लेखक परिचय

कीर्ति दीक्षित

कीर्ति दीक्षित

उत्तरप्रदेश के हमीरपुर जिले के राठ की निवासी। छह साल तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों में नौकरी की। वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकारिता एवं लेखन कार्य कर रही हैं। जीवन को कामयाब बनाने से ज़्यादा उसकी सार्थकता की संभावनाएं तलाशने में यकीन रखती हैं कीर्ति।

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roti bankकीर्ति दीक्षित

भूख का कोई भगवान नहीं होता, जब पेट में लगाई गांठें भी नुकीली होकर चुभने लगें तो रोटी से बड़ा कोई धर्म नहीं होता, और न ही भूखे के लिए कोई पाप या पुण्य! पाप, पुण्य, धर्म, अधर्म, नीति और नियम ये सभी बातें उनके लिए हैं जिनके पेट भरे हों l गाड़ियों में बैठे हम लोग अक्सर किसी फैले हाथ पर एक रुपया रखकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगते हैं, और कहीं न कहीं अपने मन के कोने में ऊपर वाले से मिन्नतें करने लगते हैं की हे भगवान हमारी ये इच्छा पूरी कर देना, और कई बार तो किसी फैले हाथ को देखकर झल्ला पड़ते हैं, कमोबेश इसे दृश्य पूरे भारत के हर छोटे बड़े शहर में दिखाई देते हैं, और हम में से ज्यादातर लोग सरकार और प्रणाली को कोसते हुए आगे बढ़ जाते हैं l

बुंदेलखंड दशकों से भूख गरीबी, सूखा जैसे ना जाने कितनी आपदाओं से घिरा है, राजनैतिक और मीडिया के गलियारों की सुर्खियाँ भी बनता है लेकिन दशा और दिशा बस बदत्तर ही हुई है l बेरोजगारी ने बूढ़े माँ बाप को घर में किस्मत के सहारे अकेला छोड़ दिया, या फिर बच्चों को सडकों पर भीख के सहारे, भीख माँगते एक बच्चा आँखों में उतरी भूख को मुंह से कहता है “जब कोई दे देता है तो खा लेते हैं नहीं तो बस स्टैंड के नल से पानी पीकर सो जाते है l” इन भूखे पेटों की आग जब बेकाबू हो जाती है तो अपराध की ज्वाला के रूप में बाहर आती है l लेकिन हम में से ही कुछ लोग ऐसे होते हैं जो स्थितियों पर किसी को कोसने के बजाय स्वयं अग्रणी होते हैं और बदलाव की ओर कदम बढ़ा देते हैं l

ऐसी ही पहल शुरू की उत्तर प्रदेश के महोबा जिले ने, यहाँ बुन्देली समाज संस्था ने १५ अप्रैल २०१५ को “रोटी बैंक” की शुरुआत की थी, बुन्देली समाज  के संयोजक तारा पाटकर कहते हैं- “जब हम रोटी माँगते बच्चों, बूढों को देखते थे तो लगता था सारी आदर्शो की बातें बेकार हैं यदि हम मानवता के मूल्यों पर ही ना खरे उतर सकें,”  दस दोस्तों ने मिलकर चौराहों, बस और रेलवे स्टेशन पर रोटी के लिए फैले हाथों के लिए अन्न की व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाई , दस घरों से २ रोटी सब्जी जमा होना शुरू हुई चौराहों रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन जैसी जगहों पर २० से २५ भूखे गरीबों को हर रोज खाना खिलाने की शुरुआत हुई थी, लेकिन लोग आते गये कारवां बनता गया, आज लगभग ७०० घरों से रोटियां आती हैं और करीब ४५० से ५०० लोगों का पेट भरता है बुन्देली समाज l आज ये बैंक उन बूढ़े असहाय लोगों का पेट भी भरता है जिनके बच्चे उन्हें घरों में अकेला छोड़कर मजदूरी की तलाश में निकल गए l

स्थानीय निवासी लीला कहती हैं – “हमारी तरफ से ज्यादा कुछ नहीं दो रोटी ही सही लेकिन उन लोगों के लिए बहुत है जो भूखे हैं l”

बिजनेसमैन राजशेखर कहते हैं –“भूख की पीड़ा हमारे आप जैसे लोगों को नहीं समझ आ सकती, क्योंकि हम जानते हैं हमारे पास साधन है, इस भूख की तकलीक उन लोगों के लिए है जिनके पास पेट की आग पर डालने के लिए केवल और केवल पानी है, रोटी बैंक एक अनूठी और मानवीय पहल है l”

संयोजक तारा पाटकर कहते हैं – “बुन्देली समाज की इस पहल को स्थानियों का भरपूर साथ मिला लेकिन सवालों ने भी उनकी मुहीम को घेरा कई लोग कहते इनके भोजन में जहर भी हो सकता है, कुछ अराजक तत्वों ने साम्प्रदयिक जहर घोलने का प्रयास किया लेकिन हमने हर समस्या का उत्तर दिया”

इस रोटी बैंक के लोगों का सपना है की कही कोई भूखा ना सोये, इनकी इस पहल ने कई लोगों को प्रेरणा दी है, महोबा की ही तरह बुंदेलखंड के बाँदा, अतर्रा, ललितपुर, उरई में रोटी बैंक शुरू हुए हैं, महरास्ट्र, झारखण्ड के हजारीबाग, और दिल्ली की आजादपुर मंडी में रोटी बैंक काम कर रहे हैं l इसके अतिरिक्त बुन्देली समाज ने अपने हेल्पलाइन नंबर भी जारी किये हैं की कहीं भी किसी को हमारी सहायता सहयोग की आवश्यकता है वो हमें इन नंबर्स पर फ़ोन कर सकते हैं -९५५४१९९०९०, ८०५२३५४४३४ l भूख के विरूद्ध लड़ते ये लोग यही अपील करते हैं की सब साथ आयें और कोई भूखा ना सोये, हर शहर में ऐसे रोटी बैंक बने l

भूखे पेटों से सुनहरे भविष्य नहीं लिखे जाते, शिकायतों, और सरकार और प्रशासन को कोसने को पीछे छोड़ हम आप अपना काम करें, मानवता का धर्म निभाएं, क्यों ना आप, हम सब इस मुहीम के लिए आगे का मार्ग प्रशस्त करें- “घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो इतना कर लें , किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये l

 

One Response to “रोटी बैंक एक मानवीय पहल”

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