लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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श्रीराम तिवारी

जनकवि रामनाथसिंग ’अदम गौँडवी’ को क्रांतिकारी श्रद्धांजलि….स्व. अदम गोंडवी

यह एक क्रमिक एवं स्वाभाविक युति है कि जिन कवियों की मातृभाषा हिंदी या कोई अन्य आंचलिक भाषा होती है,और यदि वे जनवाद या क्रांति जैसे विचारों से प्रेरित है तो वे प्रगतिशीलता के तत्वों को उर्दू शब्दों के सहारे ही थामने में सफल हुए हैं.इस विधा में गैर उर्दू भाषियों में जब भी कविता या शायरी की चर्चा होगी गजानन माधव मुक्तिबोध और दुष्यंत के बाद ’अदम गौंडवी’उर्फ़ रामनाथसिंह सदैव याद किये जाते रहेंगे.

रामनाथसिंह ने शायरी लिखने के शुरुआती दौर में ही न केवल अपना नाम बदल डाला बल्कि परम्परागत उत्तर आधुनिक कविता को शायरी का नया लिबास भी पहनाया.दुष्यंत ने जिस हिन्दी शायरी में आम आदमी का दर्द उकेरा था ,अदम गौंडवी ने जनता की आवाज बनाकर उसे अमरत्व प्रदान किया है.उनकी कई गजलों में व्यवस्था कि लानत-मलानत की गई है. जन- गीतों के तो मानो वे सरताज थे.पूंजीवादी,साम्प्रदायिक और निहित स्वारथियों की जकड़न में कसमसाती आवाम को ’अदम ’के शेर संबल प्रदान करते है-

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडिये!

अपनी कुर्सी के लिए ज़ज्वात को मत छेडिये!!

हैं कहाँ हिटलर हलाकू जार या चंगेज खाँ!

मिट गए सब कौम की औकात को मत छेडिये!!

छेडिये इक जंग मिल जुलकर गरीबी के खिलाफ!

दोस्त !मेरे मजहबी नगमात को मत छेडिये!!

एक और वानगी पेश है-

काजू भुने प्लेट में,व्हस्की गिलास में,

उतरा है रामराज ,विधायक निवास में!

पक्के समाजवादी है,तस्कर हों या डकैत,

इतना असर है खादी के लिबास में!

आजादी का जश्न वो मनाएं किस तरह,

जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में!

………………………………..

……..एक ही चारा है वगावत ….

यह बात कह रहा हूँ में होशो-हवाश में!

२२ अक्तूबर १९४७ को जन्में अदम गौंडवी के दुखद निधन से भारतीय उपमहादीप के प्रगतिशील साहित्य जगत में भले ही शोक का तमस छा गया हो किन्तु उनकी सृजनशीलता के धूमकेतु निरंतर उन सभी श्रेष्ठतम मानवों का पथ प्रशस्त करते रहेंगे ,जो मानवीय मूल्यों की हिफाज़त करते हुए , शोषण के अन्धकार को समूल नष्ट करते हुए मानव मात्र को शान्ति-मैत्री-बंधुत्व और समता से परिपूर्ण देखने की तमन्ना रखते हैं̷

जनकवि रामनाथसिंह अर्थात ’अदम गौंडवी’ने आजीवन दलित,शोषित,पिछड़ों और गरीबों के संघर्षों में न केवल परोक्ष सहयोग किया बल्कि अपनी सशक्त लेखनी से इन वंचित वर्गों को उपकृत भी किया है.वे दुष्यंत पुरस्कार से सम्मानित किये जा चुके थे.भले ही उन्होंने मात्र दो काव्य संग्रह ’धरती की सतह पर’और ’समय से मुठभेड़’सृजित किये हों किन्तु ’संछिप्त्ता सौन्दर्य की जननी है’ अतः अदम गौंडवी का सृजन,उनका व्यक्तित्व और संघर्षों में अवदान अप्रतिम है,पर्याप्त है,जीवन है…

5 Responses to “क्रांतिकारी श्रद्धांजलि…स्व. अदम गोंडवी”

  1. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    0 पैसे से आप चाहे तो सरकार गिरादो,
    स्ंासद बदल गयी है यहां की नख़ास मंे।
    जनता के पास एक ही चारा है बगा़वत,
    यह बात कह रहा हूं मैं होशो हवास में।।

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  2. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    thair are many type of thoughts ragarding ‘class confrontation’in the classness socity but in India specialy two type of classification in the socity.first is the cast confrontation and another is the socio-economical confrontation,so we can not ignore the such bitter truth.shri rajesh bheel advise is the utopia of the fudlism.thanks for comments.

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  3. GGShaikh

    उनके व्यक्तित्व और संघर्षों में अवदान अप्रतीम है, पर्याप्त है, जीवन है …
    श्री राम तिवारी जी आपकी यह स्व.अदम जी को एक असीम श्रद्धांजलि है …

    स्व.अदम जी को हमारी भी मूक अंतरपुर्वक श्रद्धांजलि…

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    • श्रीराम तिवारी

      shriram tiwari

      प्रिय श्री जी जी शेख साहब की टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद.शेख साहेब से निवेदन है कि www .janwadi . blogspot .com पर नज़रे इनायत फरमाएं.

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  4. Rajesh Bheel

    सामाजिक रचनाओं की दिशा में अदम गोंडवी जी की यह एक अत्यंत मार्मिक रचना है |
    किंतु अब समय बहुत कुछ बदल चुका है | यद्यपि शील-भंग की घटनाएँ हो रही हैं पर वे
    किसी वर्ग विशेष तक सीमित नहीं और अब कहीं ऐसा होता भी है तो समाज और पुलिस
    मौन नहीं रहते तथा अपराधी इतनी आसानी से बच नहीं पाते | दलित समाज अब ऐसे
    अत्याचार से लोहा लेने का दम ख़म रखता है | आज की सामाजिक रचनाओं में विभिन्न
    वर्गों को जोड़ने के प्रयत्न होना चाहिये न कि वर्गों के बीच द्वेष और विद्रोह की भावना भरने
    की | मेरे विचार से आज के परिप्रेक्ष्य में ऐसी रचना को प्रतिनिधि-रचना का रूप देना शायद
    उचित नहीं |

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