मजहब ही तो सिखाता आपस में बैर रखना : देश का विभाजन और आजादी के बाद की राजनीति

देश का विभाजन और आजादी के बाद की राजनीति

अलिखित रूप से अंग्रेजों और मुसलमानों के बीच बनी उपरोक्त सहमति पर काम करते हुए वर्ष 1909 का मार्ले-मिंटो सुधार अंग्रेज अपनी इसी नीति के आधार पर लाए थे । उन्होंने आगे चलकर ‘भारत सरकार अधिनियम’ लागू किया और उसमें भी मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित करने के हरसम्भव प्रयास किए । इन सारे अधिनियमों या सुधार कानूनों के अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि मुसलमान और अंग्रेज दोनों ने मिलकर यह मन बना लिया था कि हिन्दू कोई ऐसी जाति है जिस पर उन दोनों को शासन करना चाहिए या उसे उत्पीड़ित करने का उन दोनों को समान अधिकार है । इस प्रकार भारत की ब्रिटिश उपनिवेशवादी व्यवस्था हिन्दू विनाशवादी व्यवस्था में परिवर्तित हो गई ।


अंग्रेजों ने जब वर्ष 1932 में ‘कम्यूनल अवॉर्ड’ की घोषणा तो इससे भारत में मुस्लिम तुष्टीकरण का खेल आरम्भ हुआ। जिसे अंग्रेजों के जाने के बाद उनके मानस पुत्र नेहरू और उनकी पार्टी कांग्रेस ने यथावत जारी रखा। दुर्भाग्य से कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को आज तक भी अपनाए हुए है। इससे भारत की राजनीति के साम्प्रदायिकरण की प्रक्रिया बड़ी तेजी से प्रारम्भ हुई, जो आज भी जारी है।
जिन्नाह जैसे नेता को भारत हिन्दू विरोधी से राष्ट्र विरोधी बनाने का काम भी साम्प्रदायिकता ने ही किया। यद्यपि वह एक हिन्दू परिवार में जन्मा था, पर जब इस्लाम की साम्प्रदायिकता का रंग उस पर चढ़ा तो वह न केवल हिन्दू विरोधी हो गया बल्कि देश विरोधी होकर देश के तोड़ने की ही मांग 1940 के लाहौर अधिवेशन में अपनी पार्टी मुस्लिम लीग के मंच से कर बैठा।
जब बंगाल के मुख्यमंत्री सोहरावर्दी ने 16 अगस्त 1946 को ‘सीधी कार्यवाही दिवस’ का आयोजन कर साम्प्रदायिक दंगों के माध्यम से हिन्दुओं का सामूहिक नरसंहार कराया तो उस समय उसे न केवल मुस्लिम लीग का समर्थन प्राप्त था अपितु अंग्रेजों का समर्थन भी प्राप्त था। इतना ही नहीं कांग्रेस के नेता गांधी भी उससे बहुत अधिक असहमत नहीं थे और मुस्लिम तुष्टिकरण की घिनौनी राजनीति करते हुए लगभग इस कुकृत्य पर अपनी सहमति ही दे बैठे थे। इस प्रकार कांग्रेस ने उस समय हिन्दू विरोधी आचरण करते हुए अपने आपको राष्ट्र विरोधी भी सिद्ध किया। क्योंकि इस देश के बारे में यह सर्वमान्य सत्य है कि जो व्यक्ति, शासक या समुदाय हिन्दू विरोधी होता है, वह राष्ट्र विरोधी स्वयं ही हो जाता है।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात मुस्लिम साम्प्रदायिकता

वर्ष 1947 में भारत का विभाजन हुआ तो यह केवल और केवल मुस्लिम साम्प्रदायिकता के कारण हुआ था। यद्यपि भारत से द्वेष रखने वाले इतिहासकारों और लेखकों ने मुसलमानों की साम्प्रदायिकता और दंगा भड़काने की नीति का विरोध करने वाले उस समय के क्रान्तिकारी और हिन्दूवादी नेताओं के आचरण में भी हिन्दू साम्प्रदायिकता के बीज खोजने का अतार्किक और राष्ट्र विरोधी कार्य किया। उन्होंने ऐसा मुस्लिम साम्प्रदायिकता के प्रति अंग्रेजों और कांग्रेस की सोच के साथ अपनी सहमति बनाकर चलते हुए किया। यही प्रवृत्ति वामपंथियों और कांग्रेसियों के भीतर आज भी देखी जा सकती है।


मुस्लिम साम्प्रदायिकता का विरोध करना भी इन लोगों की दृष्टि में एक पाप है या कहिए कि उसे भी हिन्दू साम्प्रदायिकता की संज्ञा दी जाती है। कारण है कि हिन्दूवादी संगठनों और दलों को ये लोग आज भी हिन्दू साम्प्रदायिक शक्तियों के नाम से पुकारते हैं। अपनी इसी मानसिकता के चलते आईएएस की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए भी इन लोगों ने ऐसा पढ़ाना व समझाना आवश्यक समझा है कि भारत में साम्प्रदायिकता को विभिन्न राजनीतिक दल अपने राजनीतिक लाभों की पूर्ति के लिए अपनाते हैं।
इस एक वाक्य में ही वास्तविकता का गुड़ गोबर हो जाता है। क्योंकि इस दोगले वाक्य में आईएएस की तैयारी कर रहे विद्यार्थी को ऐसा लगता है कि जैसे हिन्दू संगठन और मुस्लिम संगठन दोनों ही साम्प्रदायिक होते हैं। जबकि व्यावहारिक सत्य यह है कि इस्लाम की राष्ट्रघाती गतिविधियों और साम्प्रदायिक सोच पर नियंत्रण रखने के लिए हिन्दूवादी शक्तियां मैदान में काम कर रही होती हैं। मुस्लिम साम्प्रदायिक शक्तियां या संगठन या आतंकी दल आज के समय में समझिए कि बाबर और औरंगजेब के कार्य को पूरा कर रहे हैं। जबकि हिन्दूवादी संगठन आज के समय में महाराणा प्रताप और शिवाजी की भूमिका में हैं, जो देश की विघटनकारी शक्तियों से लोहा ले रहे हैं और इस बात को सुनिश्चित कर रहे हैं कि इस देश का फिर से किसी भी स्थिति में विभाजन न होने पाए।

राष्ट्र हित की बात को कहें भगवा उत्पात।
देशभक्त लगते बुरे , बुरी हैं उनकी बात।

जिस प्रकार हिन्दू इतिहास के महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे महान योद्धाओं को उपेक्षा और घृणा की दृष्टि से देखा जाता है उसी दृष्टिकोण को देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी दल और संगठन आज के हिन्दूवादी संगठनों और उनके नेताओं को देखते हैं। वास्तव में जिस प्रकार अपराधियों का राजनीतिकरण ना करके राजनीति का अपराधीकरण कर दिया गया है वैसे ही साम्प्रदायिकता का राजनीतिकरण न करके राजनीति का ही साम्प्रदायिकरण इन छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी संगठनों या राजनीतिक दलों ने कर दिया है।

भारत के धर्मनिरपेक्ष दलों का दोगलापन

देश का कोई भी धर्मनिरपेक्षतावादी नेता यह नहीं कहता कि इस्लामिक मूलतत्ववाद ही भारत में साम्प्रदायिकता और दंगों का एकमात्र कारण रहा है। इस्लाम के विद्वानों की ओर से भी ऐसी कभी कोई अपील अपने लोगों से नहीं की जाती कि वह इस्लामिक मूलतत्ववाद अर्थात दारुल हरब और दारुल इस्लाम की संकीर्णता से बाहर निकलें और भारत को अपना देश मानकर इसकी उन्नति के लिए काम करें । इस सच से आंखें फेरकर ये सभी राजनीतिक दल और इस्लाम के तथाकथित बुद्धिवादी चिंतक लोग देश के लोगों को भ्रमित करने का प्रयास करते हुए यह कहते हैं कि आतंकवाद या मुस्लिम साम्प्रदायिकता का सहारा वे लोग ले रहे हैं जो गरीबी, असमानता और अशिक्षा के शिकार हैं । शेष मुस्लिम समाज का इनसे कोई सम्बन्ध नहीं है।
यदि गरीबी , असमानता और अशिक्षा के इन तथाकथित कारणों पर विचार किया जाए तो इनके बारे में भी यह कहा जा सकता है कि इन तीनों को भी मुस्लिम समाज ने अपने लिए एक अभिशाप के रूप में स्वयं ही पैदा किया है। क्योंकि अधिक जनसंख्या पैदा करना गरीबी ,अशिक्षा और असमानता को पैदा करता है। जिसमें मुस्लिम समाज लगा हुआ है । इसके अतिरिक्त मजहबी शिक्षा से बाहर निकलकर आधुनिक शिक्षा को न अपनाना भी इस्लाम के लोगों ने अपना विशेषाधिकार मान लिया है। मुस्लिम समाज के लोगों द्वारा जब यह संकल्प ही ले लिया गया है कि हम ना तो आधुनिक शिक्षा लेंगे, ना ही बच्चे कम पैदा करेंगे और ना ही राष्ट्र की मुख्यधारा के साथ मिलकर चलेंगे तो समाज में असमानता ,गरीबी और अशिक्षा को पैदा करने वाला कौन हुआ ? – इसे सहज ही समझा जा सकता है।
हमारा मानना है कि सरकार को विद्यालयों के पाठ्यक्रम में आमूलचूल परिवर्तन करना चाहिए। देश के वीर शहीदों, क्रांतिकारियों और उन इतिहासनायकों को आज के विद्यार्थियों को पढ़ाना चाहिए जो देश के लिए समर्पित होकर इस्लामिक शासन में और उसके पश्चात ब्रिटिश शासन में काम करते रहे । आतंकवादी, देशद्रोही और देशविरोधी लोगों को इतिहासनायक के रूप में स्थापित करने की कांग्रेसी मानसिकता को अब विदा कहना चाहिए। किसी भी प्रकार की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को त्यागकर देशहित में जो उचित हो, उसे करने की दिशा में निर्णय लिए जाने चाहिए।
इसके लिए इस्लाम के बुद्धिवादियों को भी पहल करनी चाहिए। देश के निर्माण में अपना योगदान सुनिश्चित करने के लिए सकारात्मक सोच और सकारात्मक ऊर्जा के साथ उन्हें मैदान में उतरना चाहिए । कई बार ऐसा भी देखा गया है कि मुसलमानों में से कुछ लोग मुसलमानों को ही गलत कहने के लिए आगे तो आ जाते हैं परन्तु उन्हें धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों की ओर से उचित समर्थन और संरक्षण प्राप्त नहीं होता । जिससे वह अपने आपको दुर्बल अनुभव करते हैं। ऐसे में यह भी आवश्यक है कि ऐसे लोगों को सरकार और सामाजिक संगठनों की ओर से भी पूर्ण समर्थन प्राप्त होना चाहिए। उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वह अपनी अच्छी और सच्ची बात को बेलाग होकर कहें।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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