मौलिक चिंतन में भाषाकी भूमिका

डॉ. मधुसूदन

’जिस समाज में मनुष्य जन्म लेता है; अनजाने (और अन चाहे)ही वह, उस  समाज में बोली जाने वाली भाषा का बंदी बन जाता है। उसकी सोच उस भाषा के शब्दों से अनजाने ही प्रभावित हो जाती है।
उसके जगत की छवि, उस भाषा की चलनी से छन कर(फिल्टर हो कर)  निकलती है। 
उसी छवि को वह वास्तविक जगत समझ लेता है। —

—भाषा वैज्ञानिक एडवर्ड सपीर १९२९ में लिख गए हैं: 
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(एक: विषय प्रवेश:)

कुछ  भाषा वैज्ञानिक मानते हैं, कि, आपकी  जन्म-भाषा  (अर्थात भाषा के शब्द ) आपकी  मानसिकता गढने में सर्वाधिक भूमिका निर्वाह करती है।पर  उस जन्म-भाषा को चुनने का अधिकार आप को नहीं होता। यह  चुनाव आपके जन्म पूर्व ही औरों द्वारा होता है। 

न आपका जन्म आपके हाथ में होता है, न  जन्म किस भाषिक के घर में होगा, आपके हाथ में (होता) है।

कौन करता है  ये चुनाव; इसे भी प्रत्यक्ष कोई नहीं जानता।

आप अपने जन्म को एक (Accident) अकस्मात माने, संयोग माने, वा अपने पूर्व जन्म के कर्मों का फल माने।मान्यता का स्वातंत्र्य आपको अवश्य  है। पर आप को किस भाषा बोलनेवाले परिवार में जन्म लेना है?

ऐसा प्रश्न आप को, जन्म के पूर्व पूछा गया हो, इसका कोई   प्रमाण  नहीं है। 

(दो :भाषा वैज्ञानिक क्या कहते हैं? )

तो, व्यक्ति स्वातंत्र्य के  इस युग में भी  आपको अपनी भाषा  चुनने का अधिकार नहीं है; न  माता पिता चुनने का अधिकार। इसके फलस्वरूप:

(१) जिस समाज में मनुष्य जन्म लेता है; उस  समाज की भाषा का वह बंदी ही बन जाता है। 

(२) और उसकी जन्म -भाषा फिर उसकी मानसिकता को प्रभावित करती है, सुनिश्चित भी कर सकती है—-भाषा वैज्ञानिक एड्वर्ड सपीर (१९३९) कुछ ऐसा ही, कहते हैं।

(३) उस मनुष्य को  दिखनेवाली जगत की छवि, उस भाषा की चलनी से छन कर निकलती है……..। 

(४) इस छवि को ही वह वास्तविक सत्य समझ लेता है। 

(तीन: भाषा का अनजाना  पहलु)भाषा के इस  अनछुए अंग पर विचार प्रस्तुत हैं। सामान्य पाठक के लिए, विषय नया होने से, धीरे धीरे उद्घाटित  करता हूँ। और धीरे धीरे ही समझकर पढने का अनुरोध है। 
आप  अपनी मान्यताओं की मर्यादा को लांघ कर ही इसे समझ पाएँगे। 
(चार:जूठन भरा  भाँडा )
कुछ लोगोंका रट्टामार जूठन भरा  भाँडा इस आलेख को स्वीकार नहीं कर पाएगा। 
उनसे अनुरोध है, कि कुछ समय के लिए अपने मत को ढँक कर खुले मन से, आलेख  पढें। 
पढने के पश्चात अपना मूल-मत,जैसे था वैसा स्वीकार कर ले। 
शंकाएँ  टिप्पणी में डालने के लिए आप स्वतंत्र हैं।

(पाँच: भाषा के मानसिक प्रभाव पर  विद्वान  क्या कहते है ?)

उत्तर:  जैसा प्रारंभ में ही उद्धरण लिखा है; भाषा वैज्ञानिक एडवर्ड सपीर का कथन दोहराता हूँ।
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’जिस समाज में मनुष्य जन्म लेता है; अनजाने (और अन चाहे)ही वह, उस  समाज में बोली जाने वाली भाषा का बंदी बन जाता है। 
उसकी सोच उस भाषा के शब्दों से अनजाने ही प्रभावित हो जाती है।
उसके जगत की छवि, उस भाषा की चलनी से छन कर(फिल्टर हो कर)  निकलती है। 
उसी छवि को वह वास्तविक जगत समझ लेता है। —भाषा वैज्ञानिक एडवर्ड सपीर
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मूल उद्धरण निम्न है।

Linguist Edward Sapir wrote in 1929:
’Human beings …..are very much at the mercy of the particular medium of language of their society’……the ‘real world’ is unconsciously built upon the language habits of the group’
( From–>’Contemporary Linguistics’) by –O’grady, Dobrovolsky, Aronoff -1989 
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(छः तो मौलिक विचारक कैसे पैदा होंगे? )

वैसे मौलिक विचारक इन सीमाओं को  पार कर सकते हैं, पर कुछ धर्म-ग्रंथ स्वतंत्र विचार को  ही निषिद्ध (forbidden) मानते हैं; तब, उन धर्मग्रंथों के बाहर आ कर, सोचे बिना उनके अनुयायियों का मुक्त चिंतन कैसे  संभव हो? 

(सात:धर्मग्रंथों के शब्दों का प्रभाव)
क्योंकि साधारण औसत अनुयायियों  की मानसिकता पर धर्म-ग्रंथों का, प्रभाव ही सर्वाधिक   होता है।ऐसा प्रभाव उनकी श्रद्धा के अनुपात में,  उनकी वैचारिकता पर भी होता  है। ऐसा  गहरा  प्रभाव, उन ग्रंथों  के शब्दों और अवधारणाओं के कारण  होता है।ऊपर ऊपर से विचार करने पर, हरेक मनुष्य विचार में  स्वतंत्र-या मुक्त  ही प्रतीत होता है। 
और वह अनुयायी हो जाता है; उस ग्रंथ का गुलाम ,वा दास।उसे victim या बलि कहना अधिक उचित होगा।
और कुछ धर्मग्रंथ अनुयायियों को  अपने मत की स्वीकृति मात्र से मुक्ति (मोक्ष) का दृढ  वचन ( Guarantee) भी  देते हैं। 
’And the language and the concepts of the scriptures play a dominant and significant role on their thinking.(एडवर्ड सपीर संदर्भ)’

(आठ: 
धर्मग्रंथो के उदार शब्द प्रयोग:)
इससे विपरीत (उलटे) जिस समाज के धर्मग्रंथॊं में उदार और मुक्त चिन्तन को प्रोत्साहित करते शब्दों का  प्रयोग होता है; 
उस समाज की भाषा  उदारता से प्रभावित होती है
और उसी उदारता से  समाज का मानस प्रभावित होता है। संस्कृति भी प्रभावित होती है। मुक्त चिन्तन के कारण अनगिनत आध्यात्मिक ग्रंथों की निर्मिती होती हैं। ऐसा समाज दुनिया को उदारता से देखता है। और, उदारतापूर्ण मानस का और विचारों का परिचय भी देता है। कठिनाइ तब होती है, जब अनुदार और उदार धर्मो  के अनुयायियों को परस्पर एक  दूसरें के साथ रहना पडता है। 

(नौ: आधुनिक समय की माँग)
आधुनिक समय में ऐसे विभिन्न मतों में श्रद्धा रखनेवाले लोगों की, परस्पर मिल जुल कर, साथ रहने की स्थिति एक अति सामान्य बात हो गई है। मनुष्य का जगत ही छोटा हो गया है।  लाखों की संख्या में  प्रवासी ,  निर्वासित, आतंक से त्रस्त एवं श्वेच्छा से  भी नागरिक विभिन्न  श्रद्धाओं को मानने वाले समाजों के साथ अन्यान्य देशों में रहते हैं।तब आपस में संतुलन कैसे संभव होगा? 
ऐसी स्थिति में , संतुलन बनाने के लिए उदार धर्मी कुछ अनुदार होकर संतुलन बनाने का प्रयास करता है।और अनुदार धर्मी  को भी उदार होने की आवश्यकता   बढ जाती है। क्यों कि संतुलन की तुला में दोनो पलडे समान होने पर ही संतुलन संभव होता है।लेखक पाठक की टिप्पणी से लेखन की दिशा निर्धारित करता है।टिप्पणी की कृपा करें। रोमन या देवनागरी में।  
(एक प्रस्तुति में  पूछे गए, प्रश्न पर अध्ययन का निचोड )

4 thoughts on “मौलिक चिंतन में भाषाकी भूमिका

  1. यह एक तथ्य हैं के मनुष्य जिस जाति में जन्म लेता हैं या जिस समाज में पलता हैं बही उसकी भाषा बन जाती हैं। बही भाषा उसके मन मष्तिक में इतनी गहरी पैठ बना लेती हैं के बह उस भाषा के अस्तित्व के लिए संघर्ष करने को भी तैयार रहता हैं। यही भाषा उसकी सोच और मानसिकता को भी परभाबित करती हैं। व्यक्ति की विचारधारा उसके धरम से भी प्रभाबित होती हैं जिसका बह अनुयायी हैं। कुछ धर्म व्यक्ति को सोच की स्वंत्रता पर पाबन्दी लगा देती हैं और कुछ धर्म सोच और विचार की स्वंतंत्रता देते हैं। कुछ धर्म उदारबादी और कुछ अनुदारवादी होते हैं
    जो लोग वास्तविक या मानसिक दास होते हैं बह लोग बिभिन प्रकार की कैद में जकड़े जाते हैं। यह लोग अपनी मातृभाषा की बजाये अपने स्वामी की भाषा अपना लेते हैं। भारत में कुछ बच्चे इतनी अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं के लगता हैं के उनके माँ बाप कोई भारतीय व्यक्ति नहीं बल्कि अंग्रेज लोग हैं। बिदेशो में तो क्या कहना भारत मैं भी कई हिन्दू और विधर्मी विधर्मी लोग अपने घरो में कोई भारतीय भाषा नहीं बोलते। बहा केवल अंग्रजी भाषा बोली जाती हैं ,ऐसा नहीं यह सब लोग धर्म बदल कर ईसाई बने हुए लोग थे , बल्कि गैर ईसाई लोग भी अपने बच्चे को अंग्रेजी केवल इसलिए सिखाई जा रही हैं ताकि बह पढ़ाई करके अमेरिका या किसी अन्य देश में उच्च नौकरी प्राप्त कर सके। तात्पर्या यह हैं बचपन की दासता की बेड़िआ की जकड़ता को अगर तोड़ा नहीं जा सकता तो भी इसे अन्य भाषाओ , अन्य रीति रिवाजो को सीख कर शिथिल किया जा सकता हैं। हैं। व्यक्ति को प्रत्यन करना चाहिए के बह अपने धर्म और समाज के साथ साथ अन्या भाषाओ को भी सीखे ताके बिभिन्न जातिओ , समुदाओ के बीच सदभाबना बड़े। बरना बिभिन्नजातिओ में हमेशा संघर्ष बना रेह्गा।

    1. समय देकर दीर्घ विचारणीय टिप्पणी के लिए मोहन जी धन्यवाद।
      संस्कृत में हमारे धर्म ग्रंथ कहते हैं ’सा विद्या या विमुक्त्ये।’
      अतः हमें मुक्त विचार के लिए प्रेरित ही किया गया है।
      इसी के चलते हम ४ वेद, १०८ उपनिषद, १८ पुराण, १८ उपपुराण, ६ दर्शन, और अनगिनत धार्मिक साहित्य के निर्माता रहे हैं।
      इतना समृद्ध साहित्य मुझे और किसी मत प्रणाली में नहीं मिला।
      साथ साथ ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी हमारा योगदान एक हजार वर्ष की गुलामी के काल की कठिनाइ के काल में भी पर्याप्त रहा।
      आप ने समय लेकर टिप्पणी दी।
      बहुत बहुत ऋणी हूँ।
      ऐसा ही साथ देते रहें।
      धन्यवाद।
      मधुसूदन

  2. श्रद्धये श्री मधुसूदन जी आपके अत्यंत मौलिक आलेख के लिए बहुत बहुत साधुवाद। वर्तमान समय की त्रासदी यह है कि राजनीतिक विश्लेषक और सामाजिक चिंतक उदार धर्म को भी अनुदार धर्मों के समान ही एक अन्य धर्म मान कर विश्व कि समस्याओं का विश्लेषण करते हैं, जिससे समस्याएँ और अधिक जटिल हो जाती हैं। रोग का निदान करते करते और अधिक गंभीर हो जाता है।

    1. नमस्कार आ. गुप्ता जी कुछ सच्चाइयाँ जो मुझे ही क्या, किसी को भी पारदर्शक सत्य होने से दिख सकती है।
      एक कविता *कभी अण्डा भी उडता है?* अलग इ मैल में भेजता हूँ।
      इन्होंने मुक्ति का व्यापार शुरु कर दिया था।
      आप अपनी मुक्त स्वतंत्र टिप्पणी देते रहिए।
      जिससे पाठक संख्या बढ जाती है।

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