहर लाल नेहरु या उनके पिताश्री ने आनंद भवन दान कर दिया बड़ा naam huaa ,पर आनंद भवन ko दान में dene के liye pahle आनंद भवन ko haasil तो karnaa hogaa.

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