लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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कल शर्मा जी मेरे घर आये, तो हाथ में मिठाई का डिब्बा था। उसका लेबल बता रहा था कि ये ‘नेहरू चौक’ वाले खानदानी ‘जवाहर हलवाई’ की दुकान से ली गयी है। डिब्बे में बस एक ही बरफी बची थी। उन्होंने वह मुझे देकर डिब्बा मेज पर रख दिया।

– लो वर्मा, मुंह मीठा करो।

– शर्मा जी, आज कुछ खास बात है क्या; आप दादा बने हैं या नाना; या शर्मा मैडम के विवाह की वर्षगांठ है ?

– नहीं वर्मा, ऐसा कुछ नहीं है। तुम तो मिठाई खाओ।

– पर कुछ तो बताइये। ये मिठाई किसी नये प्राणी के आगमन की है या किसी अति प्राचीन व्यक्ति के जाने की।

– तुम तो लोगों के आने-जाने की ही गिनती करते रहते हो। अखबार पढ़ो, तो पता लगे कि देश के उद्धार के लिए कितना बड़ा निर्णय ले लिया गया है।

– अच्छा, क्या लोगों के बैंक खातों में 15 लाख रु. आने शुरू हो गये हैं ?

– जी नहीं। ये तो मोदी का जुमला था। अब इनके दिन बीत गये हैं। क्योंकि राहुल जी ने अमरीका के बर्कले विश्वविद्यालय में सबके सामने कह दिया है कि वे भी अब जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं।

– यानि अब वे वहां पढ़ाएंगे। ये तो बहुत खुशी की बात है। वैसे उनकी डिग्री किस विषय में है ?

– अरे पागल, वहां की नहीं, यहां की घरेलू जिम्मेदारी।

– अच्छा, तो वे अब शादी कर रहे हैं ? चलो बुढ़ापे में मम्मीश्री को कुछ आराम मिलेगा। उन्हें और आपको भी बहुत बधाई।

– फिर वही उल्टी बात। उन्होंने कहा है कि भारत में खानदानी राजनीति की जड़ें बहुत गहरी हैं। इसलिए यहां खानदानी नेता ही सफल हो सकते हैं।

– और राहुल बाबा तो खानदानी नेता हैं ही।

– इसीलिए तो मैं मिठाई बांट रहा हूं। जरा सोचो, जब डॉक्टर के बच्चे डॉक्टर और व्यापारी के बच्चे व्यापारी बन सकते हैं, तो राजनेताओं के बच्चे राजनेता क्यों नहीं बन सकते ?

– शर्मा जी, राजनीति कोई घरेलू पेशा नहीं है। यदि व्यापारी कारोबार में फेल हो जाए, तो उसके परिवार की ही हानि होती है; पर राजनीति और सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर यदि अयोग्य लोग बैठ जाएं, तो इसका दुष्परिणाम पूरे देश को भोगना पड़ता है। पर ये भी अजीब उलटबासी है कि दूसरों के वंशवाद का विरोध करने वाले नेता अपने बच्चों को राजनीति में स्थापित करने के लिए अपने विरोधियों से मिलने में भी संकोच नहीं करते।

– तभी तो मैं इसे राजनीति की विशेषता कह रहा हूं।

– शर्मा जी, भारत में हजारों साल तक राजतंत्र रहा है। वही प्रभाव हमारे खून में अभी तक बना है। पिछली सदी में मोतीलाल नेहरू ने धनबल से अपने नाकारा पुत्र जवाहरलाल को कांग्रेस में स्थापित किया। न जाने क्यों, गांधी जी भी इस चक्कर में फंस गये। नेहरू का समर्थन उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी, जिसके दुष्परिणाम आज तक भारत भोग रहा है।

– ये तुम्हारी सोच है।

– हो सकता है; पर यदि सरदार पटेल प्रधानमंत्री बनते, तो हैदराबाद और जूनागढ़ की तरह पूरा कश्मीर भी भारत में होता। भ्रष्टाचार हो या भाषा और क्षेत्रवाद, ये सब रोग नेहरू की ही देन हैं। इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर पूरे देश को जेल बना दिया था। पंजाब समस्या भी उन्हीं की देन है। इसी कारण उनकी हत्या हुई। राजीव ने बोफोर्स की दलाली खाकर अपना नाम कलंकित किया। फिर श्रीलंका के फटे में अपनी टांग फंसाने से उन्हें प्राण खोने पड़े। वंशवाद राजनीति की विशेषता नहीं, कोढ़ है।

– लेकिन ये तो सभी दलों में है ?

– जी हां। कांग्रेस की देखादेखी अधिकांश दल इसी लाइन पर चल रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला, पंजाब में बादल, बिहार में लालू और पासवान, उ.प्र. में मुलायम, हरियाणा में चौटाला, उड़ीसा में पटनायक, आंध्र में नायडू, महाराष्ट्र में पवार और ठाकरे, तमिलनाडु में करुणानिधि.., ये सब वंशवादी राजनीति के ठेकेदार हैं; पर अब इसके दिन लद गये हैं। क्योंकि अब यहां भा.ज.पा. का झंडा लहरा रहा है; और इस पार्टी में शीर्ष पर वंशवाद को कोई स्थान नहीं है। इसलिए राहुल बाबा से कहो कि वे ख्याली पुलाव पकाना छोड़ दें। यदि उन्हें अमरीका में कोई अच्छी नौकरी और छोकरी मिल जाए, तो वे उसे स्वीकार कर लें। इससे उनका भी भला होगा और भारतीय राजनीति का भी।

शर्मा जी से कुछ कहते नहीं बना। उन्होंने गुस्से में मिठाई का खाली डिब्बा उठाया और तोड़कर उसे कूड़ेदान में डाल दिया। शायद वे समझ गये कि भारत में वंशवादी राजनीति का स्थान अब कहां है ?

– विजय कुमार

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