रोजा इफ्तार और साम्प्रदायिक सौहार्द

“रोजा इफ्तार” जो केवल मुस्लिम सम्प्रदाय का मज़हबी कार्यक्रम होता है जिसमें पूरे दिन का उपवास (रोजा) रखा जाता है और फिर शाम को भोजन सामग्री ग्रहण करना आरंभ किया जाता है, इसको इफ्तार (रोजा खोलना) कहते है। जब यह कार्यक्रम सामुहिक रुप से विभिन्न नेताओं व अधिकारियों द्वारा बड़े स्तर से आयोजित किया जाता है तो वह  “इफ्तार पार्टी” हो जाती है। परंतु इस अवसर पर प्रायः सामूहिक कार्यक्रम करने वालो का मुख्य लक्ष्य राजनैतिक लाभ उठाना होता है। लेकिन क्या कभी मुस्लिम संप्रदाय ने अन्य धर्मानुयाईयों की भावनाओं का सम्मान रखते हुए उनके त्यौहारों आदि पर कभी इसप्रकार की सह्रदयता का परिचय दिया है ?  उल्टा अनेक गैर मुस्लिम धार्मिक अवसरों व शोभा यात्राओं पर बाधाये ही उत्पन्न करके साम्प्रदायिक दंगे अवश्य भड़के है ।
हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने पूर्व प्रधानमंत्रियों के समान अपने 3 वर्ष के कार्यकाल में अपने निवास व कार्यालय में ‘रोजा इफ्तार’ नही किया व न ही इसमें भाग लेने कहीं जाते है। उनका यह संकल्प उनके “हिन्दू राष्ट्रवादी” होने को सार्थक करता है। इन जटिल राजनैतिक परिस्थितियों में जिस दृढ़ता से वे अपने इस संकल्प पर टिके हुए है वह अपने आप में एक सशक्त व्यक्त्वि का परिचय कराता है। परंतु राजनीति की विवशता के कारण मोदी जी के मन्त्री
मंडल के अन्य कुछ साथी रोजा रफ्तार का आयोजन भी करते है और कुछ ऐसे आयोजनों में भाग भी लेते रहते है । राष्ट्रपति जी भी अपने को ऐसे आयोजनों से पृथक नही रख पातें ? इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी न तो इफ्तार का कोई आयोजन किया और न ही ऐसे किसी कार्यक्रम में सम्मलित हुए। जबकि राज्यपाल सहित अन्य कुछ मंत्रियों ने इफ्तार का आयोजन भी किया और उसमें भाग भी लेते रहें।परंतु यह दुखद है कि पिछले वर्ष के समान इस वर्ष भी अनेक स्थानों पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा भी रोजा इफ्तार का आयोजन किया गया। “रोजा इफ्तार” ऐसे आयोजन केवल साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाने की मृगमरीचिका को ही पुष्ट करते है ।
लेकिन इस्लामिक आतंकवाद के प्रखर विरोधी अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने देश की 20 वर्ष पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए इस बार ईद पर मुसलमानों को प्रसन्न रखने के लिये व्हाइट हाऊस में इफ्तार पार्टी का आयोजन नही करके विश्व को एक सार्थक संदेश दिया है।  उनका स्पष्ट मत है कि जब मुसलमान अन्य धर्मावलंबियों के उत्सव व त्यौहार आदि  पर अन्य धर्मावलंबियों के लिये कोई स्वागत समारोह आदि नही करते तो फिर वे क्यों उनके इस पर्व का आयोजन करके उनका तुष्टिकरण करके उनको उत्साहित करें ? यह सब आज इसलिये अधिक महत्व का विषय है क्योंकि मोदी जी व श्रीमान ट्रम्प दोनों ने अपने अपने देश में राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया है। इन दोनों राष्ट्रनायकों के लिए “राष्ट्र प्रथम” (NATION FIRST) का भाव ही सर्वोच्च है।
आज भारत सहित विश्व के अनेक प्रजातांत्रिक देशो में जनसंख्या बल के महत्व को समझना चाहिये क्योंकि मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या व उनकी एकजुट वोटो के लिये सत्तालोलुप राजनेता उनकी हर अच्छी-बुरी व उचित-अनुचित स्थिति में उनके लिए सबसे आगे खड़ें होते है। इसलिये अधिकांश लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले राष्ट्रों में मुसलमान अपनी अपनी जनसंख्या प्रजनन व घुसपैठ द्वारा बढ़ाने में सक्रिय है।हमारे देश में विखरे हुए हिन्दू वोट और उनके घटते जनसंख्या अनुपात पर कोई नेता आकर्षित नही होता और हिंदुओं के त्यौहारों पर ये नेता रोजा इफ्तार जैसा कोई भी सामूहिक धार्मिक आयोजन भी नही करते। क्या यह उचित नही होगा कि हिंदुओं के लिये इन नेताओं व अधिकारियों आदि को ‘दीपावली मिलन’,  ‘होली मिलन’ व “नवरात्र भोज उत्सव” जैसे विशाल आयोजन  करके राष्ट्र की संस्कृति की रक्षा करनी चाहिये । परन्तु यह लोकतंत्र प्रणाली की आवश्यकता भी है और विवशता भी कि जब तक कोई समाज संगठित होकर किसी भी नेता आदि को अपने सुख-दुख से अवगत नही करवायेगा तब तक उनकी किसी भी सांस्कृतिक, धार्मिक व सामाजिक परंपराओं को प्रशासनिक व राजनैतिक स्तर पर कोई प्राथमिकता नही दी जा सकेगी। अतः वर्तमान परिस्थितियों में बिगड़ते हुए जनसंख्या अनुपात को सुधारना व जातिगत आधार पर विखरे हुए वोटों को एकजुट करना अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को जीवंत रखने व लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए सर्वाधिक आवश्यक है।

विनोद कुमार सर्वोदय

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