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    मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना : मजहबी घृणा और प्रथम पुरुष युद्ध

    प्रथम क्रूसयुद्ध

    मजहबी उन्माद व्यक्ति के मन मस्तिष्क में गहरा अंधकार कर देता है। क्योंकि यह सबसे पहले विवेक के दीपक को बुझाता है । जैसे चोर घर में प्रवेश करने से पहले प्रकाश के स्त्रोत को बंद करता है वैसा ही कार्य मजहब व्यक्ति के मन मस्तिष्क पर अविवेक की चादर डालकर करता है ।
    ऐसी ही मानसिकता से प्रेरित होकर मजहब के नाम पर उन्मादी, उत्पाती और उग्रवादी होकर लोग युद्ध के लिए चल दिए। ईसाई धर्म प्रचारक पीटर और उसके अन्य साथियों ने लोगों को इस प्रकार आक्रोशित कर दिया था कि वह लाखों की संख्या में विधर्मियों अथवा काफ़िरों या विपरीत मजहबी लोगों का विनाश करने के लिए घर से चल दिए थे। मजहब का भूत सिर पर इस प्रकार चढ़कर बोल रहा था कि किसी को भी मानवतावाद के बारे में सोचने का तनिक भी समय नहीं था।


    जहाँ तक राजनीतिक सत्ताओं का विषय है तो वह भी साम्प्रदायिक रंग में इस प्रकार रंग चुकी थीं कि उन्हें भी विनाश में ही विकास दिखाई दे रहा था। फ्रांस, जर्मनी और इटली के जनसाधारण लाखों की संख्या में पोप और संन्यासी पीटर की प्रेरणा से अपने बाल बच्चों के साथ गाड़ियों पर सामान लादकर पवित्र भूमि की ओर मार्च 1096 में थलमार्ग से चल दिए। श्रद्धा ही विनाश का कारण बन गई । यह स्थिति हमें बताती है कि जब मानवीय मूल्यों से मनुष्य की आस्था और निष्ठा डिग जाती है तो वह विनाश में ही विकास देखने लगता है ।
    यही कारण है कि हमारे महान ऋषि पूर्वजों ने धर्म और मानवता को एक साथ रखकर दोनों को प्रेम का प्रतीक बनाकर संसार के लिए उपयोगी माना और उनके प्रचार प्रसार और विस्तार को मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य माना। मानवता और धर्म के इस अन्योन्याश्रित सम्बन्ध को मजहब के राक्षस ने खण्ड-खण्ड कर दिया । क्योंकि मजहब का काम विखण्डन करना ही है। फलस्वरूप मानवता और धर्म मजहब के राक्षस के शिकंजे में आ गये।
    जब धर्म के स्थान पर मजहब आ गया तो उसके नेताओं ने मजहबी उन्माद को फैलाना ही संसार के लिए उपयोगी माना । उसी का परिणाम था कि संसार के उस समय के लोग एक दूसरे के विनाश के लिए घरों से निकल लिए। जब धर्म जैसी पवित्र वस्तु के स्थान पर तोड़फोड़ कराने वाला राक्षस मजहब के रूप में आ बैठता है तो लोग इसी को छलावा कहते हैं। छलावे से लोगों को बहुत डर लगता है। उसका कारण यही है कि छलावों ने संसार को बहुत अधिक कष्ट दिया है।
    इतिहास को हमें इतिहास बोध के साथ पढ़ना चाहिए। केवल घटनाओं को याद करने के दृष्टिकोण से इतिहास पढ़ना नितांत गलत है । इतिहास इसलिए बनाया जाता है कि अतीत की घटनाओं से हम शिक्षा लेते चलें और यह देखते चलें कि मजहब ने हमें कब-कब कितनी चोट पहुंचाई है ?
    हम घटनाओं पर लीपापोती न करें अपितु उन्हें सही दृष्टिकोण के साथ समझने का प्रयास करें और यह समझें कि यदि मजहब उस समय नहीं होता और धर्म उसके स्थान पर होता तो क्या ऐसा होता ? – निश्चित रूप से नहीं ।


    जो लोग उस समय एक दूसरे को मारने – काटने के लिए घरों से निकले थे वे सभी के सभी विधर्मियों के प्रति द्वेषरत थे। यह सभी एक ऐसा डरावना दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे जिसमें मनुष्य ही मनुष्य का शत्रु हो गया था और एक एक दूसरे को अपना आहार बनाने के लिए खोज रहा था। जब मनुष्य मनुष्य को अपना आहार बनाने के लिए खोजने लगे तो समझो कि उसकी मानवता उससे दूर हो गई है और उस पर पाशविकता हावी और प्रभावी हो गई है ।उनके पास भोजन – सामग्री और परिवहन के साधनों का अभाव होने के कारण वे मार्ग में लूट -खसोट और यहूदियों की हत्या करते गए जिसके फलस्वरूप बहुतेरे मारे भी गए। इनकी यह प्रवृत्ति देखकर पूर्वी सम्राट् ने इनके कोंस्तांतीन नगर पहुँचने पर दूसरे दल की प्रतीक्षा किए बिना इनको बास्फोरस के पार उतार दिया। वहाँ से बढ़कर जब वे तुर्को द्वारा शासित क्षेत्र में घुसे तो, मारे गए।
    दूसरा दल पश्चिमी यूरोप के कई सुयोग्य सामंतों की सेनाओं का था । पूर्वी सम्राट् ने इन सेनाओं को मार्गपरिवहन इत्यादि की सुविधाएँ और स्वयं सैनिक सहायता देने के बदले इनसे यह प्रतिज्ञा कराई कि साम्राज्य के भूतपूर्व प्रदेश, जो तुर्को ने हथिया लिए थे, फिर जीते जाने पर सम्राट् को दे दिए जाएँगे। यद्यपि इस प्रतिज्ञा का पूरा पालन नहीं हुआ और सम्राट् की सहायता यथेष्ट नहीं प्राप्त हुई, फिर भी क्रूशधर सेनाओं को इस युद्ध में पर्याप्त सफलता मिली।
    अंतिओक से नवबंर, 1098 में चलकर सेनाएँ मार्ग में स्थित त्रिपोलिस, तीर, तथा सिज़रिया के शासकों से दण्ड लेते हुए जून, 1099 में जेरूसलम पहुँची और पाँच सप्ताह के घेरे के बाद जुलाई, 1099 में उस पर अधिकार कर लिया। उन्होंने नगर के मुसलमान और यहूदी निवासियों की निर्मम हत्या कर दी। यहाँ पर साम्प्रदायिकता ने अपना नंगा नाच किया और मुसलमानों व यहूदियों के बाल बच्चों और महिलाओं की निर्ममता के साथ हत्या की गई।
    यहाँ पर यह नहीं देखना है कि जीत किसकी हुई बल्कि इतिहास की समीक्षा के दृष्टिकोण से यह देखना है कि हार किसकी हुई ? और यदि इस पर विचार करेंगे तो निश्चित रूप से मानवता की पराजय हुई थी। जब बड़ी संख्या में लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े थे। गिद्धों की भांति लोगों ने एक दूसरे की संपत्ति को लूटा और लाशों को भी यह देख – देखकर दफनाया गया कि कहीं उनके शरीर पर कोई किसी प्रकार का स्वर्ण या चांदी का आभूषण तो नहीं है ? यदि है तो उसे उतार लिया जाए अर्थात लूट लिया जाए। वैसे अधिकांश लाशें खुले आकाश के नीचे जंगली पशु और पक्षियों के लिए ही छोड़ दी गई थीं।
    इस प्रकार इस युद्ध में मानव ने मानव होकर भी दानव का रूप धारण कर लिया था। चारों ओर उसकी दानवता नंगा नाच कर रही थी और अपने ही भाइयों का वध करने में उसे आनंद आ रहा था। इस प्रकार की दानवता को मानवता के रूप में स्थापित करने का ईसाई और इस्लामिक इतिहासकारों ने अपने-अपने मजहब के पक्ष में प्रयास किया है । यद्यपि यह पूर्णतया गलत है। हमें निष्पक्ष होकर इस युद्ध का अवलोकन करना चाहिए और इस इस तथ्य को स्थापित करना चाहिए कि मानव जिस प्रकार उस समय नंगा होकर नाच कर रहा था उसमें मानवता की जीत नहीं हुई थी अपितु पराजय हुई थी।

    राकेश कुमार आर्य
    राकेश कुमार आर्यhttps://www.pravakta.com/author/rakesharyaprawakta-com
    उगता भारत’ साप्ताहिक / दैनिक समाचारपत्र के संपादक; बी.ए. ,एलएल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता। राकेश आर्य जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक चालीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में ' 'राष्ट्रीय प्रेस महासंघ ' के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उत्कृष्ट लेखन के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह जी सहित कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं । सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। ग्रेटर नोएडा , जनपद गौतमबुध नगर दादरी, उ.प्र. के निवासी हैं।

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