रामायाण सर्किट का निर्णय एक सार्थक दिशा

ललित गर्ग 
धार्मिक-आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के मकसद से उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने देश में रामायण सर्किट बनाने की दिशा में पहल की है। यह राजनीति में नया सकारात्मक प्रचलन है जिससे हिन्दू पयर्टन को प्रोत्साहन मिलेगा। भारतीय जनता पार्टी और उनकी सरकार न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि समूचे देश में हिन्दू मतदाताओं को आकर्षित करने की दिशा में अग्रसर है, इसकी आवश्यकता भी है। क्योंकि हिन्दू मतदाताओं को अक्सर लुभाने के ही प्रयत्न हुए है उनसे किये वायदे आधे-अधूरे ही रहे हैं। योगी सरकार ने अवैध बूचडखानों पर कार्रवाई एवं गौवध को नियंत्रित करने के लिये भी कठोर निर्णय लिये हैं। राम मन्दिर का निर्माण भी हो जाने की उम्मीद की जा रही है। योगी सरकार चुनावी वायदों को पूरा करके उत्तरप्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की दिशा में डग भर रही है, बदलाव की यह बयार शुभता एवं श्रेयस्करता की सूचक है।
भारत में हिन्दू संस्कृति और उसके ऐतिहासिक स्थलों की उपेक्षा एक गंभीर चिन्ता का कारण बनती रही है। जबकि दुनिया में हिन्दू संस्कृति और उसके ऐतिहासिक स्थलों के प्रति गहरा आकर्षण है। सदियों से विदेशी पर्यटक हिन्दू तीर्थस्थलों एवं ऐतिहासिक स्थलों के पर्यटन के लिये आते रहे हैं। ऐसा नहीं कि हिंदू तीर्थाटन हाल के वर्षों में ही बढ़ा है। वर्ष-भर जिस तरह से विदेशी पर्यटक एवं हिन्दू समाज के लोग धार्मिक यात्राएं करते हैं, उसे देखते हुए रामायण सर्किट का निर्णय बहुत पहले हो जाना चाहिए। 
देर से ही भले हो पर रामायण सर्किट के निर्माण की योजना समय की बड़ी जरूरत थी, अब इसकी बड़ी योजना बनी है जिसमें एक-दो नहीं, बल्कि नौ राज्यों के पंद्रह स्थानों को शामिल किया जाएगा। ये सारे वे स्थान हैं जिनके बारे में माना जाता है कि भगवान श्रीराम यहां से गुजर रहे थे। सरकार ने इसके लिए एक सौ तैंतीस करोड़ रुपये की योजना को हरी झंडी दे दी है। स्वदेश दर्शन योजना के तहत देश में जो तेरह पर्यटन सर्किट बनाए जाने हैं, रामायण सर्किट भी उसी का हिस्सा है। यह रामायण सर्किट उत्तर प्रदेश में अयोध्या, श्रंगवेरपुर और चित्रकूट, बिहार में सीतामढ़ी, बक्सर और दरभंगा, पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम, ओडिशा में महेंद्रगिरि, छत्तीसगढ़ में जगदलपुर, तेलंगाना में भद्राचलम, तमिलनाडु में रामेश्वरम, कर्नाटक में हंपी, महाराष्ट्र में नाशिक और नागपुर से होकर गुजरेगा। इसके अलावा श्रीकृष्ण सर्किट, बौद्ध सर्किट, जैन सर्किट और सूर्फी सर्किट की योजना पर भी काम होगा। इन सर्किट के बन जाने से निश्चित ही पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा एवं भारत की हिन्दू एवं विविध धर्मो की संस्कृति को सुदृढ़ किया जा सकेगा।
यह तय है कि भारत एक आध्यात्मिक एवं धार्मिक मान्यता का राष्ट्र है।  सर्किट-विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने में बड़े मददगार होते हैं। इसका फायदा यह होता है कि ज्यादात्तर पर्यटन-स्थल विकास के दायरे में आ जाते हैं। देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए सम्मानपूर्वक घूमना आसान हो जाता है। उन्हें भटकना नहीं पड़ता। उनकी सुरक्षा एवं सुविधाओं का पर्याप्त ध्यान रखा जाता है।
अक्सर राजनीतिक दल चुनावों के समय चांद-तारे तक तोड़कर लाने के वादे कर बैठते हैं मगर सत्ता हासिल होते ही वे किये गये वादों को भूल जाते हैं और बगले झांकने को मजबूर हो जाते हैं। राज्य के विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान हिन्दू मतदाताओं से वादा स्वयं प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने किया था और अब किये गये वायदें आकार ले रहे हैं। रामायण सर्किट हो या श्रीराम मन्दिर के मुद्दे- भले ही ये राजनीतिक मुद्दे हो, लेकिन इनसे अधिसंख्य लोगों की भावनाएं जुड़ी है।
दो तरह के नेता होते हैं- एक वे जो कुछ करना चाहते हैं, दूसरे वे जो कुछ होना चाहते हैं। असली नेता को सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी होकर, प्रासंगिक और अप्रासंगिक के बीच भेदरेखा बनानी होती है। संयुक्त रूप, सबको साथ लेकर कार्य करने की मंशा ने प्रदेश के नक्शे को बदला है, प्रगति की फिजाएं उद्घाटित हुई है। रामायण सर्किट के निर्णय से निश्चित तौर पर प्रदेश एवं अन्य स्थानों पर अनेक नयी संभावनाएं आकार लेगी। इससे रोजगार पैदा होंगे। प्रदेश में ज्यादा से ज्यादा लोग घूमने आएं, इसी मकसद से पिछले साल अयोध्या में एक लाख दीयों से दीवाली उत्सव मनाया गया था। पर हैरानी की बात है कि अयोध्या में ज्यादात्तर मंदिर-मठ जीर्ण-शीर्ण हालात में है। इस पर आज तक किसी ने गौर करना उचित नहीं समझा। प्रदेश के ज्यादात्तर शहर ऐसे हैं जिनमें पर्यटन के विकास की अपार संभावनाएं हैं। पर्यटक आते भी हैं, लेकिन सुविधाओं का भारी अभाव है, अनेक परेशानियां उनको झेलनी पड़ती है। पर्यटकों को गुंदागर्दी, चोरी, लूटपाट और ठगी जैसी घटनाओं का भी सामना करना पड़ता है। महिला पर्यटकों से छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी घटनाओं से कई बार भारत को शर्मसार होना पड़ा है। सर्किट बन जाने से इन स्थितियों में बदलाव होगा। बनारस, अयोध्या, इलाहाबाद जैसे शहर तो पूरी दुनिया में हिंदू धर्म के प्राचीन और पवित्र धार्मिक स्थान पाने जाते हैं। सरकार बनारस में काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास के इलाके के सौन्दर्यकरण के लिये तत्पर है। विडम्बनापूर्ण स्थिति यह है कि सबसे पुराने और हिंदू आस्था के विश्वविख्यात तीर्थस्थल आज भी बुनियादी सुविधाओं के मोहताज हैं, उनकी उपेक्षा असहनीय है।
उपनिषदों में कहा गया है कि ”सभी मनुष्य सुखी हों, सभी भय मुक्त हों, सभी एक दूसरे को भाई समान समझें।“ ऐसा ही लक्ष्य योगी सरकार का प्रतीत हो रहा है और यही उनका मिशन है। इतिहास अक्सर किसी आदमी से ऐसा काम करवा देता है, जिसकी उम्मीद नहीं होती। और जब राष्ट्र की आवश्यकता का प्रतीक कोई आदमी बनता है तब वह नायक नहीं, महानायक बन जाता है। योगी आदित्यनाथ एक संन्यासी की ही नहीं, एक यायावरी की ही नहीं, एक राजनीतिज्ञ की ही नहीं, एक ऋषि की समझ रखते हैं। आध्यात्मिकता की गंगा, पराक्रम की जमुना और ज्ञान की सरस्वती उनमें साथ-साथ बहती है। इसलिये प्रदेश एक शांतिपूर्ण प्रगतिशील प्रदेश बनने की ओर अग्रसर है।
योगी ने रामायण सर्किट का निर्णय लेकर न केवल मोदी की जबान रखी बल्कि अपनी पार्टी के संकल्प पत्र का भी अनुसरण किया है। मेरी दृष्टि में यह शुरुआत है, प्रदेश को आध्यात्मिक एवं धार्मिक प्रगति की ओर अग्रसर करने के लिये संकल्प के साथ-साथ पुरुषार्थ भी अपेक्षित है। नियत और निष्ठा भी जरूरी है। क्योंकि सर्किट बन जाने भर से काम नहीं चलने वाला। तीर्थयात्रियों को पर्याप्त सुविधाएं और सुरक्षा देना भी सरकार की जिम्मेवारी बनती है। अब एक नया सूर्योदय हुआ है जिसमें आध्यात्मिक-धार्मिक विकास की संभावनाएं आकार लेती हुई दिख रही है। लोग केवल बुराइयों से लड़ते नहीं रह सकते, वे व्यक्तिगत एवं सामूहिक, निश्चित सकारात्मक लक्ष्य के साथ जीना चाहते हैं। अन्यथा जीवन की सार्थकता नष्ट हो सकती है और होती रही है। राजनीतिक मूल्यों में भी बदलाव के साथ-साथ आध्यात्मिकता की भावना बल पकड़नी चाहिए।
प्रदेश की जनता ने लम्बा वनवास भोगा है। प्रदेश के केनवास पर शांति, प्रेम, सुरक्षा, विकास और सह-अस्तित्व के रंग भरने होंगे , क्योंकि लम्बे दौर से केवल दलगत स्वार्थ और सत्ता की भूख प्रदेश पर हावी रही है। सबकी पूजा, प्रार्थना, उपासना की स्वतंत्रता भारतीय संस्कृति की विशेषता है। यही सबको भयमुक्त रखता है। किसी का कोई विरोध नहीं। सम्प्रदाय नहीं लड़ता है सम्प्रदायवाद लड़ता है। यह सम्प्रदायवाद तब बनता है जब इसका प्रयोग किसी दूसरे सम्प्रदाय के विरुद्ध राजनीतिक या सामाजिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। दरअसल साम्प्रदायिक विद्वेष के बीज वहीं जन्म लेते हैं जहां एक सम्प्रदाय का हित दूसरे सम्प्रदाय के हितों से टकराता है। आवश्यकता है धर्म को प्रतिष्ठापित करने के बहाने राजनीति का खेल न खेला जाए। राजनीति में सम्प्रदाय न आये, नैतिकता आए, आदर्श आए, श्रेष्ठ मूल्य आएँ। नैतिकता मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। ”कर्तव्य“ और ”त्याग“ भावना पूर्ति करने वाली है। अतः न ही इनका विरोध हो और न ही इनकी तरफ से दृष्टि मोड़ लेना उचित है। रामायण सर्किट का निर्णय केवल पर्यटन को ही प्रोत्साहन न दे बल्कि एक सकारात्मक वातावरण निर्मित करने का माध्यम भी बने।

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