रंगीन चश्मा हटाकर देखिए संघ का असली चेहरा

लक्ष्मीनारायण 

समझौता एक्सप्रेस तथा मालेगांव, अजमेर, हैदराबाद, मुंबई आदि स्थानों पर हुए बम विस्फोटों में संघ का हाथ है, कालेधन की वापसी के लिए स्वामी रामदेव द्वारा किए गए आंदोलन में संघ का हाथ है, जन लोकपाल की मांग के लिए अण्णा हजारे द्वारा किए गए सत्याग्रह में संघ का हाथ है आदि आरोप देश के उस राजनैतिक दल के कुछ घोषित एवं स्वघोषित प्रवक्ता लगाते रहते हैं जो केन्द्र में सत्ता सम्हाल रहा हैं। कोई वंदेमातरम कहे तो संघ का हाथ, भारत माता की जय कहे तो संघ का हाथ, भारत माता का चित्र लगाए तो संघ का हाथ, नेहरू एवं इंदिरा परिवार को छोड़कर अन्य किसी नेता का गुणगान करे तो संघ का हाथ, अब तो लगता है कि जहां-जहां यह दल चुनाव में हारेगा वहां उसे अपने दल के चुनाव चिन्ह में भी संघ का ही ‘हाथ’ दिखाई देगा, इस हद तक वे संघ के हाथ से आतंकित हैं। आखिर क्या कारण है इस आतंक का?

वैसे तो देश में हजारों नहीं लाखों संघ होंगे परन्तु जिस संघ के हाथ की बात कही जा रही है वह है ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’। इसे ही आम तौर पर आर.एस.एस. कहा जाता हैं। इसके सदस्य अपने आप को ‘स्वयंसेवक’ कहलाना पसंद करते हैं। इसमें सदस्य बनने का कोई प्रावधान भी नहीं है जो इसकी गतिविधियों से जुड जाए वही है ‘स्वयं सेवक’। इसकी गतिविधि भी अनोखी है। दिन में एक बार सुबह, शाम या रात्रि में खुले मैदान में एकत्रित होना, बिना किसी साधन के खेल-कूद, व्यायाम, योगासन आदि करना, देशभक्ति का कोई गीत गाना, देश या समाज की समस्या या कोई घटना आदि पर चर्चा करना, समवेत स्वर में प्रार्थना दोहराना एवं अंत में अनौपचारिक वार्तालाप करते हुए अपने-अपने घर लौट जाना। खुले मैदान के अभाव में यही काम किसी मंदिर, विद्यालय, घर के प्रांगण या किसी कमरे में करते हैं। एक घंटे के इस कार्यक्रम में आने वाले स्वयंसेवक समय के अभाव में 45 मिनट, 30 मिनट, या 15 मिनट के लिए ही क्यों न हो एकत्रित होते हैं? यही इस संघ की ”दैनिक शाखा” कहलाती है। दैनिक एकत्रित होना संभव न हो तो सप्ताह में एक दिन ”साप्ताहिक शाखा” लगाई जाती है। देशभर में ऐसी शाखाएं प्रायः 45 हजार हैं। इन शाखाओं में कहीं 60-70 स्वयंसेवक होते हैं तो कहीं 4-5 ही। इसमें शिशु अवस्था से लेकर वृध्दावस्था तक के सभी आयु वर्ग के पुरुष सम्मिलित होते हैं।

महिलाओं के बीच भी एक आर.एस.एस. कार्यरत है, जिसे ‘राष्ट्र सेविका समिति’ कहा जाता है। इसकी गतिविधि भी इसी तरह शाखा लगाना है। दोनों संगठनों ने ‘भगवा ध्वज’ को गुरु माना है। इस मौन गुरु के सामने सभी स्वयंसेवक एवं सेविकाएं स्वेच्छा से प्रतिज्ञा ग्रहण करते हैं कि हम ‘आजीवन राष्ट्र की सेवा का व्रत निभाएंगे’। संगठन की अर्थव्यवस्था वर्ष में एक बार इन्हीं स्वयंसेवक एवं सेविकाओं द्वारा गुरु दक्षिणा के रूप में समर्पित धन राशि से की जाती है।

शाखाओं के इस तंत्र में एकरूपता बनी रहे यह सोचकर स्वयंसेवक एवं सेविकाओं के प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाते हैं। 3 दिनों से लेकर 30 दिनों तक चलने वाले इन प्रशिक्षण वर्गों में जाने वाले शिक्षार्थियों को स्वयं खर्च वहन करना होता है। निस्वार्थ भाव से देश कार्य करने के संस्कार से संस्कारित इन स्वयंसेवकों को इसका कोई प्रमाण-पत्र देने की भी इस संगठन में कोई व्यवस्था नहीं है। स्वेच्छा से आने वाले ये स्वयंसेवक-स्वयंसेविकाएं स्वेच्छा से ही संगठन से हट जाएं तो उन्हें रोकने की भी कोई वैधानिक व्यवस्था इसमें नहीं है। फिर भी आपसी विश्वास एवं स्नेह के बंधन के कारण एक बार जो स्वयंसेवक बन गए वह आजीवन स्वयंसेवक बने रहने में गौरव का अनुभव करते हैं।

देश कार्य के लिए अधिकाधिक त्याग करने एवं समय देने की इस स्पध्र्दा में कई स्वयंसेवक पूर्णकालीन कार्यकर्ता बनकर कार्य करने लगते है। इनमें घर-परिवार की जिम्मेदारी से मुक्त होकर कार्य करने वाले स्वयंसेवक ”प्रचारक” कहलाते हैं। वापस घर लौटकर घर-परिवार बसाने की इच्छा होने पर ऐसे प्रचारक कुछ वर्षों बाद गृहस्थ धर्म निभाना चाहें तो उन्हें कोई रोक-टोक नहीं होती। यह पारदर्शिता भी इस संगठन की एक विशेषता है। इस कार्य प्रणाली से चलने वाले संघ को बाहर रहकर पूरी तरह समझ पाना कठिन है। अतः जाति, पंथ, भाषा आदि भेदों को भुलाकर ”भारत माता की संतान” की भावना से सभी भारतवासी इसमें सहभागी हों यही आह्वान संघ करता रहता है। संगठित हिन्दू समाज ही राष्ट्र में सौहार्द एवं शांति स्थापित कर विकास एवं प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है इस आस्था एवं विश्वास के साथ सन् 1925 से लेकर आज तक यही एक मात्र कार्य एवं एक मात्र गतिविधि करता आ रहा है संघ।

उपरोक्त गतिविधि या शाखा पध्दति का प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला परिणाम यह है कि बाढ़, भूकम्प, सूनामी आदि प्राकृतिक आपदाओं के समय; ट्रेन, बस, हवाई जहाज या नौका आदि से घटित दुर्घटनाओं के समय, युध्द, आतंकी घटना, सांप्रदायिक दंगे आदि दुःखद प्रसंगों के समय; यात्राएं, मेले, उत्सव आदि आयोजनों के समय स्थानीय स्वयंसेवक उन-उन स्थानों पर स्थानीय जनता के सहयोग से सेवा कार्य प्रारम्भ करने में आगे बढ़कर हिस्सा लेते हुए दिखाई देते हैं। किसी आदेश या निर्देश की अपेक्षा किए बिना इस प्रकार सेवा कार्यों में लगे रहने के कारण ही आर.एस.एस. को आरएसएस (रेड्डी फॉर सेल्फलेस सर्विस) ”निस्वार्थ सेवा के लिए तत्पर रहने वाले” संगठन के रूप में जाना जाता रहा हैं। इसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कृतिरूप स्वरूप भी कहा जा सकता है। एपलाईड साईंस या मैथ्स के समान एपलाईड आरएसएस का यह स्वरूप देश हित में होने वाले हर आंदोलन में भी स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है। संतो द्वारा किये गये भूदान आंदोलन, गोरक्षा आंदोलन या राममंदिर निर्माण आंदोलन हो या समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण आदि के नेतृत्व में क्रमशः हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए या व्यवस्था परिवर्तन के लिए किए गए आंदोलन हो अथवा हैदराबाद विलय, कश्मीर विलय, गोवा मुक्ति, असम बचाओ आदि राष्ट्रीय एकता के लिए किए गए आंदोलन हो, संघ के स्वयंसेवकों का इसमें सहभागी होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में ही देखा जाता रहा है। इन सभी अवसरों पर संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका की प्रशंसा संबंधित व्यक्तियों ने बिना संकोच के की है। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, महामना मदनमोहन मालवीय, वीर सावरकर, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, स्वामी चिन्मयानंद, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी आदि के द्वारा की गई प्रशंसा ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में विद्यमान है। डॉ. हेडगेवार, श्री गुरुजी, बालासाहेब देवरस, प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह ”रज्जू भइया” तथा निवर्तमान सरसंघचालक कुप्प सी. सुदर्शन आदि महानुभाव केवल सरसंघचालक ही नहीं वरन युग प्रवर्तक एवं मार्गदर्शक के नाते श्रध्दा से लिए जाने वाले नाम हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख, एकनाथ रानाडे जगन्नाथराव जोशी, यशवंतराव केलकर, दत्तोपंत ठेंगडी, एच. वी. शेषाद्रि, बालासाहब देशपांडे, दादा साहब आप्टे, विष्णुकांत शास्त्री, लज्जाराम तोमर, लक्ष्मी बाई केलकर आदि मौलिक चिंतक एवं महान संगठक तो अपने आप को संघ का स्वयंसेवक होने का गौरव अनुभव करते हुए ही समाज में प्रतिष्ठित हुए हैं। राजनैतिक उठापटक एवं स्पध्र्दा के इस माहौल में रोगशय्या पर पड़े अटल बिहारी बाजपेयी से लेकर लालकृष्ण आडवाणी, स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि, अशोक सिंघल, डॉ. मुरलीमनोहर जोशी, दीनानाथ बत्रा, नरेन्द्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, वैंकेया नायडू, गोविन्दाचार्य, नितिन गडकरी, सुशील कुमार मोदी आदि सैंकडों जननेता एवं समाज सुधारक गिनाए जा सकते हैं जो संघ का स्वयंसेवक होने का परिचय देने में गर्व का अनुभव करते हैं।

संगठन शास्त्र में पारंगत करने की क्षमता रखने वाली इस पारदर्शी कार्य पध्दति का ही परिणाम है कि संघ का स्वयंसेवक या समिति की सेविकाएं स्थान, काल, पात्र के अनुसार देश की आवश्यकता के अनुरूप सामाजिक गतिविधियों में अपने आप को जोड़कर समाज सेवा करते रहते हैं। सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी योजना के अनुसार हजारों समाज -कार्य इन स्वयंसेवक-सेविकाओं द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। इनमें कुछ बड़े संगठनों को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास भी होता रहता है जिसे प्रचार माध्यमों ने ‘संघ-परिवार’ की संज्ञा दे दी है। यह संघ परिवार देश ही नहीं बल्कि विश्व का अनोखा संयुक्त परिवार है। इसकी गतिविधियां विश्वव्यापी हैं। प्रायः 35 देशों में स्वयंसेवक व सेविकाओं ने अपने-अपने देश में इसे गौरवपूर्ण स्थान प्रदान किया है। ऐसे संघ परिवार का अंग होना हर किसी के लिए गौरव की बात होनी चाहिए परन्तु आश्चर्य है कि भारत का सत्ताधारी दल कांग्रेस इससे आतंकित रहता है।

केवल सत्ताधारी दल ही नहीं प्रचार माध्यम भी उनके अपप्रचार या मिथ्या प्रचार का शिकार होता हुआ दिखाई देता है। परिणामस्वरूप कभी योगगुरु रामदेव को तो कभी अण्णा हजारे को प्रचार माध्यमों में बार-बार यह सफाई देनी पड़ती है कि उनके आंदोलनों में संघ का हाथ नहीं है। परन्तु देश केें हर भले-बुरे काम को अंजाम देने में संघ का हाथ होने की रट लगाने से सत्ताधारी दल के तथाकथित प्रवक्ता बाज नहीं आते। इतना ही नहीं तो शारीरिक एवं मानसिक यातनाएं देकर स्वामी असीमानंद एवं साध्वी प्रज्ञा से संघ का हाथ होने की बात मनवाने के लिए शासकीय दबाव लाकर न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करने में नहीं हिचकते। आखिर क्यों? ऌसका कारण जानने के लिए हमें संघ के इतिहास का वह पहलू जानना होगा जिसमें इसका रहस्य छिपा हुआ है।

संघ स्थापना के पांच वर्ष बाद की बात है। सन् 1930 में संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने अपने पद से त्यागपत्र देकर महात्मा गांधी के नेतृत्व में हो रहे नमक सत्यागृह के साथ चलने वाले ‘जंगल सत्यागृह’ में भाग लिया था। प्रायः आठ मास वे कारावास में बंद थे। कारावास से लौटने के बाद पुनः उन्होंने संगठन की बागडोर संभाली एवं संघ को व्यापक एवं प्रभावी बनाने में जुट गए। मध्य भारत की तत्कालीन अंग्रेज सरकार सतर्क हो गई। वंदे मातरम् का नारा लगाने वाले एक-एक व्यक्ति से डरने वाली सरकार को डर था कि संघ के स्वयंसेवक सरकारी प्रशासन में नौकरी करने लगे तो उनके लिए समस्याएं पैदा करते रहेंगे। अतः अच्छा है कि उन्हें सरकारी नौकरी में आने से रोका जाए। तत्कालीन मध्यप्रान्त सरकार के मुख्य सचिव ई. गार्डेन ने 15 दिसम्बर 1932 को यह अध्यादेश जारी किया कि ”किसी भी सरकारी कर्मचारी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य बनने अथवा उसके कार्यक्रम में भाग लेने की अनुमति नहीं रहेगी। ”इसी आशय के अध्यादेश 2-3 वर्ष के भीतर अन्य कुछ राज्य सरकारों ने भी जारी किए। सन् 1930 से 1947 तक अंग्रेजों के राज्य में इन अध्यादेशों का परिणाम इतना ही होता हुआ दिखाई देता था कि सरकारी कर्मचारी खुलकर संघ कार्य में भाग नहीं लेते थे। परन्तु उनके परिवार के सदस्य एवं आम जनता संघ की ओर बड़ी संख्या में आकर्षित होती रही। देशभक्ति ही जिसकी आधारभूमि हो उसे देशव्यापी बनने से भला कौन रोक सकता था। संघ देशव्यापी बनता गया।

अंग्रेज देश छोड़कर चले गए परन्तु उनके बनाए गए कानून एवं प्रशासन चलाने की उनकी परम्परा बरकरार रही। उनकी नजरों में जो देशभक्त ”राजद्रोही” कहलाते थे एवं जिन संगठनों से उन्हें डर लगता था उनके प्रति वही रवैया, वही दृष्टि एवं वही व्यवहार आज भी होता हुआ दिखाई देता है। परन्तु यह निश्चित कहा जा सकता है कि अंग्रेजियत की मानसिकता वालों की संघ-संघ की एवं संघ का हाथ होने की रट का परिणाम वही होगा जो भारत के हर देशभक्त नागरिक के मन में है। हर देशभक्त नागरिक यही चाहता है कि देश विनाशक शक्तियां समाप्त होकर देशभक्त संगठित हो तथा देश 21 वीं शताब्दी में विश्व को नेतृत्व देकर शान्ति एवं प्रगति के पथ पर ले जाए। रंगीन चश्मा हटाकर संघ के असली चेहरे को जानने वालों की संख्या जैसे-जैसे बढ़ेगी वैसे ही ”भूत पिशाच निकट नहीं आवे। महावीर जब नाम सुनावे। ”की तर्ज पर ”देश विनाशक निकट न आवे। संघ-संघ जब नाम सुनावे।” यही इस रट का परिणाम होगा।

संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन राव भागवत ने विजयादशमी पर प्रसारित अपने भाषण में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के विषय में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ”संघ के स्वयंसेवक ऐसे सभी आन्दोलनों में सम्मान अथवा श्रेय की अपेक्षा छोड़कर स्वभावतः ही लगे हैं। ”उन्होंने आन्दोलन के आयोजकों को चेतावनी देते हुए कहा कि ”श्रेय बटोरने में लगी संदिग्ध पृष्ठभूमि वाली, राष्ट्रभक्ति के प्रतीकरूप ”वंदे मात्रम” ”भारतमाता” आदि संकेतों को अपनी दोषपूर्ण भ्रमितदृष्टि अथवा सस्ती लोकप्रियता के लिए नकारने वाली, तथाकथित अल्पसंख्यकों में संकुचित कट्टरपन या अलगाव के विचार रखने वालों की खुशामद करने वाली प्रवृत्तियों से दूर रहना पडेगा।” साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ”लम्बी लड़ाई में सफलता पाने के लिए आंदोलन करने वाली सभी धाराओं को अपने छोटे-बड़े मतभेदों को भुलाकर एकत्र आना पड़ेगा।” किसी को भी इस बात का विस्मरण न हो कि संपूर्ण समाज भ्रष्टाचार से पीड़ित होने के कारण कई व्यक्ति एवं संगठन भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कर रहे हैं। अण्णा हजारे के तत्वावधान में, रामदेव के नेतृत्व में, गोविन्दाचार्य के मार्गदर्शन में, स्वदेशी जुटान की छत्रछाया में तथा राजनीति में शुचिता के पक्षधरों के साथ ”यूथ अगेन्स्ट करप्शन” के माध्यम से हो रहे सभी संगठनों के प्रयास एकमुखी हो, समवेत हो, यही उनके कहने का भावार्थ है। शायद यही विधि का विधान है।

* लेखक हिन्दुस्थान समाचार के राष्ट्रीय सह-प्रभारी हैं।

5 thoughts on “रंगीन चश्मा हटाकर देखिए संघ का असली चेहरा

  1. गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने कहा था “सकल जगत में खालसा पंथ पंथ गाजे, जगे धर्म हिन्दू सकल भांड भाजे”.संघ भी यही कार्य कर रहा है.भारत के चिंतन, यहाँ की संस्कृति, यहाँ की उदात्त परंपरा और यहाँ की मेधा का यहीं के तरीकों से(परिस्थिति अनुसार औरों से सीख लेते हुए)एक ऐसे विश्व का निर्माण जहाँ कोई शोषण न हो,सब तरफ शांति व भाईचारा हो.सर्वे भवन्तु सुखिनः का निर्माण करने में संघ लगा है. और ये एक सच्चाई है की जब भी कभी किसी ऋषि मुनि ने तपस्या की है इन्द्र का आसन डगमगाया है और उनकी तपस्या को भंग करने के लिए सारे प्रपंच किये जाते रहे है. आज संघ को जिस प्रकार से परसोना नॉन ग्रेटा बनाने का प्रयास हो रहा है वह जल्दी ही बूम रेंग करने वाला है.

  2. || ॐ साईं ॐ || सबका मालिक एक
    गाय माता का समुदाय जँहा बैठकर निर्भयता पूर्वक श्वास लेता है , उस स्थान के सारे पाप दोष स्वतः खिंच लेता है | (महाभारत,अनु.५१/३२)
    मित्रो क्या मै ,क्या तुम गौ माता और देश और समाज की दुर्दशा के लिए हम सभी दोषी है……….. हम भोलेनाथ के मंदिर में नंदी की प्रतिमा पर दूध,अबीर,गुलाल फुल आदि चडाते है ….और बहार खड़े नंदी पर लाठिय पड़ती है….राधे कृष्ण के मंदिर में जय गोविंदा जय गोपाला ..गयो का रखवाला की धुन चलती है और बहार गौमाता जूठन को तरसती है…..श्रीमद भगवत कथा पांडाल में खूब भीड़ उमड़ती है और बहार कीचड़ में सनी गाय माता आश्रय के लिए भटकती है | मीडिया(लोकतंत्र का चौथा खम्बा) गौ माता की दुर्गति पर आंसू बहाता है…शराब,सिगरेट,और भारतीय नारी को नंगा दिखाने वाले विज्ञापनों की मोती कमाई खाता है….स्वयं को समाज और राष्ट्र का सच्चा प्रहरी बताता है….हम भी देश समाज और राष्ट्र के उद्धार के लिए किसी विवेकानंद,सरदार वल्लभ भाई,आजाद,बोस के पैदा होने का इन्तजार करते है …किन्तु गलती से हमारे घर में पैदा ना हो जाए इसके लिए पूरी तरह सावधान रहते है……इसलिए गौ माता की रक्षा की बात वहीऔर सही हिन्दू करे जिसके घर में गौ माता है..और सेवा होती है….घर के देवाजे पर एक ५०-१०० लीटर पानी का कुंद /टंकी रही हो गौ माता के लिए….क्या आप जानते है शहरो में गायमाता गटरों का पानी पिने को मजबूर है…..
    सरकारी व्यापार भ्रष्टाचार …साप्ताहिक समाचार पत्र

  3. भाई कुछ ताकतों का वजूद ही संघ-विरोध पर टिका है. लिहाजा विरोध करेंगे ही.
    गौर करेंगे तो पायेंगे कि संघ का विरोध वही ताकते करती रही हैं जो प्रकारांतर देश विरोधी हैं.
    जब देश सेकुलरिज्म की अफीम से जागेगा तब संघ को पूजेगा. लेकिन इस अफीम के नशे से जगाने का आसरा भी संघ ही है.

  4. संक्षेपमें|
    अमरीका की संघ प्रेरित संस्थाएं|
    हिन्दू स्टुडेंट्स काउन्सिल,
    हिन्दू स्वयंसेवक संघ,
    एकल विद्यालय,
    बाल विहार,
    फ्रेंड्स ऑफ़ इंडिया इंटरनॅशनल (जिसने आपातकाल के निराकरण में अमरिका से भारी राजनैतिक, दबाव लाया था|) ,
    विश्व हिन्दू परिषद्,
    भारत सेवा संस्थान, ….. और भी कई संस्थाएं स्वयं सेवक जहां भी पहुंचा हो प्रारंभ हो जाती है|
    लगभग जो भी भारत के लिए हितकर है उसमे स्वयं सेवक जुट जाता है, वा नया काम प्रारंभ कर देता है|
    ऐसी इण्डिया स्टुडेंट्स असोसिएशनस है, वर्ल्ड वैदिक स्टडीज़ असोसिअशन है,
    हिंदी समितियां हैं,
    संस्कृत भारती है,
    जहां स्वयंसेवक निस्वार्थ भावसे, और बहुतांश में नाम की चिंता किए बिना काम कर रहें हैं|
    ऐसा ही काम त्रिनिदाद, गयाना, सूरीनाम इत्यादि स्थानों पर प्रारम्भ हुआ है| हरेक जगह २५-३० शाखाएं चलती है|
    अमरीका में १४० के लगभग शाखाएं हैं|
    तेरा वैभव अमर रहे माँ|
    हम दिन चार रहें न रहें||

Leave a Reply

%d bloggers like this: