चप्पलें सस्ती हैं वनवासी थोड़ा ज्ञान और थोड़ी मेहनत के बाद खुद खरीद लेंगे चप्पल”

विवेक कुमार पाठक
गरीबों को खाना बांटना कपड़े बांटना चप्पल बांटना नेकी का काम है मगर इसका दुनिया में प्रचार प्रसार करके अपनी झांकी जमाना कहां तक उचित है।मप्र में मीडिया और पत्रकार वत्सल मुख्यमंत्री अच्छा काम कर रहे हैं। 15 साल से दिन रात एक करके मप्र को अपने बस तक विकसित बनाने में लगे हैं मगर छोटी छोटी नेकी को भी मीडिया में क्यों भुनाते हैं और भुनाएं भी तो गरीब की इज्जत और उसके स्वाभिमान को क्यों छेड़ते हैं।आप सरकारी रुपयों से आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं इसके लिए साधुवाद मगर उनकी गरीबी को अपमानित मत कीजिए। आप आदिवासियों और तेंदुपत्ता बीनने वाले वनवासी भाइयों के पांव के छालों की फिकर करते हैं तो आपको मुझ जैसे लाखों का प्रणाम हैै।आप उनके पैर के कांटे और उनसे निकला रक्त देखकर द्रवित होते हैं तो आपका मप्र के भद्र नागरिक अभिनंदन करते हैं। मप्र में गरीबों के हितैषियों और उनकी चिंता करने वाले आपके शुक्रगुजार हैं मगर भलाई के आपके कई तरीके समझ से बाहर हैं।” अगर किसी वनवासी पर चप्पल तक नहीं हैं तो ये भारत की सत्तर साल पुरानी राजव्यवस्था की नाकामी है।”गरीब वनवासी के बड़े बड़े लाचारी भरे फोटो और खुद को दानी बताने वाले आयोजन क्यों करते हैं सरकारी मंचों पर।सरकार गरीबों को देने के लिए ही है। गरीबों के मसीहा और आदिवासियों की बार बार लगातार चिंता करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान गरीबों पर अहसान नहीं कर रहे।
मप्र सरकार के मुखिया एक पैसा भी अपनी जेब से नहीं बांट रहे हैं।वे टैक्स पेयर्स की गुल्लक से अपने मन की भलाई कर रहे हैं।टैक्सपेयर्स में गांव देहात का बीपीएल धारी भी है तो बीड़ी सिगरेट और नोन तेल आटा खरीदने वाला वनवासी आदिवासी और उसका परिवार भी है।तेंदुपत्ता बीनने वाले निर्धन आदिवासी भी मप्र सरकार में अठन्नी चवन्नी से लेकर दो चार दस रुपए का टैक्स देकर योगदान दे ही रहे होंगे।तेंदुपत्ता संग्रह करने वाले वनवासी गरीब और लाचार सरकारी गुल्लक में चाहे न चाहे धूल बराबर भागीदारी दे ही रहे हैं।इसके बाबजूद मप्र में उनको निशुल्क चप्पल पहनाना मुख्यमंत्री इतना भुना क्यों रहे हैं और चलो भुना भी लें तो कम से कम गरीबों की गरीबी को सार्वजनिक रुप से रुसवा तो न करे।कोई किसी से दान नहीं लेना चाहता है।”दुनिया में और धरा पर आया हर प्राणी स्वाभिमानी है।”चींटी भी अपने से चार गुना भारी शक्कर के दाने को बार बार खींचकर स्वाभिमान की शिक्षा देती है।चींटी पचास बार दीवार से गिर गिरकर मांगने के लिए तो अब तक चर्चा में नहीं आई है। चींटी, पशु पक्षी से लेकर इंसान सब अपने बस तक अपना जीवन स्वाभिमान और अपने दम पर जीने का संघर्ष कर रहे हैं।ऐसे में जिसे उनके संघर्ष में मदद करने की चिंता सताती हो वे प्रणाम योग्य हैं मगर अपना एजेंडा छोड़कर आएं इन भलाइयों के लिए।गरीब के पास स्वाभिमान बमुश्किल से जीवित रह पाता है।उसे पल पल अपनी कमजोरी और तंगहाली के कारण सबको माई बाप बनाना पड़ता है।मप्र के वनवासी तेंदुपत्ता संग्राहक जंगल में अगर चुभते कांटों के बाबजूद तेंदुपत्ता तोड़ तोड़कर सरकार और सिस्टम को दे रहे हैं तो ये उनके श्रम का स्वाभिमान है।वे ज्ञान के उजियारे से दूर हैं नहीं तो न सरकारी चप्पलें निशुल्क लेंगे और न किसी दरियादिल सामाजिक संस्था और क्लब के दान के आगे कातर भाव से हाथ जोड़ेंगे।मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान मप्र में आदिवासियों और गरीबों के लिए खूब काम करें।पूरे मप्र की जनता उनके साथ खड़ी है मगर अपने हर काम को मीडिया में प्रचारित और प्रसारित करने के लोभ से बचें।ये उनके गैर सरोकारपरक पूंजीवाद कुछ सलाहाकारों को अच्छा लग सकता है मगर गरीब किसी से दान देश दुनिया में प्रचारित होकर नहीं लेना चाहता।किसी पर चप्पल तक नहीं है ये उसके लिए वो मन की पीड़ा है जो वो ही जान समझ सकता होगा।अगर आप उसकी पीड़ा को दूर करना चाहते हैं तो करें मगर गरीब को हजारों लाखों के बीच मंच पर चप्पल क्यों पहनाते हैं।अगर दान देना चाहते हैं तो दान में चप्पल पहनने वाले गरीब का भी फोटो क्यों।अपनी तंगहाली में सरकारी चप्पल पाने वाला वनवासी और उसका समाज इससे शर्मिन्दा होता है।उसे चप्पल से लेकर जीवन को आसान बनाने वाली अन्य वस्तुएं भी मुक्त हस्त से दीजिए ये आपका दायित्व है और आप निभा रहे हैं इसके लिए आप आदर और बधाई के हकदार हैं मगर बिना उसका फोटो सार्वजनिक किए।आपके पास दुनिया भर की तनख्वाह ले रहे महंगे सरकारी कर्मचारी हैं। ये काम उनके बस तक छोड़ दिया होता।मंच से योजना और उसके लाभ बताने से ही आदिवासी और वनवासी आपकी बलइयां ले लेंगे फिर बड़े बड़े मंचों पर गरीब वनवासी महिला को सौ दो सौ तीन सौ की चप्पल लेकर आप अपनी झांकी क्यों जमाते हैं।गरीब हो या श्रमिक आदिवासी वनवासी सबकी अपनी इज्जत और स्वाभिमान है। अपनी सरकार की मेहनत और खुद की दरियादिली को जन जन तक खूब पहुंचाएं मगर दुनिया को ये न बताएं कि अमुक महिला और पुरुष पर खुद की खरीदी चप्पल नहीं है और मध्यप्रदेश सरकार और उसके लोकप्रिय मुख्यमंत्री ही वन में उन्हें कांटों से बचने चप्पलें वो भी निशुल्क पहनाकर खुद गए हैं।चप्पलें सस्ती हैं वनवासी थोड़ा ज्ञान और थोड़ी मेहनत के बाद खुद खरीद लेंगे चप्पल।

1 thought on “चप्पलें सस्ती हैं वनवासी थोड़ा ज्ञान और थोड़ी मेहनत के बाद खुद खरीद लेंगे चप्पल”

  1. समाज में आर्थिक व सांस्कृतिक कारणों से पिछड़ा आदिवासी वर्ग अथवा कोई अन्य गरीब व असहाय भारतीय नागरिक के व्यक्तिगत और मानवीय अधिकारों को मैं केवल न्याय व्यवस्था से नहीं अपितु मनुष्यता की दृष्टि से भी देखते आया हूँ| लेकिन जब से मुझ बूढ़े ने होश संभाला है केवल निर्वाचन के समय और केवल मध्य प्रदेश में ही क्यों मैं तो सदैव सर्वस्व देश में खैरात में बांटी गई चप्पल इत्यादि लेने वालों की भीड़ देखते आया हूँ| मेरी बात की पुष्टि में आप राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम २०१३ के बारे में जानकारी प्राप्त करें—विशेषकर देश की कुल जनसंख्या के दो-तिहाई जनसमूह की दयनीय स्थिति को पहचाने—और प्रवक्ता.कॉम पर लौट हमें बताएं कि कांग्रेस-राज के एक मात्र प्रगति-पत्र, उक्त अधिनियम के अंतर्गत रियायती खाद्यान्न का प्रावधान में देशवासियों की दरिद्रता और दुःख में उनका स्वाभिमान खोते आप कौन सा गर्व देखते हैं? ऐसी स्थिति में आप कैसे कह सकते हैं, “चप्पलें सस्ती हैं वनवासी थोड़ा ज्ञान और थोड़ी मेहनत के बाद खुद खरीद लेंगे चप्पल?”

    विवेक कुमार पाठक जी, आदिवासियों व देश में अन्य सभी नागरिकों के स्वाभिमान को लेकर मैं आपकी भावना का सम्मान करता हूँ लेकिन सामाजिक मीडिया में लिखते आप भी अपने ऊँचे आदर्श के अनुकूल भावाभिव्यक्ति करें| आप स्वयं जानते हैं कि “अगर किसी वनवासी पर चप्पल तक नहीं है तो ये भारत की सत्तर साल पुरानी (कांग्रेस राज) राजव्यवस्था की नाकामी है|” तो बीच चौराहे खड़े व्यक्तिगत रूप से मध्य प्रदेश मुख्य मंत्री (राष्ट्रीय शासन) को दोषी ठहराने का क्रूर उपक्रम क्यों करते हैं? मीडिया भाई चप्पल बांटते फोटो खींचे और आप अनैतिक पत्रकारिता द्वारा राष्ट्रीय शासन के विरोध में आदिवासी स्वाभिमान की छड़ी से आदिवासियों को हांकते फिर उन्हें कांग्रेस के खेमे में ले जाए! क्यों?

    न भूलें कांग्रेस-राज और उनके नापाक राजनैतिक गठबंधन की पकड़ से मुक्त प्रत्येक भारतीय नागरिक का मौलिक कर्तव्य है कि संगठित हम सब युगपुरुष नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत और देशवासियों के हित में काम करें|

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