राजनीति के अखाड़े बनते राजभवन

प्रमोद भार्गव

देश के राजभवन राजनीति के अखाड़े और राज्यपाल मोहरे बन रहे हैं। राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति और उनके पूर्वग्रहों से प्रभावित कार्यप्रणाली से राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद की गरिमा विवादग्रस्त होकर धूमिल होती रही है। इसका ताजा उदाहरण महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी हैं। यही नहीं महराष्ट्र में आनन-फानन में भाजपा एवं एनसीपी के बागी अजित पवार की सरकार बनवाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की भूमिकाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं। प्रधानमंत्री ने आधी रात को अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए कैबिनेट की बैठक बुलाए बिना राष्ट्रपति को महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाने की अनुशंसा कर दी और रात को ही राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति शासन खत्म भी कर दिया। इसके बाद सुबह करीब 8 बजे राज्यपाल कोशियारी ने मुख्यमंत्री के रूप में देवेन्द्र फडणवीस एवं उपमुख्यमंत्री के रूप में अजित पवार को शपथ दिला दी। आखिर बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को ऐसी क्या जल्दी थी कि बिना बहुमत की सही जानकारी लिए मनमानी कर डाली? साफ है, यह पूरी कवायद राजनीतिक निष्ठा के चलते संपन्न हुई है, न कि संविधान के प्रति निष्ठा या प्रतिबद्धता के अनुसार? हालांकि ऐसा इंदिरा गांधी के कार्यकाल से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल तक होता रहा है। महाराष्ट्र से कुछ समय के पहले कर्नाटक, गोवा व उत्तराखंड में भी यही स्थिति पैदा हो चुकी है।दरअसल, राज्यपाल केंद्र सरकार के कृपापात्र होने के कारण पूर्वग्रही मानसिकता के चलते सरकार गिराने और बनाने का खेल-खेलते रहे हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं कही जा सकती है। राज्यपाल केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि जरूर होता है, लेकिन इसका यह आशय कतई नहीं है कि वह लोकतांत्रिक और संवैधानिक मान-मर्यादाओं को ताक पर रखकर राजनीतिक हथकंडे अपनाने लगे या राजनीति का खिलौना बनकर नाचने लग जाए। राज्यपाल का दायित्व संवैधानिक संहिताओं और परंपराओं को निभाने का है। इसलिए संविधान की मंशा के अनुरूप धीरज का परिचय देते हुए राज्यपाल को कदम आगे बढ़ाना चाहिए। न कि आनन-फानन में सरकार बनाने का फैसला ले लेना चाहिए। सवाल उठने लगे हैं कि इस मामले में राज्यपाल ने संविधान की बजाय अपनी राजनीतिक निष्ठा को प्रमाणित करने का काम किया। यदि राज्यपाल की नियुक्ति गैर राजनीतिक होती तो शायद महाराष्ट्र में ऐसे हालात पैदा नहीं होते।संविधान में परंपरा को आधार माने जाने के विकल्पों के चलते भी इस पद की प्रतिष्ठा को अहंकार का ग्रास लगा है। कुछ साल पहले अंतरराज्यीय परिषद ने इस पद को संवैधानिक और राजनीतिक समस्याओं से उबारने के हल तलाशे थे। कुछ बिन्दुओं पर सहमतियां भी बनी थीं। लेकिन परिषद की किसी भी सिफारिश को अमल में नहीं लाया गया। परिषद की रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण सिफारिश थी कि राज्यपाल की नियुक्ति अनिवार्य तौर से संबंधित प्रदेश के मुख्यमंत्री से जरूरी सलाह-मशविरे के बाद ही की जाए। इस रिपोर्ट में यह सिफारिश भी थी कि राजनीति से जुड़े रहे व्यक्तियों को राज्यपाल न बनाया जाए। साथ ही प्रत्यक्ष राजनीति से मुक्त होने के बाद वे राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों में हिस्सा लेने के अलावा अन्य सभी प्रकार की राजनीति गतिविधियों से दूर रहें, ऐसी हिदायत परिषद की थी। लेकिन इसमें राजनीतिक गतिविधियों की व्याख्या स्पष्ट नहीं थी। लिहाजा राज्यपाल अपनी राजनीतिक निष्ठा के अनुसार राजनीतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करने से नहीं चूकते हैं।धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने के कारण हमारे यहां धर्म आधारित अनेक संगठन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर से राजनीति और सार्वजनिक जीवन में क्रियाशील हैं। अर्थात कई संगठन ‘राजनीति में हैं भी और नहीं भी’ की स्थिति में हैं। जैसे भाजपा से जुड़े संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल, मुस्लिम लीग से जुड़े सिमी और जमात-ए-इस्लामी। ये संगठन ऐसे हैं जो खुद को राजनीतिक संगठन तो नहीं मानते, पर राजनीतिक गतिविधियों में लगातार सक्रिय रहते हैं। ऐसे में यदि राजनीतिक दलों के अनुषांगिक संगठनों से व्यक्ति की राज्यपाल के पद पर नियुक्ति हो जाती है तो यह नियुक्ति भी परोक्ष रूप से राजनीतिक नियुक्ति ही होती है। मसलन नतीजा फिर वही ‘ढाक के तीन पात’।दरअसल, कुछ इसी तरह के विकल्पों के चलते राज्यपाल के पद की प्रतिष्ठा का क्षरण हुआ है। ऐसे मसलों में शर्मनाक बात यह रहती है कि पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने में योगदान कुछ राज्यपाल खुद करते हैं। जैसा कि महाराष्ट्र में भगत सिंह ने किया। भगत सिंह एक लंबे राजनीतिक अनुभव से गुजरे हैं। लिहाजा उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उन्हें संविधान का ज्ञान नहीं है अथवा उन्हें भुलावे में रखा गया। राज्यपालों को केंद्र का चाकर (प्रतिनिधि) माने जाने की आधिकारिक दृष्टि राजनीतिक दलों की रही है। अतएव उसे केंद्र का विश्वासपात्र होना चाहिए। इसीलिए ऐसे सुझाव भी आते रहे हैं कि जब भी केंद्र में सत्ता परिर्वतन हो, तो सभी राज्यपालों को अपना त्यागपत्र स्वयं दे देना चाहिए। इस स्थिति को एक परंपरा के रूप में देखा जाना चाहिए। जबकि उच्चतम न्यायालय ने राज्पाल की वैधानिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि ‘राज्यपाल एक संवैधानिक पदाधिकारी है, जिस पर केंद्र सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।’ राज्यपाल की स्थिति का और खुलासा पांच न्यायमूर्तियों की एक संवैधानिक पीठ ने 4 मई 1979 के फैसले में भी किया है – ‘यह ठीक है कि राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है। इसका अर्थ हुआ कि वास्तव में यह भारत सरकार द्वारा की जाती है। लेकिन नियुक्ति की केवल यह एक प्रक्रिया है। लिहाजा इसका यह अर्थ नहीं होता कि राज्यपाल केंद्र सरकार का कर्मचारी या नौकर है। इसी प्रकार इसका भी कोई अर्थ नहीं रह जाता कि राज्यपाल अपना पद राष्ट्रपति की इच्छा पर ही धारण कर रहता है।’ (ए.आई.आर. 1979, एस.सी. 1109 से उद्धृत)।वास्तव में अब जरूरत इस बात की है कि संविधान की जो मूल भावना है, उसे मजबूत किया जाए। संविधान की इस भावना का मूल मंत्र था कि संघीयता और एकात्मता का सामंजस्य संविधान की मूल धारा बने। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और संघीयता का ही पलड़ा भारी रहा। एकात्मता की महत्ता बनाए रखने की ही दृष्टि से संविधान निर्माताओं ने ऐसी संभावनाएं पाली थीं कि संघीयता और एकात्मता में परस्पर तालमेल बनाए रखने के लिए परंपराओं को आधार राज्यपाल बना सकते हैं। लेकिन बीते सात दशकों में परंपरा के बहाने राज्यपाल के पद का दुरूपयोग और गरिमा का भंजन ही ज्यादा हुआ है। इसलिए अब जरूरी हो गया है कि राज्यपाल की नियुक्ति में राज्य की भागीदारी और राज्यपाल को उसके पद से हटाये जाने की कानून सम्मत प्रक्रिया का उल्लेख का समावेश संविधान में हो, जिससे राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री परस्पर सामंजस्य बिठाकर राज्य के तंत्र को निर्विवाद रूप से संचालित कर प्रदेश की प्रगति में भागीदार बनें। ऐसी स्थिति कालांतर में निर्मित होती है तो राज्यपाल नियोक्ता दल के प्रति निष्ठा न जताते हुए सरकारें बनाने या बिगाड़ने का काम नहीं करेंगी। दूसरे दल की सरकार को बर्खास्तगी का भय नहीं दिखाएंगे और राज्य सरकार का काम सुचारू रूप से चलने की उम्मीद की जा सकेगी।

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