लेखक परिचय

सुरेन्द्र नाथ गुप्ता

सुरेन्द्र नाथ गुप्ता

मेरठ के एक हिंदुनिष्ठ परिवार में जन्म, बचपन से रा. स्व. सं. में स्वयंसेवक शिक्षा: एम०एससी०(सांख्यकी), पी०एचडी०(ओपरेशन्स रिचर्स), एलएल०बी० अनुभव: मेरठ, लीबिया, यमन व् फिजी के विश्व विद्यालयों में ४६ वर्षों तक शिक्षण कार्य के बाद प्रोफेसर पद से सेवा निवृत अभिरुचियाँ: एतिहासिक, धार्मिक व समाजिक विषयों का पठन, पाठन व लेखन संपर्क सूत्र: मोबाइल: +91 9910078594,

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डा० सुरेन्द्र नाथ गुप्ता
रक्षाबंधन पर्व या राखी उत्सव भारतीय हिंदू कैलेन्डर के श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, इसीलिये इसे श्रावण-पूर्णिमा भी कहा जाता है | संपूर्ण भारत में और फिजी, मॉरीशस व् सूरीनाम सहित विश्व के अनेक देशों में जहाँ-जहाँ भी हिंदू रहते है, वे इस उत्सव को बड़े उत्साह के साथ मनाते है |
रक्षाबंधन एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “रक्षा का बंधन” अर्थात किसी की रक्षा का भार अपने ऊपर लेना | हिन्दु समाज में यह पर्व अत्यंत प्राचीन काल से भाई- बहन के शुद्ध निस्वार्थ प्रेम के प्रतीक रुप में मनाया जाता रहा है| बहन अपने भाई की कलाई में रक्षा सूत्र ( राखी) बाँध कर और मस्तक पर तिलक लगा कर भाई के दीर्घायु होने और उसके सब प्रकार से सुख की मंगल कामना करती है, और भाई अपनी बहन को प्रतीक रुप से उपहार भेंट दे कर उसकी हर प्रकार से रक्षा करने का संकल्प करता है | रक्षाबंधन का यह त्यौहार, शुद्ध मानवीय संवेदनाओं और स्व-स्फूर्त पारिवारिक संबंधों पर आधारित भाई- बहन के प्रेम में छुपी निस्वार्थ त्याग और समर्पण की उदात्त भावनाओं को पुष्ट करके एक समरस और परस्पर सहयोगी समाज निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है | इसीलिये हिन्दुओं के सबसे विशाल एवम् प्रभावी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आठ उत्सवों में रक्षाबंधन को सम्मलित किया गया है | आज के दिन स्वयं सेवक भारत माता की एकता और अखंडता के लिए एक दूसरे को रक्षा-सूत्र बाँधते हुए गाते हैं:
रक्षा सूत्र में सिमट-सिमट, हम आज पुनः बाँधते जाते |
माता के शत्-शत् खंडित मन्दिर का शिलान्यास करते जाते ||

महाराष्ट्र (मुंबई) के तटीय क्षेत्रों में इस पर्व को नारियल पूर्णिमा भी कहते हैं | इस पूर्णिमा को समुद्र में ज्वार कम आता है और वहां के लोग समुद्र को नारियल अर्पित करके वरुण देव से अपने जल पोतों की सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं |
भारत के उत्तराखंड राज्य के कुमायू क्षेत्र में यह त्यौहार जन्यो-पुन्यु कहलाता है और इस दिन लोग अपने पुराने जनेऊ बदल कर नए जनेऊ धारण करते हैं | भारत के उत्तर में स्थित नेपाल राज्य में इसे जनेऊ पूर्णिमा कहा जाता है और इस दिन यहाँ के लोग भी अपने पुराने जनेऊ बदल कर शंकर भगवान के मंदिरों में जा कर विशेष पूजा अर्चना करते हैं |
रक्षाबंधन के सम्बन्ध मॆं पौराणिक गाथाए
इस दिन अयोध्या के महाराज दशरथ ने सरयू नदी से अपने अन्धे माता पिता के लिए पानी लेते हुए श्रवण कुमार को अनजाने में गलती से मृग समझ कर शब्द भेदी बाण से घायल किया था जिस से श्रवण कुमार की मृत्यु हो गई थी | अपराध बोध से दुखी राजा दशरथ ने अपने राज्य में इस दिन शिकार पर प्रतिबंध की घोषणा की थी | यह दिन जिस माह की पूर्णिमा थी, उस माह को श्रवण कुमार के नाम पर श्रावण मास कहा गया |
भागवत पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार वामन भगवान ने दानव राजा बलि से तीन पग के बराबर भूमि दान देने का वचन लिया और दो पग में तो पृथ्वी लोक और आकाश लोक नाप लिए परन्तु जब तीसरे पग के लिए स्थान नहीं बचा तो महादानी राजा बलि ने अपना सिर प्रस्तुत कर दिया | वामन रुप विष्णु भगवान ने प्रसन्न हो कर राजा बलि से वर् माँगने को कहा तो बलि ने भगवान को सदा अपने सामने रहने का वर् माँग लिया | भगवान विष्णु दानव राज बलि के पास रहने लगे, बैकुण्ठ खाली हो गया | तब लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बाँध कर भाई बनाया और उपहार में विष्णु जी को माँग कर बलि के वचन से मुक्त कराया था | तभी से हिन्दू धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय एक श्लोक का उच्चारण किया जाता है, जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।
येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
यह श्लोक रक्षाबन्धन का अभीष्ट मन्त्र है। इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है- “जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ, तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।”

विष्णु पुराण के अध्याय पाँच में माता यशोदा भी अपने लाड़ले कृष्ण को रक्षा सूत्र बाँध कर भगवान से उसकी रक्षा की कमाना करती है |
भविष्य पुराण में एक प्रसंग आता कि देवासुर संग्राम में जब देवता हारने लगे तो इंद्राणी शचि ने मंत्रों से अभिसिंचित रक्षा सूत्र इन्द्र की कलाई में बाँधा था जिससे देवताओं की विजय हुई|
एक अन्य कथा है कि एक बार गणेश जी को उनकी बहन ने रक्षाबंधन के दिन राखी बाँधी तो गणेश जी के दोनो पुत्र शुभ और लाभ बहुत दुखी हुए क्योंकि उनके कोई बहन नहीं थीं| देवऋषि नारद ने गणेश जी से कहा कि उनकी पुत्री अत्यन्त भाग्यशाली और सुख देने वाली होगी | तब गणेश जी ने अपनी पत्नियों ऋद्धी और सिद्धि में योगाग्नि प्रज्वलित की जिससे संतोषी माँ नाम की कन्या का जन्म हुआ और शुभ और लाभ को बहन प्राप्त हुई |
महाभारत की एक घटना है कि शिशुपाल वध के समय कृष्ण की एक अँगुली उनके सुदर्शन चक्र से जख्मी हो गयी तो द्रौपदी ने अपनी साड़ी का आँचल फाड़ कर कृष्ण की अँगुली में बाँध दिया | कृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा का वचन दिया और हस्तिनापुर की राजसभा में चीरहरण के समय कृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचा कर धर्म और वचन दोनों को निभाया था| पांडवों की माता कुन्ती ने भी अपने पौत्र अभिमन्यु को चक्रव्युह में जाने से पहले राखी बाँध कर उसकी कुशलता की कामना की थी |
ऐतिहासिक घटनाए
कहतें हैं कि यूनान के राजा सिकंदर और सिंध के राजा पुरु (पौरस) के युद्ध के वक्त सिकंदर की पत्नी रोश्नक (रोक्साना) ने पुरु को राखी भेजी थीं| रणभूमि में पुरु जब सिकंदर पर आखिरी घातक वार करने वाला था तो उसे अपनी कलाई में बँधी राखी दिखाई दीं और पुरु ने अपना वार रोक लिया था |
भारत के इतिहास की एक प्रसिद्ध घटना है कि मेवाड़ के राणा सांगा की विधवा रानी कर्णवती ने गुजरात के बहादुर शाह के आक्रमण से भयभीत होकर मुगल बादशाह हुमायू को राखी भेज कर अपनी रक्षा का आवाहन किया था | भारत के मध्यकालीन इतिहास में और भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जब राखी की भावना से प्रेरित होकर राजपूत वीरों ने अपने प्राणों को जोखिम में डाला था |
यद्यपि प्रचलन के अनुसार रक्षाबंधन भाई- बहन का ही त्यौहार है, परंतु ऐतिहासिक और पौराणिक आख्यानो से स्पष्ट है कि हिंदू समाज मॆं रक्षासूत्र का एक भावनात्मक एवम् रागात्मक महत्व है और इसका प्रयोग अनादि काल से अत्यन्त व्यापक सन्दर्भ मॆं होता आया है| वास्तव मॆं रक्षासूत्र एक प्रतीक है निस्वार्थ भाव से त्याग का, परस्पर सहयोग का और नैतिक कर्तव्यों के निर्वाह हेतु सर्वस्व बलिदान की प्रेरणा का |

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