ऋषि दयानन्द ने धर्म पालन में वेद-प्रमाण, तर्क एवं युक्तियों को प्रतिष्ठित किया

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध तक विश्व में वेदों की शिक्षाओं के अनुरूप एक ही
धर्म ‘‘वैदिक धर्म” प्रचलित था। महाभारत युद्ध के बाद देश में अव्यवस्था का दौर आया। वेदों व
विद्या का अध्ययन व अध्यापन कुप्रभावित हुआ जिसके कारण समाज में अज्ञान,
अन्धविश्वास, कुरीतियां एवं पाखण्ड ने डेरा डाल लिया। दिन-प्रतिदिन अन्धविश्वासों में वृद्धि
होती गई। स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित कर दिया गया। ब्राह्मणों ने खुद भी
वेद पढ़ना और वेदों के सत्य व व्यवहारिक अर्थ जानने में पुरुषार्थ नहीं किया जिस कारण से हमारे
क्षत्रिय व वैश्यों सहित हमारे ब्राह्मण भी अविद्या व वेद ज्ञान से विहीन हो गये। इसका परिणाम
समय-समय पर देश में अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों की उत्पत्ति व उनका प्रचार हुआ। बौद्ध,
जैन, शंकर-मत, 18 पुराणों पर आधारित वेद-विरुद्ध मत सहित यूरोप में पारसी, ईसाई व
इस्लाम मत का आविर्भाव महाभारत युद्ध के बाद के वर्षों में ही हुआ। जितने भी मत संसार में
प्रचलित हैं वह सब सत्यासत्य व विद्या व अविद्यायुक्त मान्यताओं से ओतप्रोत हैं। अनेक मतों में तो ईश्वर व जीवात्मा के
सत्य स्वरूप का भी अभाव पाया जाता है। सभी की अपनी-अपनी उपासना पद्धतियां हैं जिनमें परस्पर समानता व एकरूपता
नहीं है। सबमें अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग वाली कहावत चरितार्थ होती है। महाभारत युद्ध के बाद देश में अनेक
महापुरुष उत्पन्न हुए परन्तु किसी ने भी मत-मतान्तरों की परस्पर विरुद्ध मान्यताओं का अध्ययन कर असत्य का खण्डन
और सत्य का मण्डन करने का प्रयत्न नहीं किया। भारत में इन मत-मतान्तरों के कारण मनुष्यों के असंगठित होने सहित
मिथ्या धार्मिक व सामाजिक मान्यताओं के कारण जिनमें हम मूर्तिपूजा, फलित-ज्योतिष, अवतारवाद की धारणा, मृतक
श्राद्ध, जन्मना-जातिवाद के कारण परस्पर छोटे व बड़े का भेदभाव व आपस में विवाह एवं सामाजिक व्यवहारों का न होना आदि
कारणों से ही आर्य-हिन्दू यवनों व मुसलमानों के गुलाम हुए थे। यदि हम संगठित होते, अविद्यायुक्त मत-मतान्तर न होते और
हमने धर्म व सामाजिक मान्यताओं व परम्पराओं में वेद और सत्य को महत्व दिया होता, तो भारत कभी भी गुलाम न होता।
गुलामी के दिनों में हमने अपने पूर्वजों के धर्म की हानि व माता-बहिनों के विधर्मियों द्वारा जो घृणित अपमान की घटनायें हुई,
वह कदापि न होती।
महर्षि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) बाल्यकाल से ही सत्य के जिज्ञासु व असत्य से दूर रहते थे। उन्होंने 14 वर्ष की
आयु में ही शिव की मूर्ति को इसलिये मानना छोड़ दिया था क्योंकि शिव की वह मूर्ति अपने ऊपर से उछल-कूद कर रहे चूहों को
हटा नहीं पा रही थी। आगे चलकर यही बालक ऋषि दयानन्द बनते हैं और वेद ज्ञान सहित योग विद्या में सिद्धि व निपुणता को
प्राप्त कर अपने गुरु की प्रेरणा से मत-मतान्तरों के सत्यासत्य की परीक्षा कर असत्य का खण्डन कर वेद व ऋषियों के वेदों पर
आधारित व वेदानुकूल ग्रन्थों की सत्य मान्यताओं का मण्डन व प्रचार-प्रसार करते हैं। ऋषि दयानन्द ने कहा है कि सत्य को
जाने व जीवन में धारण किये बिना मनुष्य जाति की उन्नति नहीं हो सकती। इसलिये विश्व के प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि
वह धर्म एवं समाज आदि विषयों में सत्यासत्य की परीक्षा कर युक्ति व प्रमाणों से असत्य मान्यताओं व परम्पराओं का
निर्भीकतापूर्वक खण्डन करें और सत्य को अपनाये व दूसरों को अपनाने की प्रेरणा करे।
ऋषि दयानन्द के आगमन से पूर्व सभी मत-मतान्तर फल-फूल रहे थे। सभी मतों में सत्य व असत्य मान्यतायें व
सिद्धान्त भरे पड़े थे/हैं। कभी कोई उनकी सत्यता व मनुष्य जाति के लिये हितकारिता पर विचार ही नहीं करता था। सभी
आचार्य और उनके अनुयायी अपने-अपने मत-मतान्तरों की सत्य व असत्य बातों को आंखें मूंद कर स्वीकार करते थे। मूर्तिपूजा,
बहुपत्नीप्रथा, मांसाहार आदि अविवेकपूर्ण कार्य धड़ल्ले से किये जाते थे। सौभाग्य से ऋषि दयानन्द को मथुरा में सत्य के

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अनन्य पुजारी तथा वेदों व ऋषि परम्पराओं में गहरी आस्था व निष्ठा रखने वाले प्रज्ञाचक्षु गुरु दण्डी स्वामी विरजानन्द
सरस्वती मिले। ऋषि दयानन्द ने लगभग 3 वर्ष मथुरा में रहकर उनसे वेदांग के अन्तर्गत आर्ष व्याकरण के ग्रन्थों अष्टाध्यायी
तथा महाभाष्य का अध्ययन किया। आर्ष व्याकरण की सहायता से उन्होंने वेद व वैदिक साहित्य के मन्त्रों व श्लोकों का सत्य
अर्थ अर्थात् भाष्य व अनुवाद करने की विद्या सीखी। सन् 1863 में विद्या पूरी होने पर गुरु दक्षिणा के अवसर पर गुरु विरजानन्द
जी ने उन्हें देश से अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, असत्य अवैदिक परम्परायें एवं मिथ्या मान्यताओं को प्रचार व खण्डन-मण्डन
सहित शास्त्रार्थ आदि के द्वारा दूर करने का परामर्श दिया। ऋषि दयानन्द ने अपने गुरु के इस देशहितकारी व मनुष्यता के
कल्याण की योजना को सहर्ष स्वीकार किया और गुरु जी से विदा लेकर इस कार्य को आरम्भ कर दिया। यद्यपि इतिहास में
स्वामी शंकराचार्य जी ने जैन व बौद्ध मत के आचार्यों से शास्त्रार्थ कर उनकी ईश्वर को न मानने की मान्यता का अपने नवीन
वेदान्त के आधार पर खण्डन किया था, परन्तु इस शास्त्रार्थ में हम देखते हैं कि शंकराचार्य जी ने वेदों के महत्व की वैसी चर्चा कहीं
नहीं की जैसी की ऋषि दयानन्द जी करते हैं। ऋषि दयानन्द ने तो आर्यसमाज के नियमों में घोषणा की है कि ‘वेद सब सत्य
विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों (सज्जन मनुष्यों) का परमधर्म है।’ उन्होंने वेदों के
परम-प्रमाण होने विषयक न केवल घोषणा की अपितु इसे सत्य प्रमाणित भी किया। इसके लिये उन्होंने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
ग्रन्थ का प्रणयन किया। उन्होंने अपने समय के सभी मतों के आचार्यों को चुनौती भी दी थी कि वह इस विषय में उनसे शास्त्र-
चर्चा, शास्त्रार्थ तथा शंका-समाधान आदि कर सकते हैं। जिन्होंने उनसे वार्तालाप कर शंका समाधान करना चाहा, उनका
समाधान उन्होंने किया था।
महर्षि दयानन्द ने वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों का प्रचार करते हुए मत-मतान्तरों की सभी अवैदिक व असत्य
बातों का खण्डन किया। उन्होंने अपने व पराये किसी के प्रति कोई रियायत नहीं की। पहले वह अपने स्वजनों के पुराणों पर
आधारित सनातनी मत की मूर्तिपूजा, फलित-ज्योतिष, अवतारवाद, मृतक-श्राद्ध, जन्मना-जातिवाद आदि का खण्डन करते हैं
और इसके साथ ही अन्य मतों की बातों का भी व्याख्यान कर उसके सुधार की आवश्यकता प्रतिपादित करते हैं। सत्यार्थप्रकाश
के ग्यारह से लेकर चौदह समुल्लासों में उन्होंने संसार के सभी प्रमुख व चर्चित मतों की प्रमुख मान्तयाओं को उनके ही ग्रन्थों से
प्रस्तुत कर समीक्षा की है और उसमें निहित असत्य के अंश को युक्ति, तर्क व प्रमाण पूर्वक प्रदर्शित कर असत्य को छोड़ने तथा
सत्य को ग्रहण करने का आग्रह किया है। इसका परिणाम यह हुआ कि सभी मतों ने अपने ग्रन्थों को पढ़कर अपनी मान्यताओं
को युक्तियों के आधार पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया परन्तु कुछ असत्य ऐसे होते हैं जहां कोई युक्ति नहीं चलती। यही हुआ
और संसार आज जानता है कि किस मत में क्या-क्या अविद्या से युक्त व मानवता के हित की विरोधी मान्यतायें व सिद्धान्त
हैं। इसका श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को है तो वह ऋषि दयानन्द हैं।
ऋषि दयानन्द जी ने जो कार्य किया उससे आर्य-हिन्दू जाति की रक्षा हुई है। एक लाभ यह हुआ कि कुछ विदेशी मत
हिन्दुओं के मत में बुराईयां दिखाकर उनका मतान्तरण वा धर्मान्तरण करते थे। यवनों के भारत में आने और औरंगजेब जैसे क्रूर
बादशाह ने लाखों व करोड़ों हिन्दुओं को मौत का डर दिखाकर तलवार के बल पर उनका धर्मान्तरण किया था। इससे पूर्व व बाद
के बादशाहों ने भी न्यूनाधिक ऐसा ही किया। भारत में जो ईसाई हैं वह सभी हिन्दू पूर्वजों की सन्तानें हैं। उनका भी अंग्रेजों के
भारत आने के बाद पादरियों द्वारा धर्मान्तरण कर उन्हें ईसाई बनाया गया। ऋषि दयानन्द ने अपने वेद विषयक सिद्धान्तों के
आधार पर विदेशियों के मतान्तरण के इस कार्य में रुकावट व बाधा उत्पन्न की। ऋषि दयानन्द और उनके अनुयायियों के प्रचार
से सभी मतों के सुविज्ञ लोग वैदिक धर्म की ओर आकर्षित हुए और अनेक धर्माचार्यों व उनके अनुयायियों ने वैदिक धर्म की
श्रेष्ठता एवं महत्ता से प्रभावित होकर सहर्ष वैदिक धर्म को अपनाया। ऋषि दयानन्द की एक मुख्य देन ‘‘सत्यार्थप्रकाश” की
रचना है। यह ग्रन्थ सत्य एवं वैदिक धर्म का रक्षक है। वीर सावरकर की यह पंक्तियां स्वर्णिम अक्षरों में लिखने योग्य हैं कि जब
तक विश्व में सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ है, कोई विधर्मी अपने धर्म की शेखी नहीं बघार सकता।
यदि ऋषि दयानन्द न आते तथा वह सत्य और असत्य का ज्ञान न कराते, वह सत्य को ग्रहण करने और असत्य को
छोड़ने का आन्दोलन न करते तो आज वैदिक धर्म की क्या दुर्दशा होती इसका अनुमान लगाना कठिन है। संसार के लोग भी वेदों

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के महत्व एवं अनेक रहस्यों से परिचित न हो पाते, न ही लोगों को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का परिचय मिलता तथा न ही
बुद्धिमान एवं विज्ञ लोग इनकी प्राप्ति में अग्रसर होते। ऋषि दयानन्द ने ही संसार के लोगों को सरल एवं सही उपासना विधि से
ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना सहित यज्ञ-अग्निहोत्र करना सिखाया है। ऋषि दयानन्द ने हिन्दी का महत्व बताया और इसके
लिय राष्ट्र स्तर पर आन्दोलन किया था। गाय के महत्व व देश की अर्थव्यवस्था में गोपालन के महत्व को भी ऋषि दयानन्द ने
ही प्रथम प्रतिपादित किया था। देश को मूर्तिपूजा एवं अन्धविश्वासों व सामाजिक मिथ्या परम्पराओं से जो जो हानियां हुई थी
उनका प्रकाश व सुधार भी ऋषि दयानन्द जी व उनके अनुयायियों ने किया। ऋषि दयानन्द ने जन्मना-जाति का त्याग कर गुण-
कर्म-स्वभाव के अनुसार युवावस्था में कन्या एवं युवक के परस्पर की प्रसन्नता एवं सहमति से विवाह करने का जो विधान किया
है वह काफी सीमा तक समाज में व्यवहृत हो चुका है। आज जन्मना-जाति की बातें कमजोर पड़ चुकी हैं। इसका श्रेय भी मुख्य
रूप से ऋषि दयानन्द जी को है। देश की आजादी की प्रेरणा ऋषि दयानन्द ने ही सर्वप्रथम न केवल मौखिक प्रवचनों अपितु
सत्यार्थप्रकाश, आर्याभिविनय, संस्कृतवाक्यप्रबोध आदि ग्रन्थों में लिखकर देशवासियों को की। देश व धर्म की उन्नति व
निर्माण के ऐसे अनेकानेक कार्य हैं जिनका शुभारम्भ व प्रचार ऋषि दयानन्द ने किया था। हम ऋषि दयानन्द की पावन स्मृति को
शत् शत् नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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