योगी सरकार का सामाजिक क्रांति का शंखनाद

– ललित गर्ग –
राष्ट्रीय जीवन में घुन की तरह लगे सामाजिक रीति-रिवाजों, प्रदर्शन, फैशन, दहेज, बड़े भोज, प्री-बेड शुटिंग,भव्य एवं खर्चिली शादियों, साप्रदायिकता के कोढ़ को समाप्त करने की दिशा में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना एक रचनात्मक भूमिका का निर्माण करती है, जिसका व्यापक स्तर पर स्वागत किया जाना चाहिए। अन्य प्रांतों को भी इस प्रेरक एवं अनूठी योजना को अपनाना चाहिए। समाज में जो व्यवस्था है और जो पनप रही है, वह सामाजिक समता, सौहार्द, न्याय के घेरे से बाहर है। कब तक चलेगा यह भद्दा एवं भयावह सामाजिक रीति-रिवाजों का नाटक? और कब तक झेलता रहेगा समाज ये विसंगतियां? सबकुछ गलत होते देखकर यह सोचना कि हमें क्या? जो होता है सो होता है’ यह सोच बदलनी होगी, क्योंकि हमारी एक छोटी-सी भूल आने वाली पीढ़ियों को अभिशप्त कर सकती है, करती भी रही है। सब चाहते हैं, उपदेश देते हैं कि समाज में आडम्बर, प्रदर्शन, दिखावा, सामाजिक अन्याय, शोषण न हो। अगर सामाजिक अन्याय को बढ़ावा नहीं मिले और उसका प्रतिकार होता रहे तो निश्चित ही एक सुधार की प्रक्रिया प्रारम्भ होगी, एक स्वस्थ एवं आदर्श समाज व्यवस्था निर्मित होगी।
योगी आदित्यनाथ सरकार ने समाज को नई दिशा देने के लिए गरीब हिन्दू एवं मुस्लिम बेटियों के राज्यभर में सामूहिक शादियों के आयोजन करके समाज-सुधार का एक अनूठा उपक्रम किया है, सामाजिक क्रांति का शंखनाद किया है। एक ही पंडाल में मंत्रोचारण के साथ हिन्दू जोड़ों का विवाह सम्पन्न कराया गया और उसी पंडाल में मुस्लिम रीति-रिवाजों से निकाह भी कराए गए। नवविवाहित जोड़ों को समाज के प्रतिष्ठित लोगों ने आशीर्वाद दिया। पूरे प्रदेश में 21 हजार गरीब बेटियों के घर बसाये गए। आज के दौर में जब शादियों पर लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, लाखों रुपए पंडालों की साज-सज्जा पर खर्च किए जाते हैं और लाखों रुपए खान-पान पर खर्च किए जाते हैं। कई लोग सम्पन्नता के एक स्तर तक पहुंचते ही अफण्ड करने लगते हैं और वहीं से शुरू होता है प्रदर्शन का ज़हर। समाज में जितना नुकसान परस्पर स्पर्धा से नहीं होता उतना प्रदर्शन से होता है। प्रदर्शन करने वाले के और जिनके लिए किया जाता है दोनों के मन में जो भाव उत्पन्न होते हैं वे निश्चित ही समानता एवं सौहार्दता से हमें बहुत दूर ले जाते हैं। अतिभाव और हीन-भाव पैदा करते हैं और बीज बो दिये जाते हैं सामाजिक प्रतिस्पर्धा, दिखावा, प्रदर्शन, शोषण और सामाजिक अन्याय के।
आज जब प्रदर्शन एक सीमा की मर्यादा लांघ गया है तो नतीजा भी परिलक्षित है। देश के विभिन्न समाजों में इन हिंसक एवं अराजक होती सामाजिक रीति-रिवाजों पर अंकुश लगाने के प्रयत्न हो रहे हैं, हिन्दूओं के साथ मुस्लिम समाज भी इस दिशा में जागा है। अनेक समाजों में आज किसी बारात में 21 आदमी से ज्यादा नहीं जाने देते, दहेज नहीं लेने देते, व्यंजनों की संख्या निर्धारित कर दी गयी है जबकि वहां आलीशान होटलों में सैकड़ों व्यंजनों के साथ बारातियों को कीमती उपहार देने, दहेज, महंगी कार आदि की मांग आम बात थी। फैशन के कपड़े पहनने की, प्री-बेड शूटिंग, डेस्टिनेशन मैरीज, ब्यूटी पार्लर आदि पर रोक लगा दी है। सामाजिक सुधार के लिए अपनाये जाने वाले इन तरीकों से विचार भिन्न हो सकते हैं परन्तु अतिशयोक्तिपूर्ण प्रदर्शन, फैशन, दहेज, बड़े भोज की सीमा कहीं न कहीं तो बांधनी ही होगी, जो सामाजिक जीवन को भारमुक्त एवं सादगीमय बनाती है। योगी सरकार ने इस दिशा में पहल करके न केवल समाज को नया जीवन-दर्शन दिया है बल्कि राजनीति को भी एक नया धरातल, दर्शन एवं दिशा दी है।
सामाजिक सुधार तब तक प्रभावी नहीं हांेगे, जब तक उपदेश देने वाले स्वयं व्यवहार में नहीं लायंेगे। सुधार के नाम पर जब तक लोग अपनी नेतागिरी, अपना वर्चस्व व जनाधार बनाने में लगे रहेंगे तब तक लक्ष्य की सफलता संदिग्ध है। भाषण और कलम घिसने से सुधार नहीं होता। सुधार भी दान की भांति घर से शुरू होता है, यह स्वीकृत सत्य है। यदि इस तरह के सुधार के लिये सरकार आगे आती है तो यह सोने में सुहागा की तरह है। क्योंकि लोग अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए बेतहाशा खर्च कर रहे हैं, ऐसे में सामूहिक शादियों का आयोजन समाज को नई दिशा दिखाने वाला है। कन्यादान एक पुण्य कृत माना गया है। अनेक लोग जिनके पुत्रियां नहीं होती, वे इस पुण्य को अर्जित करने के लिये आगे आते हैं और गरीब कन्याओं का विवाह अपने खर्च पर करके यह पुण्य प्राप्त करते हैं, लेकिन अब तक यह क्षेत्र समाज एवं व्यक्ति तक सीमित था, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकार के स्तर पर सामूहिक विवाह योजना की शुरूआत करके एक बड़ी समाज-सुधार एवं जनकल्याण की योजना को आकार दिया, यह योजना ऐसे गरीब परिवारों के लिए है जो अपनी बेटियों की शादी का खर्च नहीं उठा सकते। उन परिवारों की लड़कियों का विवाह सामूहिक विवाह के रूप में किया जाता है जिन पर 35 हजार रुपए खर्च किए जाते हैं। यह योजना एक अच्छी पहल है ताकि गरीब परिवार अपनी बेटियों को बोझ नहीं समझें। इस योजना का लाभ गरीब विधवा तथा तलाकशुदा महिलाएं भी उठा रही हैं। योगी आदित्यनाथ यद्यपि गुरु गोरखानाथ पीठ के महंत हैं, समाज-सुधारक है, जिस तरीके से वह सामाजिक कार्य कर रहे हैं, इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।
आज शादी में 40-50 लाख का व्यय मध्यम वर्ग में एवं एक करोड से कई करोड उच्च वर्ग में आम बात हो गई है। उत्सवों में लाखों रुपये खर्च कर दिये जाते हैं और इस व्यवस्था में धार्मिक समारोह भी पीछे नहीं हैं। इस राशि से एक पूरा परिवार पीढ़ियों तक जीवनयापन कर सकता है। हजारों अभावग्रस्तों को सहारा मिल सकता है। एक विवाह के नाम पर हो रहे इस बेहूदा एवं बेतूके खर्च पर काबू पाना वर्तमान की बड़ी जरूरत है, यह शोचनीय है। समाज-सुधार के जब भी प्रस्ताव पारित किए जाते हैं तो स्याही सूखने भी नहीं पाती कि खरोंच दी जाती है। आवश्यकता है एक सशक्त मंच की, एक व्यापक जनजागृति की। हम सबको एक बड़े संदर्भ में सोचने का प्रयास करना होगा। जिस प्रकार युद्ध में सबसे पहले घायल होने वाला सैनिक नहीं, सत्य होता है, ठीक उसी प्रकार प्रदर्शन और नेतृत्व के दोहरे किरदार से जो सबसे ज्यादा घायल होता है, वह है आपसी भाईचारा, समाज की व्यवस्था। इस घायल होती समाज-व्यवस्था को दूरगामी सोच से योगी सरकार ने त्राण दिया है, नया जीवन दिया है। जिस तरह से उन्होंने हर जाति के गरीब वर्ग के लिए सामूहिक विवाह योजना चलाई है, वह समाज के लिए अनुकरणीय है। रुढ़िवादी परम्पराओं के चलते समाज में अभी भी दहेज प्रथा समाप्त नहीं हुई है। इसी कारण चट मंगनी और पट तलाक के मामले बढ़ रहे हैं। मुस्लिम समाज में भी तीन तलाक को कानूनी रूप से खत्म करने के बावजूद रोजाना तीन तलाक के मामले सामने आ रहे हैं। समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि संयुक्त परिवारों के घटते प्रभाव के कारण ऐसे मामले बढ़े हैं। सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन के लिए शादियों को पवित्र बंधन का संस्कार बनाया जाए, न कि वैभव प्रदर्शन का। जो हम चाहते हैं और जो हंै, उनके बीच एक बहुत बड़ी खाई है। बहुत बड़ा अन्तराल है। पीढ़ी का नहीं, नियति का। सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था बदलाव चाहती है और बदलाव का प्रयास निरंतर चलता है। चलता रहेगा। यह भी नियति है।
योगी सरकार ने एक वर्ष में सामूहिक विवाह के लिए 250 करोड़ का बजट प्रावधान किया था। इस योजना से समाज में सर्वधर्म और सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलता है। दहेज के कलंक से मुक्ति मिलती है और विवाह उत्सव में अनावश्यक खर्च पर रोक लगती है। अगर समाज में सब सुखी परिवार की कामना करते हैं तो हमें खोखली प्रतिष्ठा से बचना ही होगा और विवाह को पवित्र गठबंधन मानना होगा। राज्य सरकारों का दायित्व सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ा होता है। उनके लिए समाज कल्याण ही सर्वोपरि होता है। योगी सरकार का सामूहिक विवाह का संकल्प राष्ट्र एवं समाज के प्रति एक सार्थक योगदान है। समाज-सुधार के लिये अभी कुछ नहीं हुआ, तो फिर कब होगा? इस प्रश्न का उत्तर भी हमें ही तलाशना होगा, इस कार्य में यदि सरकार भी आगे आती है तो समाज परिवर्तन को घटित होते ज्यादा समाज नहीं लगेगा। इसी सोच से संगठित चेतना जगाएं ताकि एक दीया भी दीए से दीया जलाने की परम्परा निभाता रहे।

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