लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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politicsडा. राघेश्याम द्विवेदी
वर्ष 2014 में एन डी ए ने जो ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की हैं, उससे देेश के सारे राजनीतिक समीकरण धराशायी हो गये हैं। कांग्रेस की नांव तो वैसे ही डूबती जा रही थी। उसे पुनः संभलना इतना आसान दिखलाई नहीं पड़ा रहा है। और ना ही इसकी आगे कोई संभावना ही दिख रही है। यदि एन डी ए से कोई बहुत बड़ी जनविरोधी कार्य हो जाये, तभी कांग्रेस के लिए कोई आशा की किरण दिखाई देगी। कम से कम राहुल गांधी में वह ऊर्जा है ही नहीं, जो पार्टी व जनता में कोई जोश भर सके। हां, देश में घूमने टहलने तथा मोदी जी की हर बात में कमी निकालते-निकालते वह विल्कुल अप्रासंगिक होते जा रहेे हैं। नेहरू व गांधी परिवार की स्वामिभक्ति के कारण अन्य कोई दूसरा नेता इस पार्टी में स्वीकार्य होना प्रतीत नहीं हो रहा है।
कांगेस के कमजोर होने का लाभ भाजपा ने भरपूर उठाया है। जब-जब कांग्रेस कमजोर होती हैं, तब-तब तीसरे मोर्चे का सिगूफा उड़ने लगता है। इनके नेता जनता को झूठे शब्जबाद दिखाकर अपनेे पक्ष में खीचने की कोशिस करने लगते हंै। दिल्ली में अन्ना का फैक्टर तथा बिहार में जातिवाद की जड़ो ने देश की नैतिकता व सुचिता को तार-तार कर दिया है। बचा-कुचा काम तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार ने करने की ठान रखी है।
उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव ने राजनीति में नौतिकता का पूर्णतः अधःपतन कर ही दिया है। सपा व बसपा का वोटबैंक अब स्थिर नही रहा। अन्य क्षेत्रीय दलों ने बारी-बारी से जनता को जो धोखा दिया है, उसका खामियाजा इनको भुगतना पड़ा है। बिहार चुनाव के आसन्न होने पर ये गैर भाजपा तथा गैर कांग्रेस को कमजोर कह-कह करके अनेक उल्टे-सीघे मुद्दे व हथकण्डे अपनाकर, इन्होने भाजपा को शिकस्त देने में सफलता प्राप्त कर ली है। यही सब कुछ उत्तर प्रदेश में भी दोहराने की भी योजना बनती दिख रही है।
उत्तर प्रदेश में एक षडयंत्र के तहत पंचायत चुनाव को आगामी विधान सभा चुनाव का टेलर मानकर देखा जा रहा है। इसे अपने पक्ष में कर लेने के लिए सत्तारूढ सपा ने कई अलग-अलग किस्तों व चरणों में इसे कराने का फैसला लिया गया है। पिछले चुनावों तक यह एक या दो किस्तों में हो जाया करता था। इस बार पहले जिला परिषद व क्षेत्र विकास परिषद के सदस्यों का चुनाव कराया गया। अपने सदस्य को जिताने के लिए इस बार जो कुछ हुआ वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक नहीं हुआ था । खुले आम मत खरीदने के प्रयास किये गये। नोट,कपड़े, साड़ियां तथा कम्बल आदि खुले आम बंटे हैं। इस खरीद फरोख्त में अनेक जगह हिंसक घटनाये भी हुई हैं।जहां खरीद-फरेाख्त सफल नहीं हुआ वहां साम, दाम, दण्ड तथा भेद की नीति अपनाकर अपने पक्ष में करने की सारी औेपचारिकता निभाई गयी। विपक्षी भाजपा, बसपा तथा कांग्रेस चिल्लाते रहे और चुनाव सकुशल मानते हुए सम्पन्न करा लिये गये।
राजनीति की खत्म होती सुचिता अभी तो अच्छा लग रहा हैं, लेकिन 2017 में जब विधानसभा चुनाव होगा तो हर पार्टी के पैर के नीचे जमीन खिसक जाएगी। जो बीज सपा ने इस छोटे से चुनाव में बो रखे हैं उसकी फसल उस समय तक अपनी जड़े जमा लेगी। फिर यदि कोई टी. एन. शेषन जैसा चुनाव आयुक्त ही इस रोग से निजात दिला पायेगा। अन्यथा सब कुछ दिखावटी ही रह जाएगा । इसी प्रकार ग्राम प्रधान, ब्लाक प्रमुख तथा पंचायत अध्यक्ष का चुनाव भी सम्पन्न कराये गये हैं। यदि उत्तर प्रदेश में सर्वे कराके देखा जाय तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि पंचायत अध्यक्ष कोई आम आदमी नहीं हो सका है। या तो यह किसी मंत्री या विधायक का परिवारी जन होगा या रिश्तेदार । यही नहीं इन अध्यक्ष को विधान परिषद के माध्यम से राजनीति में प्रवेश कराया जा रहा है। जिस प्रकार बिहार में श्री लालू प्रसाद जी के दस पास बेटे को उप मुख्यमंत्री का पद मिल जाता है। उसी प्रकार राजनेता उत्तर प्रदेश में अपने अपने पाल्योें व रिश्तेदारों को महिमा मण्डित कराने में लगे हुए है। फिर इसके लिए वे किसी को गाली भी दे सकते हैं। किसी उम्मीदवार को जेल या थान्हें में चुनाव अवधि में नजरबन्द भी करा सकते हैं अथवा अपनी पार्टी के शसस्त्र संगठनों से मारपीट तथा हत्या तक करा सकते हैं। इन्हें माननीय श्री मुलायम सिंह जी की एक भी सीख या नीति का कोई असर पड़ता दीख नही रहा है। इन चुनावों में कितनी हिंसाये इसी लिए होती हैं कि इन्हें माननीयों का संरक्षण प्राप्त रहता है और कानून को कोई डर नहीं रहता है। आज के युग में किसी भी नौकरशाह में इतनी हिम्मत नहीं कि वह इन माननीयों के विरुद्ध एक शब्द भी बोल सकें। आखिर उन्हें मन माफिक पोस्टिंग तो यही माननीय ही दिलाते हैं। कोई खेमका या दुर्गाशक्ति नागपाल या अमिताभ बनने की भूल क्यों करेगा ?
एक समय था जब गांव के या क्षेत्र के असरदार लोगों को लोग पकड़कर उनकी सिपारिश कर उन्हें सरपंच या मुखिया निर्विरोध चुन लिया करते थे। और मुखिया भी पूरी ईमानदारी से अपना कम आम जनता का ज्यादा ही ख्याल रखते थे। मुखिया का निर्णय हर कोई मानता था। यहां तक कि उससे या समाज से गरीब पिछड़े की मदद भी दी जाती थी। कोई ना तो कोर्ट कचहरी जाता था और ना ही पुलिस थान्हें जाना पड़ता था। परन्तु जब से पंचायतों तथा स्थानीय निकायों को वित्तीय अधिकार तथा अनुदान मिलने लगा। लोगों की नीयत में खोट आने लगा है। अब लोग विना श्रम के सरकारी धन के बन्दर बांट के लिए ही इन चुनावों को अपने आन, बान तथा शान की तरह मानने लगे है।
अपने निहित स्वार्थ के वशीभूत होकर वर्तमान समय में नेता बेलगाम हो चुके हैं। वे मनमानी वह सब कुछ बक रहे हैं जो दूसरों को सोलह आने चिढाने वाला हो। उन्हें उनके हाई कमानों ने पूरा का पूरा छूट दे रखा है। आज एक छोटे कद का नेता छोटी बात करता नहीं देखा जाएगा। हर छोटी से छोटी घटना को मोदी का नाम लेकर बदनाम किया जाता हैं। एक छोटे प्रदेश दिल्ली का मुख्य मंत्री श्री केजरीवाल हर बात में मोदी जी को चुनौती देते नजर आता है। कांग्रेस नेता श्री रााहुल गांधी की स्क्रिप्ट में मोदी के अलावा कोई दूसरा कान्टेन्ट खोजने पर भी नहीं मिलेगा। जहां भाजपा की सरकार होगी, वहां की हर किसी छोटी घटना में इन्हें देखा जा सकेगा, परन्तु जहां उनकी अपनी कांग्रेस की सरकार रहेगी वहां वह झांकने तक नहीं जाएगे। और ना ही कोई राजनीतिक मुद्दा उन्हें व उनके स्क्रिप्ट राइटर को सूझेगा। यही हाल श्री आजम खां साहब की भी है। वे हर एक आतंकवादी घटना को मोदी से जोड़कर देेखने लगते हैं। चाहे मोदी की पाकिस्तान यात्रा हो या अन्य कोई विदेशी यात्रा ,विपक्षियों के चश्में का पावर कुुछ इतना वढ़ जाता है कि वे भूत वर्तमान की कम भविष्य के कपोल कल्पित दृश्य ज्यादा देखने लगते है।
देश के बुद्धजीवी ,इन्साफ पसन्द , न्यायपालिका के प्रबुद्ध विद्वानों तथा लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ मीडिया का रोल इस संक्रमित काल में ज्यादा बढ़ जाता है। उन्हें भारत की परम्परा व नौतिकता को देखते हुए इसके सामने आने वाले आसन्न खतरे को भांपना चाहिए तथा एसा प्रयास करना चाहिए कि विश्व गुरू की जो महिमा पहले से भारत ने अर्जित कर रखी है, वह ना तो समाप्त होने पाये ओर ना ही उसमें किसी प्रकार का दाग लगने पाये। इसके लिए हर भारतवासी का यह कर्तव्य ओर धर्म बन जाता है कि वह अपने छोटे-छोटे स्वार्थ को तिलांजलि देते हुए राष्ट्र और राज्य के आम लोगों के व्यापक हितों को प्रथम वरीयता दे।

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