लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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ramडॉ, मधुसूदन
सूचना:
मित्रों के अनुरोध पर:
सरल श्लोकों का चयन, बालकों को हिन्दी-संस्कृत उच्चारण के अभ्यास के लिए।

सूचना:
(आप एक या आधी पंक्ति गाकर बच्चों को पीछे दोहराने के लिए कहें।)
अर्थ कभी भी समझा जा सकेगा। पर उच्चारण बालकपन के १० वर्षों में ही सुदृढ हो सकेगा।

शुद्ध उच्चारण
बालकों का शुद्ध उच्चारण सुनिश्चित करने में निम्न श्लोक सहायक होंगे।
संकलन में मनोरंजन के साथ साथ उच्चारण का भी ध्यान रखा है।
बालकों का पठन करते समय आप उच्चारण का विशेष ध्यान रखें।

उच्चारण में (जोडाक्षर के पहले वाले) जुडे हुए अक्षर के पूर्व के अक्षर पर बल होना चाहिए।
जैसे *अक्षर* के उच्चारण में अक्षर =*अक् +शर* की भाँति।
ऐसे श्लोक संस्कार भी है, और उच्चारण का अभ्यास भी है।

(१)
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥

(बालकों के लिए, यह श्लोक बहुत मनोरंजक होता है।
इसी से प्रारंभ करवाकर कण्ठस्थ करने में आसान होगा। एक
बार रुचि पैदा होने पर आप ही आप सीखना चाहेंगे।)

(२)
शैले शैले न माणिक्यं।
मौक्तिकं न गजे गजे॥
साधवाः न हि सर्वत्रं।
चन्दनं न वने वने ॥
—-हितोपदेश
{श, ण, क्त, ध, त्र, च, उच्चारण विशेष है}

अर्थ:
हर पर्बत पर माणिक नहीं होते, हर हाथी के माथेपर मोती नहीं होते ।
सज्जन या साधु भी हर जगह नहीं होते , और हर जंगल में चंदन के पेड नहीं होते ।
वास्तव में—–इस संसार में अच्छे लोग (वस्तुएँ) भारी मात्रा में नहीं मिलती।)
——————————————————————————————
(३)
अलसस्य कुतो विद्या।
अविद्यस्य कुतो धनम् ॥
अधनस्य कुतो मित्रम् ।
अमित्रस्य कुतो सुखम् ॥
विशेष उच्चरण {त, द्य, ध, त्र, ख, }
आलसी मनुष्य को विद्या कैसे मिलेगी? विद्या न होनेपर धन भी नहीं मिलेगा।
और धन नहीं, तो उसका कौन मित्र बनेगा ? फिर मित्र नहीं तो सुख कैसे पाएगा?
————————————————————————————–
(४)
आकाशात् पतितं तोयं।
यथा गच्छति सागरम् ॥
सर्वदेवं नमस्कार:।
केशवं प्रति गच्छति ॥

{विशेष उच्चारण त् , त, च्छ, द, स्क, प्र, }

आकाश से गिरा हुआ (वर्षा) पानी, जैसे नदियों से आखिर सागर से जा मिलता है; उसी भाँति सभी देवों को किया हुआ नमस्कार एक ही भगवान को पहुँचता है ।

9 Responses to “सरल श्लोकों से बाल संस्कार”

  1. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    Dear Ken —
    (1) I have almost, never heard proper
    plut, dirgh, rhasw and Shudh uchcharan from non-Indians.
    (2) STOP PROMOTING AN UNSCIENTIFIC SANSKRIT PRONUNCIATION.
    (3) You do not need plan to promote, imperfection.(It will happen by itself)
    (4) Following is the example of such.
    ढर्म क्सेट्रे कुरुक्सेट्रे समवेटा युयुट्सवाहा।
    मामकाहा पाण्डवाश्चैव किम कुर्वट संजय।
    आगे और…..
    यडा यडा हि ढर्मस्य ग्लानिर्बहवटी बहारट।
    अबह्युस्ठानमढर्मस्य टडाट्मानं स्रिजाम्यहम्‌
    फिर अंत हुआ….
    करारविण्डेण पडारविण्डं।
    मुकारविण्डे विनिवेशयण्टं॥
    वटश्य पट्रश्य पुटे शयाणं।
    बालं मुकुण्डं मनसा स्मरामि॥

    Reply
    • ken

      Dr.Madhusuudan,
      We spoil our own language by not teaching/writing correctly in Roman script. If Sanskrit Scholars can read Sanskrit in Roman script then why can’t we?
      Why most languages are taught to others in Roman script but not in highly complex Devanagari script?

      अ आ इ ई उ ऊ ऍ ए ऐ ऑ ओ औ अं अः……………Devanagari
      a ā i ī u ū æ e ai aw o au aṁ aḥ…………………Roman……aw/law ,bat/bæt
      a a: i ii u uu ae e ai o: o au am ah………………Type able
      a a: i ee u oo ae e ai aw o au am ah

      धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
      मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१-१॥
      यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत !
      अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम !!
      करारविन्देन पदारविन्दं
      मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् ।
      वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं
      बालं मुकुन्दं मनसा स्मारामि ॥१॥

      dharmakṣetre kurukṣetre samavetā yuyutsavaḥ |
      māmakāḥ pāṇḍavāścaiva kimakurvata sañjaya ||1-1||
      yadā yadā hī dharmasya glānirbhavati bhārata !
      abhyutthānamadharmasya tadātmānama sṛjyāhama !!
      karāravindena padāravindaṁ
      mukhāravinde viniveśayantam |
      vaṭasya patrasya puṭe śayānaṁ
      http://www.virtualvinodh.com/wp/aksharamukha/

      May be our pundits fail to modify old Brahmi script but westerner did to their proper use. We need more research in this area.
      One may see how many letters resemble to current Roman script!
      http://www.omniglot.com/writing/brahmi.htm

      You may join this group.
      https://groups.google.com/forum/#!forum/samskrita

      Reply
      • डॉ. मधुसूदन

        Dr. Madhusudan

        KEN
        (1) I have taught college through English
        Medium for 3 decades.
        (2) Used to believe *Bharat can progress through
        English only.* (Do not believe today)
        (3) Had few awards, medals, and recognition.
        (4) Last 10 years, study of Sanskrit, and
        Hindi changed me thoroughly.
        (5) I know Gujarati, Marathi, Hindi,
        Sanskrit, English and some German at Ph D.
        (6)FOUND MOST OPPONENTS OF SANSKRIT OR HINDI
        IGNORANT OF HINDI AND SANSKRIT.
        (7)IGNORANCE OF SANSKRIT IS THE ROOT OF
        OPPOSITION OF HINDI AND/OR SANSKRIT.
        (7)SERIOUS THOUGHTS AND STUDY IS BEHIND MY
        POSITION.
        Tell me–
        ==> Do you know Hindi and Sanskrit (both)–
        before opposing them? Or you think you can oppose them without
        knowing them? <====
        EXPECT REAL DELAYED REPLY.

        Reply
        • ken

          Yes, I was taught Hindi and Sanskrit in my high school years in highly complex Devanagari script.
          In internet age, India needs to provide equal education through transcription,translation and transliteration in simple script.

          Reply
          • डॉ. मधुसूदन

            Dr. Madhusudan

            Good. Then please write an article to convince
            the readers of Pravakta.

  2. ken

    Dr.Madhusuudan,
    I prefer nuktaa ,shirorekha ,anusvar ,chandrabindu, long U,short i and dandaa-full stop free translatable ,transliteratable and write as you pronounce type global Hindi maintaining all needed speech sounds.
    This type of Hindi is spell mostly checker free , easy to teach ,learn read ,understand and transliterate.

    (१)
    श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम
    श्रीराम राम भरताग्रज राम राम
    श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
    श्रीराम राम शरणन् भव राम राम .

    (बालकॉ के लीए, यह श्लोक बहुत मनोरन्जक होता है.
    इसी से प्रारन्भ करवाकर कण्ठस्थ करने मॅ आसान होगा.एक
    बार रुची पैदा होने पर आप ही आप सीखना चाहॅगे.)

    (२)
    शैले शैले न माणीक्यम्
    मौक्तीकम् न गजे गजे .
    साधवाः न ही सर्वत्रम्
    चन्दनम् न वने वने .
    —-हीतोपदेश
    {श, ण, क्त, ध, त्र, च, उच्चारण वीशेष है}

    अर्थ:
    हर पर्बत पर माणीक नही होते, हर हाथी के माथेपर मोती नही होते .
    सज्जन या साधु भी हर जगह नही होते , और हर जन्गल मॅ चन्दन के पेड नही होते .
    वास्तव मॅ—–इस सन्सार मॅ अच्छे लोग (वस्तुएॅ) भारी मात्रा मॅ नही मीलती.)
    ——————————————————————————————
    (३)
    अलसस्य कुतो वीद्या
    अवीद्यस्य कुतो धनम् .
    अधनस्य कुतो मीत्रम्
    अमीत्रस्य कुतो सुखम् .
    वीशेष उच्चरण {त, द्य, ध, त्र, ख, }
    आलसी मनुष्य को वीद्या कैसे मीलेगी? वीद्या न होनेपर धन भी नही मीलेगा।
    और धन नही, तो उसका कौन मीत्र बनेगा ? फीर मीत्र नही तो सुख कैसे पाएगा?
    ————————————————————————————–
    (४)
    आकाशात् पतीतम् तोयम्
    यथा गच्छती सागरम् .
    सर्वदेवम् नमस्कार:
    केशवम् प्रती गच्छती .

    {वीशेष उच्चारण त् , त, च्छ, द, स्क, प्र, }

    आकाश से गीरा हुआ (वर्षा) पानी, जैसे नदीयॉ से आखीर सागर से जा मीलता है; उसी भाॅती सभी देवॉ को कीया हुआ नमस्कार एक ही भगवान को पहुॅचता है .
    Roman Transliteration:
    1)
    śrīrām rām raghunandan rām rām
    śrīrām rām bharatāgraj rām rām
    śrīrām rām raṇakarkaś rām rām
    śrīrām rām śaraṇan bhav rām rām .

    (bālakô ke līe, yah ślok bahut manoranjak hotā hai.
    isī se prāranbh karavākar kaṇṭhasth karne mæ āsān hogā.ek
    bār rucī paidā hone par āp hī āp sīkhnā cāhæge.)

    (2)
    śaile śaile na māṇīkyam
    mauktīkam na gaje gaje .
    sādhavāḥ na hī sarvatram
    candanam na vane vane .
    —-hītopdeś
    {śa, ṇa, kta, dha, tra, ca, uccāraṇ vīśeṣ hai}

    arth:
    har parbat par māṇīk nahī hote, har hāthī ke māthepar motī nahī hote .
    sajjan yā sādhu bhī har jagah nahī hote , aur har jangal mæ candan ke peḍ nahī hote .
    vāstav mæ—–is sansār mæ acche log (vastueॅ) bhārī mātrā mæ nahī mīltī.)
    ——————————————————————————————
    (3)
    alasasy kuto vīdyā
    avīdyasy kuto dhanam .
    adhanasy kuto mītram
    amītrasy kuto sukham .
    vīśeṣ uccaraṇ {ta, dya, dha, tra, kha, }
    ālsī manuṣy ko vīdyā kaise mīlegī? vīdyā na honepar dhan bhī nahī mīlegā|
    aur dhan nahī, to uskā kaun mītr banegā ? phīr mītr nahī to sukh kaise pāegā?
    ————————————————————————————–
    (4)
    ākāśāt patītam toyam
    yathā gacchatī sāgaram .
    sarvadevam namaskār:
    keśavam pratī gacchatī .

    {vīśeṣ uccāraṇ t , ta, ccha, da, ska, pra, }

    ākāś se gīrā huā (varṣā) pānī, jaise nadīyô se ākhīr sāgar se jā mīltā hai; usī bhāॅtī sabhī devô ko kīyā huā namaskār ek hī bhagvān ko pahuॅcatā hai .

    Reply
  3. दुर्गा शंकर

    आलसी मनुष्य को विद्या कैसे मिलेगी? विद्या न होनेपर धन भी नहीं मिलेगा।
    और धन नहीं, तो उसका कौन मित्र बनेगा ? फिर मित्र नहीं तो सुख कैसे पाएगा?
    ********************************
    उपरोक्त पंक्ती पूर्णतया सही है परन्तु ये अज्ञान का सन्देश देती है । धन से नही प्रेम से मित्र बनते है । धन से बने मित्र तो धन के जाते ही छूट सकते है परन्तु प्रेम से बने मित्र अटूट रहते है। इसलिए विद्या वही है जो सत्य का ज्ञान करा इतनी विनम्रता ले आए कि झुक जाए पर टूटने न पाए ।

    धन्यवाद । नमश्कार ।

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      आ. दुर्गाशंकर जी–टिप्पणी पर धन्यवाद।
      पर, यह व्यावहारिक संदर्भ में हितोपदेश (?) में, राज पुत्रों को सिखाया गया है।
      और सारा बल आलसी न होनेपर है। आध्यात्मिक संदर्भ में नहीं है। आप अपने पुत्र को विद्यार्जन में आलस त्यागने ही कहेंगे।

      Reply

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