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“ऋषि दयानन्द ने सभी सामाजिक बुराईयों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी : डा. सोमदेव शास्त्री”

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मनमोहन कुमार आर्य

श्री मद्दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल, पौंधा-देहरादून के 18 वें वार्षिकोत्सव के अवसर पर 29 मई से 31 मई, 2018 तक तीन दिवसीय सत्यार्थप्रकाश स्वाध्याय शिविर का आयोजन किया गया है जिसमें आर्यजगत  के प्रसिद्ध विद्वान डा. सोमदेव शास्त्री सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास का स्वाध्याय करा रहे हैं। स्वाध्याय शिविर के प्रथम सत्र में दिनांक 29-5-2018 को को डा. सोमदेव शास्त्री जी ने कहा कि महाभारत युद्ध के बाद वेदों का पठन पाठन रुक गया था। इसके बाद वाममार्ग चला। वाममार्ग का अर्थ है उल्टा रास्ता। आचार्य जी ने ईश्वर की उपासना की चर्चा कर पांच यमों अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह का उल्लेख किया। यह पांच यम परमात्मा की प्राप्ति कराते हैं। महाभारत युद्ध के बाद देश में प्रचलित हुए वाममार्ग का उल्लेख कर आचार्य जी ने बताया कि वाममार्ग के ग्रन्थों में कहा गया है कि वाममार्गी शराब पीये और जब नशे से गिर पड़े तो पुनः शराब पीयें, फिर गिर पड़े तो फिर खड़े होकर पीने की कोशिश करे और जब तक हो सके शराब पीता रहे। जब शराब पीकर उठा न जाये तो समझों की उस मनुष्य की मुक्ति हो गई। ऐसा होने पर उस वाममार्गी मनुष्य का जन्म व मरण का बन्धन टूट जाता है।

आचार्य जी ने वाममार्गियों के पांच मकारों की चर्चा कर बताया कि मद्य, मांस, मीन (मछली), मुद्रा व मैथुन उनके पांच मकार अर्थात् उनके मत व धर्म के मुख्य अंग हैं। मद्य को वह परम औषधि बताते हैं। मांस को बल का स्रोत कहते हैं। मछली को बुद्धिवर्धक, मुद्रा अर्थात् हस्तमुद्रा एवं मैथुन का प्रचार करते हैं। मद्य का नाम उन्होंने तीर्थ रखा है। मांस का शुद्धि, मछली का तृतीया, मुद्रा का चतुर्थी और मैथुन का नाम पंचमी रखा है। वाममार्ग के जो अनुयायी नहीं है उन्हें वह कण्टक एवं शुष्क पशु कहते हैं। आचार्य जी ने कहा कि वाममार्गियों तथा तान्त्रिकों की बातें प्रायः समान हैं। वाममार्गियों के दो प्रकार के ग्रन्थ हैं जिन्हें वह आगम और निगम कहते हैं। उनके जिन ग्रन्थों में पार्वती का शिव से संवाद है, जिन ग्रन्थों में पार्वती शिव से प्रश्न करती है उन्हें वह आगम ग्रन्थ कहते हैं और जिन ग्रन्थों में शिव पार्वती से प्रश्न करते और पार्वती उत्तर देती हैं उनका नाम उन्होंने निगम रखा है। शैव व शाक्त इन दो मतों में भी यह आगम व निगम ग्रन्थ आते हैं। शिव को मानने वाले शैव और शक्ति वा दुर्गा को मानने वाले शाक्त कहलाते हैं। शाक्त दुर्गा को जगद् जननी मानते हैं। उनके अनुसार देवी दुर्गा से ही ब्रह्मा, विष्णु व शिव आदि उत्पन्न हुए हैं। आचार्य डा. सोमदेव शास्त्री जी ने कहा कि वागमार्ग तथा शाक्त मत की मान्यतायें प्रायः समान हैं। उन्होंने कहा कि तान्त्रिकों का प्रभाव बंगाल में अधिक है।  डा. सोमदेव शास्त्री जी ने बताया कि वाममार्गियों ने अपनी साधिकाओं का नाम मुद्रा रखा है। वह महिला को साथ रखते हैं वही साधिका वा मुद्रा कहलाती है। वाममार्ग की साधना के लिए साधिका को साथ रखना आवश्यक है। वाममार्गी को दीक्षित चक्र में प्रवेश करना होता है। वाममार्गी साधिका सहित अपनी साधना व गुरु की सेवा कर गुरु को प्रसन्न करते हैं। गुरु जब प्रसन्न होता है तो वह साधिका से मैथुन करता है। उसके बाद वह वाममार्गी अपने अनुयायी को दीक्षित चक्र में प्रवेश की अनुमति देता है। वाममार्गी स्वयं को शिव व साधिका को पार्वती कहते हैं। इसके बाद वह भैरवी चक्र में सम्मिलित होते हैं। आचार्य जी ने बताया कि वाममार्गी किसी गुप्त व एकान्त स्थान पर एकत्रित होते हैं और वहां भूमि पर एक गोलाकार आकृति बनाकर उसके गोलाकार आकृति के बीच में शराब का घड़ा रखते हैं। इसमें सब वाममार्गी स्त्रियों सहित सम्मिलित होते हैं। पहले वह अपने सभी कपड़े उतार देते हैं। एक दूसरे के गुप्तांगों की पूजा करते हैं। नशा करते हैं, नाचते हैं और जिसके हाथ में जिसका कपड़ा आ जाये उससे मुंह काला करते हैं। आचार्य जी ने जगन्नाथपुरी आदि मन्दिरों की चर्चा की और उसकी दीवारों पर अश्लील चित्रों को वाममार्ग की विचारधारा से प्रभावित बताया। वाममार्गी बताते हैं कि जगन्नाथपुरी मन्दिर में नग्न मूर्तियां इस लिये बनाई गई हैं जिससे कि मन्दिर पर बिजली न गिरे। आचार्य जी ने कहा कि खजुराहों की नग्न मूर्तियां भी वाममार्ग के अनुयायी राजाओं ने बनवाई हैं। आचार्य जी ने वाममार्ग के मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि क्रियाओं आदि की भी विस्तार से चर्चा की। आचार्य डा. सोमदेव शास्त्री जी ने कहा कि मध्यकालीन महीधर व उव्वट आदि वेदभाष्यों पर वाममार्ग की विचाराधारा का प्रभाव है। मध्यकाल में यज्ञों में अश्व आदि पशुओं के मांस की आहुतियां देने को आचार्य जी ने वाममार्ग का प्रभाव बताया जिसके लिए निर्दोष व अवध्य पशुओं को मारा जाता था। आचार्य जी ने वाममार्ग के अनेक कुत्सिक कार्यों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वाममार्गी आचार्य यज्ञ में मरे पशुओं पर यजमान की पत्नी द्वारा जल सिंचन की मिथ्या व आपत्तिजनक क्रियायें भी कराते थे। डा. सोमदेव शास्त्री ने कहा कि वाममार्ग का एक जमाने में देश व समाज में बहुत प्रभाव रहा है। उन्होंने मन्त्रों के भ्रष्ट विनियोग और साधु विनियोगों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि समिधाग्निं दुवस्यत वेदमन्त्र में यज्ञाग्नि में समधिदान का स्पष्ट उल्लेख व विधान है। इस मन्त्र में यज्ञ में समिधा की आहुति देना सही विनियोग कहलाता है। उन्होंने कहा कि जो विनियोग मन्त्र के अर्थ के विपरीत किये गये हैं वह सब अनुचित व भ्रष्ट विनियोग की श्रेणी में आते हैं। आज भी पौराणिकों द्वारा ऐसे कई अनुचित विनियोग प्रयोग में लाये जाते हैं।  आचार्य डा. सोमदेव शास्त्री जी ने कहा कि महीधर व उव्वट के वेदभाष्यों पर वाममार्ग की मान्यताओं का प्रभाव है। सायण के अथर्ववेद भाष्य पर भी उन्होंने वाममार्ग का प्रभाव बताया। आचार्य जी ने कहा कि वाममार्ग से प्रभावित इन्हीं वेद भाष्यों का यूरोपियन लोगों ने अंग्रेजी में अनुवाद कर भारतीय संस्कृति को विकृत करने का प्रयास किया। स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने अपने वेदभाष्य को इन सभी प्रकार के दोषों से दूर रखा और वाममार्ग व अंग्रेजी के अनुवादों के दोषों की निष्पक्ष भाव से समीक्षा की। आचार्य जी ने वैदिक हिंसा हिंसा न भवति का भी प्रमाणों के साथ प्रतिवाद किया। आचार्य जी ने बताया कि स्वामी दयानन्द जी ने सन् 1876 में वेदभाष्य करना आरम्भ किया था। वह अपने वेदभाष्य को मासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित किया करते थे। वेद भाष्य के सदस्यों की सूची में प्रथम नाम इंग्लैण्ड के प्रो. मैक्समूलर तथा दूसरा नाम इंग्लैण्ड के ही प्रो. विलसन का था। स्वामी दयानन्द ने सन् 1876 में अपने वेदभाष्य को मैक्समूलर को भेजा तो मैक्समूलर के वेदों के प्रति भा्रन्तियुक्त विचारों में परिवर्तन हुआ। ऋषि दयानन्द जी के वेदभाष्य से प्रभावित होकर ही उन्होंने लिखा कि वेद संसार की सबसे पुरानी पुस्तक है। स्वामी दयानन्द के प्रभाव से प्रो. मैक्समूलर ने वेदों की महत्ता को बताने वाले अनेक विचारों को भी आचार्य जी ने प्रस्तुत किया। आचार्य जी ने प्रसंग का उल्लेख कर कहा कि पन्द्रहवीं शताब्दी तक वाममार्ग का सभी ग्रन्थों पर प्रभाव रहा। वाममार्ग के प्रभाव के कारण ही पुराणों में योगेश्वर श्री कृष्ण जी के चरित्र को दूषित किया गया। आचार्य जी ने आनन्द रामायण की चर्चा भी की और बतया कि यह पुस्तक भी वाममार्गियो की रचना है। उन्होंने कहा इसमें भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चरित्र को दूषित किया गया है। इस पुस्तक से कुछ उदाहरण भी आचार्य जी ने दिये। डा. सोमदेव शास्त्री जी ने कहा कि हमारे बड़े बड़े राजनेता भी इन मिथ्या ग्रन्थों से प्रभावित हैं। आचार्य सोमदेव शास्त्री जी ने कहा कि ऋषि दयानन्द के जीवन पर विचार करते हैं तो पता चलता है कि उन्हें पाचक, लेखक, सब्जी खरीद कर लाने वाले आदि सज्जन व ईमानदार पुरुष नहीं मिले। ऋषि दयानन्द ने अपने विरोधियों द्वारा दी गई भीषण यातनाओं व कष्टों को सहन किया। आचार्य जी ने जन्मना जातिवाद की मिथ्या परम्परा का उल्लेख कर कहा कि ऋषि दयानन्द ने सभी सामाजिक बुराईयों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा कि दुर्गा व काली की पूजा वाममार्गी परम्परा से ही प्रभावित एक क्रिया है। आचार्य जी के व्याख्यान का समय पूरा हो गया था। अतः उन्होंने सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में वाममार्ग के सम्बन्ध में आये प्रसंग पर अपने विचारों को विराम दिया। ओ३म् शम्।

 

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