लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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प्रवेश:

ॐ —देववाणी संस्कृत: ”भव्य ब्रह्मांडीय संगीत” A Cosmic Grand Opera –कहते हैं, ”अमरिकन संस्कृत इन्स्टीट्यूट” के निर्देशक प्रो. व्यास ह्युस्टन

ॐ —प्राचीन भारतीय ऋषि-मनीषियों ने, शब्द की अमरता का, गहन आकलन किया था।

ॐ—मानवीय चेतना की उत्क्रान्ति का क्रम-विकास, भाषा-विकास के साथ अटूट रूप से जुडा हुआ है; इस तथ्य को समझा था।

ॐ—संकरित वर्णों को विचार पूर्वक वर्जनीय समझा था।

ॐ–संस्कृत की स्पंन्दन क्षमता और सुसंवादी ऊर्जा भी एक भव्य अंतरिक्षी आयाम है।

(१)

भव्य ब्रह्मांडीय संगीत

देववाणी संस्कृत भाषा को, भव्य ब्रह्मांडीय संगीत” A Cosmic Grand Opera इन शब्दों में वर्णन करने वाले विद्वान व्यक्ति कोई भारतीय नहीं, पर ”अमरिकन संस्कृत इन्स्टीट्यूट” के निर्देशक प्रो. व्यास ह्युस्टन है। ”अमरिकन संस्कृत इन्स्टीट्यूट” न्यु-योर्क के महा-नगर में, १९८९ में प्रारंभ हुआ था, जो संस्कृत शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत है; जिस के निर्देशक है, संस्कृत भक्त ”प्रो. व्यास ह्युस्टन”।

”A great deal of thought went into the development of the Sanskrit alphabet.” वे कहते हैं, बडा गहरा चिन्तन हुआ था, संस्कृत के अक्षरों को विकसित करने में।

प्राचीन भारत के ऋषियों ने, शब्द की अमरता का, बडा गंभीर आकलन किया था। उन्हों ने मानव जीवन विकास में, और उस की उन्नति में, शब्द के योगदान पर चिन्तन किया था। जीवन को पुष्ट करने में भी शब्द की विस्मयकारक क्षमता का आसामान्य आकलन उन्हें था। हज़ारो वर्षों के बाद भी आज तक अन्य कोई संस्कृति ऐसी परिपूर्ण भाषा निर्माण करने में सफल नहीं हुयी है। भारत के लिए कितनी गौरवप्रद बात है; मैं सोचता हूँ।

(२)

भाषा विकास से जुडा है आध्यात्मिक उत्कर्ष

हज़ारों वर्षों तक, प्राचीन भारतीय ऋषि-मनीषि, भाषा के विकास कार्य में रत रहे। उस में परिपूर्णता लाने का निरन्तर प्रयास करते रहे। यह सारा परिश्रम केवल इस उद्देश्य से किया गया, कि वे अपने आप की (आत्मा की) दैवी प्रकृति का परिचय प्राप्त करे, उसे पहचाने।

इन वैय्याकरणियों की श्रद्धा थी, प्रोफ़ेसर व्यास ह्युस्टन कहते है, कि, –

”मानवीय चेतना की उत्क्रान्ति का क्रम-विकास, उसके भाषा-विकास के साथ अटूट रूप से जुडा हुआ है।”

उनके शब्दों में ”the evolution of human awareness is inextricably linked to the development of language.”

वाह ! वाह ! वाह !, क्या बात कही, आपने, प्रो. ह्युस्टन, अभी तो हम भारतीय भी इस सच्चाई को उपेक्षा के कारण भूल से गये हैं। कुछ सुशिक्षित भी इस सत्य को जानते प्रतीत नहीं होते, और अन्य भ्रांत-मति पढत-मूर्ख बची खुची संस्कृत की और संस्कृति की निरन्तर उपेक्षा करने में व्यस्त हैं।

(३)

संस्कृत की घोर उपेक्षा

एक ऐसे ही, भारतीय मूल के प्रमाण पत्र धारी विद्वान(?) हैं। वे, ऐसे ही बात बात में अपना अधकचरा ज्ञान प्रदर्शित करते करते कहने लगे, कि ”संस्कृत तो डेड लॅंग्वेज है। इस से जितना शीघ्र छुटकारा भारत पाएगा, उतना आगे बढ जाएगा।”

उन की आयु देख लोग उन से भिडते नहीं है। पर कोई विरोध न देख, वे अपने आप को कल्कि अवतार समझ बैठे, और भारत का उद्धार करने की भाव दशा में आ गए। फिर आगे बोले, कि सारा भारत यदि अंग्रेज़ी सीख जाएं, तो चुटकी में उन्नति हो सकती है। { मन ही मन मैं बोला। वाह ! वाह ! चुटकी में उन्नति?} वे बोले, नए शब्द तो संस्कृत स्वीकार करती नहीं, और पुराने दकियानूसी शब्दों से भारत आगे कैसे बढ पाएगा?

तो मैं ने उन्हें पूछा कि क्या आप संस्कृत शब्द का प्रयोग किए बिना आप की अपनी भाषा का एक वाक्य भी बोल सकते हैं? उन्हें भी शायद अज्ञान ही था, कि उनकी भाषा में भी ७० से ८० प्रतिशत तक शब्द संस्कृत मूल के हैं। पर उन्हें तत्सम और तद्-भव शब्दों के बीच भी भ्रम ही था। वे, तद्-भव शब्दों को संस्कृत के बाहर मानते थे।

मुझे विवेकानन्द जी का कथन स्मरण हो आया। कहते हैं, कि हमारा समाज पागल हो गया है, और ऐसा पागल?, कि, उस पागल को औषधि पिलानेवाले को ही थप्पड मारता है। अब ऐसे पागल समाज की थप्पड खाकर भी औषधि पिलानी है; तो आओ मुन्ना भाई, आपका स्वागत है, लगे रहो।

(४)

व्यास ह्युस्टन

अब इन पढत मूर्ख, भारतीय नमूनों के सामने अमरिकन ”व्यास ह्युस्टन” भी है। जो जानते हैं , कि हजारों वर्षों तक भाषा और लिपि, और वर्णाक्षर विकास का, सारा परिश्रम केवल इस उद्देश्य से किया गया, कि वे ऋषि मनीषी अपने आप की (आत्मा की) दैवी प्रकृति का परिचय प्राप्त करे, उसे पहचाने।

व्यास ह्युस्टन को, संस्कृत का ऊपर बताया वैसा ज्ञान हैं। जिनके प्रति, आपका आदर जाग्रत हुए बिना नहीं रह सकता। एक आंग्ल भाषी अमरिकन के लिए, संस्कृत का ऐसा ज्ञान होना, जो ऊपरि परिच्छेदों में व्यक्त किया गया है, असामान्य है।

कितनी लगन से उन्हों ने संस्कृत पढी होगी? और फिर पातन्जल योग दर्शन भी पढा है।

पर, मैं ने आज तक किसी भी संस्कृतज्ञ के लेखन में या भाषण में व्यास ह्युस्टन के कथन जैसा गूढ सत्य, जो विचार करने पर सहज बुद्धि गम्य ही नहीं पर ग्राह्य भी प्रतीत हो, ऐसे परम सत्य को परिभाषित करनेवाला विधान सुना नहीं था, या पढा नहीं था।

जानने पर आज तक मैं ने संस्कृत की जो उपेक्षा की, उस कारण पलकों के पीछे आंसू आ कर खडे हो गए।

(५)

वर्णाक्षरों की परिशुद्ध वैज्ञानिकता।

आगे व्यास ह्युस्टन कहते हैं, कि, इन प्राचीन भारतीय ऋषियों ने, एकाग्रता से, ध्यान दे कर, बार बार मुख से अलग अलग ध्वनियों का उच्चारण करते हुए, जानने का प्रयास किया, कि ध्वनि मुख-विवर के, किस सूक्ष्म अंग से, कैसे और कहाँ से जन्म लेती है?

उन्हों ने मुख-विवर का वैज्ञानिक अध्ययन किया, और ध्वनियों के मूल स्थानों को ढूंढ निकाला।

(६)

संकरित वर्ण संस्कृत में क्यों वर्ज्य़ है?

फिर और एक महत्व पूर्ण सत्य का स्फोट प्रो. ह्य़ुस्टन करते हैं; वे कहते हैं, कि उन—-

”ऋषियों ने उन्हीं ध्वनियों को भाषा के लिए चुना, जिनकी परिपूर्णता के विषय में कोई संदेह नहीं था; और जिन में शुद्धता थी, स्पष्टता थी, निःसंदिग्धता थी, और अनुनाद क्षमता थी।”

उदाहरणार्थ: च छ ज झ ञ यह सारे स्वतंत्र व्यंजन है। पर नुक्ता वाला ज़ उच्चारण और नुक्ता रहित ज के उच्चारण में स्पष्ट भेद सुनने में स्पष्ट नहीं होता, और न उन की पूरी स्वतंत्र, निःसंदिग्ध पहचान है। इस लिए ऐसे वर्णों को संकरित कहा गया। और, इन्हें, बिना स्वतंत्र पहचान के वर्ण मान कर, वर्जित समझा गया। इस लिए, आज कल चलन में आए हुए नुक्ता सहित ज़, फ़, जैसे अन्य वर्ण भी संकरित (संदिग्ध ) माने गए थे। इसी लिए उनका चयन नहीं किया गया।

कितनी महत्व पूर्ण बात है यह? इस लिए संस्कृत में ऐसे संकरित वर्ण नहीं है। ऐसी मिश्रित उच्चारण वाली प्रक्रिया को भी उन्हों ने ”वर्ण संकर” ही कहा था। इसका मूल कारण किसी भी प्रकार के संदेहात्मक उच्चारण से जो भ्रम को पुष्ट करने की क्षमता रखता हो, उस से दूर रहना था। अर्थका अनर्थ ना हो, इस शुद्धिवादी दृष्टिकोण से उनका चिन्तन हुआ था। किसी भी प्रकार की राज नीति से वे प्रेरित नहीं थे।

(७)

गुजराती मराठी दोनो में नुक्ता नहीं।

वैसे, गुजराती में नुक्ता नहीं है, मराठी के शब्द कोश में भी, किसी शब्द के साथ नुक्ता नहीं है।

आज भी गुजराती में नुक्ता रहित ”जरूर” ही पढा, बोला और लिखा जाता है। नुक्ता (या नुक्ते) को किसी भी शब्द में स्वीकारा नहीं जाता। यही परिस्थिति अन्य व्यंजनो या स्वरों की भी है। ”बृहद्‌ गुजराती कोश” किसी भी शब्द को नुक्ता सहित लिखता नहीं है। ”मराठी शब्द रत्नाकर” में भी नुक्ता कहीं, मुद्रित नहीं है। पर बोलचाल में, मैं ने कहीं कहीं पर शब्दों के उच्चारण में नुक्ता सुना हुआ है। कहीं कहीं गलत रीति से भी नुक्ता सुना है, जहां वह नहीं होना चाहिए।

(८)

भाषा से खिलवाड़

आज भाषा को लेकर जिस प्रकारका खिलवाड निकट दृष्टि के आधार पर चल रहा है, उसके लिए यह चेतावनी है। हजारों वर्षों तक जो लिपि और भाषा परिमार्जन का काम हमारे पूरखों ने किया, और जो धरोहर हमें देकर गए, उसे विकृत कर हम अगली पीढियों के लिए कौनसा भालाई का काम कर रहें हैं?

यह भाषा से खिलवाड केवल लिपि तक ही सीमित नहीं है। हिन्दी को भ्रष्ट करने का काम जिस गति से हो रहा है, वह उसे कुछ दशकॊ में नष्ट कर सकता है।

केल्टिक भाषा इसी प्रकारसे नष्ट हुयी थी। कभी आगे उसका इतिहास लिखा जाएगा।

संदर्भ:भाषा विज्ञान की भूमिका, Yoga Journal,Hinduism to day, शब्द रत्नाकर, गुजराती कोश

20 Responses to “संस्कृत है- ”भव्य ब्रह्मांडीय संगीत” –डॉ.मधुसूदन”

  1. ken

    (७)
    गुजराती मराठी दोनो में नुक्ता नहीं।
    Not only this,Gujarati language reformers prefer short
    u/ ु and long ee/ ीं instead of long uu/ ू and short
    i/ ि in writings with regular full stop.
    Along with Gujarati most world languages use modified modern alphabet in their writings.
    Devanagari script has modified few Vedic Sanskrit letters while Gujanagari script has dropped shirorekha along with few letters’ modification.
    If Sanskrit is godly and scientifically phonetic,then why these two sounds ॅ ॉ (कॅट,कॉट) are missing in traditional alphabet?

    Story of Sanskrit for Beginners
    http://palindia.wordpress.com/2014/08/24/story-of-sanskrit-for-beginners/#comment-115

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    • डॉ. मधुसूदन

      They were dropped due to ambiguity after consideration. READ VYAS HOUSTON…my friend. Read also Naom Chomsky and Prof. Stahl please.

      Reply
  2. मुकुल शुक्ल

    काश आपके ये उत्तम विचार हमारी नौकरशाही को भी समझ आए तो कितना अच्छा हो | हालांकि धीरे धीरे राष्ट्र जाग रहा है लेकिन फिर भी जितनी तेज़ी से इन विचारों का प्रसार किया जाना चाहिए थे वो नहीं हो रहा | साथ ही मोदी सरकार से भाषा के मुद्दे पर विशेष अपेक्षाएँ थी पर पिछले डेढ़ वर्षों से स्मृति ईरानी इस मामले कुछ करती नज़र नहीं आ रही हैं | आम जनता भी अंग्रेज़ के मोहपाश मे फंसी हुई नज़र आ रही है | उन्हे ये पता ही नहीं चल रहा की कैसे अनजाने ही वो अपने बच्चों को धीरे धीरे अंग्रेज़ बनाए दे रहे है | आज यहाँ जिन बड़ी बड़ी अमेरिकन कंपनियों के सी ई ओ भारतीय बताए जा रहे हैं यदि उनसे पूछा जाये तो वो खुद को भारतीय मानने से ही इंकार कर दें | यहाँ तक की जिन भारतीय मूल के सी ई ओ पर भारतवासी इतराते फिर रहे हैं वो तो खुद को उस मूल का मानते ही नहीं | ऐसा इसीलिए है क्योंकि हीं भावना से ग्रसित जो भारतीय विदेशों मे बसे उन्होने अपने बच्चों को अपने ही देश की भाषा से दूर रखा | परिणामस्वरूप देश का ब्रेन ड्रेन भी हुआ और लोगों ने अपना धर्म भी त्याग दिया | भाषा के इस महत्व को अब सरकारी स्तर पर कानून बना कर ही बचाया जा सकता है |

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    • डॉ. मधुसूदन

      धन्यवाद
      मुकुल जी। हमें कुछ समय उन्हें भी देना चाहिए। उन्हें शासन में टिकना भी है; जो आवश्यक है, साथ साथ मेरी दृष्टिसे वें जितनी शीघ्रता से सुधार कर सकते हैं, वे कर रहे हैं। विरोधक बहुत (काला) धनी है।
      पर, आलेख मैं उचित स्थान पर पहुँचा भी रहा हूँ।
      हमारी जनता को भी देश के (काला धन ) शत्रु और साथ अंग्रेज़ी भी भरमाँ रहे हैं।
      मेरे हिसाबसे हमारी भाषाएँ ही, हमारी समस्त जनता को शीघ्रता से आगे बढा सकती हैं।
      कुछ अंग्रेज़ी और अन्य ४ भाषाएँ गौण मात्रा में आवश्यक भी है; भारत को आगे बढाना है ही।
      पर एक स्वामित्व की वृत्ति चाहिए; दास्यता की नहीं।
      प्रवक्ता पर टिप्पणी नहीं पहुँच रही है, कुछ गडबडी लगती है।
      विवेकानन्दजी ने हिन्दू समाज को पागल कहा था। पागल को जो औषधि पिलाता है, उसे ही वह थप्पड मारता है।
      कुछ समय लगेगा।
      धन्यवाद
      (प्रवक्ता पर नहीं जाती)
      मधु झवे

      Reply
  3. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    भाषाओँ में जो सबसे अधिक -परिमार्जित,अद्द्तन,विज्ञान सम्मत,कर्णप्रिय ,स्मरणीय और सुसंस्कृत है , जिसकी लिपि देवनागरी है और जो विश्व की अधिकांस समृद्ध भाषाओँ की जननी है उसे संस्कृत कहते हैं.
    इसे देव वाणी और वेद वाणी भी कहते हैं. इसे जानने वाला पंडित और विप्र कहलाता है.

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन उवाच

      सविनय -धन्यवाद।
      एक कॉन्फ़ेरेन्स में आज ही, संस्कृत के विषय पर ही, मेरे द्वारा, एक शोध पत्र प्रस्तुति है।
      बंधु भाव सहित।

      Reply
  4. dr dhanakar thakur

    संस्कृतभारती के बारे में मुझे ज्ञात है
    जल्व्रित्त देखूंगा
    पर मैं सरलीकरण चाहता हूँ अनेक स्थानों पर तभी यह भारत की राष्ट्रभाषा फिर बन सकेगी
    कभी इस पर विस्तार से चर्चा करूंगा

    Reply
  5. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    प्रति श्री. डॉ. ठाकुर
    (१) आप–www Sanskritabharati .in
    पर शुल्क रहित पाठ देखिए। यह प्रायः (१५०+) प्रचारकों द्वारा बंगलुरू से, संचालित, शुल्क रहित संस्था, प्रति दिन १.५-२ घंटे -दस दिन पढा कर, बोल चाल की संस्कृत, सिखा देगी। उनका जाल स्थल देखें।
    हमारी युनिवर्सीटी में १० दिन का वर्ग लगाया था। संस्कृत प्रचारक-शिक्षक सभी के बहुत ही, प्रियपात्र बन चुके थे। ४० + भारतीय मूल के व्यक्तियों ने लाभ लिया। मेरी माताजी भी संस्कृत सीखने में पीछॆ नहीं थी। और एक मित्र की ७ वर्ष की बालिका भी।
    शाला जा कर–उसने तो चमत्कार तब किया, जब अंग्रेज़ी शाला में जाकर कहने लगी– मम नाम अंकिता। भवतः नाम किम्‌?
    गर्व से बोली” I know Sanskrit ?” Do you ?
    बच्चों को हीनता ग्रंथि है। अनुभव कहे बिना रहा न गया।

    (२)व्यास ह्युस्टन भारतीय नहीं है।कुछ अमरिकन नाम था उनका, पर व्यास नाम उन्हों ने स्वीकार किया हुआ है।
    बहुत बहुत धन्यवाद। संस्कृत भारती ना मिलने पर बताएं।

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      क्षमा करें| —एक गलत कह गया|
      सुधार कर पढ़ें|
      –“बच्चों को हीनता ग्रंथि नहीं है।
      अनुभव कहे बिना रहा न गया।”

      Reply
  6. dr dhanakar thakur

    रक्षा बधन ( आगामी २ अगस्त) को संस्कृत दिवस के रूप में आप में जो जहां है वहां मनावें. मैं रांची में अपने डेरे पर पिछले कई वर्षों से इसे मनाता हूँ और उ८स दिन हम सभी टूटी फूटी संस्कृत में ही बात करते हैं – प्रसव पारित करते हैं के एयः भारत की द्वितीय राष्ट्र भाषा घोषित हो- बिहार और झारखण्ड ने तो नाहे एपर उत्तराखंड ने ऐसा घोषित किया जो शायद हमारे अंतर्राष्ट्रीयमैथिली परिषद् की मान कंही छपने पर किसी ने उठाई और कर दी उन्हें धन्यवाद
    द्विवचन विहीन, तीन कालों वाली और भी अनेक प्रकार से सहज(यथा २ या अधिक 3, ४, आदि के लिए बहुवचन) बनाई संस्कृत ५ दिनों में सीखी बोली जा सकती है ऐसा मेरा मत है
    ॐ का क्या कहना – यह तो मूलमंत्र है अ उ म के रूप में सृस्टी , स्थिति , प्रलय का द्योतक है

    Reply
  7. Mohan Gupta

    जब भारत स्वतंत्र हुआ तब जवाहर लाल नेहरु ने आरम्भ में ही ४०० विअल्यो और महाविद्यालयों से संस्कृत पढाने पर रोक लगा दी जिस कारन भारत में संस्कृत पड़ने वाले और पड़ने वाले लोग वहुत कम लोग हो गए. स्वंतंत्र भारत में किसी भी प्रधान मंत्री या शिक्षा मंत्री ने संस्कृत भाषा पर ध्यान नहीं दिया . भारत में आजकल कुछ निजी संस्थाए संस्कृत पढाती हैं किन्तु उनकी आरती हालत अछी नहीं हैं. आवश्कता हैं के ऐसी संस्थाओ की सूचि तैयार की जाये अंग्रेजी भाषा के कारन संस्कृत ही नहीं बुल्के समस्त भारतीय भासयो की अवहेलना हो रही हैं. आजकल स्थिथि ऐसी है के संस्कृत को विदेशो में भारत से अधिक महत्व मिल रहा हैं. संस्कृत भाषा पिछले कई स्ताबदियो से प्रयोग में रहने के वाबजूद शुद्ध स्वरुप में विदमान हैं जबके भारत की कई अन्य भासए उर्दू और अंग्रेजी के शब्द ग्रहण करके असुद्ध हो गयी हैं . कई प्रसारण माध्यम के हिंदी प्रसारण सुन कर ऐसा लगता ही नहीं के प्रसारण हिंदी का था. संस्कृत एक पूरण और वैज्ञानिक भाषा हैं जिसमे नै शब्द वनाने की अपार कशमता हैं .संस्कृत जाने विना वैदिक वैदिक धरम का पुर्रन्त्य ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता . कंप्यूटर तकनीक का विकास करने में में संस्कृत भाषा का बहुत योगदान हैं. भारत के हर विदाल्या में संस्कृत भाषा की पढाई अनिवार्य होनी चाहिए . अनिल गुप्ता जी ने लिखा हैं के ॐ की ध्वनि पृथ्वी के सूर्य का चक्कर लगाते समय होती .मैंने भी यह बात पुस्तकों और लेखो में पड़ीं हैं. संस्कृत भाषो को विदेशी लोग महत्त्व दे रहे हैं. कुछ उद्धरण;
    Buenos Aires night club sways to Sanskrit melodies
    Soulful Sanskrit melodies interspersed with different genres of music entertain guests at Groove
    If you are in Buenos Aires don’t forget to visit this trendy night club because you will be in for a huge surprise! Here, you won’t come across salsa or reggaton music like most such places do, but soulful Sanskrit melodies that rent the air. “I had the most unusual night club experience last weekend when I was in Groove,” says R. Viswanathan, India’s ambassador to Argentina, Uruguay and Paraguay.
    New Zealand school teaches Sanskrit and claims it helps children understand English
    http://in.news.yahoo.com/zealand-school-teaches-sanskrit-claims-helps-children-understand-145613193.html
    Nevada (US), Jan 25 (ANI): A school in New Zealand has a ‘Sanskrit Language Studies’ program and claims that learning Sanskrit accelerates a child’s reading ability.
    Ficino School in Mt Eden area of Auckland (New Zealand), calls itself a ‘values-based academic institution’ and offers education for girls and boys from year one to eight. It says about Sanskrit: “It has a wonderful system of sound and grammar, which gives the child an excellent base for the study of any language. Children love its order and beauty.”
    संस्कृत, भारत की आत्मा !
    http://www.pravakta.com/sanskrit-heart-of-all-languages?utm_source=feedburner&utm_medium=email&utm_campaign=Feed:+pravakta+(PRAVAKTA+।+प्रवक्‍ता)
    संस्कृत भारत की एक बग्यानिक heritage हैं. वेबसाइट पर भी संस्कृत की शिक्षा दी जाती हैं .

    WONDERS OF SANSKRIT
    Kindly read and preserve it. It is wonderful.
    http://www-roc.inria.fr/who/Ramakrishna.Upadrasta/Sanskrit/14339015-The-wonder-that-is-Sanskrit.pdf
    The Language of the Gods”

    A New Dharma Video with Sri Dharma Pravartaka Acharya

    Sanskrit is known to be the world’s foremost spiritual language. It is the language of Yoga, of meditation, of Hinduism, and of Dharma. Sanskrit is a language that has been specially designed by its creators to most perfectly convey the myriad of subtle sounds, vibrational frequencies and sonic sequences necessary to the proper use of mantras.

    This amazing talk was taken from the introduction to a course on Sanskrit that will be available online as a twelve part video series starting August 20.

    WATCH THE FULL VIDEO HERE:

    Reply
  8. Vishwa Mohan Tiwari

    न केवल संस्कृत की घोर उपेक्षा हो रही है, संस्कृत – पुत्रियों की उपेक्षा उससे भी अधिक हो रही है..
    “भाषा संस्कृति की वाहिनी होती है, अत: भारत से भारतीय भाषाओं के क्षीण होने से भारतीय संस्कृति भी क्षीण होगी और उसके लुप्त होने का संकट मुँह बाए खड़ा है।

    Reply
  9. Rekha Singh

    ॐ अभी कुछ दिन पहले प्रोफ . मधु झवेरी जी के फेस बुक पेज पर प्रोफ . ब्यास हूस्टन जी और अमेरिकेन इंस्टिट्यूट ऑफ़ संस्कृत को देखा तो बड़ी उत्सुकता से पहले तो जोडने के लिए प्रार्थना की फिर थोड़ा कुछ पढ़ा लेकिन आज यह लेख पढकर बहुत ही प्रसन्नता हो रही है |श्रधावान लभते ज्ञानं |भारत मे और भारतीय मूल के बहुत सारे लोग अपनी मात्र भाषा भी ठीक से नहीं जानते और न जानना चाहते है , फिर संस्कृत तो मात्र भाषा की भी मात्र भाषा है |
    इस संसार मे तीन तरह के लोग होते है :
    (१)जो जिधर दुनिया जा रही है , उधर जाते है भेड़ और बकरी की तरह |
    (२)संस्कार बस अगर कुछ अच्छा या बुरा मिला तो चल पडे |विवेक ने साथ दिया तो सही नहीं तो गलत |
    (३)वे लोग वही करेगे जो अच्छा है |
    हम संस्कृत प्रेमी तीसरी श्रेनी मे आते है |हमारे खून और संस्कारों मे है संस्कृत भाषा |हमारी पूजा की भाषा है संस्कृत |सुंदर लेख के लिए धन्यबाद |ॐ

    Reply
  10. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    छात्रवत प्रिय अभिषेक और शशि शर्मा, प्रबुद्ध पाठक सर्वश्री, अनिल गुप्ताजी, इ पण्डितजी, प्रतिभा जी, एवम्‌ शकुन्तलाजी; आप सभी ने, अलग अलग पहलुओं पर अधिक प्रकाश डाला, जानकारी दी। मैं अनुग्रहित हूँ।विश्वास है, कि, अन्य पाठक भी आपकी टिप्पणियाँ, पढने पर, लाभान्वित ही होते होंगे।
    (१) अभिषेक के शब्द मुझे भाउकता से भर देते हैं और अपने को युवा अनुभव करने लगता हूँ।
    (२) अनिल जी ने जो ॐ के पीछे का रहस्य प्रस्तुत किया, वह बुद्धि प्रामाण्य के निकष पर खरा ही उतरेगा। मेरे ज्ञान में भी आपने वृद्धि ही की। हृदय तलसे, विनम्र धन्यवाद। इसका सत्य, अनुभव और प्रयोग पर जाँचा जा सकने की पूरी-पूरी क्षमता प्रतीत होती है।किसी ने प्रयोग कर लेखपत्र या ध्वनिकाएं (Audio) मुद्रित करना आवश्यक है।
    (३)इ पण्डित जी, माहेश्वर सूत्र से ही वर्णमाला और व्याकरण प्रारंभ होता है। मेरी अपनी श्रद्धा होते हुए भी, मैं जि्से, तर्क से सभी स्वीकार कर पाएं, ऐसा तर्क, देनेका (सफल-असफल) प्रयास करता हूँ। मेरी भी श्रद्धा आप जैसी ही है। शकुन्तला जी की टिप्पणी भी आपकी टिप्पणी को पूरकता ही प्रदान करती है।
    (४) तर्क ही सर्वमान्यता प्रदान करता है। श्रद्धा वयक्तिक मान्यता की स्वतन्त्रता अवश्य देती है; ऐसा मानता हूँ। और लेख को, सर्व मान्य बनाने का उद्देश्य है, होना चाहिए। इस लिए मर्यादाएं सुनिश्चित करके लिखता हूँ।
    (५) मैं जो पाठक तर्क, और विवादातीत प्रतिभाओं के विधान, इत्यादि पर विश्वास रखता है, उन्हें सरलता से (कुछ स्वानुभव की सीमा में),विचार करने पर स्वीकार्य हो, ऐसी मर्यादा में लिखने का प्रयास करता हूँ।
    (६)शकुन्तला जी ने जो तथ्य प्रस्तुत किए हैं, इस दृष्टि से पूरक ही माने जाएंगे। जब एक जर्मन विद्वान माहेश्वर सूक्त के विषय में कुछ कहता है; तो किसी को स्वीकार करने में कम कठिनाई होगी। मुझे जानकारी नहीं थी।
    मेरे अपने ज्ञान में वृद्धि ही हुयी। कृतज्ञ हूँ।
    (७) डॉ. शशि शर्मा से शुभ समाचार जाना बहुत अच्छी बात है। पर डर है, कि चिडिया हमारे पहले खेत चुग जाएगी।
    (८) प्रतिभा जी का संकेत संस्कृत की मंत्र शक्ति कॊ ओर है। ॐ का, श्वासोश्वास के नियमन सहित, उच्चारण आपको ध्यानावस्था में अल्पावधि में ले जाने की क्षमता रखता है। वेदों की मन्त्र शक्ति भी इसीका अनुभव कराती है।
    मैं ने तो संस्कृत-निष्ठ हिन्दी के भी सात्विक प्रभाव का अनुभव बहुत किया है।
    आपने अमूल्य समय देकर पढा, और टिप्पणियोँ से अनुग्रहित किया, हृदय तलसे, और विनम्रता पूर्वक धन्यवाद।
    व्यक्तिगत रूपसे प्रत्येक पाठक से सहमत ही हूँ। कुछ ऐसे बिन्दु भी(अनिल जी ने, शब्दांकित किए, जिनके विषय में मुझे भी जानकारी नहीं थी।
    मेरे द्वारा लेख में तथ्य, और तर्क का आधार लेकर प्रस्थापित करने का उद्देश्य रखता हूँ।फिर भी जब, मुझे आवश्यकता पडती है, तो जिनका कथन तटस्थ और सर्वमान्य होने से, सामान्य पाठक झिझकेगा नहीं, ऐसे देदिप्यमान व्यक्तित्वों का आश्रय लेता हूँ।
    धन्यवाद।छात्रवत प्रिय अभिषेक और शशि शर्मा, प्रबुद्ध पाठक सर्वश्री, अनिल गुप्ताजी, इ पण्डितजी, प्रतिभा जी, एवम्‌ शकुन्तलाजी; आप सभी ने, अलग अलग पहलुओं पर अधिक प्रकाश फेंका, जानकारी दी। मैं अनुग्रहित हुँ।विश्वास है, कि, अन्य पाठक भी आपकी टिप्पणियाँ, पढने पर, लाभान्वित ही होते होंगे।
    (१) अभिषेक के शब्द मुझे भाउकता से भर देते हैं और अपने को युवा अनुभव करने लगता हूँ।

    (२) अनिल जी ने जो ॐ के पीछे का रहस्य प्रस्तुत किया, वह बुद्धि प्रामाण्य के निकष पर खरा ही उतरेगा। मेरे ज्ञान में भी आपने वृद्धि ही की। हृदय तलसे, विनम्र धन्यवाद। इसका सत्य, अनुभव और प्रयोग पर जाँचा जा सकने की पूरी-पूरी क्षमता प्रतीत होती है।किसी ने प्रयोग कर लेखपत्र या ध्वनिकाएं (Audio) मुद्रित करना आवश्यक है।
    (३)इ पण्डित जी, माहेश्वर सूत्र से ही वर्णमाला और व्याकरण प्रारंभ होता है। मेरी अपनी श्रद्धा होते हुए, मैं जिस तर्क से सभी स्वीकार कर पाएं, ऐसा तर्क, देनेका (सफल-असफल) प्रयास करता हूँ। मेरी भी श्रद्धा आप जैसी ही है। शकुन्तला जी की टिप्पणी भी आपकी टिप्पणी को पूरकता ही प्रदान करती है।
    (४) तर्क ही सर्वमान्यता प्रदान करता है। श्रद्धा वयक्तिक मान्यता की स्वतन्त्रता अवश्य देती है; ऐसा मानता हूँ। और लेख को, सर्व मान्य बनाने का उद्देश्य है, होना चाहिए। इस लिए मर्यादाएं सुनिश्चित करके लिखता हूँ।
    (५) मैं जो पाठक तर्क, और विवादातीत प्रतिभाओं के विधान, इत्यादि पर विश्वास रखता है, उन्हें सरलता से (कुछ स्वानुभव की सीमा में),विचार करने पर स्वीकार्य हो, ऐसी मर्यादा में लिखने का प्रयास करता हूँ।
    (६)शकुन्तला जी ने जो तथ्य प्रस्तुत किए हैं, इस दृष्टि से पूरक ही माने जाएंगे। जब एक जर्मन विद्वान माहेश्वर सूक्त के विषय में कुछ कहता है; तो किसी को स्वीकार करने में कम कठिनाई होगी। मुझे जानकारी नहीं थी।
    मेरे अपने ज्ञान में वृद्धि ही हुयी। कृतज्ञ हूँ।

    (७) डॉ. शशि शर्मा से शुभ समाचार जाना।
    (८) प्रतिभा जी का संकेत संस्कृत की मंत्र शक्ति कॊ ओर है। ॐ का, श्वासोश्वास के नियमन सहित, उच्चारण आपको ध्यानावस्था में अल्पावधि में ले जाने की क्षमता रखता है। वेदों की मन्त्र शक्ति भी इसीका अनुभव कराती है।
    मैं ने तो संस्कृत-निष्ठ हिन्दी के भी सात्विक प्रभाव का अनुभव किया है।

    आपने अमूल्य समय देकर पढा, और टिप्पणियोँ से अनुग्रहित किया, हृदय तलसे, और विनम्रता पूर्वक धन्यवाद।
    व्यक्तिगत रूपसे प्रत्येक पाठक से सहमत ही हूँ। कुछ ऐसे बिन्दु भी(अनिल जी ने, शब्दांकित किए, जिनके विषय में मुझे भी जानकारी नहीं थी।
    दीर्घ टिप्पणी हो गयी। धन्यवाद।

    मेरे द्वारा लेख तथ्य, और तर्क का आधार लेकर प्रस्थापित करने का उद्देश्य रखता हूँ।फिर भी जब, मुझे आवश्यकता पडती है, तो जिनका कथन तटस्थ और सर्वमान्य होने से, सामान्य पाठक झिझकेगा नहीं, ऐसे
    देदिप्यमान व्यक्तित्वों का आश्रय लेता हूँ।
    शत शत धन्यवाद।

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  11. Shashi

    अब स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों ने भी संस्कृत की महत्वता की स्वीकार करना शुरू कर दिया है| कुछ दिनों पाहिले, आइ. आइ. टी के एक मित्र से बात के बाद पता चला कि आइ. आइ. टी देल्ही ने भी संस्कृत कि पढाई शुरू कर दी है| एन सी इ आर टी ने तो कक्छा तीन से दस तक संस्कृत अनिवार्य करने का फैसला किया है. ये सारी अच्छी खबरे है| एक आशा है कि भारतीय युवा आजकल सचेत हो रहा है, पर कांग्रसी बुड़ा रहे है और सरे आम, इतनी शुद्ध भाषा कि उपेक्षा करते है|

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  12. ePandit

    देववाणी संस्कृत की ध्वनियों का रहस्य महामुनि पाणिनि को माहेश्वर सूत्रों के रूप में स्वयं भगवान शिव से मिला था। ये ध्वनियाँ स्वयं नटराज ने ताण्डव नृत्य के दौरान अपने डमरू से उत्पन्न की थी। स्वयं परब्रह्म द्वारा प्रदत्त ध्वनियों वाली भाषा विलक्षण तो होगी ही।

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  13. शकुन्तला बहादुर

    Shakuntala Bahadur

    नुक़्ता अरबी,फ़ारसी भाषाओं से आया है। ज़,फ़,ख़ आदि ध्वनियाँ संस्कृत में नहीं है।हिन्दी में उर्दू के शब्दों के प्रयोग से आयी है।हिन्दी में क्रीड़ा,पीड़ा कहते हैं,जब कि संस्कृत मेंपीडा,क्रीडा शब्द हैं।जर्मनी के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के वैदिक विद्वान प्रो.पॉल थीमे(मेरे गुरु) पाणिनि के परम भक्त थे।बारहभाषाओं के ज्ञाता थे।उनका तुलनात्मक भाषाविज्ञान परअतिशय अधिकार था।वे कहते थे कि “सर्वप्रथम पाणिनि ने ही माहेश्वर सूत्रों की ध्वनियों के उच्चारणस्थान एवं उच्चारण हेतु किये गए प्रयत्नों को वैज्ञानिकता से और अति सूक्ष्मता से खोज निकाला था। बाद में अंग्रेज़ी में संस्कृत से ही वर्णों में ओष्ठ, नासिका, ,कंठ आदि को लिया गया। पाणिनि के समान
    दूसरा वैयाकरण नहीं हुआ।”खेद है कि जिस देवभाषा को विदेशों में इतना महत्त्व मिला है, भारत में उसकी उपेक्षा करके विदेशी भाषा का बोलबाला हो रहा है।

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  14. Abhishek Upadhyay

    सादर चरण स्पर्श ,
    अद्भुत.. मैंने पूर्व में भी इन अमेरिकी संस्कृत विद्वान् की वेबसाइट देखि थी , लेकिन आपके द्वारा इनका और इनके द्वारा संस्कृत की सेवा , महिमा के वर्णन को जानकार अत्यंत खुशी हुई और गर्व हुआ की अपने ही उद्गम में उपेक्षित संस्कृत भाषा के अतुल्यनीय गुणों के प्रचार प्रसार में एक अमेरिकी और भारतीय विद्वान अनवरत प्रयासरत हैं ! उपरोक्त लेख को पढ़कर संस्कृत भाषा के प्रति महती गर्व की अनुभूती हुई ! ऐसे ही और लेखों की प्रतीक्षा में ….

    अभिषेक उपाध्याय
    चित्रकूट (उ.प्र. ),bharaat

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  15. Anil Gupta

    मेरे पास किसी का इ मेल आया था जिसमे ये लिखा था की शब्द ॐ वास्तव में पृथ्वी के अपनी धुरी पर रोटेशन के दौरान उत्पन्न ध्वनि है. उसके अनुसार जब एक बिजली का पंखा ९०० आर. पी. एम्. की गति से घूमता है तो आवाज उत्पन्न होती है. इसी प्रकार जब पृथ्वी अपनी धुरी पर २०००० मील प्रति सेकंड की गति से घूमती है तो उससे जो ध्वनि उत्पन्न होती है वह ॐ है जिसे मह्रिषी विश्वामित्र ने समाधी के दौरान सुना और अन्य ऋषियों को बताया जिन्होंने इसे ब्रह्मनाद नाम दिया. और गायत्री मंत्र वास्तव में इस सत्य को बताने वाला मंत्र है. इस विषय में वैज्ञानिक शोध होनी चाहिए.

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