ऋषि दयानन्द की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कृति पंचमहायज्ञ विधि

मनमोहन कुमार आर्य

               पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के बाद देश-देशान्तर में वेद और वैदिक धर्म का प्रचार अवरुद्ध हो गया था। ऋषियों व वेदों के विद्वानों के न रहने के कारण वेदों के सत्यार्थों का भी प्रचलन न होने से समाज में वेदों के मिथ्या अर्थ प्रचलन में आ गये। स्वार्थी अल्पबुद्धि विद्वानों ने इस स्थिति का लाभ उठाया और अनेक प्राचीन ग्रन्थों में प्रक्षेप किये। मनुस्मृति, बाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि अनेक ग्रन्थों में वेद विरुद्ध प्रक्षेप किये गये और उनका प्रचार होने से समाज में अनेक अन्धविश्वास, पाखण्ड, कुरीतियां आदि प्रचलित हो गईं। वर्ण व्यवस्था का स्थान जन्मना जाति व्यवस्था ने ले लिया। स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित कर दिया गया। यह स्थिति दिन प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होती गई। यज्ञों में पशुओं की हत्या कर उनके मांस से आहुतियां दी जाने लगी। यज्ञ में इस प्रकार की हिंसा का जन समुदाय में विरोध हुआ जिसके परिणामस्वरूप बौद्ध और जैन मत अस्तित्व में आये। कालान्तर में स्वामी शंकराचार्य ने इन अवैदिक वा नास्तिक मतों का विरोध किया और अद्वैत मत की स्थापना की। बहुत कम आयु में स्वामी शंकराचार्य जी की मृत्यु हो गई। वैदिक धर्म अनेक अन्धविश्वासों व मिथ्या मान्यताओं यथा जड़-मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, अवतारवाद की मान्यता, मृतक श्राद्ध आदि मिथ्या परम्पराओं से भर गया। इसी बीच जन्मना जातिवाद का प्रचलन हुआ जिसने वैदिक धर्म को सबसे अधिक हानि पहुंचाईं। इसका एक प्रमुख कारण स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन से वंचित किया जाना भी था। वेदविरुद्ध व कल्पित 18 पुराणों ने भी देश व समाज में अज्ञान, अन्धविश्वासों सहित मिथ्या परम्पराओं के प्रसार में वृद्धि की जिससे समाज विकृतियां से भर गया। देश में गुंजरात के सोमनाथ व अन्य अनेक प्रमुख मन्दिर तोड़े व लूटे गये, मातृशक्ति का अपमान हुआ और आर्य-हिन्दुओं का बल व भय से धर्मान्तरण किया गया। कुछ काल बाद देश मुसलमानों का गुलाम हो गया। इस बीच देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविन्दसिंह जी आदि महावीर व महापराक्रमी महापुरुष उत्पन्न हुए जिन्होंने मुस्लिम शासकों से लोहा लिया व अनेक लड़ाईयों में उन्हें परास्त पर अपने राज्य की रक्षा की वा पराधीन प्रदेशों पर विजय प्राप्त कर उन पर शासन किया। अंग्रेजों ने भी देश पर लम्बे समय तक शासन किया। उनके शासन में भी देश का शोषण हुआ व प्रजा पर अत्याचार किये गये। हिन्दुओं का धर्मान्तरण कार्य भी उनके शासनकाल में जारी रहा। ऐसे समय में महर्षि दयानन्द सरस्वती जी का आगमन हुआ। महर्षि दयानन्द ने सन् 1863 से वैदिक धर्म का प्रचार आरम्भ किया। उन्होंने वेदों का सत्यस्वरूप साधारण जनता के सामने रखा। वैदिक मान्यताओं को तर्क व युक्ति के आधार पर सत्य प्रतिपादित किया। वेदेतर सभी मतों की तर्क एवं युक्तियों के आधार पर समीक्षा की और सभी मतों को सत्यासत्य से मिश्रित बताया। अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश’ में ऋषि दयानन्द जी ने सभी भारतीय मत-मतान्तरों सहित बौद्ध-जैन मत, ईसाई मत एवं मुस्लिम मत की समीक्षा कर वैदिक मत के साथ सभी मतों की तुलना कर धर्म का सत्य स्वरूप संसार के सामने रखा। इसका लाभ यह हुआ कि पहली बार भारत के सभी मतों के लोग अन्य सभी मतों के यथार्थ स्वरूप जो सत्यासत्य मिश्रित मान्यताओं से युक्त हैं, उसे यथार्थ रूप में जान पाये। सत्यार्थप्रकाश संसार के लोगों को ऋषि दयानन्द की बहुत बड़ी देन है जिसमें वेद सहित वेदेतर वैदिक साहित्य से वैदिक मान्यताओं के पक्ष में प्रमाण दिये गये हैं और अनेक विषयों पर तर्क एवं युक्ति के साथ वेद सम्बन्धी रहस्यों का प्रकाश किया गया है।

               महर्षि दयानन्द की देश को अनेक देनें हैं। इनमें से एक देन पंचमहायज्ञविधि ग्रन्थ भी है। इस ग्रन्थ में मनुष्यों वा आर्यों के पांच प्रमुख कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है। ऋषि दयानन्द के समय में देश देशान्तर में सभी लोग वैदिक ध्यान व उपासना की पद्धति को विस्मृत कर चुके थे। ऋषि दयानन्द ने अपने इस लघु ग्रन्थ में सन्ध्योपासना विधि सहित देवयज्ञ अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ तथा बलिवैश्वदेव यज्ञ का विधान कर उसके महत्व को इंगित किया है और इन कर्तव्यों के निर्वाह की विधि भी प्रस्तुत की है। ऋषि के इस कार्य के लिये सारा संसार उनका ऋणी है। यह बात अलग है कि संसार भौतिकवाद से ग्रस्त है। वह ऋषि के इन उपकारी कार्यों से लाभ नहीं उठा रहा है। ऐसा न करने से वह अपनी ही हानि कर रहे हैं। वैदिक धर्म में मनुष्य जो भी शुभ व अशुभ कर्म करता है उसका फल उसको ईश्वर की व्यवस्था से भोगना पड़ता है। यदि हम सन्ध्योपासना, अग्निहोत्रयज्ञ, पितृयज्ञ आदि का अनुष्ठान नहीं करेंगे तो हमें इससे होने वाले लाभों से वंचित होना पड़ेगा और न करने का दण्ड भी परमात्मा की व्यवस्था से प्राप्त होगा।

               सन्ध्योपासना विधि के आरम्भ में ऋषि दयानन्द जी ने लिखा है कि यह पुस्तक नित्यकर्मविधि का है। इसमें पंचमहायज्ञों का विधान है। इन पंचमहायज्ञों के नाम हैं–ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ और नृयज्ञ। इन यज्ञों के मऩ्त्र, मन्त्रों के अर्थ और जो-जो करने का विधान लिखा है, उसे यथावत् करना चाहिये। एकान्त देश में अपने आत्मा मन और शरीर को शुद्ध और शान्त करके उस-उस कर्म में चित्त लगाके तत्पर होना चाहिये। इन नित्यकर्मों को करने का फल यह है कि ज्ञानप्राप्ति से आत्मा की उन्नति और आरोग्यता होने से शरीर के सुख से व्यवहार और परमार्थ-कार्यों की सिद्धि का होना। उससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सिद्ध होते हैं। इनके प्राप्त होने से मनुष्य का सुखी होना उचित है अर्थात् मनुष्य सुखी होता है वा दुःखों से मुक्त होता है।

               सन्ध्योपासना विधि में ऋषि दयानन्द ने सन्ध्या शब्द का अर्थ बताते हुए लिखा है कि भली भांति ध्यान करते हैं, वा ध्यान किया जाये परमेश्वर का जिसमें, वह सन्ध्या’। सो रात और दिन के संयोग-समय दोनों सन्ध्याओं में सब मनुष्यों को परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करनी चाहिये। इसके बाद शरीर की बाह्य और भीतर की शुद्धि का उल्लेख किया गया है। इसके पक्ष में मनुस्मृति का श्लोक प्रस्तुत किया गया जो बताता है कि शरीर जल से, मन सत्य से, जीवात्मा विद्या और तप से तथा बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है। ऋषि दयानन्द इस क्रम में कहते हैं कि शरीर-शुद्धि की अपेक्षा अन्तःकरण की शुद्धि सबको अवश्य करनी चाहिये क्योंकि वही सर्वोत्तम और परमेश्वर-प्राप्ति का एक साधन है। इसके बाद तीन प्राणायाम करने का विधान किया गया है और उसकी विधि भी लिखी है। इसके बाद सन्ध्या में आचमन आदि से सम्बन्धित मन्त्र व उनके अर्थ दिये गये हैं। इसका प्रतिदिन प्रातःसायं सेवन करने से मनुष्य को इष्ट धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। यदि कोई पूछे कि सन्ध्या क्यों करते हैं तो इसका उत्तर है कि धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के लिये सन्ध्या करते हैं। किसी भी मत में धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का वैदिक धर्म की तरह उल्लेख नहीं है। इससे सभी मत अपूर्ण सिद्ध होते हैं। वेदेतर मत के अनुयायियों को यह ज्ञात नहीं है कि सन्ध्या करने से मनुष्य को इन चार पुरुषार्थों की प्राप्ति वा सिद्धि होती है। सन्ध्या करने व इसके अंग स्वाध्याय करने से मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि सहित आत्मा की उन्नति भी होती है। वेद एवं वैदिक साहित्य को पढ़कर जो ज्ञान व आत्मा की उन्नति होती है वह इतर मतों के अध्ययन से नहीं होती। इसका कारण यह है कि ईश्वरीय व सांसारिक ज्ञान की जो पूर्णता वेद व वैदिक मत में है वह अन्य मतों में नहीं है। अतः सबको सन्ध्योपासना अवश्य करनी चाहिये। इससे हमें इस जीवन में भी लाभ होता है और परजन्म वा पुनर्जन्म में भी लाभ होगा। हम यह भी कहना चाहते हैं कि सन्ध्योपासना की विधि का निर्माण ऋषि दयानन्द ने किया है। ऋषि दयानन्द जी वेदों के गम्भीर व अतुलनीय विद्वान होने के साथ सफल योगी भी थे। उन्होंने ईश्वर का साक्षात्कार किया था। इस कारण उनके द्वारा निर्मित सन्ध्योपासना विधि वा पंचमहायज्ञविधि सर्वाधिक प्रमाणिक होने से सर्वग्राह्य ग्रन्थ है। उपासना में सफलता प्राप्त करने के अभिलाषी साधको को सन्ध्योपासना विधि के आधार पर उपासना करके मोक्ष प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील होना चाहिये।

               सन्ध्योपासनाविधि के बाद दूसरा महायज्ञ अग्निहोत्र-देवयज्ञ है। अग्निहोत्र यज्ञ का विधान वेदों में है। वेद मन्त्रों के आधार पर ही ऋषि दयानन्द ने दैनिक व विशेष यज्ञों का विधान किया है। वेद ईश्वरीय ज्ञान होने से वेद मन्त्रों में की गई ईश्वराज्ञा का पालन करना सभी मनुष्यों का परम कर्तव्य है। जो मनुष्य ईश्वराज्ञा का पालन करता है, ईश्वर से उसे सुख प्राप्त होता है और जो नहीं करता वह मन्दमति दुःखों से संत्रस्त रहता है। पंचमहायज्ञविधि में ऋषि दयानन्द ने देनिक यज्ञ करने के पक्ष में वेद एवं मनुस्मृति आदि से प्रमाण प्रस्तुत किये हैं और यज्ञ विषयक आवश्यक निर्देश करने सहित यज्ञ में घृत एवं साकल्य से दी जाने वाली आहुतियों के मन्त्रों को भी दिया है। यज्ञ करने से वायुमण्डल शुद्ध होता है। वायु के अनेक दोष दूर होते हैं। दुर्गन्ध का नाश होता है। दुर्गन्ध आदि से होने वाले रोग दूर होते व अनेक असाध्य रोगों से बचाव होकर विद्यमान रोगों में भी लाभ होता है। यज्ञ करने से यज्ञकर्ता सहित यज्ञ से परिष्कृत वायु में जो भी प्राणी श्वांस लेते हैं, उनको भी लाभ होता है। ऋषि दयानन्द जी के अनुसार अग्निहोत्र-यज्ञ से वायु एवं वर्षा-जल की शुद्धि होती है, जिससे अन्न भी शुद्ध प्राप्त होता है। इससे मनुष्य के शरीर में रक्त एवं वीर्य आदि भी शुद्ध बनते हैं और सन्तान भी श्रेष्ठ शरीर व संस्कारों वाली उत्पन्न होती हैं। यज्ञ करने से अनेक आध्यात्मिक लाभ भी होते हैं। यज्ञ एक वैज्ञानिक अनुष्ठान है। इससे अनेक लाभ है। सभी मनुष्यों को यज्ञ को अवश्य करना चाहिये। अग्निहोत्र विषयक ऋषि दयानन्द का उपदेश है ‘केशर, कस्तूरी आदि सुगन्ध, धृत, दुग्ध आदि पुष्ट, गुड़, शर्करा आदि मिष्ट, तथा सोमलतादि रोगनाशक ओषधी, जो ये चार प्रकार के बुद्धि-वृद्धि, शूरता, धीरता, बल और आरोग्य करने-वाले गुणों से युक्त पदार्थ है, उनका होम करने से पवन और वर्षा-जल की शुद्धि करके शुद्ध पवन और जल के योग से पृथिवी के सब पदार्थों की जो अत्यन्त उत्तमता होती है, उससे सब जीवों को परम सुख होता है। इस कारण उस अग्निहोत्र कर्म करनेवाले मनुष्यों को भी जीवों के उपकार करने से अत्यन्त सुख का लाभ होता है। तथा ईश्वर भी उन मनुष्यों पर प्रसन्न होता है। ऐसे-ऐसे प्रयोजनों के अर्थ अग्निहोत्रादि का करना अत्यन्त उचित है।’

               पंचमहायज्ञविधि के अनुसार तीसरा महायज्ञ पितृयज्ञ है। इस विषय में ऋषि दयानन्द का उपदेश है तीसरा महायज्ञ पितृयज्ञ’ है। इसके दो भेद है-एक ‘तर्पण’ और दूसरा ‘श्राद्ध’। ‘तर्पण’ उसे कहते हैं कि जिस कर्म से विद्वान-रूप देव, ऋषि और पितरों को सुखयुक्त करते हैं। उसी प्रकार जो उन लोगों का श्रद्धा से सेवन करना है, सो ‘श्राद्ध’ कहाता है। यह तर्पण आदि कर्म विद्यमान (जीवित)अर्थात् जो प्रत्यक्ष (जीवित) है, उन्हीं में घटता है, मृतकों में नहीं। क्योंकि उनकी प्राप्ति और उनका प्रत्यक्ष होना दुर्लभ है। इसी से उनकी सेवा भी किसी प्रकार से नहीं हो सकती। किन्तु जो उनका नाम लेकर (मृतकों को) देवे, वह पदार्थ उनको कभी नहीं मिल सकता। इसलिये मृतकों को सुख पहुंचाना सर्वथा असंभव है। इसी कारण विद्यमानों (जीवितों) के अभिप्राय से ‘तर्पण’ और ‘श्राद्ध’ वेद में कहा है।’ पितृयज्ञ के विषय में ऋषि दयानन्द ने पंचमहायज्ञविधि पुस्तक में विस्तार से लिखा है। इसके लिये पाठकों को पंचमहायज्ञविधि पुस्तक का अध्ययन करना चाहिये। इसी प्रकार से अन्य दो यज्ञों यथा अतिथियज्ञ एवं बलिवैश्वदेवयज्ञ के विषय में भी पंचमहायज्ञविधि पुस्तक का अध्ययन कर विस्तार से जानना चाहिये।

               पंचमहायज्ञ विधि एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसके अध्ययन व पंच महायज्ञों के विधान के अनुसार आचरण व व्यवहार करने से हमारे धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष सिद्ध होते हैं। जो व्यक्ति इस जन्म व परजन्म में दुःखों से पृथक होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहें, उन्हें पंचमहायज्ञविधि के अनुसार अनुष्ठान करते हुए सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदों के भाष्य, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों का अध्ययन करते हुए आचरण करना चाहिये। इससे निश्चय ही जीवन सुखी होता है एवं सात्विक इच्छाओं की पूर्ति होती है। इसके साथ मनुष्य की शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति होती है और हमारे परलोक वा परजन्म में भी सुधार होता है। ओ३म् शम्।  

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