लेखक परिचय

राजीव रंजन प्रसाद

राजीव रंजन प्रसाद

लेखक मूल रूप से बस्तर (छतीसगढ) के निवासी हैं तथा वर्तमान में एक सरकारी उपक्रम एन.एच.पी.सी में प्रबंधक है। आप साहित्यिक ई-पत्रिका "साहित्य शिल्पी" (www.sahityashilpi.in) के सम्पादक भी हैं। आपके आलेख व रचनायें प्रमुखता से पत्र, पत्रिकाओं तथा ई-पत्रिकाओं में प्रकशित होती रहती है।

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[राजगीर से यात्रावृतांत]

राजीव रंजन प्रसाद 

राजगीर (राजगृह) को निहारता हुआ मैं उस बुद्धकालीन भारत की कल्पना कर रहा था जो तब चार शक्तिशाली राज्यों, दस छोटे गणराज्यों तथा सोलह महाजनपदों में विभाजित था। राजगीर महाभारत काल, भगवान बुद्ध एवं महावीर के समयों में उत्थान पर था तथा तत्कालीन सम्राटों नें यहाँ राजधानी का निर्माण किया था। फाह्यान तथा ह्वेनसांग नें अपने अपने यात्रावृतांतों में राजगृह को जिन पाँच पर्वतों से घिरा नगर बताया है उन्हें अपनी नैसर्गिकता के साथ आज भी देखा जा सकता है ये हैं- पाण्डव, गॆद्धकूट, वैभार, इसिगिलि, तथा वैपुल।

[पाँच पर्वतों से घिरा हुआ था प्राचीन नगर राजगृह – एक झलक]

प्राचीन भारतीय इतिहास से प्राप्त उद्धरणों के अनुसार मगध के एक साम्राज्य बनने की कथा का प्रारम्भ होता है जब कुरुवंशी राजा वसु नें इस क्षेत्र को विजित किया था। उनके निधन के पश्चात बार्हद्रथ सत्तासीन हुए जिनके नाम पर ही बार्हद्रथ वंश पडा तथा मगध की वास्तविक सत्ता और गौरव का प्रारंभिक इतिहास यही से ज्ञात होता है। जरासंध इसी वंश में उत्पन्न प्रतापी तथा शक्तिशाली शासक थे एवं महाभारत कालीन इतिहास इसकी पुष्टि करता है। अंधक-वृष्णि-संघ के राजा श्रीकृष्ण नें पाण्डवों की सहायता से जरासंध का अपनी कूटनीति से वध करवा दिया था। इस राजनीतिक हत्या के बाद बार्हद्रथ वंश का विनाश होने लगा इस वंश का अंतिम शासक थे – रिपुंजय जिनका उसके ही मंत्री पुलिक नें वध कर दिया था।

[महाभारत कालीन अवशेष – मनियार मठ। इस स्थल का विवरण पालि ग्रंथों में मणिमाल चैत्य तथा महाभारत में मणिनाग मंदिर के रूप में प्राप्त होता है। चित्र में दिख रही कूप जैसी मुख्य संरचना का व्यास 300 मीटर तथा दीवाल की मोटाई 1.20 मीटर है।]

पुलिक की सत्ता नें अभी पहला कदम भी नहीं रखा था कि भट्टिय नाम के महत्वाकांक्षी सामंत नें विद्रोह कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनके पंद्रह वर्षीय पुत्र बिम्बिसार को 543 ईसापूर्व में सत्ता हासिल हुई एवं उन्होंने हर्यंक वंश की नींव रखी। भगवान बुद्ध के जीवन काल में मगध के शासक थे बिम्बिसार। कहते हैं उन्होंने तत्कालीन प्रचलित परिपाटी के उलट एक स्थायी सेना रखी हुई थी जिसनें उनकी शक्ति को अपराजेय बना दिया था। मगध साम्राज्य की राजधानी थी राजगृह और संभवत: बिम्बिसार द्वारा यहाँ सर्वप्रथम अपना गृह बनाये जाने के कारण भी नगर का नाम राजगृह पडा हो सकता है। इस नगर का प्राचीन नाम गिरिवज्र कहा जाता है। बिम्बिसार नें युद्ध ही नहीं विवाहिक सम्बन्धों को भी राज्य विस्तार का माध्यम बनाया। कोसल राज प्रसेनजित के बहन कोसल देवी से विवाह कर उन्होंने काशी क्षेत्र को दहेज में प्राप्त कर लिया तो लिच्छवियों की मित्रता हासिल करने के लिये राजा चेटक की पुत्री छलना से विवाह कर लिया। उन्होंने मध्य पंजाब अर्थात तत्कालीन मद्ददे की राजकुमारी खेमा से किया था। बिम्बिसार नें अंग के राजा ब्रम्हदत्त को पराजित कर अंग क्षेत्र को भी अपने अधिकार में कर लिया था। आम्रपाली को वैशाली गणराज्य की प्रसिद्ध नर्तकी एवं परम रूपवती वेश्या थी आम्रपाली के सौन्दर्य पर मोहित होकर बिम्बिसार उसे लिच्छवि से जीतकर राजगृह में ले आये। कहते हैं उसके संयोग से उन्हें जीवक नामक पुत्ररत्नह हुआ जिसने कालांतर तक्षशिला में चिकित्साशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की और प्रख्यात चिकित्सक बने।

 

[छठी शताब्दी ईसा पूर्व के प्रसिद्ध वैद्य जीवक का आम्रवन क्षेत्र जो उन्होंने भगवान बुद्ध को समर्पित कर दिया था]

राजगीर नें एक बडे साम्राज्य की राजधानी होने का सुख प्राप्त किया। यह भी कहा जाता है कि बिम्बिसार एक महान निर्माता भी थे। अपने समय के प्रसिद्ध वास्तुकार महागोविन्द की देखरेख में उन्होंने राजगृह का निर्माण करवाया था। शासन प्रबन्ध की दृष्टि से बिम्बिसार के पदाधिकारी – उपराजा (ज्येष्ठ पुत्र), मांडलिक राजा, सेनापति, सेनानायक, महामात्र, व्यावहारिक महामात्र (न्यायाधीश), ग्रामभोजक (गाँवों में कर वसूलने के लिये नियुक्त) आदि थे। शासन प्रबन्ध महामात्र देखते थे तथा फाँसी जैसे कठोर दण्ड का भी प्रावधान था। बिम्बिसार की आस्था भगवान बुद्ध पर थी जो उनके समकालीन भी थे तथापि उनका शासन सही मायनों में धर्मनिर्पेक्ष ही माना जायेगा चूंकि जैन मत के अनुसार भी उन्हें सम्मान प्राप्त है और यह भी उल्लेख मिलता है कि वे ब्राम्हणों को भूमिदान आदि भी करते रहते थे। बिम्बिसार की हत्या उनके ही पुत्र अजातशत्रु नें की थी तत्पश्चात राजगृह से मगध की सत्ता संभाली। अजातशत्रु के विषय में विरोधाभासी उल्लेख मिलते हैं। पिता को गिरफ्तार करने और बाद में हत्या करने के पीछे केवल सत्ता की महत्वाकांक्षा ही नहीं थी कहा जाता है कि उस युग में व्याप्त धार्मिक प्रतिस्पर्धायें भी इसका एक कारण बनीं। एक ही व्यक्ति के दो चरित्र चित्रण एक समय के समकालीन प्रचारित हो रहे धर्मग्रंथों में मिलने को मैं इस कथन के प्रमाण की तरह देखता हूँ; वस्तुत:। बौद्ध ग्रंथो में वे पितृहंता है तथा जन ग्रंथों में वे पितृभक्त कहे जाते हैं। बिखरी हुई कहानियों, प्राप्त अवशेषों और जनश्रुतियों को समेटें तो यह माना जा सकता है कि भगवान बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्त के उकसाने पर अजातशत्रु नें बिम्बिसार को कैद कर लिया। वर्तमान में भी इस कारागार के अवशेष राजगीर में देखे जा सकते हैं।

 

[बिम्बिसार को कैद करने के लिये निर्मित कारागार के अवशेष]

कारागार जिसमें बिम्बिसार कैद किये गये थे वहाँ से वह गृद्धकूट पर्वत स्पष्ट नज़र आता था जहाँ से भगवान बुद्ध अपने भिक्षुओं को उपदेश दिया करते थे; इसी पहाड़ी पर भगवान बुद्ध पर जानलेवा हमला हुआ था। कहते हैं कि जब अजातशत्रु को बोध हुआ कि पिता तो वस्तुत: उससे प्रेम करते थे वह उन्हें कारागार से मुक्त कराने के लिये स्वयं चल पडा किंतु हत्या की आशंका से भयग्रस्त बिम्बिसार नें विष खा कर प्राण दे दिये। इस घटना से अजातशत्रु ग्लानि से भर उठे व अंतत: बुद्ध की शरण में चले गये।

[गृद्धकूट पर्वत पर स्थित वह स्थल जहाँ से भगवान बुद्ध उपदेश दिया करते थे]

बिम्बिसार की मृत्यु नें अजातशत्रु को गहरी कठिनाईयों में डाल दिया था। नाना प्रसेनजित नें रुष्ठ हो कर काशी वापस प्राप्त करने के लिये आक्रमण कर दिया। अंत में प्रसेनजित की पुत्री वजिरा से विवाह कर अजातशत्रु नें इस युद्ध की अंतिम परिणति को संधि बना दिया। वह लिच्छिवियों से भी युद्ध रत रहा और लम्बे संघर्ष के पश्चात विजयी भी रहा था। अजातशत्रु बैद्ध और जैन धर्म का समान आदर करते थे। उन्होंने एक बौद्ध स्तूप का भी निर्माण करवाया था तथा उनके ही शासनकाल में प्रथम बौद्ध संगिति राजगृह के निकट सप्तपर्णी गुफा में हुई थी। अजातशत्रु की हत्या उनके ही पुत्र उदायिन (460 – 444 ईसा पूर्व) नें की तथा सत्ता संभाली। उदायिन नें ही राजधानी को राजगृह से गंगा तथा सोन नदी के संगमस्थल पर पाटलीपुत्र के निकत स्थानांतरित कर दिया था। इसी समय से राजगृह का राजनीतिक महत्व समाप्त होता गया तथा यह नगर इतिहास का हिस्सा बनता चला गया।

 

[गृद्धकूट पर्वत के निकट ही निर्मित विश्व शांति स्तूप का एक दृश्य]

राजगीर की अपनी यात्रा के दौरान मेरी रुचि उन संदर्भों को जानने की थी कि क्या कोई एसे प्रभाण हैं कि कभी भगवान बुद्ध और भगवान महावीर का आमना सामना हुआ हो? भगवान बुद्ध और महावीर समकालीन रहे हैं और दोनों ही प्रखर विचारक तथा युग परिवर्तक। कुछ चर्चाये मैंने स्थानीय स्तर पर जानकार से प्रतीत होने वाले लोगों के बीच की तो प्राप्त विचारों से साम्प्रदायिक श्रेष्ठता के भावों की बदबू आने लगी इस लिये उनमें अधिक उलझना मुझे श्रेयस्कर नहीं लगा। मेरा मानना है कि धर्म अत्यधिक व्यापक शब्द है तथा इसका सम्बन्ध केवल आस्था से जोडना विवेचना को कुन्द कर देना है। प्रत्येक धर्म की अपनी प्रगतिशीलता, वैज्ञानिकता तथा साम्राज्यवादिता रही है। धर्म नें सत्ताओं को गढा और मिटाया भी है। अनुयाईयों नें विचारों को अपने अनुरूप मोडा मरोडा है तथा तू मुझसे छोटा क्यों और मैं तुझसे श्रेष्ठ कैसे जैसी विवेचनायें उपजायी हैं। पाखण्ड विचारों या विचारकों के भीतर नहीं होता वह उनके अनुयाईयों की सोच से बाहर निकलता है। पाखंड ही कट्टरता का बीज है तथा इसका सम्बन्ध केवल धर्म से ही नहीं उन विचारों से भी है जिनके केन्द्र में नास्तिकता विद्यमान है। मार्क्सवाद को ही लीजिये; क्या किसी धार्मिक विचारधारा की तरह नहीं हो गया है?…और उसके अनुयाईयों की कट्टरता को किसी पण्डा या मुल्ला से आप कम आंकेंगे? विचार परस्पर विमर्श के लिये होते हैं और विचारधाराये मूल सोच की हत्या के साथ पनपती हैं। पाखण्ड निर्मल बाबा प्रसंग से ले कर मंगलेश डबराल प्रकरण तक एक ही हम्माम में है।

 

[भगवान बुद्ध के वर्षा प्रवास स्थल के निकट निर्मित एक बौद्ध मंदिर] 

अतीत भी यह तस्दीक करता है कि हम न पहले बदले न अब बदलना चाहते हैं। तलवारों की नोंक पर पैदा होने वाले शासक अपने ही पिताओं की हत्या को मंदिरों-मठों में दान दे कर धुला मान लेते थे। अगर यह अतीत है तो वर्तमान लोकतंत्र में भी सत्तायें लाशों पर ही विराजमान हो रही हैं। बुद्ध गौण हो गये है, महावीर भुला दिये गये हैं, मार्क्स जैसे विचारक हाशिये पर हैं लेकिन उनकी दुंदुभी हर ओर बज रही है। अनुयाईयों की आस्थाओं नें विचार और शास्त्रार्थ प्रक्रियाओं पर ताले लगा दिये हैं तथा हम गीता या कुरान पर हाँथ रख कर बोला गया अथवा कार्ल मार्क्स नें यही कहा था को उद्धरित कर ही उसपर परमसत्यता का मुलम्मा चढा हुआ मानते हैं। राजगीर के गरमपानी के सोतों के निकट यह बात तो समझ ही सका हूँ कि ठहरा हुआ पानी सडने लगता है और समय के साथ अनुभव तथा सिद्धांत बदलते हैं इसी लिये हर युग के पास अपने कृष्ण, बुद्ध, महावीर, मार्क्स और गाँधी हैं। मैंने महसूस किया कि विचार बहती नदी हैं।

 

[अजात शत्रु द्वारा निर्मित किला तथा बौद्ध स्तूप के पुरावशेष; यहाँ कुछ नव-निर्मित कब्रों द्वारा किया गया अतिक्रमण भी देखने को मिलता है। अपनी धरोहरों को ले कर हम कितने सजग हैं यह तस्वीर से स्वत: स्पष्ट है। ] 

हे बुद्ध आपने तो रास्ता दिखाया था हम ठौर पर ही मंदिर बना कर बैठ गये।

3 Responses to “हे बुद्ध आपने तो रास्ता दिखाया था हम ठौर पर ही मंदिर बना कर बैठ गये”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    राजीव रंजन जी का यह यात्रा वृत्तांत सराहनीय है. जैसा मैंने पहले भी लिखा है की ये इस यात्रा द्वारा हमें भारतीय इतिहास के कुछ अछूते पहलुओं का अवलोकन करा रहे हैं.
    भारत का इतिहास,विशेषतः बुद्ध कालीन या उसके पहले का इतिहास इतने विरोधाभाषों से पूर्ण है की कहना कठिनं है की क्या ठीक है या क्या गलत .श्री राजीव रंजन प्रसाद ने उसको कुछ प्राप्त तथ्यों के आधार पर पेश करने का प्रयत्न किया है और उसमे वे सफल भी हुए हैं,पर कुछ बातें खटकती है.जैसे विम्बिसार से आम्रपाली का विवाह पता नहीं श्री प्रसाद ने इसके लिए किस आधार का सहारा लिया है,पर मुझे जो आजतक ज्ञात है,उसके अनुसार जब आम्रपाली ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था,तब भी वह वैशाली के लिच्छवियों के दरबार की राज नर्तकी ही थी.इसका सबसे बड़ा आधार जातक कथाएं हैं.बुद्ध स्त्रियों को भिक्षुणी बनाने के पक्ष में नहीं थे.उनका यह विरोध उस समय भी प्रखर था,जब उनकी पत्नी और माता भिक्षुणी बनने आयी थी,पर आम्रपाली के आगे उनका विरोध चल नहीं सका था.बिम्विसार और बाद में अजातशत्रु बुद्ध के समकालीन थे.
    उस समय के इतिहास से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है की राज्याधिकार पाने के लिए निकटतम सगे सम्बन्धियों का बध एक आम बात थी.इस मामले में भारत का इतिहास अन्य देशों से भिन्न नहीं था.

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  2. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    खोजपरक आलेख है,एतिहासिक तथ्यों की स्थापना में प्रमाणीकरण के लिए उपयुक्त प्रयास है.बधाई….

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