लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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साहित्य से ही निवारण
मनोज ज्वाला
आज अपने देश में जितनी भी तरह की समस्यायें और चुनैतियां विद्यमान
हैं, उन सबका मूल कारण वस्तुतः बौद्धिक संभ्रम है , जो या तो अज्ञानतावश
कायम है या अंग्रेजी मैकाले शिक्षा-पद्धति से निर्मित औपनिवेशिक सोच का
परिणाम है अथवा वैश्विक महाशक्तियों के भारत-विरोधी साम्राज्यवादी
षड्यंत्र का अंजाम । राष्ट्रीय एकता-अखण्डता पर प्रहार करते रहने वाला
आतंकवाद , अलगाववाद , क्षेत्रीयतावाद,  सम्प्रदायवाद , धर्मनिरपेक्षतावाद
हो या आर्थिक विषमता की खाई को गहरी चौडी करने  वाली समस्याओं में शुमार
भूख बेरोजगारी गरीबी पलायन शोषण दमन हों अथवा सामाजिक जीवन  की
शुचिता-नैतिकता को ग्रसते जाने वाला अनाचार व्याभिचार भ्रष्टाचार हो या
व्यैक्तिक-पारिवारिक जीवन में घर करती जा रही स्वार्थपरायणता व संकीर्णता
हो , सब का मूल कारण अनुचित अनर्गल बौद्धिक-शैक्षिक परिपोषण ही है ; जबकि
किसी भी व्यक्ति-परिवार-समाज-राष्ट्र की बौद्धिकता-शैक्षिकता का सीधा
सम्बन्ध साहित्य से ही है । क्योंकि , साहित्य न केवल संस्कृति के
संवर्द्धन में सहायक होता है , अपितु लोक-मानस व लोक-प्रवृति के निर्माण
में भी साहित्य की महत भूमिका कारगर होती है ।
उल्लेखनीय है कि अपने देश की विभिन्न भाषाओं के साहित्य में जब तक
राष्ट्रीयता का स्वर प्रमुखता से मुखरित होता रहा , तब तक राष्ट्रीय एकता
अखण्डता की भावनायें राजनीतिक दासता से स्वतंत्रता-प्राप्ति तक पुष्ट
होती रहीं । किन्तु स्वतंत्र्योत्तर साहित्य में जब वामपंथी धारा के बहाव
से  जनवाद , दलितवाद , नारीवाद , प्रगतिवाद  ,  प्रयोगवाद जैसी
प्रवत्तियां मुखरित हो उठीं ; तब उनके प्रभाव-दुष्प्रभाव से देश में
पृथकतावाद व जातिवाद ही नहीं , बल्कि आतंकवाद व नक्सलवाद का हिंसक विषवमन
भी  होने लगा , जो आज राष्ट्र के समक्ष गम्भीर चुनौतियां बनी हुई हैं ।
इन सब अनुचित-अवांछित ‘वादों’ को किसी न किसी रुप में साहित्य से भी पोषण
हो रहा है , इससे इंकार नहीं किया जा सकता है । आज जवाहर लाल नेहरु
विश्वविद्यालय जैसे शीर्षस्थ शिक्षण संस्थानों में भारत विरोधी नारा
मुखरित हो रहे हैं , गो-मांस-भक्षण के समारोह आयोजित हो रहे हैं ; तो
समझा जा सकता है कि ऐसी मनः-स्थिति व राष्ट्र-विरोधी प्रवृति के निर्माण
में साहित्य की ही एक खास धारा की भूमिका रही है ।
इसी तरह से व्यक्ति के नैतिक पतन और लगातार बढ रहे पारिवारिक
विघटन में भी कहीं न कहीं ऐसी प्रवृत्तियों का निर्माण करने वाले साहित्य
का ही योगदान है । साहित्य के नाम पर जन-मानस को अवांछित-गर्हित विचारों
का मानसिक आहार परोसा जाना इसके लिए कम जिम्मेवार नहीं है । यह साहित्य
की एक खास धारा का ही प्रभाव है , जिसकी वजह से आज परिवार की परिभाषा बदल
कर पति-पत्नी व बच्चे  तक सीमित हो गई है । ‘प्रेम’ व ‘प्यार’ जैसे
पवित्र शब्दों को युवक-युवती या स्त्री-पुरुष के दैहिक आकर्षण एवं
वासनात्मक आचरण में परिणत कर देने और इसके परिणामस्वरुप समाज में बढ रहे
व्याभिचार-बलात्कार की प्रवृत्तियों के लिए तो सिर्फ और सिर्फ साहित्य ही
जिम्मेवार है । आज स्थिति यह हो गई है कि किसी युवती-स्त्री के प्रति
मैथुन-प्रेरित पशुवत आचरण करने वाले निकृष्ट अपराधी को भी उस
स्त्री-युवती का प्रेमी कहा जाने लगा है , तो दूसरी ओर भाई व बहन के
परस्पर सम्बन्ध के स्वरुप को ‘प्रेम’ या ‘प्यार’ कहे जाने में लोगों को
संकोच होने लगा है ।  यह साहित्य ही है , जिसके आधार पर सामाज में नैतिक
पतन व चारित्रिक क्षरण को बढावा देने वाली  फिल्मों के निर्माण हो रहे
हैं । फिल्मी नचनिया-बजनिया कलाकारों और तथाकथित अभिनेताओं को समाज में
व्याभिचार फैलाने वाली फिल्मों के निर्माण व अभिनयन हेतु कच्चे माल के
तौर पर फुहड गीतो व कहानियों की आपूर्ति किसी न किसी रुप में साहित्य से
ही रही है । आज किशोर-किशोरियों, युवक-युवतियों को फिल्मी कथा-कहानियों
से प्रेरित हो कर अपने जीवन की दिशा स्वयं निर्धारित करने तथा जीवन-साथी
स्वयं चयनित करने और उस निर्धारण-चयन में माता-पिता की उपेक्षा करने में
साहित्य ही प्रेरक बना हुआ है । पारिवारिक विघटन के लिए और भी तत्व चाहे
जितने भी जिम्मेवार हों , किन्तु साहित्य इसके लिए सर्वाधिक जिम्मेवार है
। अपने देश में संयुक्त परिवारों का विघटित होते जाना भले ही सिर्फ
सामाजिक चुनौती के रुप में चिन्हित हो रहा हो , मगर यह पारिवारिक विघटन
प्रकारान्तर में एक राष्ट्रीय चुनौती भी है ; क्योंकि इससे एकता की भावना
खण्डित होती है, स्वार्थपरता बढती है और सामूहिक-पारिवारिक विकास अवरुद्ध
होता है, जिससे अंततः राष्ट्र ही कमजोर होता है ।
आज हमारे राष्ट्र की सबसे गम्भीर समस्याओं-चुनौतियों में शुमार
‘साम्प्रदायिकता’ के लिए देश की सत्ता-लोलुप राजनीति के जिम्मेवार होने
के बावजूद साम्प्रदायिक तुष्टिकरण में तो राजनीति के साथ-साथ साहित्य भी
इसका पोषक सहायक रहा है । साम्प्रदायिक सौहार्द्रता के नाम पर
औचित्य-अनौचित्य का विचार किये बिना सम्प्रदाय-विशेष का पक्षपात करना और
बहुसंख्यक समाज पर आघात करना आज हमारे देश के साहित्य में आम प्रचलन  हो
गया है । इससे एक ओर राष्ट्रविरोधी चिन्तन-आचरण को पोषण मिलता रहा है ,
तो वहीं दूसरी ओर बहुसंख्यक समाज के हितों का हनन करने की दुष्प्रवृत्ति
का संवर्द्धन भी होता रहा है । सच को झूठ व झूठ को सच तथा उचित को अनुचित
व अनुचित को उचित ठहराने की कुटिलतापूर्ण राजनीतिक हठधर्मिता
स्वातंत्र्योत्तर भारत के साहित्य में भी घर चुकी है  । इसके
परिणामस्वरुप एक तरह का वैचारिक आतंकवाद, जिसे आप ‘सफेद आतंक’ भी कह सकते
हैं , आज अपने देश में तेजी से बढ रहा है । साहित्य की एक धारा से निःसृत
यह ‘सफेद आतंक’ ही है, जो हिन्दुओं के धर्मान्तरण को तो उचित ठहराता है ,
किन्तु धर्मान्तरित हिन्दुओं के परावर्तन को अपराध मानता है । इसी तरह
अपने देश की राजनीति में स्थापित धर्मनिरपेक्षता, जो किसी भी दृष्टि से
तर्कसंगत नहीं है ; बल्कि प्रकारान्तर में ‘छद्म साम्प्रदायिकता’ ही है ;
आज अपने देश की सबसे बडी चुनौती बनी हुई है , क्योंकि इससे देश की
एकता-अखण्डता व सुरक्षा ही खतरी में पडी दिखती है । किन्तु साहित्य की एक
धारा धर्मनिरपेक्षता की उसी राजनीतिक भेंडचाल के अनुसार बह रही है और
लोकमानस को भ्रमित कर रही है । वास्तव में धर्मनिरपेक्ष तो हुआ ही नहीं
जा सकता , क्योंकि समस्त विश्व-वसुधा धर्म की ही परिणति है और जबकि
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किया जाने वाला आचरण ‘छद्म साम्प्रदायिकता’ है
; इस तथ्य को साहित्य ही सत्य प्रमाणित-स्थापित कर सकता है । किन्तु
दुर्भाग्य से साहित्य यह काम नहीं कर रहा है , बल्कि धर्मनिरपेक्षता की
राजनीतिक अवधारणा को पुष्ट करने में ही लगा हुआ है । लेकिन यह भी इतना ही
सत्य है कि हिन्दू-हितों को साम्प्रदायिकता कहने और हिन्दुत्व-विरोध को
धर्मनिरपेक्षता मानने की भेडचाल को साहित्य ही आइना दिखा सकता है और यह
सत्य कायम कर सकता है कि हमारे राष्ट्र का अभीष्ट पंथनिरपेक्षता है , न
कि धर्मनिरपेक्षता ; जबकि धर्मनिरपेक्ष तो हुआ ही नहीं जा सकता है ।
मैंने तो अपने उपन्यास ‘सेक्युलर्टाइटिस’ में  इसी सत्य को स्थापित व
प्रमाणित किया भी है । मुझे इस उपन्यास के कई ऐसे पाठकों की
प्रतिक्रियायें मिली हैं , जो कल तक धर्मनिरपेक्षता के राजनीतिक चलन के
अनुसार धर्मनिरपेक्ष थे , किन्तु उपन्यास पढने के बाद उन्हें बौद्धिक
पोषण मिला तो वे अब धर्म का पक्षधर हो कर हिन्दुत्व के प्रति निष्ठावान
होते हुए ‘पंथ-निरपेक्ष’ के औचित्य पर बल देने लगे हैं । इससे कम से कम
मैं तो इस निष्कर्ष पर पहुंच गया हूं कि राजनीति के द्वारा देश में कायम
किये गए बौद्धिक संभ्रम से उत्त्पन्न चुनौतियों का समाधान साहित्य के
द्वारा ही किया जा सकता है । इसी तरह से ‘भारत माता’ एवं ‘वन्दे मातरम’
तथा ‘गौ-संवर्द्धन’ का विरोध किये जाने के पीछे सक्रिय राजनीतिक जमात को
भी साहित्य की उसी धारा से खुराक मिल रहा है , जो धर्मनिरपेक्षता की
अनर्गल व्याख्या कर लोकमानस को भ्रमित करती रही  है । अपने देश के
साहित्य में अगर ‘धर्मनिरपेक्षता’ व ‘छद्म साम्प्रदायिकता’ को एकार्थी
सिद्ध करने और ‘पंथ-निरपेक्षता’ को स्थापित करने की मुहिम चल पडे , तो न
केवल यह अवांछित अराष्ट्रीय राष्ट्रीय धारा सूख जाएगी
एकता-अखण्डता-सुरक्षा विषयक बहुत सारी चुनौतियों का समाधान भी हो सकता है

आज अपने देश की  राष्ट्रीय अस्मिता एवं पुरातन संस्कृति और
भारतीय धर्म-दर्शन, जीवन-दृष्टि तथा भारतीय ज्ञान-विज्ञान के प्रति हमारी
पीढियों में बढती अरुचि एवं निष्ठाहीनता तथा पश्चिम के प्रति बढती
पलायनवादिता के लिए भी कहीं न कहीं वर्तमान साहित्य ही जिम्मेवार है ।
हालाकि इन सब के प्रति लोगों में बची-खुची थोडी-बहुत निष्ठा , रुचि व
आकर्षण भी पूर्ववर्ती साहित्य के कारण ही कायम है ; इससे भी इंकार नहीं
किया जा सकता है । आज हमारे देश में जिस तरह की शिक्षा-पद्धति कायम है ,
उससे हमारी अस्मिता अब तक तो समाप्त हो जानी चाहिए थी ; किन्तु इसके
बावजूद अगर हमारे भीतर राष्ट्रीयता अभी जीवित है , तो निस्संदेह इसका
श्रेय साहित्य को ही है , जिससे यह प्रमाणित होता है कि साहित्य की
तत्सम्बन्धी सृजनशीलता से यह और पुष्ट हो सकती है; जबकि यथास्थितिवादिता
से हमारी अस्मिता धीरे-धीरे मिट भी सकती है  ।
हमारे देश की अधिकतर समस्याओं व चुनौतियों  का कारण यहां का
राजनीतिक प्रदूषण है और इस राजनीति का अभीष्ट सिर्फ शासनिक सत्ता है ।
ऐसे में इन चुनौतियों का समाधान साहित्य में ही ढूंढना वांछित है । कहा
भी गया है , बल्कि देखा भी गया है कि राजनीति जब डगमगाती है, तो साहित्य
उसे गिरने से बचाता है । किन्तु यह तभी सम्भव है जब साहित्य अपने धर्म-पथ
पर अडीग रहे । किन्तु अपने देश में वर्तमान स्थिति भिन्न है । साहित्य की
एक धारा साहित्य के स्वधर्म के पथ पर नहीं , बल्कि राजनीति के एक
पथ-विशेष पर उन्मुख हो उसी की हां में हां मिलाता रहा है ।
स्वातंत्र्योत्तर भारत का लोकमानस गढने में राजनीति व साहित्य की इसी
दुरभिसंधि का योगदान रहा है , जिसके तहत अब राजनीतिक परिदृश्य बदल जाने
पर पुरस्कार-सम्मान वापसी से लेकर सहिष्णुता-असहिष्णुता को मापने तक के
प्रहसन किये  जा रहे हैं । ऐसे में साहित्य की भूमिका अब और बढ गई है ।
साहित्य व राजनीति की दुरभिसंधि अगर कायम रही , तो स्थिति और बिगड्ती
जाएगी , किन्तु साहित्य अगर अपने स्वधर्म पर अडीग रहा तो राष्ट्र की
समस्त चुनौतियों-समस्याओं , खास कर जो बौद्धिक संभ्रम के कारण कायम हैं ;
उन सबका समाधान कर सकता है ।


मनोज ज्वाला

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