आसान नहीं चीतों का पुनर्वास

प्रमोद भार्गव 

दुनिया में औद्योगिक विकास और बढ़ते शहरीकरण की वजह से वन्य प्राणियों के सामने चुनौतीपूर्ण हालात उत्पन्न हो गए हैं। उनके सरंक्षण एवं पुनर्वास की लाख कोशिशें कूनो पालपुर में दम तोड़ चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 74 साल पहले पूरी तरह लुप्त हो चुके चीतों के पुनर्वास की अनुमति मध्य प्रदेश वन विभाग को दी है। इन चीतों को दक्षिण अफ्रीका के नमीबिया से लाकर सागर जिले के नौरादेही अभ्यारण्य में रखा जाएगा। चीते को घास के मैदान वाले जंगल पसंद हैं और इसके लिए नौरादेही को जाना जाता है। उम्मीद है राष्ट्रीय बाघ सरंक्षण प्राधिकरण की चीतों के पुनर्वास की कोशिश रंग लाएगी। चीता बेहद फुर्तीला और जंगल में सबसे तेज दौड़ने वाला बिल्ली प्रजाति का वन्य प्राणी होता है। एक समय चीतों की रफ्तार भारतीय वनों की शान हुआ करती थी।  1947 के आते-आते चीतों की आबादी पूरी तरह लुप्त हो गई। 1948 में अंतिम बार चीता छत्तीसगढ़ के सरगुजा में देखा गया था पर उसे मार गिराया गया। मध्य प्रदेश में चीतों की बसाहट की जाती है तो नौरादेही के 53 आदिवासी बहुल ग्रामों को विस्थापित करना होगा। इस अभ्यारण्य के विस्तार के लिए 1100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रस्तावित है। यह सागर, नरसिंहपुर एवं छतरपुर जिलों में फैला हुआ है। सबसे ज्यादा विस्थापित किए जाने वाले 20 ग्राम सागर जिले में हैं। हालांकि इनमें से 10 ग्रामों का विस्थापन किया जा चुका है। शेष ग्राम छतरपुर और नरसिंहपुर जिलों के राजस्व ग्राम हैं। जितना कठिन चीतों का पुनर्वास है, उससे ज्यादा कठिन और खर्चीला काम ग्रामों का विस्थापन है। अब तक चीता एवं सिंह के पुनर्वास के प्रयास विफल ही रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका के जंगलों से 1993 में दिल्ली के चिड़ियाघर में चार चीते लाए गए थे, लेकिन छह माह के भीतर चारों मर गए। बीती सदी में चीतों की संख्या करीब एक लाख थी। अफ्रीका के खुले घास वाले जंगलों से लेकर भारत सहित लगभग सभी एशियाई देशों में पाये जाने वाले चीते अब एशियाई जंगलों में गिनती के रह गए हैं। प्रजनन के तमाम आधुनिक और वैज्ञानिक उपायों के बावजूद जंगल की इस फुर्तीली नस्ल की संख्या बढ़ाई नहीं जा पा रही। यह प्रकृति के समक्ष वैज्ञानिक दंभ की नाकामी है। जूलाॅजिकल सोसायटी ऑफ लंदन की रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया में 91 प्रतिशत चीते 1991 में ही समाप्त हो गए थे। अब केवल 7100 चीते पूरी दुनिया में हैं। एशिया के ईरान में केवल 50 चीते शेष हैं। अफ्रीकी देश केन्या के मासीमारा क्षेत्र को चीतों का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब इनकी संख्या यहां भी गिनती की रह गई है।
इस सदी के पांचवें दशक तक चीते अमरीका के चिड़ियाघरों में भी थे।प्राणी विशेषज्ञों की  कोशिशों के बाद इन चीतों ने 1956 में शावकों को जन्म भी दिया पर किसी भी शावक को बचाया नहीं जा सका। किसी भी चिड़ियाघर में चीतों की जोड़ा बनाने की यह पहली घटना थी, जो नाकाम रही। हमारे देश के राजा-महाराजाओं को घोड़ों और कुत्तों की तरह चीतों के शावकों को पालने का शौक था। इनसे जंगल में शिकार कराया जाता था। मुगल काल में अकबर ने सैकड़ों चीतों को पाला। मध्य प्रदेश में मांडू विजय से लौटने के बाद अकबर ने चंदेरी और नरवर (शिवपुरी) के जंगलों में चीतों से वन्य प्राणियों का शिकार कराया। ग्वालियर रियासत में सिंधिया राजाओं ने भी चीते पाले। ग्वालियर रियासत में यह शगल बीसवीं सदी के अंत तक ही संभव रहा। मार्को पोलो ने तेरहवीं शताब्दी के एक दस्तावेज का उदाहरण देते हुए बताया है कि कुबलई खान ने अपने कारोबार के पड़ाव की चौकीदारी के लिए एक हजार से भी अधिक चीते पाले। इससे इनके प्रकृतिजन्य स्वभाव पर प्रतिकूल असर और इनकी प्रजनन क्रियाओं पर भी बेहद प्रतिकूल असर पड़ा। सईस के हंटर की फटकार की दहशत ने इन्हें मानसिक रूप से दुर्बल बना दिया। इससे चीतों ने विभिन्न शारीरिक क्रियाओं में रूचि लेना बंद कर दिया। जब चाहे तब भेड़-बकरियों की तरह हांक लगा देने से भी इनकी सहजता प्रभावित हुई। चीतों की ताकत में कमी न आए इसके लिए इन्हें मादाओं से अलग रखा जाता । बैलों की तरह नर चीतों को बधिया करने की क्रूरता भी राजा-महाराजाओं ने खूब अपनाई। इन सब कारणों से जंगल की इस बिजली की रोशनी मंद पड़ती गई और इक्कीसवीं शताब्दी के मध्य के आसपास एशिया में बुझ भी गई। दरअसल एक ओर तो हम विलुप्त होते प्राणियों के सरंक्षण में लगे हैं, दूसरी तरफ आधुनिक विकास इनके प्राकृतिक आवास उजाड़ रहा है। पर्यटन से हम आमदनी की बात चाहे जितनी करें, लेकिन पर्यटकों को बाघ, तेंदुआ व अन्य दुर्लभ प्राणियों को निकट से दिखाने की सुविधाएं, इनके स्वाभाविक जीवन को अंततः बुरी तरह प्रभावित करती हैं। यहां विचारणीय प्रश्न यह भी है कि जब चीता विलुप्ति के करीब था, तब इसको बचाने के उपाय सफेद शेर की तरह क्यों नहीं किए गए ? चीते जैसे प्राणियों के आचार-व्यवहार के साथ संकट यह भी है कि ये नई जलवायु में आसानी से ढल नहीं पाता।  आशंका अपनी जगह बरकरार है कि कहीं कूनो पालपुर की तरह करोड़ों रुपये खर्च और 22 ग्रामों को विस्थापित करने के बाद भी नौरादेही में भी चीते की चाल स्वप्न बनकर ही न रह जाए।

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